बदलते इंसान की
कहानी है कमलेश की कठकरेजी
सुशील कुमार भारद्वाज
कथाकार कमलेश की
कहानियों में अमूमन विस्थापन का दर्द, जड़ से कटकर अलग हो नये जीवन की तलाश और
सामंजस्य की समस्या अक्सर दिख ही जाती है. कमलेश की नई कहानी “कठकरेजी” भी बाढ़–पीड़ित
विस्थापितों की ही कहानी है. यूं कहें कि कठकरेजी बाढ़ की त्रासदी में घर-बार से
बेदखल, परिवार से अलग, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, और भावनात्मक रूप से टूटे सुमेसर
की कहानी है. सुमेसर तबाह हो चुकी जिंदगी को फिर से सजाने –संवारने के लिए अपना
सबकुछ छोड़ कुछ ख्वाबों के सहारे पटना की धरती पर पैर रखता है. चकाचौंध शहर में भी
उसे रहने लिए फुटपाथ पर बने अवैध टिन का घर नसीब होता है. तुर्रा ये कि उस घर का
भी किराया उसे चुकाना पड़ता है. जबकि सुमेसर भी अब जान चुका है कि यहाँ भी बड़े मुंह
वाला राक्षस कोशी की बाढ़ की तरह आता है लेकिन फर्क बस इतना है कि कोशी सबकुछ अपने
में समा लेती है जबकि शहरी राक्षस कुछ भी निगलता नहीं बल्कि तबाही को भी कौतुहल और
तमाशा बनाकर छोड़ देता है.
दरअसल में कहानी
सरकारी व्यवस्था पर एक जोरदार तमाचा है. बाढ़ के नाम पर बिहार जैसे प्रान्तों में
हर साल अरबों रूपया का वाया-न्यारा होता है. राहत-कोष से बहने वाली गंगा से कितने
बाढ़ पीड़ितों का किस हद तक सहायता होता? कितनों का पुनर्वास होता है? कितने लोगों
को सही से दवाई और चिकित्सा नसीब होता है? सबकुछ साफ़ –साफ़ दिखने लगता है. चिंता का
विषय तो यह है कि लोक-कल्याणकारी लोकतांत्रिक देश में सड़कों पर जिंदगी गुजारने की भी
कीमत चुकानी पड़ती है. मौलिक सुविधा के नाम पर बिजली की कौन कहे? पीने का शुद्ध
पानी तक मस्सैयर नहीं. उसके लिए भी पास के नुक्कड़ पर लगे सरकारी चापाकल पर घंटों
लाइन में लगना पड़ता है. जब विवश हो कीड़े –मकोड़ों के संग जानवरों की तरह सड़कों के
किनारे रात बितानी पड़े तो हम किस मुंह से मानवता की बात करें? खुद को सभ्य और सभ्य
समाज का वासी कहें? जबकि यही लोग तथाकथित सभ्य समाज की गंदगी को भी ढो रहे हैं. इन
लोगों का न तो कोई जाति है न धर्म. लेकिन समाज के नज़र में दलित और अछूत जरूर हैं.
ये समाज की सेवा तन, मन और धन से करते हैं और खुश रहते हैं लेकिन बदले में मिलता
है क्या? ये किसी के वोटबैंक भी नहीं हैं तो इन्हें पूछेगा कौन? हां, ठंढ़ के मौसम
में नये –पुराने कपड़ों के बहाने कुछ राजनीतिक और गैर-सरकारी संगठन के लोग तस्वीर
खींचवाने जरूर पहुँच जाते हैं. लेकिन इन तस्वीरों से इन पीड़ित लोगों को वो सुख भी
नहीं मिल पाता है जो नयनसुख इन्हें सड़क किनारे दीवारों पर चिपके सिनेमा के
पोस्टरों से मिलता है.
विस्थापितों की
जिंदगी के कई आयामों को कमलेश जी ने पकड़ने की कोशिश की है. सदाबहार खुशी और गम के
बीच चिलम –गाँजे का कश है तो शराब की खुमारी है. मारपीट गालीगलौज की छौंक है तो
सद्भाव और भाईचारे की मिशाल. पिता-पुत्री का रिश्ता है तो मशीनी जिंदगी जीने वाले
कठकरेजी भी. दिल से सबके लिए खुशी, शुभकामानाएं और शोक भी है लेकिन ताज्जुब है कि
दिल ही नहीं है. वर्ना पुत्र के मरने के बाद शोक की बजाय पिता नशे में धूत नहीं
रहता. पिता के मरने के बाद बेटी आजादी नहीं महसूस करती. आजादी की बात तो तब होती
जब मीना शहर दर शहर भटकने के अपने धंधे को छोड़ नई जिंदगी जीने की कोशिश करती. मीना
को जिस्म और प्रेम का अंतर मालूम है? भौतिकवादी युग में बाजार से सुख और शांति की
चाह रखने वाली मीना के लिए वैवाहिक जीवन गुलामी की निशानी है. दाम्पत्य जीवन का
अनुशासन उसके स्वतंत्रता में दखलंदाजी है. मीना का चरित्र उस समय बेहतर रूप से
स्पष्ट होता है जब वह अपने धंधेवाले अंदाज़ में अपने जिस्म को सुमेसर के प्रस्ताव
के जबाब में आगे कर देती है. एहसान बस इतना है कि दूसरे से वह उस काम के लिए पैसे
लेती है लेकिन सुमेसर से नहीं लेगी.
मीना का दूसरा पहलू
भी विचारणीय है कि उसका बीमार पिता अब झिकझिक नहीं करता. जो कुछ भी मीना लाकर देती
है, वह चुपचाप ग्रहण करता है. कहां जाती है? कब जाती है? क्यों जाती है? किसी चीज
से उसे मतलब नहीं है. क्या यह स्वार्थ की पराकाष्ठा नहीं है? क्या मीना के अंदर
कभी निर्दोष मन नहीं था? क्या उसके जिंदगी में हसीन सपने और सपनों के राजकुमार के लिए
कोई जगह कभी थी ही नहीं? या परिस्थितियों के जुल्मों सितम ने उसे कठकरेजी बना
दिया? मासूमियत और जिंदादिली यथार्थ के रुखड़ी जमीन पर वर्षों से रगड़ खाकर अंत में दम
तोड़ गई? क्या मीना की परिस्थिति के लिए मीना को ही दोषी माना जा सकता है? नरक के
जीवन से बाहर आ पाना इतना आसान है क्या? सुमेसर के साथ शादी रचाकर वह वाकई खुश हो
जाती? सुमेसर पहला आदमी रहा होगा जिसने घर बसाने का प्रस्ताव दिया होगा या कई आए
और धोखा देकर चले गए? क्या मीना का इतिहास उसके वैवाहिक जीवन में समय –बेसमय फन
तानकर खड़ा नहीं हो जाएगा?
जिस आंतरिक संघर्ष
से मीना वर्षों पहले गुजरी उसी संघर्ष और टूट-फूट के दौर से गुजरकर तो सुमेसर भी कठकरेजी
बन रहा है. मायामोह और भ्रम के टूटते ही सुमेसर के होठों पर मुस्कुराहट नाचने लगती
है. वह नई सुबह की नई रौशनी में नये नज़रिये से नई चकाचौंध को महसूसने लगता है. गांव
से लाई गई यादों और संस्कारों के साथ–साथ पटना की चमक–धमक में सड़कों पर रिक्शा
चलाने के अनुभव ने उसे एक नये इंसान के रूप में गढ़ दिया.
कहानी विध्वंस से
निर्माण की ओर बढती है. जीवनानुभव अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर है. ग्रामीण जीवन
की सहृदयता और सहयोग भागमभाग वाली शहरी जिंदगी में कहीं दम तोड़ती नज़र आती है. मानवीय
संवेदना शहरों से विलुप्त होती जा रही है. समयाभाव और नैतिक भ्रष्टाचार अस्पताल के
कुव्यवस्था में नज़र आता है जहां जिंदगी की तलाश कम, कब्र की बिस्तरें अधिक नज़र आती
हैं. भयादोहन का तो अंत ही नहीं है. चाहे बाढ़ का आतंक हो या जमींदार के सेना
का या बैंक कर्ज का या सिपाहियों का.
कमलेशजी का कथा कौशल
सरल, सहज, और परिवेशानुकुल भाषा में ही परिलक्षित नहीं होता है बल्कि बिम्बों के
यथोचित प्रयोग एवं प्रस्तुति में भी साफ़-साफ़ झलकता है; जो कहानी की पठनीयता को सहज
एवं सुगम बनाता है. साथ-ही-साथ लोकरंग और लोकसंस्कृति में पगा कहानी का एक-एक
पात्र अपनी पहचान के लिए संघर्षरत दिखता है.
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