शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 में दिखीं आठ भाषाओं की अट्ठाईस फ़िल्में


- सुशील कुमार भारद्वाज

जहां एक तरफ बिहार विधान सभा चुनाव के बाद से राज्य की छवि अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक-हत्या, अपहरण, रंगदारी और बलात्कार के कारण धूमिल हों रही है वहीं दूसरी ओर राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उन फिल्मकारों पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे जिन्होंने बिहार के नकारात्मक छवि को अपने फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत किया. इतना ही नहीं, नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर राजधानी (पटना) में प्रेममयी वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से दूर कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार आयोजित सात दिवसीय ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ में उन्होंने आश्वासन भी दिया कि बिहार की धरती पर बिहारी कलाकारों के साथ बिहार केंद्रित विषय पर फिल्म बनाने वालों को वे हर संभव सहायता भी उपलब्ध कराएंगें. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी रहे फिल्म फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़ ,अभिनेत्री दिव्या दत्ता, और शेखर सुमन.   
पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 में काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुआ था जिसमें बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई और यह प्रचार- प्रसार किया गया था कि इस बार दर्शक फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन आदि जैसी महान हस्तियों से मिल सकेंगें. लेकिन समारोह के अंत अंत तक दर्शकों को नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता और इम्तियाज अली जैसे नामचीन निर्देशक से ही संतोष करना पड़ा.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ समापन. दिखाई गई अन्य फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान,

प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ ही नहीं जुटी बल्कि बजरंगी भाईजान के लिए हंगामा भी हुआ और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ताबडतोड लाठी चार्ज भी हुआ. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके महिला – पुरुष भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 19 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन न सिर्फ हॉल खाली ही रहे बल्कि भीड़ बनकर जुटे कुछ लोगों को छोड़ किसी के पास कोई सार्थक प्रश्न नहीं थे. हां, सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग से अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से बताया गया कि फिल्मसिटी के निर्माण के लिए राजगीर में 20 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर लिया गया है. फिल्म नीति तैयार कर ली गई है जो कि एक दो महीने में सार्वजनिक हों जाएगी वहीं बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में खुलने की भी खुशखबरी दी गई.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन इसके सफल आयोजन पर अंगुली भी कम नहीं उठे. जहां आयोजकों में सामंजस्य की कमी की वजह से मीडिया वालों के समक्ष खेद व्यक्त करने के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा रहा वहीं कुछ लोग कह रहे थे कि सत्ताधारी दल के आपसी उठापटक की वजह से सरकार की ओर से जिस उदासीनता को बरक़रार रखा गया उसी उदासीनता का परिचय देते हुए बॉलीवुड के श्रेष्ठ कलाकारों ने अपनी अपनी अनुपस्थिति में ही अपनी भलाई समझी. समझदार लोग कहते नज़र आए अनियंत्रित भीड़ तो एक मदारी भी जुटा लेता है लेकिन सरकारी खर्चे का सार्थक सदुपयोग होना भी लाजिमी होता है.



रविवार, 21 फ़रवरी 2016

बदलते लोग (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज

                   बदलते लोग

 सुशील कुमार भारद्वाज
-    सुशील कुमार भारद्वाज



बदलते ही रहना प्रकृति की नियति है. यदि यह परिवर्तन न हो तो व्यवस्था चरमरा जाएगी. अव्यवस्था की स्थिति में चीजें सड़-गल कर बर्बाद हो जाएंगी. बात चाहे आप पृथ्वी की गति की करें या फिर दिन-रात और मौसम के बदलने की या सुख–दुःख के चक्र की. कहीं स्थिरता नहीं है. सृष्टि में ही जब स्थिरता नहीं है तो मानव जीवन में इसकी तलाश के क्या मायने हैं? लोग बच्चे से जवान और जवान से बूढ़े हो जाते हैं. इन बदलावों के भी अपने मायने हैं लेकिन जब कभी हम बदलते लोग की बात करते हैं तो हमारी सोच संकुचित हो जाती है. हम नकारात्मक बातों में उलझ कर कहीं दूर निराशा के भंवर में डूबते, फंसते नज़र आते हैं. हमें याद आते हैं भोगे हुए कष्ट, खाये हुए धोखे और निर्लज्ज इंसानों के करतूत और उनकी गोलगोल बातें. शायद इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि हम जी ही रहे हैं ऐसे संक्रमित एवं भयाक्रांत तकनीकी विकासशील माहौल में, जहाँ चारो ओर आर्थिक ही नहीं मानसिक भ्रष्टाचार का बिगुल बज रहा है. अपने-पराये का फर्क करना मुश्किल हो रहा है. विश्वास शब्द अपना अर्थ और अहमियत खोता जा रहा है. यदि कुछ बचा है तो भविष्य की चिंताएं. स्वयं की ही नहीं बहन–बेटियों और कुटुम्बियों के सुरक्षित घर वापसी तक किसी अप्रिय घटना के प्रति सशंकित रहना. इतने पर भी कहाँ छूटता है भय? यदि जो कहीं हो गई किसी घटना में मौत तो, लोगों की नज़रें करती हैं एक्सरे उन लाशों की बजाय देने की सहायता. होते हैं सवाल उनकी नज़रों में- क्यों और कैसे मर गया? कोई अपराधी या आतंकवादी तो नहीं था? गर जो मिल गयी लाश किसी कमसिन लड़की की, तो फिर मत पूछो क्या- क्या होंगें सवाल? सहानुभूति के बजाय होगी पड़ताल उसके चरित्र की- कब, कहाँ और क्यों जाती थी? किस-किस से वह खुल कर बात करती थी? प्रेमी से घर वाले तक के व्यवहार की ही बातें नहीं होगीं बल्कि जाति-धर्म की भी चर्चाएं होंगीं. साथ ही होती है लोगों को हडबडाहट बच बचा कर किसी तरह निकल भागने की- अपनी जिम्मेवारियों से भी और अप्रत्याशित भयारोप से भी. ऐसी ही परिस्थितियों में याद आती है मुझे अरुण देव की ये पंक्तियां जो रेखांकित करती हैं मानवीय बदलाव को:-

“भीड़ में गुम गया है आदम
खोई हुई हव्वा को खोजते हुए

हर स्त्री में वह स्मृति की तरह रह गई हव्वा के पास जाता है
और उसकी संभावना में एक आदम की तरह खटखटाता है सांकल
बजाता है घंटी
पुकारता है वही राग
जिसे पहली बार गुनगुनाया था उसने हव्वा को रिझाने के लिए

अपने वंश वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह

शायद उस सेब को होगा पता
जिसकी मिठास पुरा कथाओं से बह कर आती है अभी भी

ईश्वर के साम्राज्य से बहिष्कृत
अपनी नश्वरता के उद्यान में उसने खिलाएं प्रणय के फूल
गाये अपनी अमरता के गीत

अब भी
जब कभी उमगते बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट
उसके रक्त में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है

इधर हव्वा और आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता है नज़र


हव्वा को खोजते खोजते उसने देखे
अपनी बेटिओं के लटके हुए शव, झुलसे हुए चेहरे
प्रेम विहीन दाम्पत्य में उन्हें घुटते हुए


न जाने आदम ने कैसा बनाया है अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत होने के रास्ते भी बंद हैं.”


लेकिन बदलाव के सकारात्मक पहलू भी होते हैं. थोड़ी देर के लिए आप पीछे मुड कर देखें और सोचें कि जब आपका जन्म हुआ था तो परिस्थितियां और सुविधाएं क्या थीं? परम्पराएं क्या थीं? लोगों की  सोच और सामाजिकता के क्या मायने थे? और आज आप खुद को कहाँ और किन परिस्थितियों में पाते हैं? संभव है कि तत्कालीन समाज की सोच, परम्पराएं, और सभ्यता-संस्कृति आपको अपनी ओर आकर्षित करती हों. आपको नॉस्टैल्जिक बनाती हों. लेकिन क्या बगैर बदलाव के आप जिन सुविधाओं को जी रहें हैं वह भी संभव था? शायद नहीं.
सबसे बड़ी बात है कि आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है. और जरुरत के अनुसार धीरे –धीरे बदलते –बदलते हमलोग यहाँ तक आ पहुंचें हैं. हमारी सोच व्यक्ति एवं विकास केंद्रित होती चली गई, जीने के मायने बदलते चले गए. उदारता और स्वतंत्रता से हमलोग स्वछंदता की ओर बढ़ते चले गए. समाज अब भी है लेकिन बदले अर्थों में. सच है कि इन बदलावों से पुरानी व्यवस्था चरमराने लगी है, बुजुर्ग लोग नए लोगों को कोसने लगे हैं, पसंद –नापसंद और विश्वास के साथ-साथ हित टकराव बढ़ते जा रहें हैं. लेकिन इसे सिर्फ अभी की बात नहीं मानी जा सकती है. यह हर दस –बीस वर्ष के अंतराल पर महसूस किया जा सकता है क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है.
साहित्य के विभिन्न विधाओं में भी यह परिवर्तन ससमय प्रतिरोध के रूप में उभरते रहते हैं. चाहे आप किसी कथाकार की समकालीन कहानी को देखें या फिर कविता या फिर नाटक को. कहीं आदम और हव्वा की अनुगूँज सुनाई पड़ेगी तो कहीं प्रेम में कालिदास के मेघदूतम को छोड़ उन्मुक्तता के छंद. और कहीं नाटकों में सिद्धांतों और नियमों को अपने सुविधानुसार परिभाषित करने का जुनून. बदलाव का मंजर हर जगह नज़र आता है. यदि एक तरफ जातीय बंधन के कमजोर होने की बात की जाती है तो दूसरे तरफ धर्म की कट्टरता चरम पर नज़र आती है. साथ ही साथ तेज हो रहीं हैं सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहसें.
लेकिन जब चीजों को गौर से पढ़ने की कोशिश करते हैं तो अहसास होता है कि कुछ भी नहीं बदला है. सिर्फ चेहरे बदल गए हैं, रंगरूप बदल गए हैं, कार्यशैली बदल गई है लेकिन आत्मा वही है, जन्मजात प्रभाव वही है, मानवीयता और अमानवीयता की परिभाषाएं वही हैं सिर्फ सीमाक्षेत्र का थोडा अतिक्रमण हो गया है. और यही सच है कि मौलिक गुण में कोई परिवर्तन नहीं होता है.
विचारणीय बात है कि इन बदलाबों को दिशा देना भी हमारे ही हाथों में है तो फिर क्यों नहीं हम सकारात्मक सोच के साथ एक नई शुरुआत कवि अरुण देव के ही इन शब्दों में करें-


अब की अच्छी शुरुआत की जाए घमंड से ऐंठन की जगह
नम्रता से सीधा रहा जाए पडोसियों पर हंसने से पहले उनके दुःख में रो लिया जाए

एक दिन घर से निकलना हो और बिना दाग के वापस लौटा जाए आत्मा में चढ़ने से पहले मैल हंसी की तेज धार से उसे खुरच दिया जाए

एक दिन गली बुहारी जाए
नाली साफ किया जाए
पर उससे पहले मन के कपट आंसुओं से धुल लिए जाएं”

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर बिहार की राजधानी पटना में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे के माहौल से दूर प्रेममयी वसंत ऋतु के धूप-छांव में ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तरफ से पहली बार आयोजित किया गया है. जबकि पटना की धरती पर फिल्म समारोह की शुरुआत विभिन्न विभागों एवं आयोजकों के सहयोग से वर्ष 2006  से अब तक तीन बार हो चुका है. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्मों का यह सिलसिला बंद हो गया था. लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात है कि भारतीय पैनोरमा की विभिन्न भाषाओँ की क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न रुपए खर्च करने हैं न ही किसी पास का इंतज़ार. महज अपना एक पहचान पत्र लेकर पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 20 फरवरी से 25 फरवरी तक वर्ष 1956 से अब तक के बने चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लें लिया जा सकता है. दिखाई जाने वाली प्रमुख फिल्मों में द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, देसवा, बजरंगी भाईजान, एवं राम सिंह चार्ली है. सबसे अनोखी बात है कि इस फेस्टिवल में सिर्फ फिल्म ही नहीं दिखाए जाएंगें बल्कि रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर, फ्रेजर रोड में प्रदर्शनी एवं कार्यशाला का भी आयोजन किया गया है.

पटना फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन करते तेजस्वी यादव 
समारोह का का उद्घाटन बिहार के उप-मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी प्रसाद यादव, कला, संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम, मुख्य सचिव श्री अंजनी कुमार सिंह, संस्कृति एवं युवा विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, समेत शेखर सुमन आदि बालीवुड कलाकारों, एवं गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में सिनेमा ‘राम सिंह चार्ली’ के प्रदर्शन के साथ श्री कृष्ण मेमोरियल, हाल में आज 19 फरवरी को हुआ. जबकि फेस्टिवल का अंत ‘बजरंगी भाईजान’ के साथ होगा. कहने की जरूरत नहीं कि बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेन्ट एंड फिनांस कार्पोरेशन, फिल्म समारोह निदेशालय, एवं राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के सहयोग से आयोजित पटना फिल्म फेस्टिवल से न सिर्फ माहौल में बदलाव आएगा बल्कि नए एवं कला से जुड़े लोगों को प्रेरणा एवं बहुत कुछ सिखने को मिलेगा.  
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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

गीताश्री की स्वप्न, साजिश और स्त्री है चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष (पुस्तक-समीक्षा)

चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष (पुस्तक-समीक्षा)
-    सुशील कुमार भारद्वाज

समकालीन कथाकारों में गीताश्री एक महत्वपूर्ण लेखिका हैं जो यथार्थवाद को अपनी कहानियों में तवज्जो देती हैं जिसमें संवेदना और मानवीय चिंतन का संचार होता है. “स्वप्न, साजिश और स्त्री” गीताश्री का नया कथा-संग्रह है जो कि आज के भौतिकवादी परिवेश में चारदीवारी के अंदर और बाहर दरकते हुए मानवीय रिश्ते, उन्मुक्त सपनों की उड़ान और साजिश की शिकार होती स्त्रियों के संघर्ष की कहानी है.

आज की मृगतृष्णा जीवन पद्धति में मानसिक एवं भावनात्मक असामंजस्य से नारकीय होते पारिवारिक जीवन से त्रस्त लोग आभासी दुनिया में सुख-शांति और जन्नत की तलाश कर रहे हैं. फ्रेंडशिप क्लबों आदि के सहारे जिंदगी को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. लोग रिश्तों के दरारों में व्यापार की एक सम्भावना देख अपना दिल और जेब भर रहे हैं. व्यस्तता और इगो के कारण काम और झगड़े इतने हैं कि लोगों को प्रभावित होते बच्चों के भविष्य के बारें में भी सोचने की फुर्सत नहीं है तो किसी की भावना के लिए कहाँ से इज्जत आएगा? मनुष्य के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही चेहरे नज़र आने लगते हैं. असहिष्णुता इतना अधिक है कि किसी के पास सामंजस्य और समझौते का विचार तक नहीं है. जिंदगी की तलाश में लोग भटकते जा रहे हैं. कभी-कभी कुछ लोग सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर जलालत की जिंदगी जरूर झेल लेते हैं लेकिन वे भी मौके की ही ताक में रहते हैं. जिसका जीता जागता सबूत है “डायरी आकाश और चिडियां”, “उजड़े दयार में”, “आवाजों के पीछे-पीछे”, और “बदन देवी की मेंहदी का मनडोला” जैसी कहानियां, जहाँ चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष है.
 “रिटर्न गिफ्ट” बिखड़ी जिंदगी का निराश अंत है तो “भूत खेली” और “माई री मैं टोना करिहों” वैज्ञानिक युग में भी अन्धविश्वास के नाम पर होने वाले आर्थिक, मानसिक और शारीरिक शोषण का विभत्स रूप.
“कहाँ तक भागोगी” समाज से धर्म–परिवर्तन पर एक सवाल है कि  पितृसत्तात्मक समाज में किस धर्म में स्त्रियां सुरक्षित हैं? कहाँ स्त्रियों को दोयम दर्जे की जिंदगी नहीं गुजारनी पड़ती है? “लकीरें” स्पष्ट करती हैं कि भावनात्मक रूप से पीड़ित सारी महिलाओं की कहानी कमोबेश एक ही है, तो “सुरताली के सपने” बालश्रम की वजह से भावनात्मक एवं मानसिक रूप से बर्बाद होते बचपन की ओर इशारा है. मेकिंग आफ बबीता सोलंकी” में परिवार और इज्जत की कीमत पर आगे बढ़ने की ललक और बदनामी के अन्तर्द्वन्द्व के बीच उभरते दर्द की ओर ध्यानाकर्षित किया गया है जबकि “ड्रिम्स अनलिमिटेड” में प्रतिभा और प्रेम के नाम पर भावनात्मक शोषण की ओर.

संग्रह की सभी बारह कहानियां स्त्री-केंद्रित हैं लेकिन इन्हें स्त्री-विमर्श मात्र के दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता. इन कहानियों में न उपदेश है न आदर्श, बल्कि परिस्थितियों और समस्याओं को ज्यों का त्यों रखा गया है जिससे सीख लेते हुए स्वयं में सुधार करने की जरूरत है. देशी और विदेशी शब्दों में जहाँ भाषा सहज बोलचाल की है वहीं शिल्प बांधे रखने में और कथ्य चौंकानें में सफल है.

पुस्तक – स्वप्न, साजिश और स्त्री
लेखक – गीताश्री
मूल्य – ३०० रुपए
पृष्ठ -१४४
प्रकाशक – सामयिक बुक्स नई दिल्ली 

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है: अवधेश प्रीत

पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है: अवधेश प्रीत


अवधेश प्रीत 

अवधेश प्रीत गंभीर लेखकों में से एक हैं जो अपने समय के जरूरी सवालों में हस्तक्षेप करते हैं और सक्रिय पत्रकारिता करते हुए हस्तक्षेप, नृशंस, हमजमीन, कोहरे में कंदील, और चांद के पार एक चाभी जैसे पांच कहानी संग्रह दिए. इनकी कई कहानियों का उर्दू में अनुवाद ही नहीं हुआ बल्कि कुछ का नाट्य-मंचन भी हुआ है. इनका पहला उपन्यास “अशोक राजपथ” जल्द ही आने वाला है. प्रस्तुत है विभिन्न सम्मानों से सम्मानित कथाकार अवधेश प्रीत से उनकी रचनात्मकता पर सुशील कुमार भारद्वाज की हुई बातचीत का एक अंश:-

-अपने साहित्यिक सफर को किस रूप में देखते हैं?
साहित्य एक अनवरत यात्रा है और मेरे लिए इसे मूल्यांकित करने का अवसर नहीं आया है क्योंकि यह अभी जारी है। हां,  इतना कहूंगा कि अब तक देश दुनिया में बहुत हलचल रही,  बदलाव आये। उसके कार्य कारणों की साहित्य ने पड़ताल की। मैंने भी अपने सामर्थ्य भर इस पड़ताल की कोशिश की। अब तक जो लिखा उसकी नोटिस ली गई। सामान्य पाठक से लेकर विद्वान आलोचकों तक ने मेरी कहानियां पढ़ीं और सराहा। यह मेरे लिखे के प्रति स्वीकार है और यही मेरे श्रम की सार्थकता है। अभी बहुत कुछ लिखना है। बेहतर लिखा जाय यह प्रयास करना है। लिहाजा,  अब तक की यात्रा को मैं सिर्फ प्रस्थान बिन्दु के रूप में देखता हूं।


-आपकी कहानियों में या तो सामाजिक समस्याएं होती हैं या फिर अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत मुख्यपात्र. कोई विशेष कारण?

मेरे लिए लेखन सामाजिक सरोकारों से जुड़ना है। मेरा समाज, उसके यथार्थ , उसके संघर्ष और स्वप्न , मनुष्य की गरिमा और उसकी जटिलताएं , ये सब मेरेलिए , मेरे लेखन की प्रतिबद्धता है। जैसा नामवर सिंह कहते हैं, कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि वह युग के मुख्य सामाजिक अंतर्विरोधों के संदर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है। इस अर्थ में देखें तो मैं अपनी कथा सामग्री समाज से चुनता हूं , वह चाहे समस्या हो या मनुष्य । कह सकते हैं मेरी कहानी समाज की है , समाज के लिए है।

-आपकी कई कहानियों को पढ़ते समय मेरे जैसे पाठक अपने आंसुओं को रोक नहीं पाते हैं? अपने शिल्प–कला का कुछ रहस्य बताएं?

मेरी कहानियों में कोई कला- शिल्प नहीं है । न ही कोई रहस्य । आपका आॅब्जर्वेशन कितना गहरा है । कितना करीबी है और कहानी में जो कुछ भी है , वह कितना विश्वसनीय है , इन सबके योग से ही कहानी पठनीय और ग्राह्य बनती है । कोई कहानी जब किसी पाठक को अपनी, अपनो की लगने लगे तो जाहिर है , वह संवेदना को छूती है । मेरी कहानियां भावुक नहीं हैं। लेकिन उनमें जो भावनात्मक लगाव है , वह मेरी संवेदना का हिस्सा है , उससे अगर आप जैसा पाठक तादात्म्य महसूस करता है , तो मैं समझता हूं , यह मेरे लिखे की सार्थकता है । अगर एडुआर्डो गालियानो के शब्दों में कहूं तो जब कोई व्यक्ति लिखता है तो उस चीज की भर्त्सना करने के लिए लिखता है, जो कष्ट देती है और उसे साझा करने के लिए जिससे खुशी मिलती है । तो कह सकते हैं , यह रोना और हंसना लेखक और पाठक की साझीदारी है ।

-किस साहित्यकार ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया और लेखन के लिए प्रेरित किया?

यकीनन प्रेमचंद ने ही सबसे ज्यादा प्रभावित किया और कई कारणों ने लिखने के लिए प्रेरित, जैसे विद्रूप, विडंबनाओं के विरुद्ध लड़ने के लिए , प्रतिरोध के लिए मेरे पास लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । मैंने इसी लिए पेशा भी चुना तो पत्रकारिता को चुना । हां , लिखना और अपने लेखन के लिए , प्रेरणा के तत्व भी प्रेमचंद से ही मिले ।

-पत्रकारिता करते हुए लेखन कितना प्रभावित हुआ? कुछ लोगों का मत है कि आपने कम लिखा है?

पत्रकारिता के बारे में एक कहावत का उल्लेख करूं तो जर्नलिज्म इज अ हिस्ट्री इन हरी कहा गया है । इस तरह कह सकते हैं कि पत्रकारिता इतिहास की हलचलों के बीच रहते हुए अपने समय के स्याह- सफेद को करीब से जानने का माध्यम है । व्यवस्था और नागरिक के संबंधों की पड़ताल का अवसर है । इस लिहाज से पत्रकारिता मेरे लेखन में अपने समय की सच्चाइयों को जानने में सहायक रही है । मेरे लेखन को पत्रकारिता ने इस अर्थ में प्रभावित किया है कि मैं ज्यादा आॅब्जेक्टिव तरीके से चीजों को देख पाया । रही बात कम मात्रा में लिखने की तो मेरी कहानियों के पांच संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और मैं नही समझता कि यह कुछ कम है । मात्रा महत्वपूर्ण नहीं है । क्या लिखा, कितना सार्थक लिखा और किस तरह अपने समय के जरूरी सवालों में हस्तक्षेप किया , यह महत्वपूर्ण है । मैंने ये तमाम कहानियां अपनी सक्रिय पत्रकारिता के दौरान ही लिखी हैं और समझता हूं , यह कुछ कम नहीं है ।

-बिहार में “हिंदुस्तान” जैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के लिए लगभग 30 वर्षों तक कार्य करते हुए आपने काफी कुछ उतार–चढाव देखे होंगें. एक साहित्यकार होते हुए कैसा अनुभव रहा?

पत्रकारिता में , उसके स्वरूप में, कार्य प्रणाली में इस दौरान काफी मूलभूत बदलाव आये हैं । पत्रकारिता तकनीक की वजह से ज्यादा तेज और त्वरित हुई है । आज रीयल टाइम रिपोर्टिंग का जमाना है । अभी की खबर अभी । पाठकों के प्रति नजरिया बदला है । मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग जो उपभोक्ता है, वही आज पत्रकारिता की चिंता के केंद्र में है । हाशिये के लोग, किसान, मजदूर ये कहीं पीछे छूट गये हैं । मैंने महसूस किया है कि आज पत्रकारिता का मतलब मूल्य नहीं मुनाफा है । पत्रकारिता प्रोडक्ट हो गई है और प्रोडक्ट को बाजार की जरूरत होती है । बाजार में तो बिकाऊ चीजें ही चलती हैं । एक साहित्यकार के रूप में यही कह सकता हूं कि कि इस सबके बावजूद पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है । इस उम्मीद के हवाले से मेरा अनुभव आश्वस्तकारी रहा है ।

-बदलते दौर में हिंदी साहित्य और बाजारवाद को किस रूप में देखते हैं?

हिन्दी साहित्य का मूल स्वर प्रतिरोध का स्वर है । इसके मद्देनजर कहूं तो बाजारवाद की जो बुराइयां हैं , हिन्दी में उसके खिलाफ काफी लिखा जा रहा है । बाजारवाद से आशय अगर हिन्दी लेखन में बाजार की मांग के मुताबिक लिखे जाने की उभरती प्रवृत्ति से है ,तो मैं कहूंगा कि यह बहुत शुभ नहीं है । इसके तात्कालिक लाभ हो सकते हैं । दूरगामी नहीं । हिन्दी का मिजाज बाजारू नहीं है । हिन्दी का पाठक बाजारोन्मुख लेखन को स्वीकार ही नहीं सकता
-आपकी कहानी पाकिस्तान में भी प्रकाशित हुई है?

हां, एक कहानी ' अली मंजिल' पाकिस्तान में छपी है ।

- “चांद के पार एक चाभी” इन दिनों काफी चर्चा में है? आप अपने शब्दों में इस संग्रह के बारे में क्या कहेंगें?

' चांद के पार एक चाभी ' संग्रह को पाठकों द्वारा पसंद किया जा रहा है, यह मेरे लिए संतोष की बात है । इस संग्रह की तमाम कहानियां हमारे समय के जरूरी लेकिन अनदेखी की गई सच्चाइयों को उठाती हैं । कहन के तरीके और पाठकीय अपेक्षाओं के अनुकूल होने की वजह से यह संग्रह लोकप्रिय हो रहा हो , हो सकता है । वैसे अपने संग्रह के बारे में मैं खुद कुछ कहूं , यह नैतिक नहीं है । पाठक ही इसके निर्णायक हैं ।

-आपका पहला उपन्यास “अशोक राजपथ” बाजार में आने से पहले ही लोगों की जुबां पर चढ़ने लगा है. इसके बारे में कुछ बताएं?

हां, मेरा उपन्यास ' अशोक राजपथ ' आनेवाला है । उसके कुछ अंश विभिन्न पत्रिकाओं में छपे हैं । यह उपन्यास पटना की एक मुख्य और प्राचीन सड़क अशोक राजपथ पर केंद्रित है । यह सड़क पुराने पटना और नये पटना को तो जोड़ती ही है, इसी सड़क पर पटना के तमाम शैक्षणिक संस्थान स्थित हैं । इन्हीं संस्थानों से लोग निकलकर सत्ता प्रतिष्ठानो तक पहुंचते हैं । कह सकते हैं , यह उपन्यास शिक्षा और सत्ता की लड़ाई पर केंद्रित है ।


-आने वाली युवा पीढ़ी के साहित्यकारों के बारे में आपकी क्या राय है?

आनेवाली पीढ़ी के बारे में मैं क्या कह सकता हूं । हां मौजूदा पीढ़ी बेहतर लिख रही है । यह पीढी ज्यादा पढी़ - लिखी और दुनियादार है । ज्यादा सजग और समझदार है । बस, जल्दबाजी में कुछ ज्यादा दिखती है । सबकुछ तुरत फुरत पा लेने को आतुर । लेकिन दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि नई पीढ़ी का लेखन बहु आयामी और बहुलतावादी है । मैं तो नई पीढ़ी के लेखन से सीखता हूं और लगता है कि अगर आपको अपडेट रहना है तो इन्हें पढ़ना और इनसे सीखना होगा । नई पीढ़ी का लेखन मुझे उत्साह से भरता है । नई रचनाशीलता संभावनाओं से भरी होती है । और संभावनाएं किसे प्रिय नहीं होंगी ?
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