रविवार, 1 दिसंबर 2019

हत्यारा (कविता) : सुशील कुमार भारद्वाज

                                                   
हत्यारा
★★★★★★★

आँखों के भ्रम को यूँ न दिल से लगाइए कि
दिल और दिमाग काम करना ही कर दे बंद सही में।
आखिर किस बेजा पर एक हत्यारे को सही
और दूसरे को गलत करार देते हो?
हत्यारा तो केवल हत्यारा होता है।
वह जिस्म का हत्यारा है तो
मानवता और इंसानियत कहाँ शेष बची है?
ढ़ूंढ़ रहे हो तुम हत्यारे की जाति-धर्म?
कहाँ ढ़ूढ़ पाओगे तुम संस्कार और रिश्ते?
सभी यहीं पले-बढ़े हैं, हमसब के बीच!
हत्यारे को तो तुम पैदा कर रहे हो हर रोज
अपनी स्वार्थपरता की अँधी दौड़ में।
किसी हत्यारे को पूजते हो घर- मंदिर में,
और किसी हत्यारे को देते हो गाली!
तुम ही तो हत्यारों के लिए आते हो अदालतों में,
और देते हो मानवाधिकार की दलील।
कौन कहता है कि नहीं बैठा है हत्यारा
घर से बाहर तक अपने घात में?
जरा-सी गुस्ताखी तो करो
हत्यारे की विरोध की।

★★★★★★★★★★★★★
सुकुभा

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