बुधवार, 17 मई 2017

उषाकिरण खान का संस्मरण

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान हिन्दी और मैथिली साहित्य में एक महत्वपूर्ण नाम है। कहानी, उपन्यास के साथ -साथ वे अन्य विविध क्षेत्रों में भी ससमय दखल देती रहती हैं। पिछले दिनों उनके फेसबुक वॉल पर एक संस्मरण नजर आया जिसमें उन्होंनें भारतीय संस्कृति में जबरदस्त पैठ बनाये पर्दा -प्रथा का जिक्र किया है। आप भी पढ़कर देखें। पसंद आएगी।


१३मई कावह दिन तूफ़ानी  था सन १९६८ में तुहिन और मेरे भतीजे सोमू का मुण्डन बाबा वैद्यनाथ धाम में होने वाला था । मैंपटना में थी तनु के जन्म की तारीख़ तय थी ऐसे में बाबा का फ़रमान कि तुहिन को लेकर बाबा धाम आ जाओ पर रामचन्द्र खान साहब झींकते हुए अंशु (अनुराधा शंकर) तुहिन को लेकर चल दिये मुझे मेरे छोटे भाई विश्वेश और सहेलियों स्नेहलता तथा लीला सिंह यादव के भरोसे। दरभंगा से आनेवाली गाड़ी बरौनी जंक्शन पर  बदलनी पड़ती । पूरा हुजूम बरौनी मे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ नाश्ता पानी करने में लग गया । मेरे ससुर जी ने छोटी सी अटेची सासुजी को पकड़ाते हुए बोले-सम्हालिए कै राखू टका छै।घुटने तक घूँघट वाली सासु माँ ने रख लिया। कई बार मेरी माँ ने और ससुरजी नेकहा कि घूँघट हटाकर बैठें पर वो नहीं मानी । ट्रेन आते ही सब चल पड़े सासुमां बैठी रह गईं। तब घूँघट सरकाया देखा सारे तो चले गये ,वो रोने लगीं पर बैठी रही ।ससुर जी ने देखा अर्द्धांगिनी छूट गईं ।वो अगले स्टेशन पर उतर गये और स्टेशन मास्टर से कहकर बरौनी मे अनाउन्स करवाया कि स्टेशन पर बैठी गंगा देवी प्रतीक्षा करे उनके पति श्री बहादुर खां शर्मा आ रहे हैं।सासुजी के कान खड़े हुए । एक सिपाही आया और पूछा कि आप ही गंगा देवी हैं? आग्रह किया कि चलकर वेटिंग रूम में बैठें आपके पति आ रहे हैं । पर वो टस से मस न हुईं।ससुरजी के आने पर ही उठीं। दरअसल यह शहर की ओर उनकी दूसरी यात्रा थी।
मुण्डन वग़ैरह हुआ और रामचन्द्र जी रात में ही लौट आये ।दूसरे दिन सुबह ७बजे से कुछ आभास हुआ ।हम महेन्द्रू के पी एन सिन्हा रोड में थे वहाँ से पी एम सी एच निकट ही था। रिक्शेपर मैं गई । वहाँ मेरी क्लासमेट्स इन्टर्नशिप कर रही थीं वो पास आ गईं ।जा नरौने के साथ होंगी सो मुझे खिलाने चाय पिलाने की जुगत में भिड़ गईं । वह दिन बुद्ध पूर्णिमा का था सो स्टाफ़ गंगा नहाने चले गये थे १२ बजे तनु का जन्म हुआ जिसे हमारी सहेलियाँ सुलेखा और माला ने संभाला । साफ कर जब सामने आई तो इसे गोद लेने की होड़ मच गई सफ़ेद गहरे भूरे घने घुंघराले केशवाली ८-३० पौंड की बच्ची।
सन्ध्या ६-३० मे हम रिक्शे में बैठकर घर की ओर चले कि ज़ोरदार आँधी आई । रिक्शावाला और रामचन्द्र जी ने पकड़ कर रखा मेरे कमज़ोर हाथों में तनु दबी पड़ी थी। घर में अंशु और तुहिन उमा नामक मेड और भाई प्रतीक्षा में थे ।तुहिन तथा अंशु ने लैक्टोकेलेमाइन वग़ैरह से मेकअप किया था नये बच्चे को इम्प्रैस करने को ।

सोमवार, 15 मई 2017

बिहार वाली बस : ( सुशील कुमार भारद्वाज)

बिहार वाली बस
सुशील कुमार भारद्वाज



बस में चढा तो भीड़ बहुत थी लेकिन चढ़ना भी मज़बूरी थी. पूरे एक घंटे के इंतज़ार के बाद बस जो आई थी. मालीपुर जैसे छोटे इलाके के लिहाज से स्थिति कोई बुरी नहीं थी. ट्रक, ऑटो और जीप तो सरपट दौड़ ही रहे थे. फर्क बस इतना था कि गाडियां हसनपुर और रोसड़ा की ओर जा रही थीं और मुझे जाना था बेगूसराय.
अब सुबह-सुबह तो सबकी अपनी मज़बूरी होती है ऐसे में बस को आखिर छोड़े तो कौन? उसमें भी आज ठंढी हवा जाते हुए माघ महीने का एहसास कराने के लिए फिर से धमक चुकी है.
बस में तिल रखने भर की भी जगह न सूझती थी, पर कंडक्टर था कि न तो बार-बार गाड़ी रुकवाने से बाज आता था न ही भूसे की तरह आदमी को ठूंसने से. संयोग से बीस मिनट की धक्का –मुक्की के बाद मुझे एक सीट मिल ही गया. ओह! खुशी के क्या कहने? लगा जैसे जग जीत लिया. सारे कष्ट दूर. सच भी था कि बेगूसराय तक तो शायद ही कोई मुझे उठाने की हिमाकत करता. ठाठ से बैठने के बाद खिड़की की ओर मुंह करके हरे भरे बगीचे और खेत को देखने लगा तो देखते ही रह गया. आंखों के साथ-साथ मन को भी अजीब सुकून मिला. खेत से लगे ही आम, जामुन, लीची, बेल, कटहल, चौह, शीशम, पीपल, बरगद, ताड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. पटना में ये नज़ारे अब कहां नसीब होते हैं? जो कुछ पेड़–पौधे सड़क किनारे या यहां–वहां थे, वे भी सड़क चौड़ीकरण, पुल–निर्माण आदि के नाम पर गायब हो गए. एक कसक उठी. क्या इस हरियाली की परिकल्पना अब कंक्रीट के जंगल बने शहरों में की जा सकती है? यहां भी जो हरियाली बची हुई है वह भी कब तक बची रह पाएगी? वर्षों पहले घने बगीचे नज़र आते थे लेकिन अब यहां भी सड़क किनारे खेत तेजी से बाजार बनते जा रहे हैं. जमीन के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं. कभी ये पेड़ –पौधे घरों की शोभा हुआ करते थे. अब गाँवों में भी स्थिति बुरी होती जा रही है. अभाव के दौर में लकड़ी भी इतने महंगे होते जा रहे हैं कि गाँव के लोग भी खिड़की –कवाड़ी के लिए लोहा, स्टील या प्लाई का इस्तेमाल करने लगे हैं. अब तो गरीबों के घर में भी लकड़ी के फर्नीचर दुर्लभ-वस्तु बनते जा रहे हैं. समझ में नहीं आता कि आने वाली पीढ़ी साल, शीशम बरगद और पीपल के पेड़ सचमुच में देख भी पाएगी या फिर शहरीकरण के अंधी दौर में वह सिर्फ तस्वीरों से संतोष करके रह जाएगी? कितना दुर्भाग्यपूर्ण वह दिन होगा जब बच्चे ये पूछने को मजबूर हो जाएगें कि फल-फूल पेड़–पौधों से आते हैं कि फैक्टरी से? हंसी भी आती है खुद की बातों पर. लेकिन डर भी लगता है भविष्य की बातों से.
“मर साला मर” की तेज आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी. सिर घुमाकर देखा तो सामने सांवले रंग के एक युवक अपने तेवर में दिखा. सिर पर काली टोपी, और गले में माला और चैन गडमड थे. तैश में वह साथ की महिला पर चिल्ला रहा था– “ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा.”
एक चुप्पी के बाद, “ये साला बिहार देश नहीं सुधरेगा! देखो, दिल्ली, पंजाब और कलकत्ता में. कैसे लोग कायदे से रहते हैं? दिल्ली की बसों में इतनी भीड़ रहती है क्या? वहां दस–दस मिनट पर गाड़ी हैं, मेट्रो है. और यहां साला दो घंटे में एक मरियल–सी बस चें-पों करते हुए आवेगी और भूसे की तरह आदमी पर आदमी लाद कर ले जावेगी .... साला यहां का आदमी भी मुर्दा है. कभी कुछ नहीं बोलेगा... सिर्फ राजनीति करेगा.... इसको –उसको सबको प्रधानमंत्री बनावेगा बकिर बस सुविधा के लिए कोई नहीं बोलेगा. ट्रेन के लिए कोई नहीं बोलेगा?”
“चुप भी करिये. बस में क्यों तमाशा करते हैं?” – साथ की महिला उसे चुप कराने की गरज से कही. बच्चा बस में चढ़ गया था. आगे वाली सीट के पास ही खड़ा था. कंडक्टर से ही काहे नहीं पूछ लेते हैं कि लड़का वहां है कि नहीं?”
“साली, मैं कंडक्टर से पूछूँगा? तू खुद क्यूँ नहीं आगे जाकर देख आती है?”
“कितने जिद्दी आदमी हैं? मैं महिला होकर, इतने लोगों की कश्मकस भीड़ में अब आगे जाकर देखूं लेकिन मर्द होकर आप नहीं जावेंगें?” – चेहरे का भाव बदलते हुए गुस्से में महिला बोली.
“जादे फटर–फटर मत कर साली! तूझे अपने बेटे की नहीं पड़ी है तो मैं क्यूँ इस भीड़ में मरने जाऊँ?... तेरा बेटा है ..तू जान ...”
“क्यों इतना शोर मचा रहे हो भाई? आपका बच्चा यहीं पर खड़ा है.” कंडक्टर की आवाज आई.
“मरने दे हरामखोर को. इतनी आवाज दे रहा हूं. साला एक जबाब तक नहीं देता है.”
“अब चुप करों भाई. पूरे बस को सिर पर उठा रखा है.” – कंडक्टर ने शांत कराने के गरज से उसे डपटा.
गुस्से से तमतमाकर युवक “साला मैं अपना बच्चा खोज रहा हूं और ये बस वाला कहता है– पूरे बस को सिर पर उठा रखा हूं. हद हो गई. कहां का न्याय है? मेरा बेटा भूला जाएगा तो ये बस वाला मुझे बेटा लाके देगा क्या? ..... अपनी औकात ही भूल जाता है?.... एक मरियल बस का कंडक्टर क्या बन गया, पता नहीं खुद को क्या समझने लगा है.... यही बात दिल्ली में बोलता तो इतनी मार पड़ती कि होश ठिकाने लग जाते.......”
“बस रोको बस” – कंडक्टर अचानक तैश में आते हुए बीच में ही बस रूकवाते हुए बोला – “उतरो जी ... उतरो... दिल्लीवाली बस से ही जाना ... बिहारवाली बस तुम जैसों के लिए नहीं है.”
और एक झटके के साथ बस सड़क पर खड़ी हो गई. अच्छा खासा तमाशा बन गया. गाली-गलौज सब हो गया. सिर्फ हाथ उठना बच गया. कंडक्टर हाथ भी चला बैठता यदि जो लोगों ने बचाव नहीं किया होता. कुछ लोग उसको नीचे उतरवाने पर तुले थे तो कुछ ने मानवता दिखलाते हुए कहा –“अरे भाई, माफ कर दो, कहां बीच जंगल में छोड़ोगे? बीबी –बच्चे साथ में हैं. बेगूसराय पहुंचा दो .... अभी नया नया शहर का हवा लगा है... समय के साथ अपने ठीक हो जाएगा.”
काफी मानमनौवल के बाद बस खुली. दो लोगों ने अपनी सीट भी छोड़ दी जिसमें वह युवक अपने बीबी–बच्चे के साथ बैठ गया. उसके बाद बस में सिर्फ हल्की कानाफूसी होती रही. बस चलती –रूकती बेगूसराय पहुँच गई और बस-स्टैंड में लोग सारी बातों को भूल अपने –अपने रास्ते चले गए.


रविवार, 14 मई 2017

सआदत हसन मंटो की कहानी : खोल दो

मंटो की कहानी "खोल दो" अपने -आप में एक बहुत ही सारगर्भित  कहानी है जो एक साथ कई बिन्दुओं को रेखांकित करती है। कहानी में जहाँ काफी कुछ खुली नजरों से दिखती है वहीं बहुत कुछ ईशारों में कही गई है। याकि बचाव के पक्ष में कोई कह सकता है कि मंटों की यह सबसे बड़ी गलती रही जो शायद बहुत ही साहसी और स्पष्टवादी होने के बाबजूद कहने से चूक गये। यह सच है कि विभाजन एक दंश के रूप में उभरा था जो शायद ही किसी को प्रियकर रहा हो सिवाय राजनेताओं और बलवाइयों और लूटेरों के। राजनेताओं को गद्दी दिख रही थी तो असभ्य या जरूरतमंद मौकापरस्तों को माल-असबाब और अस्मत लूटने का एक बहाना। साम्प्रदायिकता और दंगा जैसे शब्द उन लुटेरों के लिए कितने मायने रखते हैं? प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उनको क्या स्वार्थ दिखता है यह भी गौरतलब है। निस्वार्थ भाव से कितने कार्य होते हैं मुझे नहीं मालूम लेकिन कहानी से यह जरूर परिलक्षित हो जाता है कि रजकार कितने भलमानस थे? उसे सकीना में न बेचारगी दिखी न तरस की गुंजाईश। दिखी तो सिर्फ शायद उसकी चढ़ती जवानी, जिसकी मदद तो शायद कहीं नहीं दिखती अलबत्ता उसकी पहचान ही उसके मरणासन्न तक के दुःख का कारण जरूर बन गई। वे शोषक हिन्दू थे या मुसलमान या सिर्फ बहशी दरिंदे या फिर नेक -फरिश्ते-- यह तो सिर्फ विचार का विषय है। संभव है उन रजकारों ने अपना फरीश्ताई स्वरूप कुछ लोगों को दिखाया हो लेकिन उस दंगें की आग में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के सरहद को बार-बार पार करने के बदले में वे क्या पा रहे थे ? क्या खो रहे थे शायद किसी को मालूम नहीं और मालूम था तो आवाज उठाने की हिम्मत नहीं। मरणासन्न सकीना यदि हिलती -डुलती है तो जितना मानवता शर्मसार होती है उतनी ही खुशी एक पिता को पुत्री को पा जाने की है। लेकिन क्या जिंदगी यहीं रूक जाती है? नहीं। फटेहाल पिता उसके किस किस जख्म को और किस हद तक किस रूप में भरने की कोशिश करेगा? क्या वह जिंदा बचकर भी किसी जिंदा लाश से कम है?
मंटों की यह कहानी न सिर्फ विभाजन के त्रासदी का चित्रांकन है बल्कि यह समय समय पर समाज में दिखने वाले हर विद्रूप का रेखांकन है। आज पढ़ते हैं सआदत हसन मंटो की कहानी "खोल दो"

अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए।
सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं। वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था। उसके होशो-हवास गायब थे। उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था।
गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं। तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा। ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना...सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया।
पूरे तीन घंटे बाद वह ‘सकीना-सकीना’ पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला। चारों तरफ एक धांधली-सी मची थी। कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी। सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतड़ियां बाहर निकली हुईं थीं। उससे आगे वह और कुछ न सोच सका।
सकीना की मां मर चुकी थी। उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी , जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था, "मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ।"
सकीना उसके साथ ही थी। दोनों नंगे पांव भाग रहे थे। सकीना का दुप्पटा गिर पड़ा था। उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था। सकीना ने चिल्लाकर कहा था "अब्बाजी छोड़िए!" लेकिन उसने दुप्पटा उठा लिया था।....यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब का तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुप्पटा था, लेकिन सकीना कहां थी?
सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका। क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था?- क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी?- रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए?
सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था। उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ जितने भी इनसान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी। सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की। आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे।
छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुसत हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे। आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं। सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआऐं दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है... मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी...उम्र सत्रह वर्ष के करीब है।...आंखें बड़ी-बड़ी...बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल...मेरी इकलौती लड़की है। ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा।
रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढे¸ सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी।
आठों नौजवानों ने कोशिश की। जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए। कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली।
एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी। लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया। रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे। एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया। देखा, तो बहुत खूबसूरत थी। दाहिने गाल पर मोटा तिल था। एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?
लड़की का रंग और भी जर्द हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है।
आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की। उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया। एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी।
कई दिन गुजर गए- सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली। वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला। रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे।
एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा। लारी में बैठे थे। सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया। लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला?
सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा। और लारी चला दी। सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया।
शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई। चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे। उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी। लोग उसे उठाकर लाए हैं। सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया। लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए।
कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया। कमरे में कोई नहीं था। एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी। सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा। कमरे में अचानक रोशनी हुई। सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना
डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है?
सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं...जी मैं...इसका बाप हूं।
डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो।
सकीना के मुद्रा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी। बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है-। डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।
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शनिवार, 13 मई 2017

तीन तलाक और वकीलों की नैतिकता (आलेख):राजकिशोर

गरीब से गरीब जनता के लिए न्याय की आखिरी मंजिल के रूप में जानी जाती हैं अदालतें। फिर भी सांसों को रोके हर निर्णय की ओर टकटकी लगाये ये लोग टूटने लगते हैं जब उनकी अपेक्षाओं पर कुठाराघात होता है। धन के बदौलत न्याय और अन्याय की महीन कड़ी को धूमिल कर देने के बाबजूद आखिरी उम्मीद भी यही है चाहे इसके लिए मानवता और नैतिकता तार-तार क्यों न हो जाय। और आज जब तीन तलाक पर एक खुली बहस चारो ओर छिड़ी हुई है वैसी स्थिति में तीन पूर्व भारतीय कानून मंत्री का सुप्रीम कोर्ट में एक -दूसरे के विरूद्ध बहस करना काफी कुछ सोचने को विवश करता है। और इस संदर्भ में रविवार डाइजेस्ट के संपादक राज किशोर जी का आलेख गौरतलब है। आप स्वयं पढ़कर देखें।


तीन तलाक और वकीलों की नैतिकता
राजकिशोर

तीन तलाक की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में जिस मसले पर विचार किया जा रहा है, उसका सर्वाधिक रोचक पहलू है, वकीलों की नैतिकता। इस मुकदमे में विभिन्न पक्षों की ओर से तीन पूर्व कानून मंत्री भी दलील दे रहे हैं। इनके नाम हैं – कपिल सिब्बल, राम जेठमलानी और सलमान खुर्शीद। सलमान खुरशीद इस मुकदमे में कोर्ट मित्र हैं। उनके अनुसार, तीन तलाक एक गुनाह है और यह शरीयत का हिस्सा कदापि नहीं हो सकता। कपिल सिब्बल और राम जेठमलानी के मुवक्किल तीन तलाक के पक्षधर हैं, इतः इन दोनों वकीलों की कोशिश है कि तीन तलाक की प्रथा बनी रहनी चाहिए। चूँकि तीन तलाक के मुकदमे में दो ही पक्ष हो सकते हैं – हाँ और नहीं का, इसलिए ये पूर्व केंद्रीय मंत्री दो अलग-अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यदि कोई तीसरा पक्ष भी हो सकता है, तो हो सकता है उसकी तरफ से दलील देने वाला कोई और पूर्व कानून मंत्री खड़ा हो जाता।

सामान्य वकीलों की नैतिकता के बारे में हम जानते हैं :  उनकी कोई नैतिकता नहीं होती। अदालत में वे क्या कहेंगे, यह उन्हें मिलने वाली फीस पर निर्भर है। जो उनकी फीस देने को तैयार हैं, वे उसका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे। वे इस पर बिलकुल विचार नहीं करेंगे कि जिसका ब्रीफ वे ले रहे हैं, वह अपराधी है या बेगुनाह। उनका प्रोफेशन अपनी फीस ले कर अपराधी को बेगुनाह या बेगुनाह को अपराधी साबित करने की कोशिश करना है। नाथूराम गोडसे के पास भी वकील थे, जिनका तर्क था का कि गांधी जी के हत्यारे को हत्यारा नहीं कहा जा सकता। मुंबई होटल हत्याकांड के अभियुक्त कसाब को कोई वकील नहीं मिल पा रहा था। कसाब के कहने पर बंबई हाई कोर्ट ने उसके लिए एक वकील नियुक्त कर दिया। उस वकील ने न्यायालय का सम्मान करते हुए कसाब के पक्ष में तर्क-वितर्क किया, पर चाहता तो वह भी उच्च न्यायालय से क्षमा माँग ले सकता था। नहीं तो वह कसाब को ही यह कानूनी सलाह दे सकता था कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और अदालत से माफी माँग ले। हो सकता है, तब कसाब को शायद फाँसी के फंदे पर न चढ़ना पड़ता। सब कुछ जानते हुए भी बेचारे वकील को कसाब को निर्दोष साबित करने के लिए अपने कानूनी ज्ञान और अनुभव का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि उसका पेशा यही ठहरा।

जो लोग वकालत के पेशे में हैं, वे कह सकते हैं कि हम अदालत नहीं हैं, वकालत हैं। हर आदमी को कानूनी मदद पाने का हक है। जिस तरह कोई डॉक्टर किसी घायल का इलाज करने से इस आधार पर मना नहीं कर सकता कि वह स्वयं हत्यारा है और किसी की हत्या करने के प्रयास के दौरान ही उसे यह चोट लगी है, उसी तरह कोई वकील भी ऐसे मुवक्किल की कानूनी मदद करने से मना नहीं कर सकता, जो हत्या करने के बाद सीधे वकील के चैंबर में चला आया है और जिसके हाथों पर मकतूल के खून के छींटे चमक रहे हैं। इस तर्क में खोट यह है कि हर जख्मी आदमी को स्वस्थ होने का अधिकार है। जेल में भी डॉक्टर होते हैं और युद्धबंदियों का भी इलाज किया जाता है। लेकिन हर अपराधी को एक वकील मिलना ही चाहिए, यह तर्क नैतिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।    

फिर भी साधारण वकील को उसकी इस अनैतिकता के लिए माफ किया जा सकता है, क्योंकि यह उसके पेट का सवाल भी है। लेकिन हमारे पूर्व कानून मंत्रियों को क्या हुआ है? वे क्यों एक-दूसरे का विरोध कर रहे हैं? जब वे कानून मंत्री थे, तब उन्हें निश्चित रूप से तीन तलाक प्रथा के खिलाफ होना चाहिए था। इसका एक बड़ा कारण यह है कि वे भारत के संविधान से बँधे हुए थे जो सरकार को यह निर्देश देता है कि वह एक समान निजी कानून बनाने का प्रयास रेगी। जब सभी भारतीयों के लिए एक समान निजी कानून बनेगा, तो क्या उसमें तीन तलाक जैसी घिनौनी चीज को शामिल किया जा सकता है? अब मोटी फीस पाने के बाद उनमें से कुछ की राय बदल गयी है और वे तीन तलाक का समर्थनकर रहे हैं, तो कम से कम मैं उन्हें भद्र व्यक्ति (जेंटलमैन) कहने के लिए बाध्य नहीं हूँ।
फेसबुक वॉल से साभार।

समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी राधेश्याम तिवारी की रचना "कनस्तर में गंगा" पर


              राधेश्याम तिवारी उन कवियों में हैं, जो आदतन बिना किसी दबाव के कविता लिखते रहे हैं। सच यह भी है, कविता जब जीवन से जुड़ी होगी तो उसका कला-स्तर जैसा भी होगा, मान्य होगा, इसलिए कि एक सच्चे कवि के लिए मनुष्य-जीवन हमेशा ज़रूरी होता है, महान आलोचकों की बताई हुई कला नहीं। एक सचेत कवि मनुष्य-जीवन को अधिक महत्व देगा-ही-देगा। राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के साथ अकसर यही करते हैं। कवि अपनी कविता में इसीलिए हर प्यार वाली झिड़की पाने के लिए मनुष्य-जीवन के बिलकुल क़रीब खड़ा रहता आया है। पढ़ते हैं कवि-समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी राधेश्याम तिवारी की रचना "कनस्तर में गंगा" पर।

                                                                                  'कनस्तर में गंगा' ( राधेश्याम तिवारी ) : एक ऐसे कवि की कविताएँ जो सूअर को सूअर और कुत्ता को कुत्ता बोलने का हुनर जानता है
● शहंशाह आलम

कविता को जहाँ से आना होता है, वह आती है। एक सत्य यह भी है कि कविता को जहाँ पर आना होता है, आ जाती है। यूँ कहिए कि कविता को आने के लिए कोई दिन, कोई तारीख़ अथवा कोई समय पहले से मुक़र्रर नहीं होता। अब कोई दुष्ट आदमी यह कह सकता है कि अपनी दुष्टता सिद्ध करने के लिए जब वह दिन, तारीख़ और समय वह निर्धारित कर सकता है तो कोई कवि अपनी कविता के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता। अब जो दुष्ट है, वह ऐसा ही कुछ सोचेगा। लेकिन कवि किसी कविता को आने देने के लिए ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता। कविता जब आप जागे हैं, तब आती है। आप सोए हैं, तब भी आ सकती है। और आप सोए से उठकर कविता क़लमबद्ध कर लेते हैं। अब कोई कवि देवता तो होते नहीं कि खर्राटे मारकर अपनी कविता पूरी कर लेंगे, जैसे देवता लोग खर्राटे मारते हुए भी अपना सारा काम कर लेते हैं, ऐसा देवता-कवि-प्रेमी लोगों से सुना है। हालाँकि मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि जो कवि अपने को देवता टाइप मानते होंगे, वे खर्राटे भरते हुए कविता पूरी नहीं कर लेते होंगे। लेकिन राधेश्याम तिवारी समकालीन हिंदी कविता के देवता-कवियों में नहीं हैं। अगर देवता-कवि होते तो अपने कनस्तर में गंगा को बचाए रखने की बात नहीं करते। टीन के बने कनस्तर में हम सिर्फ़ पानी भर नहीं रखते, घी, तेल, आटा आदि भी रखते हैं। आम आदमी से गहरे भावनात्मक जुड़े कवि राधेश्याम तिवारी को मालूम है कि आम आदमी के कनस्तर से घी, तेल, आटा आज की सरकारों ने कबका चुरा लिया है। अब 'नमामि गंगे' के नाम पर आज की संवेदनहीन सरकारें बची-खुची गंगा भी ग़ायब कर देंगी, इस कवि को पता है। कवि को यह भी पता है कि आज की सरकारें जब ख़ुद अपने हिस्से की सारी गंदगी गंगा में डालती आई हैं तो 'नमामि गंगे' का हश्र क्या होगा, यह हमें स्वत: जान लेना चाहिए। यही वजह है कि राधेश्याम तिवारी जैसे कोमल, विनम्र और कठोर जनता के कवि अपनी सद्य प्रकाशित कविताओं की किताब का नाम 'कनस्तर में गंगा' रखते हैं। ताकि कहीं नहीं तो जीवन को बचाए रखने वाली गंगा कवि के कनस्तर में ही बची रहेगी। यह हमारे समय का सौभाग्य है कि सरकारें जब आम आदमी के हिस्से का सारा कुछ हड़प लेने के इंतज़ार में घात लगाए बैठी हैं तो आम आदमी के हिस्से का सबकुछ कवि बचाने के जतन में लगा है। राधेश्याम तिवारी की कोशिशें और इनकी बेचैनियाँ इस बात में अधिक हैं कि इनकी कोई कविता व्यक्तिवादी न होकर उस जमात के लोगों के लिए हो, जो समय के हर हिस्से से बेदख़ल कर दिए जाते रहे हैं। मेरा ख़ुद का यही मानना है कि जो कविताएँ वंचित समाज, वंचित जन, वंचित समय के लिए लिखी जाती हैं, वे ही कविताएँ कविता-इतिहास में बहुमूल्य बनी रहेंगी :

          लुधियाना स्टेशन पर
          अगर कभी आप जाएँ
          और सामान हो कुछ ज़्यादा
          तो बिल्ला नम्बर-56 की कुली
          आपके सामने खड़ी मिल जाएगी
          भारतीय रेल के इतिहास में
          यह पहली महिला कुली है
          जिसका नाम है मायादेवी
          जो सत्ता की मायादेवियों से अलग है

          मायादेवी अपने यूनिफॉर्म में
          सुबह नौ बजे
          हाज़िर हो जाती है स्टेशन पर
          और दिन ढलते ही चली जाती है घर
          वहाँ भी उसके लिए
          बोझ कुछ कम नहीं है
          जिसे वह धरती की तरह वहन करती है
          फिर भी वह जीवन से नहीं हारी
          उसे पूरा भरोसा है
          कि उसका इकलौता बेटा
          एक दिन ज़रूर बनेगा
          रेलवे अधिकारी

          वह बेटे को पढ़ाकर
          अपने दिवंगत कुली पति का
          सपना पूरा करना चाहती है
          जो एक असाध्य रोग का
          हो गया था शिकार
          मायादेवी को अनुकंपा पर
          मिला है यह आधार
          उसे बिल्ला देते हुए
          रेलवे के बाबू को
          कुछ संशय ज़रूर हुआ था
          मगर अब उसे मायादेवी पर गर्व है

          पहले-पहल लुधियाना स्टेशन पर
          जब वह मिली थी
          तो पत्नी ने अचरज से पूछ लिया
          'क्या तुम कुली हो?'
          सामान उठाते हुए
          मायादेवी ने कहा -
          'बहन जी,
          औरत के लिए इसमें नया क्या है…!'

          उस समय लगा
          जैसे पूरी धरती लुधियाना स्टेशन हो
          और हर स्त्री मायादेवी ( 'बिल्ला नम्बर-56', पृ. 17-18 )।

     राधेश्याम तिवारी की कविताएँ दो टूक, जिसे आप खरी-खोटी कहना कहते हैं, हमारे हिस्से का जो कुछ कहना होता है, कह जाती हैं। हमारे समय के महान आलोचकों के इस बयान से बेफ़िक्र कि दो टूक कहने वाली कविताएँ अपना वास्तविक सौंदर्य खो चुकी होती हैं। अब कोई सोची-समझी कविता लिखेगा, तब न कविता के सौंदर्य को बचाने का मामला आड़े आएगा। राधेश्याम तिवारी उन कवियों में हैं, जो आदतन बिना किसी दबाव के कविता लिखते रहे हैं। सच यह भी है, कविता जब जीवन से जुड़ी होगी तो उसका कला-स्तर जैसा भी होगा, मान्य होगा, इसलिए कि एक सच्चे कवि के लिए मनुष्य-जीवन हमेशा ज़रूरी होता है, महान आलोचकों की बताई हुई कला नहीं। एक सचेत कवि मनुष्य-जीवन को अधिक महत्व देगा-ही-देगा। राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के साथ अकसर यही करते हैं। कवि अपनी कविता में इसीलिए हर प्यार वाली झिड़की पाने के लिए मनुष्य-जीवन के बिलकुल क़रीब खड़ा रहता आया है।

     राधेश्याम तिवारी बीज को बोने के बाद उसके बढ़ने का इंतज़ार करते हैं। इसी बोए हुए बीज के पास खड़ा रहकर इस धरती को सेतु बनाते हुए हर रोज़ नई सुबह का स्वागत भी करते हैं ताकि कवि का अपना भोर आए और कवि मजूर के, किसान के, दुकानदार के, कुली के, रिक्शा-ठेले वाले साथियों के पसीने की गंध से अपनी कविताओं को सराबोर कर सके। कवि इसी देह-गंध में विभोर रहना चाहता है, मस्त-मत्त रहना चाहता है। यह सब होना यहीं संभव है। आप पेड़ काटते जाएँगे, राधेश्याम तिवारी पेड़ उगाते जाएँगे। आप अँधेरा खड़े करते जाएँगे, राधेश्याम तिवारी आपके खड़े किए अँधेरे को अपने चराग़ से गिराते जाएँगे। यह कमाल यही कर सकते हैं, सो राधेश्याम तिवारी यह कमाल करते चले आ रहे हैं। तभी 'कनस्तर में गंगा' की कविताएँ हर उस आदमी की तरफ़ हाथ बढ़ाती हैं, जो मनुष्य-जीवन को किसी-न-किसी तरह बचाए रखने में विश्वास रखते हैं। आज हर तरफ़ रंजो-ग़म यानी चिंता और दुःख पसरा हुआ है। ऐसे में कविताएँ जब आदमी को सहारा देती हैं तो आदमी अपनी चिंता, अपना दुःख कुछ देर के लिए ही सही, अपने जीवन के पतझड़ के पत्तों को भुलाकर अपने शहद-से मीठे दिनों को याद ज़रूर कर लेता है : मेरा आना तो / उसी दिन तय था / जिस दिन शुरू हुई / पृथ्वी बनने की प्रक्रिया / पृथ्वी के साथ-साथ / मैं भी बनने लगा / धीरे-धीरे / तब यह पृथ्वी अग्निपिंड थी / फिर भी मैं उसी तरह बचा रहा / जिस तरह / बाघिन के जबड़े में /  दबा उसका बच्चा / लम्बे समय तक आग के साथ रहते हुए / इसी से आत्मीयता हो गई गहरी / कि आज भी उसकी गर्माहट / मुझमें मौजूद है / इससे दूर होते ही / ठंडा हो जाता है बदन / बर्फ़ की तरह / कौन जानता था / इस पृथ्वी पर / लौटूँगा बार-बार मैं / रूप बदल-बदलकर / नदी की तरह कहाँ-से-कहाँ होता हुआ / मैं यहाँ पहुँचा हूँ / लेकिन यह तो तय है / कि मेरे भीतर / सृष्टि का वह प्राणी / अभी तक जीवित है / वह पहला प्राणी भी कोई और नहीं / मैं ही हूँ / धरती के सभी मनुष्यों में / मेरी ही व्याप्ति है / यह है एक ऐसा मर्म / जिसे जान लेने के बाद / एक लगने लगी है पृथ्वी / सारी नस्लें / और सारे धर्म / करोड़ों वर्ष बीत गए / इस धरती माँ के साथ रहते हुए / आगे भी रहना है अनंत काल तक / इसी के साथ / कहना है बस यही / जब तक यह धरती रहेगी / किसी न किसी रूप में / बचा रहूँगा मैं भी / मेरे हैं सारे धर्म / सभी नाम मेरे हैं / इसीलिए यह मत पूछना / कि मैं कौन हूँ / मैं वह मौन हूँ / जिसकी अभिव्यक्ति / भाषा में संभव नहीं ( 'भाषा में संभव नहीं', पृ. 11-12-13 )।

     राधेश्याम तिवारी की कविताएँ किसी हरीफ़ के ख़िलाफ़ लिखी गई कविताएँ नहीं हैं। तब भी ये कविताएँ घुट-घटकर जी-मर रहे आदमियों की कविताएँ ज़रूर हैं। आज का पूँजीवादी, आज का सत्तावादी, आज का सट्टावादी, आज का कट्टरतावादी, आज का धर्मवादी, आज का मारकाटवादी, आज का जातिवादी, आज का शत्रुवादी समय हम कवियों की जमात को सिर्फ़ इसलिए अलग-थलग करता आया है कि हमारी जमात ऐसे किसी समय की भर्त्सना सदियों से करते आई है और इसीलिए यह जमात सदियों से वंचितों की जमात में शामिल है। यहाँ उन दरबारी कवियों के बारे में क़तई नहीं कहा जा रहा, जो सत्ता के संरक्षण में रहते हुए हमेशा ख़ुद को सुरक्षित-संरक्षित रखते आए हैं। ये वे कवि होते हैं, जिन्हें सत्ता की निंदा और लांछन और गाली झेलनी नहीं होती है। जबकि राधेश्याम तिवारी वंचित कवियों की जमात के कवि हैं यानी सत्ता की निंदा और लांछन और गाली सुनने वाली जमात के कवि हैं। इसमें संदेह नहीं। उजाड़ रास्ते के कवि-सरीखे राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के ज़रिए भटके हुए मुसाफ़िरों को बेहद उम्दा तरीक़े से रास्ता दिखाते हैं। इनके 'सागर प्रश्न', 'बारिश के बाद', 'इतिहास में चिड़िया' के बाद आया 'कनस्तर में गंगा' कविता-संग्रह की कविताएँ पहले की कविताओं से ज़रा अलग तेवर और मिज़ाज की कविताएँ हैं। ऐसा इसलिए कि इस ताज़ा संग्रह की कविताओं में कवि सूअर को सूअर और कुत्ता को कुत्ता कहने की हिम्मत किसी प्रार्थना की तरह नहीं बल्कि इस अँधेरे के जंगल में पूरी ताक़त लगाकर कहता है। कवि का यह रंगो-नूर थोड़ा जुदा है, थोड़ा अलहदा है और थोड़ा नई चमक लिए हुए भी है। 'कनस्तर में गंगा' की कविताओं के ये रंग 'शब्द-संवेदन', 'शब्द-भंगिमा' तथा 'धारा के विरुद्ध' खण्डों के माध्यम से प्रकट किए गए हैं। पहले हिस्से में चौदह, दूसरे में उनचास तथा तीसरे में तेईस कविताएँ हैं। राधेश्याम तिवारी की इन सारी कविताओं की चमक ऐसी है, इन कविताओं का मंज़र ऐसा है, इन कविताओं का विस्तार ऐसा है कि ये कविताएँ हमारी रगों में दौड़ने को बेक़रार दिखाई देती हैं। यह सच है कि कवि के आगे हमेशा खुला आसमान रहता है और कवि जो चाहता है, जब चाहता है, जैसा चाहता है धूप को अपनी क़लम से लपेटकर लिख डालता है :

          भूख  है  तो  भोजन  नहीं
          भोजन  है  तो  भूख  नहीं
          प्यास  है  तो   पानी  नहीं
          पानी  है  तो   प्यास  नहीं
          घास  है  तो  घोड़ा   नहीं
          घोड़ा  है  तो   घास  नहीं
          जिसे       नहीं       चाहा
          वह    कितना   पास   है
          जिसे      बहुत     चाहा  
          वह    मेरे  पास     नहीं ( 'वह मेरे पास नहीं', पृ. 33 )।
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कनस्तर में गंगा ( कविता-संग्रह ) / कवि : राधेश्याम तिवारी / प्रकाशक : संजना प्रकाशन, डी-70/4, अंकुर एन्कलेव, करावल नगर, दिल्ली-110090 / मोबाइल संपर्क : 08860898399 / मूल्य : ₹300


समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद, पटना-800015 / मोबाइल : 09835417537

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गलती किसकी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज


निराशा के अंधकारमय वातावरण में जो चमकती हुई चीज नजर आती है उसमें लोगों का विश्वास जमता है। उसमें वे एक रहनुमा का अक्स देखते हैं। इसी सहारे उसे एक तय वक्त देते हैं लेकिन जब वह उस उम्मीद पर खड़ा नहीं उतरता है तो वे उसे क्षमा करने की स्थिति में भी खुद को नहीं पाते हैं। आश्चर्य जैसी कोई बात यहाँ नजर नहीं आती। क्रांति की चाह सबकी होती है क्योंकि बदलाव हर कोई चाहता है पर कोई रहनुमा नहीं बनना चाहता है क्योंकि हर इंसान बीबी -बच्चा वाला है। घर-परिवार की समस्याओं से उसे फुर्सत कहाँ है जो वह देश -समाज की बात सोच सके। उसके पास फुर्सत है तो सिर्फ किसी को गरिया लेने का। देश- दुनिया में सबको भ्रष्ट और सबसे अनैतिक करार देने की क्षमता है। वह घूसखोरी के खिलाफ सौ पेज का भाषण उड़ेल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे पहले लेन-देन कर मामले को शांतिपूर्वक निपटाने का भरसक प्रयास करेगा। विफलता की स्थिति में ही शायद वह क्रांतिकारी के रूप में नजर आए वर्ना उनके पास सफाई के सौ अफसाने जरूर होंगें। मूढ़ जनता तब भी थी आज भी है। फुर्सत है किसके पास कि कोई किसी के फटे में टाँग अड़ाए। कहा गया है न कि जिनके घर खुद शीशे के हों वो दूसरों ......। दरअसल में बात वही है। यहां बेदाग है कौन? जिस तरह भगवान बुद्ध ने अपने बेटे के मृत्यु के दुख से दुखी बुढिया को कहा था कि यदि तुम एक मुट्ठी सरसों ला दो तो मैं तुम्हारे संतान को जिंदा कर दूँगा बशर्तें उस घर में आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई ह़ो। बुढ़ी अम्मा अपने संतान की खातिर किस किस दरवाजे नहीं गई? लेकिन अंत में निराशा के सिवाय मिला क्या? और बुद्ध को भी वह कोई दोष नहीं दे पाई । कहीं न कहीं वही स्थिति हमारी भी है। कोई भी इंसान न तो परिपूर्ण है न पूर्ण परिपक्व और न ही दोष रहित। इंसानी खामियां उसे भी कहीं न कहीं किसी मोड़ पर समझौता करने को मजबूर कर देती हैं। लेकिन जिन्हें हम भगवान मान लेते हैं उनसे हम गलती होने की अपेक्षा ही कहाँ रखते हैं? और शेष काम के लिए तो आलोचक दिन -रात मौके की ताक में तो आँखें बिछाये बैठे ही रहते हैं। फिर विवश होकर सोचना ही पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? इतनी अपेक्षाओं को पालने को किसने कहा था? किससे पूछकर हमने दूसरे पर इतना विश्वास कर लिया? किस भरोसे हमने दूसरे के कंधे पर अपनी उम्मीदें लाद दी? क्या यह न्यायसंगत था? फिर बाबेला किस बात का? यदि जो गलती खुद की है तो भुगतो। दूसरे को गरियाने से क्या मिलने वाला है सिवाय अपने अंदर की गंदगी से बाहरी समाज और वातावरण को गंदा करने के?

धंधा है चलता ही रहेगा ः सुशील कुमार भारद्वाज


लगातार जारी है और जारी ही रहेगा। ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। भूतकाल में भी लोगों ने इनके जलवे देखे हैं लेकिन वो क्या कहते हैं न कि थेथरई इतनी जल्दी छुटती नहीं। चोरी करके भी सीनाज़ोरी करके गर्व से आगे बढ़ते जाते हैं। आखिर उनका दोष भी कहाँ है? दोषी तो शायद वे हैं जो सबकुछ जानकर भी उनके अंधभक्त हैं। उनके छिछाले में भी उनके अद्भूत कारनामें और हिम्मत देखते हैं। उनके जयकारे में ही सारी शक्ति उड़ेल देते हैं। दुःख में भी चूँ करने की हिम्मत नहीं कर पाते। इसलिए नहीं कि उन्हें बोलना नहीं आता बल्कि इसलिए कि उन्हें अपने थूके को ही चाटना पड़ेगा। चाहे ऐंठन कितनी ही क्यों न पड़ जाए वे हिलेंगें नहीं और जो कहीं हिल गये तो समझ लो कि उनको कोई नया आका मिल गया। वह संरक्षित और सुरक्षित महसूस कर रहा है। फिर तो वह विभीषण की तरह अपने पुराने घर में भी आग लगाने से नहीं चुकेगा। आखिर राजनीतिक दांवपेच सीख कर ही तो वे यहाँ तक पहुँचे हैं। आखिरकार क्योंकर उनसे कोई ईमानदारी की आस लगाये बैठा है। अब तो ईमानदारी की आस लगाना ही बेईमानी है। अभी भी शक है तो मारते रहो अंधेरे में तीर। निशाने पे गया तो भी वाह वाह चूक गया तो भी वाह वाह। अपना क्या है? हम तो कह देंगें - राम राम भाई राम राम।

बुधवार, 3 मई 2017

कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की संक्षिप्त टिप्पणी

कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की  टिप्पणी


योगेंद्र आहूजा मूलत:  कहानीकार हैं, लेकिन उनकी हर कहानी अपने गर्भ में औपन्यासिक जीवन की समग्रता और संश्लिष्टता छिपाए हुए है। चूंकि वे मौन के सर्जक कलाकार हैं, और शब्दों के किफायती प्रयोक्ता, उनकी कहानियां संदर्भों-संकेतों से अटी पड़ी हैं। कहानियों में घटनाएं हैं, लेकिन विवरण न के बराबर। उन घटनाओं के भीतर छुपे राजनीतिक षड़यंत्रों, सांस्कृतिक संदर्भों, आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों को एक-दूसरे की संगति में गुने बिना लेखक के मूल आशय को समझना कठिन हो जाता है। चूंकि उनकी कहानियां उद्बोधन का स्थूल और दंभपूर्ण 'सृजनात्मक पाखंड' नहीं रचतीं, संवाद के सहारे अपने और परिवेश के भीतर की थाह लेकर साझा रणनीति बनाने की दुर्धर्ष लड़ाई लड़ती हैं, इसलिए पाठक को उनकी कहानियों में यहां-वहां बिखरे संकेतों को ब्यौरों में, ब्यौरों को युगीन विडंबनाओं के आर्तनाद में, और आर्तनाद को सृजन की सूक्ष्म अर्थव्यंजनाओं में तब्दील करते हुए खुद ही अपने आस्वाद तंत्र को विस्तृत और गहन करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए कहानी 'एक्यूरेट पैथोलॉजी' में निरुपित पहली ही घटना को लिया जा सकता है जो पात्र, वातावरण और ब्यौरों के साथ घुलमिल कर समय की सीमा के आर पार व्यवस्थागत विघटन और मानवीय शोषण की एक-सी कहानी रचने लगती है।


कौतूहल को जगाना और उत्तरोतर उसी के सहारे त्रासदी की चरम अवस्था में संघर्ष के बीज बो आना योगेंद्र आहूजा की कथा-शिल्प की खासियत है। कहानी की शुरुआत वे गनपत नाई के बारे में एक स्टेटमेंट से करते हैं - ''आख़िरी दाढ़ी उसने पच्चीस साल पहले उसी दिन बनाई थी, उस साल के आखरी दिन जब . .  .।'' लेकिन नहीं, पाठक के प्राण कंठ तक अटका कर वे जानबूझकर वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। न, दरअसल वही बने रहते हैं - शब्दकार नहीं, कैमरामैन की तरह। बस, कैमरे का फोकस बदल देते हैं। गनपत के निर्णय से नहीं, उम्रदराज गनपत के अनुभवों से अब वे बावस्ता हैं जो दूर से ही दमन और उत्पीड़न की आहट तो लेना जानता है, उससे जूझना नहीं, और इस प्रक्रिया में अपनी ही जड़ता में वह एक के बाद एक घटनाओं के जरिए वक्त को विकरालतर होते देखने को बाध्य है। पाठक थोड़ी सी राहत भरी सांस लेकर गनपत के अनुभवों में डूबने की तैयारी करता ही है कि योगेंद्र आहूजा कैमरे का एंगिल पहली स्टेटमेंट के छूटे अंतिम शब्द पर केंद्रित कर देते हैं - ''जब . . . झंडापुर चौराहे पर . . . दो आदमी मार दिए उन्होंने, एक कोई हाशमी साहब, एक रामबहादुर . .  ।''
पाठक सन्न! तो यह गनपत की नहीं, प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की हत्या की कहानी है? वह अपने से ही सवाल पूछता है खूब आशंकित होकर। संशय की ठोस वजह भी है उसके पास। अभी.अभी लेखक के कैमरे की आंख से उसने एक बेहद भयावह लेकिन कलात्मक चित्र देखा था। 31 दिसंबर की ठिठुरती रात के घने अंधेरे में अपने सैलून में असहाय सा अकेला खड़ा है गनपत। लाइट नहीं है, इसलिए अंधेरे की काली परतों को चीरने के लिए धुंआती ढिबरी जल रही है।  प्रकाश की लौ कितनी मद्धम और कंपकपाती क्यों न हो, वह अंधेरे के शाप में बिंधे अक्स को धुंधला धुंधला उजागर कर ही देती है। फिर यह ढिबरी तो सैलून में जल रही है जहां ग्राहक और हज्जाम दोनों की सुविधा के लिए हर दीवार पर कई कई कोणों में आईने टंगे हैं। आईने ढिबरी के कांपते उजाले को प्रतिबिंबित कर-कर के उजाले की एक श्रृंखला बना देते हैं। साथ ही गनपत की असहायता को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। इसी के साथ अनायास फोकस में आता है झंडापुर के नुक्कड़ नाटक से लौटे गनपत के तरुण पुत्र रोशनलाल का दहशत भरा चेहरा। दहशत मौत का स्मरण कराती है, मौत का पर्याय नहीं होती। दहशतजदा आदमी भी शायद यह सत्य नहीं जानता। जानता है कैमरा जो सैंकड़ों ढिबरियों के आवर्धित प्रकाश में हृदय के अंतस्तल में दबी-ढकी परतों के चेहरे को भी उघाड़ लाता है। कैमरा देखता है, खौफ के बावजूद ''बेइंसाफी और क्रूरता के विरुद्ध उसके हृदय में जो प्रतिवाद जन्मा था, जीवन का प्रथम प्रतिवाद, पहला इंकार, पहला विशाल गुस्सा और अपार घृणा, उसे उसने हृदय में ही रखने का फैसला किया, उस दिन तक के लिए, जब . .   .।''
एक बार फिर 'जब'। यानी फिर रस में व्यवधान! लेकिन अब पाठक ने झल्लाना छोड़ दिया है। वह उमग कर योगेंद्र आहूजा के खेल में शामिल हो गया है। शायद बचपन की स्मृतियों को ताजा करके घुटन भरे माहौल में 'टीलो' खेलने का शौक चर्रा आया हो। वह समझ गया है, लेखक उसे भरमाने के लिए इशारे करके गोटी को कहीं छुपा आता है और खुद इत्मीनान से टहलता हुआ कहीं दूर निकल जाता है, मानो पिछली बात से कोई वास्ता नहीं।
पाठक जानता है, लेखक की इत्मीनान भरी अगली यात्रा में ही उसे टीलो की अगली गोटी मिलेगी। इसलिए अपनी अंतश्चेतना को दो भागों में विभाजित कर वह नेपथ्य और रंगमंच दोनों जगह पर बनी रहने वाली सक्रियता को देखने नहीं, गुनने लगता है। टीलो खेल को जीतने का एक ही मूलमंत्र है - अंतर्सूत्रों पर गहरी पकड़।
योगेंद्र आहूजा चूंकि औपन्यासिक संवेदना के कथाकार हैं, इसलिए कहानी में अनेक अंतर्कथाओं और चरित्रों को बुनते हुए युग की विडंबनाओं को नहीं, विडंबनाओं को बनाने वाली परिघटनाओं, मानसिकताओं और प्रक्रियाओं को थहा लेना चाहते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में समय एकरैखिक गति से आगे नहीं बढ़ता, तमाम नियमों और अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी वर्तुलाकार गति में कभी बदलाव के अंधेरों को लिए आता है, कभी बदलाव से पहले की दमघोंटू सर्जक चुप्पी' की अनिवार्यता को। 'पांच मिनट' कहानी में उनकी यह तकनीक अपने चरम उत्कर्ष पर है।

रोहिणी अग्रवाल के फेसबुक वॉल से साभार।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फिल्म निर्माण में बाधा बनती बिहार के सिनेमाघर पर विनोद अनुपम की एक टिप्पणी

फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम का कॉलम हर हफ्ता दैनिक प्रभात खबर में पढ़ने को मिलता है। इस बार अनुपम जी ने अपने आलेख में बिहार में सिनेमाघर की दयनीय होती स्थिति में बिहारी फिल्म निर्माण की बाधाओं को उकेरने की कोशिश की है जिससे आप भी पढ़ें।

 सिनेमाघर बनाएं,तभी बनेंगे सिनेमा

आज जबकि सलमान और शाहरुख की फिल्मों के लिए दूसरे हफ्ते में प्रवेश करना बडी बात मानी जाती है,’अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्म का कुछ शहरों के कुछ सिनेमाघरों में पांचवे हफ्ते में प्रवेश करना चकित करता है।उल्लेखनीय है कि बिहार की पृष्ठभूमि पर बिहारी सितारों और तकनीशियनों के साथ बनी यह फिल्म बिहार से पहले हफ्ते में ही बाहर हो गई थी। पहले हफ्ते के आंकडों के अनुसार भी मुम्बई में बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने लगभग 44 लाख की कमाई की,जबकि बिहार में कुल जमा 4 लाख। वास्तव में ऐसी बात नहीं कि जो फिल्म जुहू(मुम्बई),गुडगांव और जामनगर में पांचवे हफ्ते में भी देखी जा रही है,वह बिहार ने देखनी नहीं चाही,सच यह है कि सिनेमा देखने के लिए चाहिए सिनेमाघर,और बिहार के कई जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।
बिहार में 80 के दशक तक 450 से अधिक सिनेमाघर थे,आज इसकी संख्या घटकर 200 के करीब रह गई है। पटना में कभी समय था जब मोना,एलफिंस्टन, रिजेन्ट, रुपक, चाणक्य, वीणा, अप्सरा, वैशाली, पर्ल जैसे लगभग शहर के सभी कोनों में सिनेमाघर थे। इसके अलावे दानापुर, खगौल और पटना सिटी में कई सिनेमाघर थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनकी क्षमता अमूमन 300 से ऊपर की होती थी। आज सिनेमाघर ही नहीं घटे,मोना और रिजेन्ट की तरह जो बचे हैं,उनकी क्षमता आधे से भी कम रह गई है। इन्हीं सिनेमाघरों को ‘दंगल’ का दवाब झेलना पडता है, ‘अनारकली’ के लिए भी गुंजाइश निकालनी पडती है, और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी। ऐसे में किसी फिल्म को वे चाहकर भी लगाए नहीं रह सकते, क्योंकि अगली फिल्म को जगह चाहिए होती है।
सिंगल थिएटर सभी जगह बंद हुए हैं,लेकिन वहां उसकी भरपाई मल्टीप्लेक्स ने कर दी है,जबकि बिहार में सिनेमाघर बंद तो हुए,नए नहीं खुले। जाहिर है व्यवसाय के नाम पर सिनेमा में बिहार की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होती चली गई। ऐसे में बिहार में सिनेमा के विकास के चाहे जितने सपने पाल लें,उन्हें तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हम दर्शक बनाने की व्यवस्था नहीं करें,दर्शक तब बनेंगे जब सिनेमाघर बनेंगे। जाहिर है कोई क्यों ‘अनारकली’,’मिथिला मखान’ या ‘गुटरू गुटरगूं’ परिकल्पित करे,जबकि व्यवसाय के लिए उसे मुम्बई,जामनगर और गुडगांव का ही मुंह जोहना पडे।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

जैनेंद्र कुमार के साहित्य में स्त्री और भारतीय संस्कृति "त्यागपत्र" के संदर्भ में (समीक्षा)


हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक जैनेंद्र कुमार का स्थान प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में बहुत ही महत्वपूर्ण है।जैनेन्द्रजी का कथा-साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है । उन्होंने अपनी संस्कृति और परंपरा के परिप्रेक्ष्य में ही भारतीय मानस की पहचान की है । उन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं जैसे- ईश्वर, आस्तिकता-नास्तिकता, बुद्धि-भावना, अंतःप्रेरणा -तर्क, हिंसा-अहिंसा, प्रेम और वासना, पति और पत्नी, सतीत्व, शरीर की पवित्रता, पाप-पुण्य, समर्पण आदि ।
जैनेंद्र स्वातंत्रयोत्तर भारत में भौतिकता की चमक दमक, परिवार के बिखराव, धन लोलुपता, विवाहेतर संबंधों को देखते हुए ऐसे मुद्दों को उठा रहे थे।  जैनेंद्र ने अपने जीते जी देश की राजनीतिक, सामाजिक संरचना में कई रंग और बदलाव महसूस किए। अपने समय व समाज को समझने की उनकी जो दृष्टि थी, उसके अनुकूल उन्होंने पात्र रचे। समाज पर टिप्पणी की, विश्लेषण किया।  जैनेंद्र के रचना संसार में नायिकाएँ लेखक से कई बार विद्रोह कर देती हैं, वे जैनेंद्र के स्वप्नों और मंतव्यों से अलग डगर पकड़ने लगती हैं।  उनकी स्त्रियों की सीमाएँ हो सकती हैं, यह भी कि वे वैसी स्वतंत्र नहीं जो स्वयं निर्णय लें और उसके सुख दुख झेलें। दरअसल वे घटनाओं की शिकार हैं और 'प्रतिक्रिया' व्यक्त करती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस प्रक्रिया में वे निश्चित रूप से अपने समय को पीछे छोड़ती हैं। जिस स्त्री ने परंपरा से विद्रोह किया उसी ने ठोकर खाने के बावजूद नई राह बनाई। परंपरा को जैनेंद्र की स्त्रियों ने तोड़ा, नई राह आधुनिक स्त्री विमर्श बना रहा है।
जैनेन्द्र ने प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ को नहीं अपनाया, लेकिन वे प्रेमचन्द के विलोम नहीं बल्कि पूरक थे। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को साथ-साथ रखकर ही जीवन और इतिहास को उसकी समग्रता के साथ समझा जा सकता है। जैनेन्द्र ने भाषा के स्तर पर काफी मेहनत की। जैनेंद्र के उपन्यासों में दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों के समावेशन से दूरूहता आई है परंतु ये सारे तत्व जहाँ-जहाँ भी उपन्यासों में समाविष्ट हुए हैं, वहाँ वे पात्रों के अंतर का सृजन प्रतीत होते हैं। जैनेंद्र के पात्र बाह्य वातावरण और परिस्थितियों से कम प्रभावित लगते हैं जबकि अंतर्मुखी गतियों से ज्यादा संचालित। पात्रों की अल्पता के कारण भी जैनेंद्र के उपन्यासों में वैयक्तिक तत्वों की प्रधानता रही है।
इनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति के समर्थक हैं। बाह्य स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं। उनका यह विध्वंसकारी व्यक्तित्व नारी की प्रेमविषयक अस्वीकृतियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है। इसी कारण जब वे किसी नारी का थोड़ा भी आश्रय, सहानुभूति या प्रेम पाते हैं, तब टूटकर गिर पड़ते हैं और तभी उनका बाह्य स्वभाव कोमल हो जाता है। जैनेंद्र के नारी पात्र प्रायः उपन्यास में प्रधानता लिए हुए होते हैं। उपन्यासकार ने अपने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। स्त्री के विविध रूपों, उसकी क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का विश्वसनीय अंकन किया है। 'सुनीता', 'त्यागपत्र' तथा 'सुखदा' आदि उपन्यासों में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब उनके नारी चरित्र भीषण मानसिक संघर्ष की स्थिति से गुज़रे हैं। नारी और पुरुष की अपूर्णता तथा अंतर्निर्भरता की भावना इस संघर्ष का मूल आधार है। वह अपने प्रति पुरुष के आकर्षण को समझती है, समर्पण के लिए प्रस्तुत रहती है और पूरक भावना की इस क्षमता से आल्हादित होती है, परंतु कभी-कभी जब वह पुरुष में इस आकर्षण मोह का अभाव देखती है, तब क्षुब्ध होती है, व्यथित होती है। इसी प्रकार से जब पुरुष से कठोरता की अपेक्षा के समय विनम्रता पाती है, तब यह भी उसे असह्य हो जाता है।
गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र का सम्पूर्ण साहित्य सृजन प्रक्रिया की विलक्षणता और सुनियोजित संश्लिष्टता का अनन्यतम उदाहरण है। जैनेन्द्र के बारे में अज्ञेय ने कहा था आज के हिन्दी के आख्यानकारों और विशेषतय: कहानीकारों में सबसे अधिक टेक्निकल जैनेन्द्र हैं। तकनीक उनकी प्रत्येक कहानी की और सभी उपन्यासों की आधारशिला है। स्त्री विमर्श के प्रबल हिमायती जैनेन्द्र ने कहानी के अंदर प्रेम को संभव किया।

कहानी खेल से उनके लेखन का सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो 24 साल की उम्र तक उपन्यास परख आ गया। उपन्यास 'परख' से सन्‌ 1929 में पहचान बनी। 'सुनीता' का प्रकाशन 1935 में हुआ। 'त्यागपत्र' 1937 में और 'कल्याणी' 1939 में प्रकाशित हुए। 1929 में पहला कहानी-संग्रह 'फांसी' छपा। इसके बाद 1930 में 'वातायन', 1933 में 'नीलम देश की राजकन्या', 1934 में 'एक रात', 1935 में 'दो चिड़ियां' और 1942 में 'पाजेब' का प्रकाशन हुआ। सन् 1929 में ‘परख’ से आरंभ कर सन् 1985 में ‘दशार्क’ के लेखन तक उनका रचनाकाल विस्तृत है। इस समयावधि में जैनेन्द्र ने कुल तेरह उपन्यास लिखे जिनमें से अधिकतर उपन्यासों का कथ्य स्त्री संबंधी है। लेखक ने अपने कुछ उपन्यासों के शीर्षक भी कथा की मुख्य चरित्र रही स्त्रियों के नाम पर ही दिए हैं। जैसे - ‘सुनीता’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’।

समय और हम, साहित्य का श्रेय और प्रेय, प्रश्न और प्रश्न, सोच-विचार, राष्ट्र और राज्य, काम पे्रम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी आदि निबंध जैनेन्द्र की दार्शनिकता और नितांत मौलिक पदस्थापनाओं के कारण जाने पहचाने गए। अपने अधिकांश साहित्य का लेखन डिक्टेशन से कराने वाले जैनेन्द्र के लेखन पर महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अत्यधिक प्रभाव था। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण उनके उपन्यास सुनीता और सुखदा हैं जो टैगोर के उपन्यास- घरे बाहरे से प्रेरित हैं। परख और सुनीता को पढ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द ने एक बार कहा था जैनेन्द्र में गोर्की और शरतचन्द्र चटर्जी दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं। बहरहाल बांग्ला साहित्यकार शरतचन्द्र के उपन्यासों की ही तरह उनके तकरीबन सभी उपन्यासों में स्त्री चरित्र पूरी दृढता के साथ नजर आते हैं। त्याग-पत्र की मृणाल और सुनीता का केन्द्रीय चरित्र सुनीता उपन्यास में अपनी मौजूदगी का अहसास प्रखरता से कराता है। हालांकि उनके स्त्री चरित्र आत्मा की ट्रेजेडी और आत्म प्रपीढन से ग्रसित नजर आते हैं।
जैनेंद्र की आरंभिक तीनों रचनाओं परख (1929), त्यागपत्र (1937) व सुनीता (1935) के केंद्र में स्त्री है। प्रायः प्रेम करती स्त्रियाँ। प्रेम करती ये स्त्रियाँ विचारशील और कर्मठ हैं। अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करती ये वे स्त्रियाँ हैं, जिन्होंने पारिवारिक मर्यादा, परंपरा, नियमों की पाखंडी तस्वीर को तोड़ा और जीतने हारने, संघर्ष करने के लिए परंपरागत औरत के चोले से बाहर निकल आईं। जैनेंद्र की साहित्यिक चेतना 'त्यागपत्र' में चरमोत्कर्ष पर है। मृणाल के चरित्र, संघर्ष और त्रासदी ने उसके व्यक्तित्व को अद्भुत ऊँचाई प्रदान की है। 'त्यागपत्र' में आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य का सशक्त स्त्री विमर्श सिर्फ स्त्रियाँ ही कर सकती हैं, यदि ऐसी कोई बाध्यता न हो तो प्रेमचंद और जैनेंद्र की कुछ रचनाएँ आधुनिक स्त्री विमर्श के समकक्ष ठहरती है।
इन स्त्रियों ने कर्तव्य निर्वाह करते हुए जिस प्रकार नैतिकता, मर्यादा का विश्लेषण किया, जिस तरह सामाजिक संरचना में रचे बसे पाखंड को तार तार किया वह भविष्य की अधिकारसंपन्न स्त्री के लिए रास्ता बनाता है। जैनेंद्र की इन स्त्रियों ने कहीं स्वेच्छा से अपना जीवन नहीं चुना है। अक्सर यही हुआ कि उनके मन की जो बात थी, मन में ही उसका दम घुट गया। लेकिन परिस्थितियों का सामना करने में इनके वजूद की जद्दोजहद प्रकट होती है। नियति की शिकार होने के बाद भी इन स्त्रियों ने अपने लिए रास्ते जरूर बनाए या कम से कम रूढ़ रास्तों से ऐतराज दिखाया।
मृणाल हिंदी साहित्य की पहली आधुनिक स्त्री है जो नैतिकता की परंपरागत मान्यता को सिरे से खारिज करती है। वह न सिर्फ अपने स्त्रीत्व व अस्मिता के प्रति सजग है बल्कि खुद को तिल तिल जला कर भी वह नया रास्ता अख्तियार करती है। सच है कि जलना उसके जैसी स्त्रियों के नसीब में होता है, पर वह घर में इज्जत बचाते दम नहीं तोड़ती। मृणाल ने घर छोड़ा, बाहर निकली और हाशिए के लोगों के बीच पहुँच गई। यहीं उसका व्यक्तित्व नए आयाम पाता है। उसके पास समाज व लोगों को समझने के लिए तार्किक बुद्धि है जो कथित सभ्य समाज के ढोंगों का पर्दाफाश करती है। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर वह शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे कथित दुर्जनों के बीच है। मृणाल इनके बीच भी इनकी ऊपरी परत खरोंच कर इनसानियत पा जाती है। मृणाल समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की सच्ची सहृदयता का सम्मान करती है। तभी वह कहती है 'वहाँ छल असंभव है जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है।' मनुष्य हो तो भीतर एक मनुष्य होना होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुल कर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है। क्योंकि उसे जरूरत नहीं कि वह कहे 'मैं पीतल नहीं हूँ'। दरअसल मृणाल सभ्य समाज के सदाचार की ही शिकार थी। किसी से प्रेम कर बैठना ही मृणाल का कदाचार था। उसका पालन पोषण तो इसलिए हो रहा था कि वह एक अच्छी आर्य स्त्री बने। जबरदस्ती दूसरे से विवाह के बाद जब वह दांपत्य की नींव सच्चाई पर रखना चाहती है तो पति की नजर में दुराचारी हो जाती है। सच्चाई का बोझ पति की मर्दानगी के लिए कहर है। पछाँह का घी खाया मर्द उसकी बेंत से धुनाई करता है। साथ ही यह धौंस भी देता है कि 'बहू बेटियों की चलन की रीति नीति हुआ करती है।' '...अपना कुल शील चला जाता है, वह न निभा तो फिर क्या रह गया'। इस कुल शील का मतलब यही था कि पति की हर जायज नाजायज इच्छा को शिरोधार्य किया जाए। कुल शील की ओखल में स्त्री के सिर पर दनादन मूसल बरसते रहें और वह सहती रहे। पति ने दुश्चरित्रता का आरोप लगा कर मृणाल को छोड़ दिया तो उसका कोई सहारा नहीं। मायके में उसकी जगह तभी तक थी जब तक पति का घर था। घर आने की शर्त ही थी कि 'वहाँ अपनी गृहस्थी अच्छी तरह सँभालना और पति को सुखी रखना' पर मृणाल से तो गृहस्थी ही बिखर गई थी अब नैहर में ठौर कहाँ? स्त्री को मिलने वाले आशीर्वादों का बोझ कैसा होता है, इसको जैनेंद्र ने समझा है।
'पतिव्रता रहने पूतों फलने, बड़भागिन होने आदि के आशीर्वाद उन्होंने ऐसे प्रणत भाव से दिए कि मानो उसके नीचे वह गड़ कर भी मर जाए तो धन्य हो जाए' पर मृणाल विद्रोहिणी निकली उसने 'अन्य' होना स्वीकार न किया। वह कहती है 'क्यों पतिव्रता को यह चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता तब भी अपना बोझ डाल दे? मुझे देखना भी नहीं चाहते, यह जान कर मैंने उनकी आँखों के आगे से हट जाना स्वीकार कर लिया।' मृणाल ने अलग रहना स्वीकार किया और पति ने उसे शहर के बाहरी हिस्से की एक कोठरी में पटक दिया। आत्महत्या का विकल्प मृणाल के सामने कभी नहीं था। वह मरने को अधर्म मानती है। उसे जीना था, भले मर कर ही सही। रोटी चलाने में मृणाल की मदद एक निहायत ही मामूली आदमी करता है। यह आदमी मृणाल के रूप यौवन पर आसक्त है। मृणाल इसे समझती है फिर भी वह सहारा देने के लिए उसकी कृतज्ञ है। शीघ्र ही मृणाल परिश्रम से अपनी जीविका अर्जित करने लगती है। उसके गर्भ धारण करते ही दूसरा आदमी उसे छोड़ कर भाग जाता है। मृणाल स्वयं यही चाहती थी कि वह अपने परिवार में लौट जाए। क्योंकि वह समझती थी कि उसके साथ सोने के कारण वह उसे बदजात और बाजारू औरत ही समझेगा। दुख और अपमान की पीड़ा मृणाल को इस मनःस्थिति में पहुँचा देती है कि वह अपने दर्द से ही दवा हासिल करती है : 'मेरा मन पक्का होता रहे कि कोई मुझे कुचले, तो भी मैं कुचली न जाऊँ और इतनी जीवित रहूँ कि उसके पाप के बोझ भी ले लूँ और सबके लिए क्षमा की प्रार्थना करूँ।'

इतनी उदारता निर्वेयक्तिक सोच से ही आ सकती है। मृणाल ने अपने कष्टों को भी साक्षी भाव से देखा तभी अहं का विर्सजन कर पाई। दूसरे मर्द के छोड़ कर जाने के बाद, प्रसूति के लिए मृणाल जब मिशनरी अस्पताल पहुँचती है तो वहाँ उसे धर्म परिवर्तन का प्रलोभन मिलता है किंतु वह धर्म परिवर्तन को राजी नहीं होती है। गौरतलब है कि धर्म परिवर्तन से इनकार वह इसलिए नहीं करती कि हिंदू धर्म में उसकी गहरी आस्था है। ऐसा वह इसलिए करती है कि वह स्त्री है और उसकी स्थिति के लिए किसी भी धर्म में कोई रियायत नहीं है।

जैनेंद्र के स्त्री पात्रों में एक और समानता है वे सभी, रिश्तों की बुनियाद सच्चाई पर रखना चाहती हैं। अपने तथा दूसरे के प्रति ईमानदार रहने की आकांक्षी हैं। परख की कट्टो, त्यागपत्र की मृणाल, सुनीता की सुनीता, मुक्तिबोध की नीना और दर्शार्क की वेश्यावृति करने वाली रंजना, ये सभी अपने कार्य के प्रति जिम्मेदार हैं और सीधा जवाब देती हैं। जैनेंद्र के यहाँ स्त्री प्रेम को स्वीकारती है, पर वह यथासंभव विवाह संस्था के संरक्षण का प्रयास करती है। जैनेंद्र की कहानी 'जाह्नवी' में स्त्री प्रेमी की प्रतीक्षा में हर दिन कौओं को रोटी खिलाती है। जाह्नवी रोटी खाते कौओं से मनुहार करती है कि वे उसके सारे अंग चाहे नोच खा लें पर दो आँखों को छोड़ दें। ये आँखें पियु का इंतजार कर रही हैं। इसी लड़की 'जाह्नवी' का जब विवाह तय हो जाता है तो वह भावी पति को पत्र लिख अपने प्रेमी के बारे में बताती है। वह साफ साफ कहती है कि जीवनसंगिनी बनने में वह असमर्थ है। हाँ अनुगता बन कर वह कर्तव्य निर्वहन भली भाँति कर सकती है। संयोग से जाह्नवी की इस सच्चाई का सम्मान होता है। पर त्यागपत्र में मृणाल की सच्चाई ही उसकी मुसीबतों का कारण बन जाती है। मुसीबतों को न्यौता तो मृणाल खुद देती है प्रेम करके। इस प्रेम को यह सिला मिलता है कि उसे 'कुलबोरन' कहा जाता है।

मृणाल भाई के संरक्षण व भाभी के अनुशासन में बड़ी होती है। भाभी के लिए वह दायित्व है। मृणाल को सुगृहणी बना कर ससुराल भेजना भाभी की जिम्मेदारी है। यहाँ दो स्त्रियों के मध्य निकटता न होकर अनुशासन की औपचारिक दूरी है। घर में मृणाल मात्रा अपने भतीजे प्रमोद के साथ नैसर्गिक रूप से रहती है।

युवा होती लड़कियों की तरह वह खुद से, आकाश से, बादल से, तारों से, हवा से प्रेम करती है। इन्हीं प्रेमों के बीच प्रेम मूर्त हो गया तो बगिया की तरह लहलह हो जाती है। यही प्रेम मृणाल को हुआ है जिसकी वजह से वह चिड़िया बन जाना चाहती है। चिड़िया नन्हीं है पर स्वतंत्र है, उड़ सकती है। मृणाल उड़ने से पहले ही पकड़ ली गई और सजा मुकर्रर हो गई।

ससुराल से लौट कर मृणाल बुझी बुझी है। प्रमोद उससे कुछ सुनना चाहता है जो वह सुनता है, उसके बाल मन को भेदने के लिए पर्याप्त है 'तुम सब लोगों के लिए मैं पराई हूँ। तेरी माँ ने मुझे धक्का देकर पराया बना दिया है। पर मुझे जहाँ भेज दिया है प्रमोद मेरा मन वहाँ का नहीं है।'

मृणाल यहाँ स्पष्टतया कहती है कि उसे धक्का देकर खदेड़ा गया है। वह अवांछित वस्तु है। इसका उसे एहसास है। मायके में उसे सुनना पड़ा 'आइंदा इस तरह बिना फूफा की मर्जी से चली आएगी तो वह उन्हें अपने घर में आश्रय न देंगे।' मृणाल आश्रिता और सामान बन कर रह गई है। वह प्रमोद से खुद को 'फूफा की चीज' कहती है।

'त्यागपत्र' की रचना 1937 में हुई थी। उस समय के भारत में महिला सशक्तिकरण व महिला साक्षरता दर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। मृणाल इतनी बहादुर नहीं थी कि घर छोड़ कर, प्रेमी के साथ निकल जाती। उसने बेमेल विवाह में भरसक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया था, पर पति के व्यवहार ने उसे तोड़ दिया। ऐसा नहीं था कि मृणाल प्रतिरोध नहीं करती। पति के ठहरे गर्भ को गिराने की कोशिश, विरोध था। मृणाल के गर्भ पर सिर्फ मृणाल का अधिकार था। इसके विपरीत मृणाल दूसरे आदमी (कोयले वाले) से ठहरे गर्भ को जन्म देती है। क्योंकि 'इस पाप को ढो रही हूँ' कहने के बावजूद वह कोयले वाले की कृतज्ञ है। आसनाई के लिए ही सही पर उसने मृणाल को घर परिवार छोड़ कर सहारा दिया था। मृणाल युवा है और अपनी दैहिक जरूरतों को छिपाती नहीं। वह कहती है 'तन दे सकूँगी शायद वह अनिवार्य हो।' तन की जरूरत के बारे में इतने कुंठामुक्त तरीके से तब कितनी औरतें बोल रही थीं? मृणाल देह को पारस्परिक आवश्यकता मान रही है पर वह देह का सौदा करने के सख्त खिलाफ है। यह उसका ऊँचा वसूल है। अन्यथा दर दर की ठोकर से उसे कुछ राहत अवश्य मिली होती। मृणाल की यौवन की उमंगें बेरहमी से कुचली गई थीं। फिर भी मृणाल अपनी आंतरिक गरिमा व स्वाभिमान से समझौता नहीं करती। जैनेंद्र स्त्री की क्षमता का विस्तार घर से बाहर भी चाहते हैं।
इन नारी पात्रों ने समाज और संस्कृति की बलिवेदी पर अपना आत्मबलिदान किया है । जैनेन्द्रजी ने न तो इनका आदर्शवादी समाधान दिया और न ही मार्क्सवादियों की तरह क्रांति का आह्वान किया, बल्कि बुद्धिजीवी वर्ग पर ही यह प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिया । उनके ये नारी पात्र आत्म-बलिदान करते हुए पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने में सफल हो गए हैं । यहाँ जैनेन्द्रजी ने सटीक चित्रण कर सांस्कृतिक परिष्करण को हमारे समक्ष एक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत कर दिया । इन स्त्रियों की पीड़ा सामाजिक विषमता जनित होते हुए भी उन्होंने समाज की महत्ता को स्वीकार किया । मृणाल कहती है- “ मैं समाज को तोड़ना फोड़ना नहीं चाहती । समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे या किसके भीतर बिगड़ेंगे?” अपनी ओर से नितांत निरपराध होते हुए भी वेदना और कवकलता में इन नारियों का घुलना पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने और सहानुभूति प्राप्त करने में सफल रहा है । इससे समाज और संस्कृति की विसंगतियों को जैनेन्द्रजी ने उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं ।
 जैनेन्द्र कुमार स्त्री को ‘सर्वस्व’ रूप में स्वीकार करते हैं। यह रूप अपनाते ही 'स्त्री’ पूरे विश्व का मूलाधार बन जाती है। उनका मानना है –‘स्त्री ही व्यक्ति को बनाती है, घर को, कुटुम्ब को बनाती है। फिर उन्हें बिगाड़ती भी वही है। हर्ष भी वही और विमर्श भी। ठहराव भी और उजाड़ भी। दूध भी और खून भी। रोटी भी और स्कीमें भी। और फिर आपकी मरम्मत और श्रेष्ठता भी सब कुछ स्त्री ही बनाती है। धर्म स्त्री पर टिका है, सभ्यता स्त्री पर निर्भर है और फ़ैशन की जड़ भी वही है। एक शब्द में कहो ,...दुनिया स्त्री पर टिकी है।
त्यागपत्र में मृणाल एक प्रबल चरित्र के रूप में उभरती है। वह अत्यंत उदार व आदर्शवादी चरित्र के रूप में उभरती है जो स्वयं के जीवन में अपार कष्ट पाकर भी सदा दूसरों के लिए केवल सुख की ही आकांक्षा रखती है। उसके मन में अपनी परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के लिए कोई कटुता नहीं और न ही वह किसी को दोषी मानती है। मृणाल अपने जीवन में जिससे भी जुड़ना चाहती है या जुड़ी वह केवल सत्य और पूरी निष्ठा के साथ, फिर उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करना चाहा। समाज की नजरों में वह एक बाज़ारू औरत है किन्तु तन देकर धन की उम्मीद करना वह बेमानी समझती है। जीवन में मिली ठोकरों की प्रतिक्रिया वह केवल मौन आत्मसंघर्ष के रूप में व्यक्त करती है। अपने संघर्षमय जीवन में सामाजिक नियमों का वह सदा तिरस्कार करती है। मृणाल जैसा स्त्री चरित्र तथाकथित सभ्य समाज की ‘सभ्यता’ पर सवालिया निशान लगाता है, समाज के भीतर दोहरा स्वरूप लेकर विचरण करते लोगों को बेनक़ाब करता है और विवश करता है बुद्धिजीवी वर्ग को सामाजिक नियम-कानून, नैतिकता, आदर्श की परिभाषाओं पर पुनर्विचार करने के लिए।
वर्तमान संदर्भों में यह स्त्री चरित्र अधिक पारंपरिक और कम आधुनिक नज़र आती हैं। जिस युग में जैनेन्द्र उपन्यासों की रचना प्रारम्भ करते हैं अर्थात् 20वीं शताब्दी का दूसरा-तीसरा दशक, यह काल भी परम्परा और आधुनिकता के संघर्ष का समय है। कट्टो, सुनीता और मृणाल पारम्परिक इन अर्थों में हैं कि वे जानती हैं कि तत्कालीन सामाजिक संरचना के तहत वे कर्तव्यों से बंधी हैं। उनके यह कर्तव्य उनके परिवार के प्रति हैं। जैनेन्द्र के यहाँ परिवार और विवाह संस्कार परम्पराओं से जुड़ा है। अतः इनका निर्वाह करने वाली स्त्री पारम्परिक ही होगी। इन स्त्रियों में परिवार या विवाह संस्था को तोड़ने की इच्छा नहीं है क्योंकि इनसे कटकर या बाहर निकलकर ‘जीवन’ गर्त की ओर बढ़ता चला जाएगा। मृणाल के दुखद अंत के माध्यम से जैनेन्द्र यही संकेत देना चाहते हैं क्योंकि जैनेन्द्र स्त्री की स्वतंत्र सत्ता के पक्षधर नहीं हैं। ‘त्यागपत्र’ में प्रमोद के माध्यम से वे कहलवाते हैं- ‘विवाह की ग्रंथि दो के बीच की ग्रंथि नहीं है वह समाज के बीच की भी है। चाहने से वह क्या टूटती है। विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं है, व्यवस्था का प्रश्न है।.. वह गांठ है जो बंधी कि खुल नहीं सकती। टूटे तो टूट भले ही जाए लेकिन टूटना कब किसका श्रेयस्कर है?’ पारम्परिक यह स्त्रियाँ इन अर्थों में भी हैं कि इन्हें अधिकारसंपन्नता प्राप्त नहीं है जो कि तत्कालीन समय का भी प्रभाव है। अधिकार पाने हेतु यहाँ स्त्री लड़ती नहीं किन्तु स्त्री हेतु समाज के द्वारा बनाये गए नियमों व वर्जनाओं का पालन भी नहीं करती। स्वायत्तता की दरकार इन्हें नहीं है, पति के साथ होते हुए आर्थिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता भी इन्हें नहीं है क्योंकि जैनेन्द्र स्त्री को पुरुष की सहभागी के रूप में देखते हैं, प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं। जैनेन्द्र कुमार का मत है- ‘स्त्री पुरुष के पौरुष स्पर्धा में न पड़े बल्कि उसे उसी रूप में धारण करके कृतार्थता का अनुभव करे। आज का कैरियिस्ट शब्द सतीत्व के अर्थ स्पष्ट करता है। कैरिज़्म में पुरुष से होड़ है। सतीत्व में पुरुष से योग और सहयोग से है|’ आज के आधुनिक संदर्भों में ऐसी मान्यताओं को इन स्त्री चरित्रों की सीमाओं के रूप में भी देखा जा सकता है। किन्तु जैसा कि कहा जा चुका है कि जैनेन्द्र कुमार का समय परम्परा व आधुनिकता के संघर्ष का समय रहा है और ऐसे समय में जैनेन्द्र परस्पर विरोध एवं प्रतियोगिता की अपेक्षा सामंजस्य का मार्ग चुनते हैं। उनके भीतर न जड़ परम्पराओं को ढोते रहने का आग्रह है और न ही आधुनिकता के नाम पर अपना सब कुछ ताक पर रख देने का चलन है। जैनेन्द्र के साहित्य का मूल तत्व ‘प्रेम’ है। ‘प्रेम’ का उत्कृष्ट रूप जैनेन्द्र ‘स्त्री’ के भीतर पाते हैं। यही कारण है कि परिवार तथा विवाह संस्थान बचाए रखने का दायित्व उन्होंने स्त्रियों के हाथ में दिया। ‘प्रेम’ के अभाव में जैनेन्द्र विवाह और परिवार की नीँव को कमज़ोर व अधूरा मानते हैं। दरअसल जैनेन्द्र ने मानवीय दुनिया की अपेक्षा आत्मिक दुनिया पर ज्यादा लिखा वे यथार्थ की जगह विचारों की बात ज्यादा करते हैं जो उन्हें रूसी साहित्यकार दास्तोएव्सकी के नजदीक रखता है। एक दौर वह था जब उपन्यास, कहानियों में यशपाल और जैनेन्द्र द्वारा नारी के बोल्ड चित्रण से उनकी साडी-जम्पर उतारवाद का प्रवर्तक भी कहा गया तथा उन पर साहित्य में नैतिकता की गिरावट और अश्लीलता के आरोप मढे गए, अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब जैनेन्द्र ने अपने निबंधों के जरिए ही दिया। अश्लीलता यदि है तो वस्तु में नहीं व्यक्ति में है, असल में नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग वे ही हैं जो सुविधा प्राप्त हैं, वे अपने भोग और आराम को बचाये रखने के लिए नीतिवादिता से अपनी रक्षा में चारों ओर घेरा डालते हैं अंग्रेजी में एक शब्द है कंजरवेटिव नैतिकता की दुहाई ऐसे ही लोग देते हैं।
अपनी जिंदगी में उच्च आदर्शो को ओढने वाले सादगी-करूणा की प्रतिमूर्ति जैनेन्द्र सही मायने में सत्यान्वेषी थे जिनके लिए अपनी आत्मा की आवाज सर्वोपरि थी और जिसका पालन उन्होंने मरते दम तक किया।
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