गुरुवार, 15 जून 2017

असगर वजाहत की कहानी दलित के द्वारे

असगर वजाहत उन साहित्यकारों में से एक हैं जो देशकाल पर गहरी निगाह रखते हैं और उन्हें कलात्मक ढ़ंग से शब्दबद्ध कर इतिहास के दस्तावेजों में शामिल करते हैं। प्रस्तुत कहानी "दलित के द्वारे" भी हाल की एक राजनीतिक घटनाक्रम पर लिखी गई है। जिनके कई मायने भी हैं तो कई सवाल भी। आप भी पढ़े।


दलित के द्वारे
कहानी
अ. व.

नेताजी दलित के घर भोजन करने गए। उन्होंने अपनी एक करोड़ की कार को दलित के घर के सामने रोक दिया । और फिर उनकी गाड़ी के पीछे जो पचास - पचास लाख की गाड़ियां थी वे भी रुक गयीं। दलित घर के बाहर खड़ा था। उसके पैर कांप रहे थे। उसका दिल धड़क रहा था।उसकी गर्दन झुकी हुई थी। जनता नेताजी की जय जय कार कर रही थी ।नेताजी ने हाथ जोड़कर दलित को नमस्कार किया है और आगे बढ़कर दलित के गले में फूलों की एक माला डाल दी। इस भारी माला से दलित का सिर और झुक गया।
 दलित नेताजी को लेकर घर के अंदर आया खाना लगा हुआ था ।नेता जी और दलित खाना खाने बैठ गए। दलित ने इतना अच्छा खाना कभी न खाया था। खाना शुरु होते ही पत्रकार और मीडिया के लोग अंदर आ गए । वे भी खाने पर टूट पड़े। दलित को लगा कही खाना कम  न पड़ जाए। पर खाना कम नहीं पड़ा।
कैमरे चालू कर दिए और खाने के बाद पत्रकार नेताजी से कुछ मजेदार सवाल पूछने लगे ।दलित से भी कुछ पूछा गया लेकिन वह जवाब न दे सका क्योंकि उसका पेट गले तक भरा था और आवाज नहीं निकल रही थी। पत्रकार उसे छोड़कर नेताजी के पास आ गए। नेताजी धड़ाधड़ बातें कर रहे थे।
नेता जी के जाने के  बाद दलित पिघलने लगा।वह बर्फ की तरह गलने लगा।धीरे धीरे बहने लगा।फिर वह गायब हो गया।
अब दलित केवल उस फ़ोटो ही में था जो नेता जी के साथ खींची गयी थी।
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असगर वजाहत जी के फेसबुक वॉल से साभार।

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