गुरुवार, 29 जून 2017

बदलती पत्रकारिता और हमारी पसंद



अखबार शायद तब से है जब सूचना क्रांति का प्रस्फुटित होना शेष था। लेकिन समय के साथ चीजें बहुत तेजी से बदलती चली गई। अखबार के अलावे रेडियों एक मात्र सहारा नहीं रहा। 1990 ई० के विनिवेश नीति का असर हमारे अर्थशास्त्र पर ही नहीं पड़ा बल्कि इसने पूरे जनसंचार को ही प्रभावित करने की कोशिश की। परिणामस्वरूप समाचार चैनलों की ऐसी व्यवस्था और बाढ़ आई की पल-पल की खबरें नजरों के सामने आने लगी। इंटरनेट के प्रचार -प्रसार ने तो रही-सही कसर निकालने की पूरी कोशिश कर दी। बस एक क्लिक पर सब पत्रकार और एक क्लिक पर सारी खबरें। लगा जैसे कि अखबारों के दिन लदने वाले हैं। लेकिन फिलवक्त तक ऐसा हुआ नहीं है। अखबारों ने भी अपने उपलब्ध संसाधनों के सहारे अपने -आप को बदलते हुए मौजूदा रेस में भागीदारी की कोशिश की है। बहुत कुछ बदलते हुए भी बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है। खैर, मैं बचपन से हिन्दुस्तान पढ़ता आया हूँ आज भी पढ़ता हूँ। दैनिक जागरण, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, द हिन्दू, द टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द पायोनियर, द स्टेटस मैन, आदि समेत दर्जनों हिन्दी अंग्रेजी के अखबारों को विद्यार्थी जीवन में पढ़ा। लेकिन फिर घुम-फिर कर हिन्दुस्तान पर ही लटका। सब अखबारों की अपनी-अपनी खूबियाँ और कमियाँ थी लेकिन बात सहजता, उपलब्धता, रूचि और पसंद और जरूरत पर अटक जाती है। जिससे आपकी जरूरत पूरी होती है। वही आपके लिए खास है।
संपादक विशेष पर कभी गौर नहीं फरमाया। बस अपनी जरूरत पूर्ति से खुश होता रहा। अब रही बात सुझाव और बदलाव की तो स्वाभाविक रूप से इस गलाकाट युग में जब अखबार ही बाजार के हवाले है तो आप संपादक की स्वतंत्रता की बात नहीं कर सकते। पत्रकारिता को मिशन के रूप देखना खुद को दु:ख देना है। क्योंकि संपादक भी इन दिनों महज अपनी नौकरी निभा रहे हैं। वे त्याग, बलिदान और समाज कल्याण के लिए नहीं हैं, भले ही उनकी दिलीइच्छा कुछ भी हो। उन्हें सत्ता के पक्ष या विपक्ष में से एक को चुनना है। अन्यथा में न लें तो अब अखबारों /समाचार चैनलों का राजनीतिकरण हो गया है। वे अब निष्पक्ष खबरों की बजाय सुविधाजनक पत्रकारिता करते हैं। सुविधानुसार खबरें बनाते और दिखाते हैं। जनमानस को पक्ष-विपक्ष में करने के लिए खबरों को परोसते हैं। और पूँजीवाद के इस दौर में पत्रकारिता के बचे रहने में ही जब संशय है तो फिर अखबार की क्या बात की जाय? जहां, पूँजीपति ही अखबारों और चैनलों के मालिक हों वहां सुझाव और सलाह के कोई मतलब नहीं होते। सीधी भाषा-पसंद है तो स्वीकार करो वर्ना नकार, लेकिन वे करेंगें वही जिनसे उनका व्यापार बढ़ेगा।
- सुशील कुमार भारद्वाज

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