पत्रकारिता
ही आज भी
आम आदमी की अंतिम उम्मीद है: अवधेश प्रीत
अवधेश प्रीत गंभीर लेखकों में से एक हैं जो अपने समय के जरूरी सवालों में
हस्तक्षेप करते हैं और सक्रिय पत्रकारिता करते हुए हस्तक्षेप, नृशंस, हमजमीन, कोहरे
में कंदील, और चांद के पार एक चाभी जैसे पांच
कहानी संग्रह दिए. इनकी कई कहानियों का उर्दू में अनुवाद ही नहीं हुआ बल्कि कुछ का
नाट्य-मंचन भी हुआ है. इनका पहला उपन्यास “अशोक राजपथ” जल्द ही आने वाला है.
प्रस्तुत है विभिन्न सम्मानों से सम्मानित कथाकार अवधेश प्रीत से उनकी
रचनात्मकता पर सुशील कुमार भारद्वाज की हुई बातचीत का एक अंश:-
-अपने साहित्यिक
सफर को किस रूप में देखते हैं?
साहित्य एक अनवरत यात्रा है और मेरे लिए
इसे मूल्यांकित करने का अवसर नहीं आया है क्योंकि यह अभी जारी
है। हां, इतना कहूंगा कि अब तक देश दुनिया में बहुत हलचल रही, बदलाव आये। उसके कार्य
कारणों की साहित्य ने पड़ताल की। मैंने
भी अपने सामर्थ्य भर इस पड़ताल की
कोशिश की। अब तक जो लिखा उसकी नोटिस ली
गई। सामान्य पाठक से लेकर विद्वान
आलोचकों तक ने मेरी कहानियां पढ़ीं और
सराहा। यह मेरे लिखे के प्रति
स्वीकार है और यही मेरे श्रम की
सार्थकता है। अभी बहुत कुछ लिखना है।
बेहतर लिखा जाय यह प्रयास करना है।
लिहाजा, अब
तक की यात्रा को मैं सिर्फ
प्रस्थान बिन्दु के रूप में देखता हूं।
-आपकी कहानियों
में या तो सामाजिक समस्याएं होती हैं या फिर अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत
मुख्यपात्र. कोई विशेष कारण?
मेरे
लिए लेखन सामाजिक सरोकारों से जुड़ना है। मेरा समाज, उसके
यथार्थ , उसके संघर्ष और स्वप्न , मनुष्य
की गरिमा और उसकी जटिलताएं , ये सब मेरेलिए , मेरे लेखन की प्रतिबद्धता है। जैसा
नामवर सिंह कहते हैं, कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि
वह युग के मुख्य सामाजिक अंतर्विरोधों
के संदर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है। इस अर्थ में देखें तो मैं अपनी कथा सामग्री
समाज से चुनता हूं , वह चाहे समस्या हो या मनुष्य । कह सकते हैं मेरी कहानी
समाज की है , समाज के लिए है।
-आपकी कई
कहानियों को पढ़ते समय मेरे जैसे पाठक अपने आंसुओं को रोक नहीं पाते हैं? अपने
शिल्प–कला का कुछ रहस्य बताएं?
मेरी
कहानियों में कोई कला- शिल्प नहीं है । न ही कोई रहस्य । आपका आॅब्जर्वेशन कितना गहरा है । कितना
करीबी है और कहानी में जो कुछ भी है , वह
कितना विश्वसनीय है , इन सबके योग से ही कहानी पठनीय और
ग्राह्य बनती है । कोई कहानी जब किसी पाठक को अपनी, अपनो की लगने लगे तो जाहिर है , वह संवेदना को छूती है । मेरी कहानियां
भावुक नहीं हैं। लेकिन उनमें जो भावनात्मक
लगाव है , वह मेरी संवेदना का हिस्सा है , उससे अगर आप जैसा पाठक तादात्म्य महसूस करता है , तो मैं समझता हूं , यह मेरे लिखे की सार्थकता है । अगर एडुआर्डो गालियानो
के शब्दों में कहूं तो जब कोई व्यक्ति लिखता
है तो उस चीज की भर्त्सना करने के लिए लिखता है, जो कष्ट देती है और उसे
साझा करने के लिए जिससे खुशी मिलती है । तो कह सकते हैं , यह रोना और हंसना लेखक और पाठक की साझीदारी है ।
-किस साहित्यकार
ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया और लेखन के लिए प्रेरित किया?
यकीनन
प्रेमचंद ने ही सबसे ज्यादा प्रभावित किया और कई कारणों ने लिखने के लिए प्रेरित, जैसे विद्रूप, विडंबनाओं के विरुद्ध लड़ने के लिए , प्रतिरोध के लिए मेरे पास लिखने के
अलावा कोई विकल्प नहीं था । मैंने इसी लिए
पेशा भी चुना तो पत्रकारिता को चुना । हां , लिखना
और अपने लेखन के लिए , प्रेरणा के तत्व भी प्रेमचंद से ही
मिले ।
-पत्रकारिता करते
हुए लेखन कितना प्रभावित हुआ? कुछ लोगों का मत है कि आपने कम लिखा है?
पत्रकारिता
के बारे में एक कहावत का उल्लेख करूं तो जर्नलिज्म इज अ हिस्ट्री इन हरी कहा गया है । इस तरह
कह सकते हैं कि पत्रकारिता इतिहास की हलचलों
के बीच रहते हुए अपने समय के स्याह- सफेद को करीब से जानने का माध्यम है । व्यवस्था और नागरिक के संबंधों की
पड़ताल का अवसर है । इस लिहाज से पत्रकारिता
मेरे लेखन में अपने समय की सच्चाइयों को जानने में सहायक रही है । मेरे लेखन को पत्रकारिता ने इस
अर्थ में प्रभावित किया है कि मैं ज्यादा
आॅब्जेक्टिव तरीके से चीजों को देख पाया । रही बात कम मात्रा में लिखने की तो मेरी कहानियों के पांच
संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और मैं नही
समझता कि यह कुछ कम है । मात्रा महत्वपूर्ण नहीं है । क्या लिखा, कितना सार्थक लिखा और किस तरह अपने समय
के जरूरी सवालों में हस्तक्षेप किया , यह
महत्वपूर्ण है । मैंने ये तमाम कहानियां अपनी सक्रिय पत्रकारिता के दौरान ही लिखी हैं और समझता हूं , यह कुछ कम नहीं है ।
-बिहार में
“हिंदुस्तान” जैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के लिए लगभग 30 वर्षों तक कार्य करते हुए आपने काफी कुछ उतार–चढाव
देखे होंगें. एक साहित्यकार होते हुए कैसा अनुभव रहा?
पत्रकारिता
में , उसके स्वरूप में, कार्य प्रणाली में इस दौरान काफी मूलभूत बदलाव आये हैं । पत्रकारिता
तकनीक की वजह से ज्यादा तेज और त्वरित हुई
है । आज रीयल टाइम रिपोर्टिंग का जमाना है । अभी की खबर अभी । पाठकों के प्रति नजरिया बदला है । मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग जो उपभोक्ता है, वही आज पत्रकारिता की चिंता के केंद्र में
है । हाशिये के लोग, किसान, मजदूर ये कहीं
पीछे छूट गये हैं । मैंने महसूस किया है कि आज पत्रकारिता का मतलब मूल्य नहीं मुनाफा है । पत्रकारिता
प्रोडक्ट हो गई है और प्रोडक्ट को बाजार की जरूरत होती है । बाजार में तो बिकाऊ चीजें ही चलती हैं । एक
साहित्यकार के रूप में यही कह सकता हूं कि कि इस सबके बावजूद पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है । इस
उम्मीद के हवाले से मेरा अनुभव आश्वस्तकारी
रहा है ।
-बदलते दौर में
हिंदी साहित्य और बाजारवाद को किस रूप में देखते हैं?
हिन्दी
साहित्य का मूल स्वर प्रतिरोध का स्वर है । इसके मद्देनजर कहूं तो बाजारवाद की जो बुराइयां हैं , हिन्दी में उसके खिलाफ काफी लिखा जा रहा है । बाजारवाद से आशय अगर हिन्दी
लेखन में बाजार की मांग के मुताबिक लिखे
जाने की उभरती प्रवृत्ति से है ,तो मैं कहूंगा कि यह बहुत शुभ नहीं है । इसके तात्कालिक लाभ हो सकते हैं ।
दूरगामी नहीं । हिन्दी का मिजाज बाजारू
नहीं है । हिन्दी का पाठक बाजारोन्मुख लेखन को स्वीकार ही नहीं सकता ।
-आपकी
कहानी पाकिस्तान में भी प्रकाशित हुई है?
हां,
एक कहानी ' अली मंजिल' पाकिस्तान में छपी है ।
- “चांद के पार
एक चाभी” इन दिनों काफी चर्चा में है? आप अपने शब्दों में इस संग्रह के बारे में
क्या कहेंगें?
' चांद के पार एक चाभी ' संग्रह को पाठकों द्वारा पसंद किया जा
रहा है, यह
मेरे लिए संतोष की बात है । इस संग्रह की तमाम कहानियां हमारे समय के जरूरी लेकिन अनदेखी की गई सच्चाइयों
को उठाती हैं । कहन के तरीके और पाठकीय
अपेक्षाओं के अनुकूल होने की वजह से यह संग्रह लोकप्रिय हो रहा हो , हो सकता है । वैसे अपने संग्रह के बारे
में मैं खुद कुछ कहूं , यह नैतिक नहीं है । पाठक ही इसके निर्णायक हैं ।
-आपका पहला
उपन्यास “अशोक राजपथ” बाजार में आने से पहले ही लोगों की जुबां पर चढ़ने लगा है.
इसके बारे में कुछ बताएं?
हां,
मेरा उपन्यास ' अशोक राजपथ ' आनेवाला है । उसके कुछ अंश विभिन्न पत्रिकाओं में छपे हैं । यह उपन्यास पटना
की एक मुख्य और प्राचीन सड़क अशोक राजपथ पर केंद्रित है । यह सड़क
पुराने पटना और नये पटना को तो जोड़ती ही है,
इसी सड़क पर पटना के तमाम शैक्षणिक
संस्थान स्थित हैं । इन्हीं संस्थानों से लोग निकलकर सत्ता प्रतिष्ठानो
तक पहुंचते हैं । कह सकते हैं ,
यह उपन्यास शिक्षा और सत्ता की
लड़ाई पर केंद्रित है ।
-आने वाली युवा
पीढ़ी के साहित्यकारों के बारे में आपकी क्या राय है?
आनेवाली पीढ़ी के बारे में मैं क्या कह
सकता हूं । हां मौजूदा पीढ़ी बेहतर लिख रही है । यह पीढी ज्यादा
पढी़ - लिखी और दुनियादार है । ज्यादा सजग और समझदार है । बस, जल्दबाजी में कुछ
ज्यादा दिखती है । सबकुछ तुरत फुरत पा लेने को आतुर । लेकिन दूसरा और
महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि नई पीढ़ी का लेखन बहु आयामी और बहुलतावादी है ।
मैं तो नई पीढ़ी के लेखन से सीखता हूं और लगता है कि अगर आपको अपडेट रहना
है तो इन्हें पढ़ना और इनसे सीखना होगा । नई पीढ़ी का लेखन मुझे
उत्साह से भरता है । नई रचनाशीलता संभावनाओं से भरी होती है । और संभावनाएं किसे
प्रिय नहीं होंगी ?
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