सोमवार, 26 जून 2017

दूसरा शनिवार में शिवदयाल (रपट): नरेंद्र कुमार









दिनांक 24.06.2017 शाम 5 बजे 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में साहित्य सुधीजन प्रिय कवि शिवदयाल को सुनने हेतु उपस्थित थे। गांधी मैदान का वातावरण मानो काव्य-पाठ के लिए ही आमंत्रित कर रहा था। गोष्ठी में अस्मुरारी नंदन मिश्र, राजकिशोर राजन, सुजीत वर्मा, प्रत्युष चंद्र मिश्र, हरेन्द्र सिन्हा, अरुण शाद्वल, मधुरेश नारायण, कुमार पंकजेश, मुकेश प्रत्यूष, अनिल विभाकर, भगवती प्रसाद द्विवेदी, जयेन्द्र सिंह, प्रभात सरसिज, डॉ निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, अशोक जंगबहादुर, राजेश शुक्ल, शिव पुरी, एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कवि ने 'नाव', 'खोज', 'कवि ने लिखी कविता', 'बेवजन', 'अपने को देखना', 'अकिलदाढ़', 'घोंघा', 'ताक पर दुनिया', 'अंत, अंत हे गर्दनीबाग', 'मीनू मैम का पर्स', 'मीनू मैम की हँसी', 'मीनू मैम की बिंदी', 'खरीददारी', 'आने वाले दिनों में', 'चादर', 'शरणार्थी बच्चा' एवं 'लिफाफा' शीर्षक से कविताएं सुनाई। कविताएं श्रोताओं से सीधे संवाद कर रही थीं।

काव्य-पाठ के बाद हुई चर्चा में सुजीत वर्मा का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं एक तेवर की नहीं हैं तथा उनमें गंभीरता के साथ संवेदनशीलता है। 'नाव' कविता संवेदनशील है, वहीं 'घोंघा' शीर्षक कविता अस्तित्ववादी है। 'खोज' शीर्षक कविता में यांत्रिक युग में मनुष्यता की खोज की बात कवि कहते हैं। विषयवस्तु, भाषा, संरचना एवं शैली के स्तर पर कविताएं लाजवाब हैं तथा उनमें चेतना का गंभीर अंतरप्रवाह स्पष्ट दिखता है। अरुण शाद्वल का कहना था कि शिवदयाल की कहानियों, उपन्यासों एवं कविताओं में आदमी का संघर्ष स्पष्ट दिखता है। इनकी रचनाएं सामान्य चीजों को विशेष बना देती हैं।




शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए डॉ निखिलेश्वर वर्मा का कहना था कि कविता के गुणों के साथ कवि पाठक तक पहुंचते हैं। विषय के हिसाब से शिल्प अपनाते हैं। अशोक जंगबहादुर का कहना था कि कवि की रचनाएं समाज का दर्पण है। आगे कुमार पंकजेश ने कहा कि कवि के लिए विषय ढूंढना मुश्किल काम नहीं है। उनकी कविताएं समस्या के साथ समाधान की बात करती हैं। मुहल्लों और घर की चीजों से लगाव के कारण कवि 'गर्दनीबाग' एवं 'ओसारा' जैसी कविताएं रचते हैं। अपनी रचनाओं में कवि बिना लाग-लपेट अपनी बात कह जाते हैं।

अनिल विभाकर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कवि का ध्यान रोजमर्रे की चीजों पर है। झूठी शानो-शौकत पर कवि कटाक्ष करते हैं। संवेदना के स्तर पर कविताएं बढिया हैं, पर कुछ कविताओं को और खुलना चाहिये था। भगवती द्विवेदी का कहना था कि शिवदयाल मूलतः कवि हैं। सभी कविताएं अनुभूतिपरक लगीं...सीधे संवाद करती हुई। संवेदना को झकझोरती हुई कविता 'गर्दनीबाग' सांस्कृतिक क्षरणशीलता को व्यक्त करती है। प्रत्यूष चंद्र मिश्र ने कहा कि किसी रचनाकार की रचनाओं में स्मृतियों का कोलाज़ नहीं बनता है तो लगता है कि रचना में कुछ कमी रह गयी हैं। 'गर्दनीबाग' कविता में कवि अपनी निजी स्मृतियों को सामूहिक स्मृतियों में तब्दील कर देते हैं।


जयेन्द्र सिंह कविताएं सुनते हुए अभिभूत थे। उन्होंने कहा कि शिवदयाल कुल मिलाकर एक सजग साहित्यकार हैं और वे एक श्रोता। प्रभात सरसिज ने कहा कि कवि की रचनाओं में सम्यक दृष्टि है, करुणा है, बस गुस्सा नहीं है। कविताओं में अवधि-विस्तार दिखता है। राजेश शुक्ल का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं मानस में अंकित रह जाती हैं। वे सही मायने में एक पूर्णकालिक लेखक हैं।

अस्मुरारी नंदन मिश्र ने कहा कि आज बहुत-कुछ छूटता जा रहा है। इस उपेक्षा से संवेदनशील मन में जो पीड़ा उपजती है, वह कवि की रचनाओं में आ गयी हैं। शिवदयाल ईमानदारी के चुकने की बात करते हैं तथा छूटती चीजों के प्रति हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। उनकी कविताओं में जो व्यंग्य है, वह महीन है तथा भीतर तक प्रभावित करती हैं। हरेन्द्र सिन्हा का कहना था कि संवेदनहीनता आज सबसे बड़ा संकट है। शिवदयाल के व्यक्तित्व एवं रचनाकर्म में संवेदना समाहित है। इनकी कविताएं सुनने के पश्चात तनाव खत्म होता है।


मधुरेश नारायण ने कहा कि शिवदयाल की कविताएं पाठकों एवं श्रोताओं से सीधे जुड़ती हैं तथा घर के अंदर-बाहर की छोटी-छोटी चीजों पर बात करती हैं। मुकेश प्रत्युष ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा कि कवि सीधे अपना पॉलिटिक्स जाहिर करते हैं...कोई छुपाव नहीं। कवि का काम समाज के सत्य को सामने लाना है। समय के सत्य को उजागर करने से बचने की कोशिश में कितने कवि अप्रासंगिक होते चले जाते हैं। 'घोंघा' कविता में इसी अस्तित्व की असुरक्षा की बात कवि करते हैं।

 राजकिशोर राजन ने कहा कि समकालीन कविता दवाब में लिखी जा रही हैं। नये युवा कवि आलोचकों की पसंद पर कविताएं लिख रहे हैं। शिवदयाल की यात्रा कथा से कविता के बीच होती रहती है। उनकी कविताओं की भाषा, शिल्प और विषय अपने समकालीन कवियों से भिन्न है। यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कवि अपने रचनाकर्म को ले कर कितना गंभीर है। बिना लंबे संघर्ष के इस स्तर पर आप अलग से रेखांकित नहीं हो सकते। शिवदयाल जी की कहानियां भी शिल्प और कहन के स्तर पर हिंदी में अपनी अलग पहचान बनाती हैं। वहीं कुछ रचनाओं में वैचारिक दवाब के कारण हृदय पक्ष मौन हो गया है।नरेन्द्र कुमार ने शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए कहा कि कवि विषय-वस्तु की तलाश में दूर नहीं जाते, बल्कि अपने आस-पास ही नजर दौड़ाते हैं। रचनाओं में कोई चमत्कार करने का प्रयास नहीं...भाषा की क्रीड़ाओं में उलझने की कोई इच्छा नहीं। उनकी कुछ लंबी कविताओं में उनकी औपन्यासिक प्रवृति स्पष्ट दिखती है।

शिवदयाल का अपनी कविताओं के संदर्भ में कहना था कि उन्होंने कहानी एवं उपन्यास के वनिस्पत कविताओं पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि चाहिए। आज कविताओं पर हुई चर्चा से मैं अभिभूत हूं। 'दूसरा शनिवार' के सद्प्रयासों के प्रति उन्होंने शुभकामनाएं व्यक्त की। अगली गोष्ठी में मुकेश प्रत्यूष के एकल काव्य-पाठ का निर्णय लिया गया। अंत में प्रत्यूष चंद्र मिश्र द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

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