शनिवार, 13 मई 2017

तीन तलाक और वकीलों की नैतिकता (आलेख):राजकिशोर

गरीब से गरीब जनता के लिए न्याय की आखिरी मंजिल के रूप में जानी जाती हैं अदालतें। फिर भी सांसों को रोके हर निर्णय की ओर टकटकी लगाये ये लोग टूटने लगते हैं जब उनकी अपेक्षाओं पर कुठाराघात होता है। धन के बदौलत न्याय और अन्याय की महीन कड़ी को धूमिल कर देने के बाबजूद आखिरी उम्मीद भी यही है चाहे इसके लिए मानवता और नैतिकता तार-तार क्यों न हो जाय। और आज जब तीन तलाक पर एक खुली बहस चारो ओर छिड़ी हुई है वैसी स्थिति में तीन पूर्व भारतीय कानून मंत्री का सुप्रीम कोर्ट में एक -दूसरे के विरूद्ध बहस करना काफी कुछ सोचने को विवश करता है। और इस संदर्भ में रविवार डाइजेस्ट के संपादक राज किशोर जी का आलेख गौरतलब है। आप स्वयं पढ़कर देखें।


तीन तलाक और वकीलों की नैतिकता
राजकिशोर

तीन तलाक की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में जिस मसले पर विचार किया जा रहा है, उसका सर्वाधिक रोचक पहलू है, वकीलों की नैतिकता। इस मुकदमे में विभिन्न पक्षों की ओर से तीन पूर्व कानून मंत्री भी दलील दे रहे हैं। इनके नाम हैं – कपिल सिब्बल, राम जेठमलानी और सलमान खुर्शीद। सलमान खुरशीद इस मुकदमे में कोर्ट मित्र हैं। उनके अनुसार, तीन तलाक एक गुनाह है और यह शरीयत का हिस्सा कदापि नहीं हो सकता। कपिल सिब्बल और राम जेठमलानी के मुवक्किल तीन तलाक के पक्षधर हैं, इतः इन दोनों वकीलों की कोशिश है कि तीन तलाक की प्रथा बनी रहनी चाहिए। चूँकि तीन तलाक के मुकदमे में दो ही पक्ष हो सकते हैं – हाँ और नहीं का, इसलिए ये पूर्व केंद्रीय मंत्री दो अलग-अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यदि कोई तीसरा पक्ष भी हो सकता है, तो हो सकता है उसकी तरफ से दलील देने वाला कोई और पूर्व कानून मंत्री खड़ा हो जाता।

सामान्य वकीलों की नैतिकता के बारे में हम जानते हैं :  उनकी कोई नैतिकता नहीं होती। अदालत में वे क्या कहेंगे, यह उन्हें मिलने वाली फीस पर निर्भर है। जो उनकी फीस देने को तैयार हैं, वे उसका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे। वे इस पर बिलकुल विचार नहीं करेंगे कि जिसका ब्रीफ वे ले रहे हैं, वह अपराधी है या बेगुनाह। उनका प्रोफेशन अपनी फीस ले कर अपराधी को बेगुनाह या बेगुनाह को अपराधी साबित करने की कोशिश करना है। नाथूराम गोडसे के पास भी वकील थे, जिनका तर्क था का कि गांधी जी के हत्यारे को हत्यारा नहीं कहा जा सकता। मुंबई होटल हत्याकांड के अभियुक्त कसाब को कोई वकील नहीं मिल पा रहा था। कसाब के कहने पर बंबई हाई कोर्ट ने उसके लिए एक वकील नियुक्त कर दिया। उस वकील ने न्यायालय का सम्मान करते हुए कसाब के पक्ष में तर्क-वितर्क किया, पर चाहता तो वह भी उच्च न्यायालय से क्षमा माँग ले सकता था। नहीं तो वह कसाब को ही यह कानूनी सलाह दे सकता था कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और अदालत से माफी माँग ले। हो सकता है, तब कसाब को शायद फाँसी के फंदे पर न चढ़ना पड़ता। सब कुछ जानते हुए भी बेचारे वकील को कसाब को निर्दोष साबित करने के लिए अपने कानूनी ज्ञान और अनुभव का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि उसका पेशा यही ठहरा।

जो लोग वकालत के पेशे में हैं, वे कह सकते हैं कि हम अदालत नहीं हैं, वकालत हैं। हर आदमी को कानूनी मदद पाने का हक है। जिस तरह कोई डॉक्टर किसी घायल का इलाज करने से इस आधार पर मना नहीं कर सकता कि वह स्वयं हत्यारा है और किसी की हत्या करने के प्रयास के दौरान ही उसे यह चोट लगी है, उसी तरह कोई वकील भी ऐसे मुवक्किल की कानूनी मदद करने से मना नहीं कर सकता, जो हत्या करने के बाद सीधे वकील के चैंबर में चला आया है और जिसके हाथों पर मकतूल के खून के छींटे चमक रहे हैं। इस तर्क में खोट यह है कि हर जख्मी आदमी को स्वस्थ होने का अधिकार है। जेल में भी डॉक्टर होते हैं और युद्धबंदियों का भी इलाज किया जाता है। लेकिन हर अपराधी को एक वकील मिलना ही चाहिए, यह तर्क नैतिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।    

फिर भी साधारण वकील को उसकी इस अनैतिकता के लिए माफ किया जा सकता है, क्योंकि यह उसके पेट का सवाल भी है। लेकिन हमारे पूर्व कानून मंत्रियों को क्या हुआ है? वे क्यों एक-दूसरे का विरोध कर रहे हैं? जब वे कानून मंत्री थे, तब उन्हें निश्चित रूप से तीन तलाक प्रथा के खिलाफ होना चाहिए था। इसका एक बड़ा कारण यह है कि वे भारत के संविधान से बँधे हुए थे जो सरकार को यह निर्देश देता है कि वह एक समान निजी कानून बनाने का प्रयास रेगी। जब सभी भारतीयों के लिए एक समान निजी कानून बनेगा, तो क्या उसमें तीन तलाक जैसी घिनौनी चीज को शामिल किया जा सकता है? अब मोटी फीस पाने के बाद उनमें से कुछ की राय बदल गयी है और वे तीन तलाक का समर्थनकर रहे हैं, तो कम से कम मैं उन्हें भद्र व्यक्ति (जेंटलमैन) कहने के लिए बाध्य नहीं हूँ।
फेसबुक वॉल से साभार।

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