Geetashree लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Geetashree लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है



गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

गीताश्री की स्वप्न, साजिश और स्त्री है चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष (पुस्तक-समीक्षा)

चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष (पुस्तक-समीक्षा)
-    सुशील कुमार भारद्वाज

समकालीन कथाकारों में गीताश्री एक महत्वपूर्ण लेखिका हैं जो यथार्थवाद को अपनी कहानियों में तवज्जो देती हैं जिसमें संवेदना और मानवीय चिंतन का संचार होता है. “स्वप्न, साजिश और स्त्री” गीताश्री का नया कथा-संग्रह है जो कि आज के भौतिकवादी परिवेश में चारदीवारी के अंदर और बाहर दरकते हुए मानवीय रिश्ते, उन्मुक्त सपनों की उड़ान और साजिश की शिकार होती स्त्रियों के संघर्ष की कहानी है.

आज की मृगतृष्णा जीवन पद्धति में मानसिक एवं भावनात्मक असामंजस्य से नारकीय होते पारिवारिक जीवन से त्रस्त लोग आभासी दुनिया में सुख-शांति और जन्नत की तलाश कर रहे हैं. फ्रेंडशिप क्लबों आदि के सहारे जिंदगी को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. लोग रिश्तों के दरारों में व्यापार की एक सम्भावना देख अपना दिल और जेब भर रहे हैं. व्यस्तता और इगो के कारण काम और झगड़े इतने हैं कि लोगों को प्रभावित होते बच्चों के भविष्य के बारें में भी सोचने की फुर्सत नहीं है तो किसी की भावना के लिए कहाँ से इज्जत आएगा? मनुष्य के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही चेहरे नज़र आने लगते हैं. असहिष्णुता इतना अधिक है कि किसी के पास सामंजस्य और समझौते का विचार तक नहीं है. जिंदगी की तलाश में लोग भटकते जा रहे हैं. कभी-कभी कुछ लोग सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर जलालत की जिंदगी जरूर झेल लेते हैं लेकिन वे भी मौके की ही ताक में रहते हैं. जिसका जीता जागता सबूत है “डायरी आकाश और चिडियां”, “उजड़े दयार में”, “आवाजों के पीछे-पीछे”, और “बदन देवी की मेंहदी का मनडोला” जैसी कहानियां, जहाँ चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष है.
 “रिटर्न गिफ्ट” बिखड़ी जिंदगी का निराश अंत है तो “भूत खेली” और “माई री मैं टोना करिहों” वैज्ञानिक युग में भी अन्धविश्वास के नाम पर होने वाले आर्थिक, मानसिक और शारीरिक शोषण का विभत्स रूप.
“कहाँ तक भागोगी” समाज से धर्म–परिवर्तन पर एक सवाल है कि  पितृसत्तात्मक समाज में किस धर्म में स्त्रियां सुरक्षित हैं? कहाँ स्त्रियों को दोयम दर्जे की जिंदगी नहीं गुजारनी पड़ती है? “लकीरें” स्पष्ट करती हैं कि भावनात्मक रूप से पीड़ित सारी महिलाओं की कहानी कमोबेश एक ही है, तो “सुरताली के सपने” बालश्रम की वजह से भावनात्मक एवं मानसिक रूप से बर्बाद होते बचपन की ओर इशारा है. मेकिंग आफ बबीता सोलंकी” में परिवार और इज्जत की कीमत पर आगे बढ़ने की ललक और बदनामी के अन्तर्द्वन्द्व के बीच उभरते दर्द की ओर ध्यानाकर्षित किया गया है जबकि “ड्रिम्स अनलिमिटेड” में प्रतिभा और प्रेम के नाम पर भावनात्मक शोषण की ओर.

संग्रह की सभी बारह कहानियां स्त्री-केंद्रित हैं लेकिन इन्हें स्त्री-विमर्श मात्र के दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता. इन कहानियों में न उपदेश है न आदर्श, बल्कि परिस्थितियों और समस्याओं को ज्यों का त्यों रखा गया है जिससे सीख लेते हुए स्वयं में सुधार करने की जरूरत है. देशी और विदेशी शब्दों में जहाँ भाषा सहज बोलचाल की है वहीं शिल्प बांधे रखने में और कथ्य चौंकानें में सफल है.

पुस्तक – स्वप्न, साजिश और स्त्री
लेखक – गीताश्री
मूल्य – ३०० रुपए
पृष्ठ -१४४
प्रकाशक – सामयिक बुक्स नई दिल्ली 

रविवार, 3 जनवरी 2016

कहानी मेरे लिए मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने का उपक्रम है:गीताश्री



कहानी मेरे लिए मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने का उपक्रम है - गीताश्री 


पत्रकारिता से साहित्य में आई गीताश्री की कहानियाँ सतायी गयी स्त्रियों की कहानियां नहीं हैं, न ही वे स्त्री मुक्ति का घोषणापत्र बनाती हैं बल्कि स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को पूरी शिद्दत से सामने लाती हैं. हाल ही में इन्हें मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बिहार गौरव सम्मान से सम्मानित किया. पेश है गीताश्री से उनकी रचनाशीलता को लेकर सुशील कुमार भारद्वाज  की बातचीत का एक अंश :-
अपने साहित्यिक सफर को किस रूप में देखती हैं?
-साहित्य का बीज तो बचपन में ही पड़ा लेकिन पत्रकारिता जब मेरा पहला प्यार बन गया तो सबकुछ पीछे छूट गया. पत्रकारिता की रुखड़ी जमीन ने मेरे अंदर की रचनात्मकता को सोख लिया. लेकिन पत्रकारिता की सीमा ने मुझे फिर से साहित्य की ओर मोड़ दिया. रचनात्मकता मेरे अंदर की भूख है  “प्रार्थना के बाहरमेरी पहली कहानी हंस में 2009 में छपी थी. फिर राजेंद्र यादव जी के मार्गदर्शन में आगे बढ़ती रही. और स्वप्न, साजिश और स्त्रीके रूप में दूसरे कथा संग्रह को आपलोगों को भेंट कर रही हूँ.
राजेंद्र यादव जैसे गुरू ने आपको कितना प्रभावित किया?

-.
कई पीढ़ियों के कथा-गुरु हैं, कोई माने या न मानें. वे सबसे मित्रवत व्यवहार करते थे, वे कहानी की पाठशाला थे सबको प्रेरित करते थे उकसाते थे, उन्होंने साहित्य से विमर्शो को जोड़ा, यथार्थ को कहानी बनाने की कला उनसे सीखी.
पत्रकारिता ने आपके साहित्यिक जीवन को किस रूप में प्रभावित किया?

-
पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन के लिए ऊर्वर भूमि है. पत्रकारिता ही वह जरिया है जिसने मुझे लेखन तक पहुंचाया नहीं तो मैं भटकती रहती रचनात्मकता की खोज में. मेरे लिए रास्ता तैयार किया. अभिव्यक्ति की जो सीमाएं पत्रकारिता में हैं, वह साहित्य में आकर टूट जाती है वहां अधैर्य है, हड़बड़ी है, साहित्य में धीरज है. मार्खेज ने कहा था- पत्रकारिता ने
उन्हें भाषा का एक अधिक प्रभावशाली इस्तेमाल करना सीखाया साथ ही मुझे अपनी कहानियों को प्रामाणित बनाने के रास्ते बताए.अपने अनुभवो से मैंने भी इस सत्य को जाना.

महिला साहित्यकारों की स्थिति कैसी है?

इन दिनों महिलाओं की आमद साहित्य में काफी तेज हो गई है. साहित्य में स्त्री विमर्श की धमक ने भी स्त्रियों को जिस तरह से लिखने के लिए उकसाया, प्रेरित किया उसी का फल है कि आज इतनी लड़कियां घर के चौखट लांघ बेबाक और बेलौस हो अपनी बातों को कविता, कहानी और उपन्यास आदि के माध्यम से कह रही हैं. काफी चर्चा भी हो रही है. स्त्री लेखन के लिए हम आरक्षण नहीं मांगते हैं लेकिन हमारी पहचान तो हो, स्त्री लेखन को अलग से रेखांकित किया जाए. बड़ी मुश्किल से स्त्रियों ने खुद को अभिव्यक्त करना सीखा है, साहस जुटाया है और समानांतर रास्ता बनाया है. उसे क्रेडिट तो मिलना ही चाहिए.

बदलते माहौल में स्त्री विमर्श को किस रूप में देखतीं हैं?

-
शोर वहीं होता है जहाँ खोखलापन होता है. यह चुप्पी का शोर है. इस समय महिलाएं अच्छा लिख रही हैं , कुछ लोग उसके पीछे बेजा शोर मचा रहें हैं. लचर तर्को से स्त्रीलेखन को खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं. कौन समझाए कि सभी कहानियां स्त्री-विमर्श की नहीं है. वे समकालीन दौर की समाज की सच्चाइयों को ईमानदारी से बयान कर रही हैं. लोग स्त्री विमर्श को मजाक बना कर उपेक्षित करना चाह रहे हैं. हमें उनकी मंशा समझ में आ चुकी है। उनके हाय तौब्बा से हम रास्ता नहीं बदलने वाले। 

जब लोगों के पास समयाभाव है वैसी स्थिति में लंबी कहानियों के बारे में
क्या सोचती हैं?

--
बदलते दौर में जब लोगों के पास समय का अभाव है जल्दबाजी में सारा काम निपटाना चाहते हैं वैसी स्थिति में कहानी को बेबजह अधिक नहीं खींचना चाहिए. कहानियां छोटी और कसी होनी चाहिए. पाठकों से संवाद करना चाहिए. वैसे कहानी में कला प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं जिसको देखकर ही पाठक का सिर भारी हो जाए. कम शब्दों में भी बातों को कहा जा सकता है. लेकिन छोटी कहानी लिखने की कला हर किसी को नहीं आती है.
आपकी कहानी के कला पक्ष पर कुछ आलोचक टिप्पणी करते हैं?

-
कला क्या है? जीवन के कठोर सच की अभिव्यक्ति कला से नहीं होगी.  यथार्थ से बड़ा सौंदर्य कुछ भी नहीं. मेरी कहानियों में कला की बाजीगरी नहीं. सच को सच कहने का साहस है. भावुकता जीवन में है. जीवन की भावुकता आपस में जोड़ती है. मैं जीवन की भावुकता को कहानी की संवेदना बनाती हूं.
आपके अनुसार कहानी क्या है?

कहानी मेरे लिए मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने का उपक्रम है. जिनके हक
छीन लिए गए हैं या जिनके सपने बहिष्कृत कर दिए गए हैं, मेरी कहानी उनके पक्ष में खड़ी है. कहानी आंतरिक खोज है जिसके जरिए पीड़ा से मुक्ति का विराट स्वप्न देखती हूं और गैरबराबरी के विरुद्ध प्रतिरोध के औजार में बदल देती हूं.

 बिहार के मुजफ्फरपुर जैसे पारंपरिक सामन्तवादी परिवेश में पली गीताश्री की जब तस्लीमा नसरीन जैसी लेखिकाओं से तुलना होने लगती है तो क्या सोचती हैं?

-
कुछ लोग इस्मत चुगताई से मुझे जोड़ रहे हैं. इतनी महान हस्तियों से तुलना तो मेरे लिए कंपलीमेंट है. ऐसा बोलने वालों पर मुझे हंसी आती है. आरोप लगाने से पहले परंपरा का ज्ञान बहुत जरुरी होता है. अपढ़ लोग ऐसी बात करते हैं. ऐसे लेखन की लंबी परम्परा रही है. लेकिन मैंने तो ऐसा कुछ नही लिखा जो हमसे पहले की लेखिकाओं ने नही लिखा है. कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग और मैत्रेयी पुष्पा से अधिक बोल्ड नहीं लिखा. मेरे समकालीनों में मुझसे ज्यादा बोल्ड लिख चुकी हैं. नई पीढ़ी तो बहुत आगे निकल रही है. फिर ये बातें मेरे लिए ही क्यों? क्योंकि मुझे पत्रकारिता से साहित्य में प्रवेश की वजह से घुसपैठिया मानते हैं.

बिहार के रचनात्मक परिवेश को किस रूप में देखती हैं?

-
बिहार साहित्य के लिए बहुत ही उर्वर भूमि है जिसने एक से बढ़कर साहित्यकार देश को दिए और आज भी कई रचनाकार राज्य या राज्य के बाहर रहते हुए परचम फहरा रहे हैं. क्या सुखद संयोग है कि इस समय देश की दो बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएं,  हंस में संजय सहाय और पाखी में प्रेम भारद्वाज संपादक हैं. दोनों बिहार के हैं. कितने नाम गिनाऊं. जगह कम पड़ जाएगी. हृषिकेश सुलभ, अवधेश प्रीत जैसे दिग्गज कथाकारों से संपन्न बिहार की कई कथा-पीढ़ियां राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं. वंदना राग, प्रभात रंजन, कविता, संजय कुंदन, अनुज समेत और भी कई रचनाकार इतने सशक्त रूप में हैं कि दूसरे प्रदेश के लोग हतप्रभ  हैं.


आज कल कई कथाकार बिहार की पृष्ठभूमि में रचना कर रहे हैं. कोई खास वजह?

-
दरअसल यहाँ की संस्कृति, मिट्टी और लोग बड़े ही दिलचस्प हैं. यहाँ का
लोकरंग बहुरंगी है. किस्से इसकी लोकचेतना का हिस्सा हैं. उसे उठाने के लिए अपने लोक लौटना पड़ता है बार बार. प्रचुर भंडार है. कमी नहीं पड़ने वाली. विस्मृत लोक बहुत मोहता है. नोस्टालजिया भी एक वजह कि हम बार बार अतीत की ओर लौटते हैं. हमारी रचना को प्रामाणिक और जीवंत बनाने के लिए इस लोक की यात्रा बहुत जरुरी है.


सामाजिक व्यवस्था में स्त्री-स्वतंत्रता का क्या मतलब है?
-स्त्री को स्वतंत्र ईकाई के रुप में स्वीकारने की बात हम करते हैं. पितृसत्ता उसे अपनी इज्जत-प्रतिष्ठा से जोड़ कर वस्तु में बदल देती है. स्त्री हूं तो रह रह कर टीस उठती है अपने समुदाय के बारे में. मेरा रास्ता बहुत आक्रामक नहीं है. हम अपना हक ही तो मांगते हैं,  बराबरी ही तो मांगते हैं, और क्या पूरा आसमान थोड़े न मांगते हैं. हमें पुरुषविहीन दुनिया नहीं चाहिए. हमें
साथी चाहिए, मालिक नहीं. अपने हको की बात करना कहां गलत है? बंधु, नई पीढ़ी बहुत आक्रोशित और आक्रामक है. हमारी पीढ़ी मांग रही है, आने वाली पीढ़ी मांगने की भाषा में बात नहीं करेगी, झपट लेगी अपना हक और हकूक.

इन दिनों क्या लिख रहीं हैं?

मीडिया केंद्रित एक उपन्यास लिख रही हूँ .
------------------------------------------------------------------------------------