बुधवार, 21 जून 2017

शत्रुघ्न सिन्हा के कॉलेज की एक घटना उन्हीं की जुबानी

शत्रुघ्न सिन्हा ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति के उम्मीदवारी के लिए बधाई देने के बाबजूद जिस तरीके से बयान दिया उसमें नया कुछ भी नहीं है. वे भाजपा में रहते हुए भी पार्टी के खिलाफ ही बयानबाजी नहीं करते रहे हैं बल्कि वे जन्म से ही अख्खड़ साहसी हैं. उनके बागी रूप को भारती एस प्रधान की लिखी एनिथिंग बट खामोश में भी बखूबी पढ़ा जा सकता है. आइए पढ़ते हैं शत्रुघ्न सिन्हा के कॉलेज की एक घटना को उन्हीं की जुबानी. जिसे आपलोगों के लिए हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है – सुशील कुमार भारद्वाज




वे एक खास घटना के बारे में बताये. “एक दिन पटना साइंस कॉलेज के लड़के लड़कियों को प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ककोलत, पटना से सत्तर से अस्सी किलोमीटर दूर पर्वतीय इलाके में घुमाने की तैयारी की गई. मेरी छवि की वजह से मुझे उस कार्यक्रम से अलग रखा गया, जो मुझे मंजूर नहीं था. उनलोगों ने मेरे बगैर जाने की बात कैसे सोच ली? मैंने तय किया कि बाबजूद इसके मैं इस कार्यक्रम का हिस्सा बनूँगा.
“मेरे एक दोस्त ध्यान देव शर्मा, जो कि मुझे बहुत चाहता था, मुझे आधे रास्ते में बख्तियारपुर बस अड्डे के पास मिला और मुझे अपने साथ रिक्शे से ले गया, रिक्शा को वह खुद चला रहा था. जलती गर्मी में धूल भरी लंबी यात्रा से हमलोग ककोलत पहुंचे लेकिन बस लौटने ही वाली थी. प्रभारी प्रोफेसर श्री डीएन सिंह, जो कि मुझे बिल्कुल ही पसंद नहीं करते थे, को बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने वहां पहुंचने की गुस्ताखी की थी. उन्होंने जब मुझे बस के अंदर बैठे देखा तो उन्होंने इसे अपने व्यक्तिगत अपमान के रूप में लिया और वे नीचे उतर गए. उन्होंने कहा, ‘ये बस पटना वापस नहीं जाएगी. तुम्हें इस परिभ्रमण में शामिल नहीं किया गया था इसलिए जब तक तुम बस से बाहर नहीं निकलोगे, यह हिलेगी नहीं.’ अंधेरा हो रहा था और मैं जंगल में अकेला नहीं रहना चाहता था. लेकिन इसी समय मुझे बस से बाहर निकलना था. प्रोफेसर के जानकारी के बिना कुछ दोस्तों ने मुझे बस के उपर चढ़ने में मदद की. बस के उपर में लेटे हुए छड को पकडे रहा. बस के उपर में बड़े बड़े बर्तन और पिकनिक का सामान रखा हुआ था. बाहर कर दिए जाने के कारण मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, और बस भी इतने खराब तरीके से चलाया जा रहा था कि मेरा पूरा शरीर उपर –नीचे उछल रहा था. बस के अंदर बैठे प्रोफेसर और अन्य को आभास भी नहीं हुआ कि बस के उपर इतना उछल कूद मचाने वाला मैं था, उनलोगों को लगा कि ये आवाज बस के उपर रखे बर्तन की है. रास्ते में कुंठा के कारण बर्तन और प्लेट को फेंकता रहा. यह मुझे परपीडन की खुशी देती रही. अब मैं महसूस कर रहा हूं कि उस तरह का काम कलाबाजी दिखाने वाले का था लेकिन वह मजबूत इरादा ही था जिसकी वजह से बख्तियारपुर पहुंचने तक उपर में ही जमा रहा. जब बस चाय–नाश्ता के लिए रूकी, तो मैं नीचे आया और सिगरेट जलाकर धुआं प्रोफेसर के सामने उड़ाने लगा. सब कोई चकित था कि मैं वहां पहुंचा कैसे? कुछ लड़कियां मेरे इस साहसी कारनामें को देखकर बहुत खुश हुई. उस दिन, प्रोफेसर के चेहरे पर छाये नफरत की अभिव्यक्ति को मैं नहीं भूल सकता.
“लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई. मेरे दोस्त ध्यान देव के कुछ प्रभावी मित्र परिवहन विभाग में थे. हमलोगों ने ऐसी स्थिति बना दी कि बस खुल ही नहीं सकती थी. उन्होंने बहाना बनाया कि बस में कुछ खराबी है. लेकिन 11:30 बजे रात तक मैं ही चलने के लिए उतावला होने लगा. मुझे लगा कि लड़कियों के बस के साथ हमलोगों को आगे बढ़ना चाहिए. हमारे चेहरे पर भयंकर मुस्कुराहट देखकर प्रोफेसर ऐंठ कर रह गए. अठारह साल के लड़के के इरादे के सामने अधिकारी के चेहरे पर इतनी शर्मिंदगी और बेबसी छाई थी कि हमलोगों ने बस को आगे बढ़ाने और दूसरे रास्ते से पटना पहुंचने का निश्चय किया.



उनकी खासियत है कि शस इस तरह के शरारत के बारे में कहने से हिचकते नहीं हैं भले ही इसमें उनको कोई फायदा न हुआ हो.
“मैं जनता हूं कि इस तरह का बचकाना हरकत करना बेकार था. मुझे नहीं करना चाहिए था.” वे माने, “मैंने उस प्रोफेसर के लिए कोई ईर्ष्या नहीं रखा. यदि मैं आज उनकी जगह होता तो मैंने भी वही किया होता. लेकिन मुझे ध्यान देव के लिए बहुत प्यार और दुलार है, जिसने उसदिन मेरी मदद की. मैंने इस घटना के बारे में जीवन के इस पड़ाव पर सुनाया सिर्फ यह बताने के लिए कि मैं आमदा हो जाने पर क्या कर सकता हूं. आज यह बेकार लग सकता है, दुस्साहसी लग सकता है लेकिन सतरह और अठारह की उम्र में इस तरीके के कार्यों को कर पाना बहत ही मुश्किल था और इरादे का मजबूत होना जरूरी था. उसदिन मुझे कुछ भी हों सकता था.”
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