कलबुर्गी की हत्या के बाद
का तमाशा
( सुशील कुमार भारद्वाज)
( सुशील कुमार भारद्वाज)
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| एम एम कलबुर्गी |
कोई यह नही कह सकता
कि आगे किसी तरीके की हत्या अब न होगी. न ही कोई यह कह रहा है कि आगे की कार्य
योजना क्या हो? कुछ लोगों की गंभीरता की बातों को अलग कर दें तो सारा नजारा किसी
तमाशा से कम नही दिखता है जहाँ अपना फोटो खिंचवाने और नाम उछालने का मौका लोगों को
ठीक उसी प्रकार मिल गया है जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान
के समय सेल्फि का मिल गया था. क्या यह किसी क्रूर मजाक से कम है?
लोगों ने कन्नड़ भाषा
या कलबुर्गी के साहित्यों की ना तो गंभीरता से चर्चा की न ही उनके साहित्य को बड़े
फलक या विश्व के बड़े पाठक समुदाय के बीच लाने की कोई कोशिश या संकल्प किया. उनके
पीछे जो परिजन हैं उनकी सहायता के लिए कितने हाथ आगे सही मायने में बढे कहना
मुश्किल है. ऐसी परिस्थिति में प्रो एम एम कुलबुर्गी अब क्या सोचते होंगे ठीक ठीक
कुछ कह पाना मुश्किल ही लगता है. लेकिन इतना तो तय ही है कि जितना वे जिन्दा रहते
दुखी नही हुए होंगें उससे कहीं अधिक आज वे अपनी मौत के बाद हो रहे तमाशे से दुखी
होंगें. लोगों को कम से कम किसी के मौत के बाद खेले जा रहे इस असंवेदनशीलता से थोडा
उपर उठने की कोशिश जरूर करनी चाहिए.

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