- सुशील कुमार
भारद्वाज
जहां एक तरफ बिहार
विधान सभा चुनाव के बाद से राज्य की छवि अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक-हत्या,
अपहरण, रंगदारी और बलात्कार के कारण धूमिल हों रही है वहीं दूसरी ओर राज्य के सबसे
युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उन फिल्मकारों पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे जिन्होंने
बिहार के नकारात्मक छवि को अपने फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत किया. इतना ही
नहीं, नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर राजधानी (पटना) में प्रेममयी वसंत
ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से दूर कला,
संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार आयोजित सात दिवसीय ‘पटना फिल्म
फेस्टिवल’ में उन्होंने आश्वासन भी दिया कि बिहार की धरती पर बिहारी कलाकारों के
साथ बिहार केंद्रित विषय पर फिल्म बनाने वालों को वे हर संभव सहायता भी उपलब्ध
कराएंगें. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह
के साक्षी रहे फिल्म फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़ ,अभिनेत्री दिव्या दत्ता, और शेखर
सुमन.
पटना की धरती पर
फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 में काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुआ था जिसमें
बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा
काफी दिनों तक चली थी. 11-
18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म
महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक
निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और
इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई और यह प्रचार-
प्रसार किया गया था कि इस बार दर्शक फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, प्रियंका चोपड़ा,
विद्या बालन आदि जैसी महान हस्तियों से मिल सकेंगें. लेकिन समारोह के अंत अंत तक दर्शकों
को नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता और इम्तियाज अली जैसे नामचीन निर्देशक से ही
संतोष करना पड़ा.
लेकिन लंबे अरसे बाद
शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं
की स्तरीय एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न
ही किसी पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी
मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19 फरवरी से
25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से
चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी,
पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं
कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई
तो बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ समापन. दिखाई गई अन्य फिल्मों में ‘द कौफिन
मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह
तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान,
प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ ही नहीं जुटी बल्कि बजरंगी भाईजान के लिए हंगामा भी हुआ और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ताबडतोड लाठी चार्ज भी हुआ. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके महिला – पुरुष भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल
की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना
साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय
नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 19 फरवरी को फिल्म
अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980 के बीच
की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों
के पोस्टरों को शामिल किया गया. दरअसल संवाद
कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी अभिनेता,
निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण
से जुड़ी जानकारी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. इस
कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन न सिर्फ हॉल खाली
ही रहे बल्कि भीड़ बनकर जुटे कुछ लोगों को छोड़ किसी के पास कोई सार्थक प्रश्न नहीं
थे. हां, सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे
रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे.
इस फिल्म समारोह के
बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग से अवगत कराया
बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां
फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया
वहीं विभाग की ओर से बताया गया कि फिल्मसिटी के निर्माण के लिए राजगीर में 20 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर लिया गया है. फिल्म नीति
तैयार कर ली गई है जो कि एक दो महीने में सार्वजनिक हों जाएगी वहीं बहुत जल्द
फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में खुलने की भी खुशखबरी दी गई.
सिनेमा हॉल में भीड़
तो खूब जुटी लेकिन इसके सफल आयोजन पर अंगुली भी कम नहीं उठे. जहां आयोजकों में
सामंजस्य की कमी की वजह से मीडिया वालों के समक्ष खेद व्यक्त करने के सिवा कुछ
नहीं सूझ रहा रहा वहीं कुछ लोग कह रहे थे कि सत्ताधारी दल के आपसी उठापटक की वजह
से सरकार की ओर से जिस उदासीनता को बरक़रार रखा गया उसी उदासीनता का परिचय देते हुए
बॉलीवुड के श्रेष्ठ कलाकारों ने अपनी अपनी अनुपस्थिति में ही अपनी भलाई समझी. समझदार
लोग कहते नज़र आए अनियंत्रित भीड़ तो एक मदारी भी जुटा लेता है लेकिन सरकारी खर्चे
का सार्थक सदुपयोग होना भी लाजिमी होता है.







