31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश
-सुशील कुमार भारद्वाज
फिल्मकार फिल्म बनाते समय फिल्म की कहानी, विषय, कलाकार तथा कमाई जैसे अन्य चीजों पर भी विचार करते हैं। लेकिन इन दिनों फिल्म की सफलता की गारंटी के लिए कुछ खास नुस्खों का भी उपयोग किया जाने लगा है बिल्कुल समाचार चैनलों की तरह समाचार सनसनी फैलाने और लोगों को आकर्षित करने की नीयत से। शायद निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल और निर्माता हैरी सचदेवा ने कुछ सनसनी फैलाने और कम बजट में अधिक मुनाफा कमाने के इरादे से ही फिल्म का नाम "31 अक्टूबर" रखा। इतना ही नहीं वर्ष 1984 और भारत शब्द को भी पोस्टर में टिकट की तरह प्रस्तुत किया गया है। और यदि 31 अक्टूबर 1984 का भारतीय इतिहास में कोई खास महत्व है तो इसलिए कि उस दिन भारत के तत्कालीन महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी जिसका तात्कालिक कारण ब्लू अॉपरेशन यानि सेना का अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में घुसकर आतंकवादियों का मार गिराने की अनुमति देना था। और इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर फैलते ही दिल्ली और आसपास के इलाके में साथ ही देश के लगभग सभी राज्यों में कमोवेश हिंसा का एक लहर चल पडा। दंगे की आग में काफी जानमाल की क्षति हुई थी। बाद के वर्षों में जाँच और अदालत की भी बातें हुईं लेकिन परिणाम सिफर ही रहा। तब से अब तक में एक लंबा दौर गुजर चुका है। इस बीच अनेक अन्य दंगें भी हुए और दंगों के बहानें कुछ फिल्में भी आईं।
लेकिन सोहा अली खान, वीर दास, दयाशंकर पांडे, लखा लखविंदर सिंह, प्रीतम कांगे, और सेजल शर्मा अभिनित फिल्म "31 अक्टूबर" न तो इंदिरा गाँधी की कहानी है न उनके हत्या की कहानी बल्कि यह एक दंगा पीडित परिवार की कहानी है जो अपने धर्म के कारण पहले तो अपनों के बीच शक की निगाह से देखा जाता है और बाद की उसकी जिंदगी बने माहौल की वजह से दुश्वारियों से भर जाती है। वे न्याय की आस में आगे बढते हैं जहाँ उन्हें कुछ लोगों का साथ तो मिल जाता है लेकिन न्याय नहीं।
फिल्म में कलाकारों के अभिनय और गीत संगीत पर कुछ कहना अलग बात है लेकिन सवाल उठता है कि क्या फिल्मकार के लिए फिल्म का नाम न्यायोचित है? क्या 1984 के भारत को पूर्णत: दिखाने में सफलता मिली? क्या दंगा पीडित की प्रस्तुत स्थिति सिर्फ इसी दंगें में हुई थी या कमोबेश यही स्थिति हर दंगें की होती है? क्या फिल्मकार ऐतिहासिक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे? यदि नहीं तो फिर फिल्म का नाम सनसनी फैलाने के लिए क्यों? जब फिल्म 2015 में ही तैयार हो गई थी तो 2016 में वह भी अक्टूबर के महीने में प्रदर्शित करने की क्या वजह बनी? शायद फिल्म निर्देशक कहीं न कहीं भ्रम की स्थिति में रहे जिसका खामियाजा यकीनन फिल्म को भुगतना पड रहा है या पडेगा। फिल्म की सफलता के लिए फिल्म की सारी कसौटियों पर खडा उतरना भी निहायत ही जरूरी है। और दर्शकों के नब्ज को पकडने की जरूरत भी
-सुशील कुमार भारद्वाज
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| गूगल से साभार |
फिल्मकार फिल्म बनाते समय फिल्म की कहानी, विषय, कलाकार तथा कमाई जैसे अन्य चीजों पर भी विचार करते हैं। लेकिन इन दिनों फिल्म की सफलता की गारंटी के लिए कुछ खास नुस्खों का भी उपयोग किया जाने लगा है बिल्कुल समाचार चैनलों की तरह समाचार सनसनी फैलाने और लोगों को आकर्षित करने की नीयत से। शायद निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल और निर्माता हैरी सचदेवा ने कुछ सनसनी फैलाने और कम बजट में अधिक मुनाफा कमाने के इरादे से ही फिल्म का नाम "31 अक्टूबर" रखा। इतना ही नहीं वर्ष 1984 और भारत शब्द को भी पोस्टर में टिकट की तरह प्रस्तुत किया गया है। और यदि 31 अक्टूबर 1984 का भारतीय इतिहास में कोई खास महत्व है तो इसलिए कि उस दिन भारत के तत्कालीन महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी जिसका तात्कालिक कारण ब्लू अॉपरेशन यानि सेना का अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में घुसकर आतंकवादियों का मार गिराने की अनुमति देना था। और इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर फैलते ही दिल्ली और आसपास के इलाके में साथ ही देश के लगभग सभी राज्यों में कमोवेश हिंसा का एक लहर चल पडा। दंगे की आग में काफी जानमाल की क्षति हुई थी। बाद के वर्षों में जाँच और अदालत की भी बातें हुईं लेकिन परिणाम सिफर ही रहा। तब से अब तक में एक लंबा दौर गुजर चुका है। इस बीच अनेक अन्य दंगें भी हुए और दंगों के बहानें कुछ फिल्में भी आईं।
लेकिन सोहा अली खान, वीर दास, दयाशंकर पांडे, लखा लखविंदर सिंह, प्रीतम कांगे, और सेजल शर्मा अभिनित फिल्म "31 अक्टूबर" न तो इंदिरा गाँधी की कहानी है न उनके हत्या की कहानी बल्कि यह एक दंगा पीडित परिवार की कहानी है जो अपने धर्म के कारण पहले तो अपनों के बीच शक की निगाह से देखा जाता है और बाद की उसकी जिंदगी बने माहौल की वजह से दुश्वारियों से भर जाती है। वे न्याय की आस में आगे बढते हैं जहाँ उन्हें कुछ लोगों का साथ तो मिल जाता है लेकिन न्याय नहीं।
फिल्म में कलाकारों के अभिनय और गीत संगीत पर कुछ कहना अलग बात है लेकिन सवाल उठता है कि क्या फिल्मकार के लिए फिल्म का नाम न्यायोचित है? क्या 1984 के भारत को पूर्णत: दिखाने में सफलता मिली? क्या दंगा पीडित की प्रस्तुत स्थिति सिर्फ इसी दंगें में हुई थी या कमोबेश यही स्थिति हर दंगें की होती है? क्या फिल्मकार ऐतिहासिक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे? यदि नहीं तो फिर फिल्म का नाम सनसनी फैलाने के लिए क्यों? जब फिल्म 2015 में ही तैयार हो गई थी तो 2016 में वह भी अक्टूबर के महीने में प्रदर्शित करने की क्या वजह बनी? शायद फिल्म निर्देशक कहीं न कहीं भ्रम की स्थिति में रहे जिसका खामियाजा यकीनन फिल्म को भुगतना पड रहा है या पडेगा। फिल्म की सफलता के लिए फिल्म की सारी कसौटियों पर खडा उतरना भी निहायत ही जरूरी है। और दर्शकों के नब्ज को पकडने की जरूरत भी
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| सुशील कुमार भारद्वाज |

