बदलते लोग
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| सुशील कुमार भारद्वाज |
- सुशील कुमार भारद्वाज
बदलते ही रहना
प्रकृति की नियति है. यदि यह परिवर्तन न हो तो व्यवस्था चरमरा जाएगी. अव्यवस्था की
स्थिति में चीजें सड़-गल कर बर्बाद हो जाएंगी. बात चाहे आप पृथ्वी की गति की करें
या फिर दिन-रात और मौसम के बदलने की या सुख–दुःख के चक्र की. कहीं स्थिरता नहीं
है. सृष्टि में ही जब स्थिरता नहीं है तो मानव जीवन में इसकी तलाश के क्या मायने
हैं? लोग बच्चे से जवान और जवान से बूढ़े हो जाते हैं. इन बदलावों के भी अपने मायने
हैं लेकिन जब कभी हम बदलते लोग की बात करते हैं तो हमारी सोच संकुचित हो जाती है.
हम नकारात्मक बातों में उलझ कर कहीं दूर निराशा के भंवर में डूबते, फंसते नज़र आते
हैं. हमें याद आते हैं भोगे हुए कष्ट, खाये हुए धोखे और निर्लज्ज इंसानों के करतूत
और उनकी गोलगोल बातें. शायद इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि हम जी ही रहे हैं ऐसे
संक्रमित एवं भयाक्रांत तकनीकी विकासशील माहौल में, जहाँ चारो ओर आर्थिक ही नहीं
मानसिक भ्रष्टाचार का बिगुल बज रहा है. अपने-पराये का फर्क करना मुश्किल हो रहा
है. विश्वास शब्द अपना अर्थ और अहमियत खोता जा रहा है. यदि कुछ बचा है तो भविष्य
की चिंताएं. स्वयं की ही नहीं बहन–बेटियों और कुटुम्बियों के सुरक्षित घर वापसी तक
किसी अप्रिय घटना के प्रति सशंकित रहना. इतने पर भी कहाँ छूटता है भय? यदि जो कहीं
हो गई किसी घटना में मौत तो, लोगों की नज़रें करती हैं एक्सरे उन लाशों की बजाय देने
की सहायता. होते हैं सवाल उनकी नज़रों में- क्यों और कैसे मर गया? कोई अपराधी या
आतंकवादी तो नहीं था? गर जो मिल गयी लाश किसी कमसिन लड़की की, तो फिर मत पूछो क्या-
क्या होंगें सवाल? सहानुभूति के बजाय होगी पड़ताल उसके चरित्र की- कब, कहाँ और
क्यों जाती थी? किस-किस से वह खुल कर बात करती थी? प्रेमी से घर वाले तक के
व्यवहार की ही बातें नहीं होगीं बल्कि जाति-धर्म की भी चर्चाएं होंगीं. साथ ही
होती है लोगों को हडबडाहट बच बचा कर किसी तरह निकल भागने की- अपनी जिम्मेवारियों
से भी और अप्रत्याशित भयारोप से भी. ऐसी ही परिस्थितियों में याद आती है मुझे अरुण
देव की ये पंक्तियां जो रेखांकित करती हैं मानवीय बदलाव को:-
“भीड़ में गुम गया है आदम
खोई हुई हव्वा को खोजते हुए
हर स्त्री में वह स्मृति की तरह रह गई हव्वा के पास जाता है
और उसकी संभावना में एक आदम की तरह खटखटाता है सांकल
बजाता है घंटी
पुकारता है वही राग
जिसे पहली बार गुनगुनाया था उसने हव्वा को रिझाने के लिए
अपने वंश वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह
शायद उस सेब को होगा पता
जिसकी मिठास पुरा कथाओं से बह कर आती है अभी भी
ईश्वर के साम्राज्य से बहिष्कृत
अपनी नश्वरता के उद्यान में उसने खिलाएं प्रणय के फूल
गाये अपनी अमरता के गीत
अब भी
जब कभी उमगते बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट
उसके रक्त में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है
इधर हव्वा और आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता है नज़र
हव्वा को खोजते खोजते उसने देखे
अपनी बेटिओं के लटके हुए शव, झुलसे हुए चेहरे
प्रेम विहीन दाम्पत्य में उन्हें घुटते हुए
न जाने आदम ने कैसा बनाया है अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत होने के रास्ते भी बंद हैं.”
खोई हुई हव्वा को खोजते हुए
हर स्त्री में वह स्मृति की तरह रह गई हव्वा के पास जाता है
और उसकी संभावना में एक आदम की तरह खटखटाता है सांकल
बजाता है घंटी
पुकारता है वही राग
जिसे पहली बार गुनगुनाया था उसने हव्वा को रिझाने के लिए
अपने वंश वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह
शायद उस सेब को होगा पता
जिसकी मिठास पुरा कथाओं से बह कर आती है अभी भी
ईश्वर के साम्राज्य से बहिष्कृत
अपनी नश्वरता के उद्यान में उसने खिलाएं प्रणय के फूल
गाये अपनी अमरता के गीत
अब भी
जब कभी उमगते बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट
उसके रक्त में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है
इधर हव्वा और आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता है नज़र
हव्वा को खोजते खोजते उसने देखे
अपनी बेटिओं के लटके हुए शव, झुलसे हुए चेहरे
प्रेम विहीन दाम्पत्य में उन्हें घुटते हुए
न जाने आदम ने कैसा बनाया है अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत होने के रास्ते भी बंद हैं.”
लेकिन बदलाव के
सकारात्मक पहलू भी होते हैं. थोड़ी देर के लिए आप पीछे मुड कर देखें और सोचें कि जब
आपका जन्म हुआ था तो परिस्थितियां और सुविधाएं क्या थीं? परम्पराएं क्या थीं?
लोगों की सोच और सामाजिकता के क्या मायने
थे? और आज आप खुद को कहाँ और किन परिस्थितियों में पाते हैं? संभव है कि तत्कालीन
समाज की सोच, परम्पराएं, और सभ्यता-संस्कृति आपको अपनी ओर आकर्षित करती हों. आपको
नॉस्टैल्जिक बनाती हों. लेकिन क्या बगैर बदलाव के आप जिन सुविधाओं को जी रहें हैं
वह भी संभव था? शायद नहीं.
सबसे बड़ी बात है कि आवश्यकता
ही अविष्कार की जननी है. और जरुरत के अनुसार धीरे –धीरे बदलते –बदलते हमलोग यहाँ
तक आ पहुंचें हैं. हमारी सोच व्यक्ति एवं विकास केंद्रित होती चली गई, जीने के
मायने बदलते चले गए. उदारता और स्वतंत्रता से हमलोग स्वछंदता की ओर बढ़ते चले गए.
समाज अब भी है लेकिन बदले अर्थों में. सच है कि इन बदलावों से पुरानी व्यवस्था
चरमराने लगी है, बुजुर्ग लोग नए लोगों को कोसने लगे हैं, पसंद –नापसंद और विश्वास
के साथ-साथ हित टकराव बढ़ते जा रहें हैं. लेकिन इसे सिर्फ अभी की बात नहीं मानी जा
सकती है. यह हर दस –बीस वर्ष के अंतराल पर महसूस किया जा सकता है क्योंकि परिवर्तन
ही संसार का नियम है.
साहित्य के विभिन्न
विधाओं में भी यह परिवर्तन ससमय प्रतिरोध के रूप में उभरते रहते हैं. चाहे आप किसी
कथाकार की समकालीन कहानी को देखें या फिर कविता या फिर नाटक को. कहीं आदम और हव्वा
की अनुगूँज सुनाई पड़ेगी तो कहीं प्रेम में कालिदास के मेघदूतम को छोड़ उन्मुक्तता
के छंद. और कहीं नाटकों में सिद्धांतों और नियमों को अपने सुविधानुसार परिभाषित
करने का जुनून. बदलाव का मंजर हर जगह नज़र आता है. यदि एक तरफ जातीय बंधन के कमजोर
होने की बात की जाती है तो दूसरे तरफ धर्म की कट्टरता चरम पर नज़र आती है. साथ ही
साथ तेज हो रहीं हैं सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहसें.
लेकिन जब चीजों को
गौर से पढ़ने की कोशिश करते हैं तो अहसास होता है कि कुछ भी नहीं बदला है. सिर्फ
चेहरे बदल गए हैं, रंगरूप बदल गए हैं, कार्यशैली बदल गई है लेकिन आत्मा वही है,
जन्मजात प्रभाव वही है, मानवीयता और अमानवीयता की परिभाषाएं वही हैं सिर्फ सीमाक्षेत्र
का थोडा अतिक्रमण हो गया है. और यही सच है कि मौलिक गुण में कोई परिवर्तन नहीं
होता है.
विचारणीय बात है कि
इन बदलाबों को दिशा देना भी हमारे ही हाथों में है तो फिर क्यों नहीं हम सकारात्मक
सोच के साथ एक नई
शुरुआत कवि अरुण देव के ही इन शब्दों में करें-
“अब की अच्छी शुरुआत की जाए घमंड से ऐंठन की जगह
नम्रता से सीधा रहा जाए पडोसियों पर हंसने से पहले उनके दुःख में रो लिया जाए
एक दिन घर से निकलना हो और बिना दाग के वापस लौटा जाए आत्मा में चढ़ने से पहले मैल हंसी की तेज धार से उसे खुरच दिया जाए
एक दिन गली बुहारी जाए
नाली साफ किया जाए
पर उससे पहले मन के कपट आंसुओं से धुल लिए जाएं”

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