सुभाष रूपेला की कविताएं जितनी छोटी और सुंदर होती है उतनी ही अर्थपूर्ण भी। ये कविताओं के विषय का चयन भी जिंदगी की सहज घटनाओं से करते हैं जो आपके मन को अक्सरहां छू जाते हैं और मन को गुदगुदा जाते हैं। आनंद लेते हैं सुभाष रूपेला जी की कुछ कविताओं का।
वो ठंडा हो जाए, तो बात बन जाए
ग़ुस्सा बिन ब्रेक की वो गाड़ी है,
अंधेरी राह पर चाल जिसकी तूफ़ानी है,
वो चल जिधर पड़ी, सो चल पड़ी,
है मज़ाल किसकी, जो बीच में रहे खड़ी?
रौंदती सब कुछ वो मंज़िल की ओर चल पड़ी।
ज़िद से दोस्ती उसकी पुश्तैनी है,
संकल्प से उसकी दुशमनी पुरानी है,
विवेक से नाराज़गी उसकी ख़ानदानी है,
तैश के ऐक्सिलेटर से ऐश उसने ठानी है,
हादिसों की सोहबत उसकी जवानी है,
ठुक पिटकर लाखों गँवाने की उसकी कहानी है।
अनुभव के हथौड़ों से होती है डेंटिंग,
निखरती है सूरत पाकर पछतावे की वेल्डिंग,
संयम का ब्रेक हो, संतुलन का क्लच हो,
साथ शांत मन की मंथर चाल हो,
फिर भला हादेसे का क्यों नसीब हो?
मंज़िल क्यों न सदा इस गाड़ी के क़रीब हो?
क्रोध से नहीं संयम से चलाओ ज़िंदगी की ये गाड़ी,
फिर रहेगी सफलता अगाड़ी और पिछाड़ी।
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वापसी
लंबा अर्सा पाँच साल का गुज़ार दिया,
मगर माँ का चेहरा न कहीं भी दिखाई दिया।
चेहरे और तस्वीर में फर्क हुआ करता है,
माँ-बेटे का दिल कहाँ जुदा हुआ करता है!
फोन करके भी चित्त को कहां मिल पाता था चैन!
सूरत माँ की देखने को तरस रह जाते थे नैन।
शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरा होगा,
बेटे ने माँ को जब याद न किया होगा।।
आ ही पहुँचा अमेरिका से, माँ से मिलने बेटा,
चरऩ छुए माँ के उसने, ली फिर जादू की जफ्पी।
ख़ुशी के समंदर में, नहाया-सा लगने लगा वो।
बचपन की बातों में, गोते लगाने लगा वो।।
काश ऐसा ही हमदर्द बेटा आप सबको मिलता जाए,
ख़िज़ाँ नहीं, फिर बहार ही बहार छा जाए।।
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बेचारे मास्टर की नेता जी के सामने पेशी
नगर में आ पहुँचा एक मदारी,
जमूरे-सी दिखती उसे जनता सारी.
सब मसलों का वो सुराग पा गया,
फैक्ट्री बदलने का खयाल आ गया.
ट्रेनिंग देने सैमिनार आ गया.
सार अखबार में ज़रा, लीक हो गया:--
“मैकाले थे सेर, हम हैं मियां सवा सेर,
अपनी गली में होता है कुत्ता भी शेर,
नज़र आते हो चूहे से मचाते फिरते अंधेर.
तैयार करते जाते हो क्रांतिकारी ढेर,
चूहेदानी से सीसीटीवी लगाए हैं हमने ढेर,
बेजा हरकत कैद कर तुम्हें करेंगे कैद,
जासूस हमारे फिरते हैं हर कहीं मुस्तैद.
क्रांतिकारी नहीं, दरी बिछाऊ लाल चाहिए,
हुक़ुम बजा लाएं, वो कमाल चाहिए.
फेल हों, तो भी सब पास चाहिए.
अमल करो तुरंत, मत करना और लेट,
कर देते हैं हम वरना, पलक झपकते टरमिनेट.”
हुक़ुम सुन आआक़ा का, मास्टर को आ गया पसीना,
दिसंबर में घिर आया मानो जून का महीना.
याद आ गया उसे घर बैठा नगीना,
संभव नहीं बिलकुल, उसके बिना जीना.
“नेता शरऩम् आदेशम् शरऩम् दलम् शरऩम् गच्छामि,
मत होना रुष्ट स्वामी, करूंगा मैं सदा गुलामी.”
छोड़कर राष्ट्र-भक्ति, बढ़ेगी जब तक व्यक्ति-भक्ति,
छिना पद जगत गुरु का, हीरे छिनेंगे बिन गिनती.
होता नहीं शिक्षक का आदर जहां,
फेल को भी पास करना पड़ता है जहां,
अँधेरा ही अँधेरा छा जाता है वहां.
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आशीर्वाद
सुरक्षा-कवच बन जाता है आशीर्वाद।
हर बुरी नज़र से बचाता है आशीर्वाद।
दुआओं की खाद से फलते सभी इरादे।
हिना का रंग खिला जाता है आशीर्वाद।।
बीमा दीर्घायु दे जाता है आशीर्वाद।
राह की अड़चनें भगाता है आशीर्वाद।
असीस के अनमोल रतन तुम संभाल रखना।
मुरादें पूरी करवाता है आशीर्वाद।।
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