मंगलवार, 5 मार्च 2019

कवि अरूण कमल की योगफल की समीक्षा शहंशाह आलम की कलम से।




सुसुम धूप में फिर से ढूँढ़ो
वही शब्द लुप्त
संदर्भ : अरुण कमल की कविताओं का संग्रह योगफल
• शहंशाह आलम

          अभी ठीक से खेत कोड़ा भी नहीं
          अभी ठीक से मिट्टी बराबर भी नहीं की
          अभी ठीक से रोपनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से पटाया भी नहीं
          अभी ठीक से पौधा उठा भी नहीं
          अभी ठीक से बालियाँ भी नहीं फूटीं
          अभी ठीक से दाने पके भी नहीं
          अभी ठीक से कटनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से दौनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से ओसाई भी नहीं हुई
          अभी ठीक से दाने चाले भी नहीं गए
          अभी तो दाने बटोरे भी नहीं गए कि
          द्वार पर आकर खड़े हैं
          वसूली वाले

          नहीं महाराज, नहीं, अभी तैयार नहीं।

अपनी पसंद के कवियों को पढ़ते हुए अकसर सोचा करता हूँ कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है। हो सकता है, ऐसा सोचना, मेरे अंदर रह रहे कविआदमी के लिए कोई अच्छा लक्षण ना हो। स्वीकार्य है, यह वाला लक्षण मेरे जैसों के अंदर होना भी नहीं चाहिए। ख़ास कर, कविता के महान कवियों को पढ़ते हुए। यह है भी, तो एक कविधर्मी होने के कारण है। यही कारण है, अरुण कमल को पढ़ा-पढ़ी के समय भी यह ख़्याल आता रहा है कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है? सोचने का यह भाव, एक सनातन भाव है, सो ऐसा सोचते रहने को कोई ख़राब गुण मैं नहीं मानता। बहुत सारे मूर्धन्य आलोचक इस गुण को अच्छा नहीं मानते। उनका मानना है, इस गुण से उनके बहुत सारे प्रिय कवि कविता की आलोचना में आने से रह जाएँगे। आलोचना का यह जड़वाद है, जिसकी वजह से आज भी बहुत सारे जेनुइन कवि उनकी आलोचना का हिस्सा बनने से रह गए हैं। समकालीन हिंदी आलोचना की यह बड़ी कमज़ोरी रही है। पहले भी, अभी भी। यह कमज़ोरी आगे भी रहने वाली है।
     हिंदी आलोचना अरुण कमल की कविता के साथ ऐसा कोई जड़ रास्ता नहीं तलाश सकती थी। दरअसल कविताई का जो गुण अरुण कमल के पास था, बहुत कम हिंदी के कवियों के पास यह गुण होता है, जिनकी कविता सिर्फ़ हिंदी कविता को नहीं, विश्वकविता को प्रभावित करे। सीधे-सीधे कहिए, तो अरुण कमल की कविता, कविता का कोई विश्वकोश अगर है, तो उसी कोश में रखी जाने वाली कविता है। अरुण कमल की कविता हिंदी कविता की ऐसी निधि है, जो भविष्य के लिए संभाल कर रख ली जानी चाहिए। यह कविता हमारे वक़्त की ऐसी कविता है, जिसमें हमारे वक़्त का ज़ख़्म भी है और मरहम भी। वक़्त कहीं ख़ामोशी में है, तो कहीं हो-हल्ला में है। तभी हाकिमे वक़्त पूँजीपतियों से हमारा सौदा करता है और ऐसे सौदे पर बिना शर्मिन्दा हुए रक़्स करता है और रक़्स करते हुए हमको ज़ख़्म देता है और अरुण कमल की कविता मरहम देती है। उनकी कविता एक लोकप्रिय सरकार के सात दिन का आस्वाद लीजिए और समझिए कि कोई हाकिमे वक़्त रक़्स ही काहे करता है बिना शर्मिन्दा हुए : ‘पहले ही दिन सरकार ने आँगनबाड़ी सेविकाओं पर लाठियाँ भाँजीं / दूसरे दिन वृद्धावस्था पेंशन पर पानी के फ़व्वारे / तीसरे दिन छँटनीग्रस्त शिक्षामित्रों के धरने पर कुत्ते छोड़े / चौथे दिन उजड़े झोंपड़वासियों पर घोड़े दौड़ाए / पाँचवें दिन बेरोज़गारों के जुलूस को रौंदा / छटे दिन मूक-बधिर-नेत्रहीनों पर आँसू गैस के गोले ठोंके / सातवें दिन बालिकाहत्या का विरोध करतीं औरतों पर गोलियाँ दागीं / और सात को मौक़े पर ढेर किया / सबने स्वर से गाया / ऐसी लोकप्रिय न्यायप्रिय / देवानाम प्रिय प्रियदर्शी सरकार / धम्माशोक बाद कभी नहीं आई / कभी नहीं / नहीं।’ इस कविता के बाद एक और कविता माननीय के नाम सन्देश भी लीजिए और मेरे कहे का अर्थ निकालिए : ‘माननीय / आज इस ऐतिहासिक प्राचीर से / मैं, भारत का एक नागरिक / स्वाधीनता दिवस की पूर्व वेला में / आपको सम्बोधित कर रहा हूँ / और आपसे पाँच प्रश्न करता हूँ - / पहला, आपका ख़र्चा कौन चलाता है? / दूसरा, कौन-सी शक्ति है आपके पास? / तीसरा, यह शक्ति आपको कहाँ से आती है? / चौथा, आप यह शक्ति किसके हित में प्रयोग करते हैं? / और पाँचवाँ, आपकी अन्तिम इच्छा क्या है? / जय हिन्द!’

     अर्थ निकालने में कोई कठिनाई आ रही हो, तो सारे अर्थ मैं ही उद्घाटित कर देता हूँ। दोनों कविताओं का अर्थ सीधे-सीधे यही है कि अरुण कमल की कविता पढ़ते-गुनते-सुनते समय ऊपर-ऊपर शीत लगती है, तो इसके नीचे-नीचे बहती हुई धाह ऐसी है कि इससे निकलने वाली लपट किसी ज्वालामुखी के ताप से कम नहीं। यह कविता औरों की कविता से पृथक् इस मायने में है कि कवि ख़ुद अपनी कविता को ‘नीचे धाह ऊपर शीत’ कहता है और हमेशा की तरह कवि सच कहता है। बिना किसी लाग-लपेट के कहता है। तभी अरुण कमल की कविता काल-बोध की कविता है। तभी इनकी कविता कवि के जी रहे भारी दिनों का आख्यान है। आख्यान भी कैसा, जिसे कोई माननीय पढ़ ले, तो उसके होश उड़ जाएँ। सच ही तो है, कौन माननीय है, जो कविता में ख़ुद के विरुद्ध फैल रही इस लपट को, इस लौ को, इस अग्निशिखा को सह पाएगा, कोई नहीं। सहेगा वही, जो घाम वाले दिनों को सहकर जनता का सच्चा सेवक बना होगा। ख़ुद को ऊँचा उठाने की बजाय देश की जनता को ऊँचा उठाने की चाह लिए संसद या  राज्यसभा, विधानसभा या विधान परिषद् पहुँचा होगा। कवि का भी और मेरा भी अभिप्राय यही है कि जनता सबकुछ का आकलन करती है, आपके त्याग का भी, आपकी जुमलेबाज़ी का भी। असल कवि तो देश की असल जनता ही है बिरादर, हम तो माध्यम भर हैं, शब्द भर हैं, हम तो आवाज़ भर हैं।
     अरुण कमल की कविता किसी अँधेरी कोठरी की कविता नहीं है। यह कविता ऐसी है, जो हमेशा आदमी के दरमियाँ रहती आई है। वही आदमी, जिसको कोई योगफल निकालने नहीं आता। इन आदमियों का योगफल यानी आम आदमी के अच्छे-बुरे का हिसाब-किताब, जोड़-घटाव, लेखा-जोखा सब कवि ही करता रहता है। सच में, अगर जनता हिसाबी होती, तो देश का महामात्य जिस तरह से अपने हर भाषण में पूरी तरह निर्लज्ज उनकी इज़्ज़त-आबरू उछालता फिर रहा है, तार-तार करता फिर रहा है, ऐसे महामात्य को उसकी कुर्सी से खींचकर, उसे अपनी बस्ती लाकर उसकी लज्जा को बिना पछतावे के किसी बंदी गृह की तरह ढा नहीं देती। यह कितनी अच्छी बात है कि जनता को कवि पर इस बात का भी भरोसा है कि ऐसे नक़ली और फ़र्ज़ी महामात्य का पर्दाफ़ाश कोई कवि ही करेगा। तभी अरुण कमल देश की जनता का भरोसा अपनी कविता चलो पीते हैं चाय में बचाए रखते हैं : ‘चलो पीते हैं चाय, राजेश को बुलाते हैं / मंगलेश को, विष्णु नागर को, विजय को भी पुकार लो / सबको पुकारो, जो नहीं पीते उनको भी, शकील-वीरेन्द्र यादव / जगाओ नीलेश को, श्योराज भी तो यहीं होंगे / अरे यार, यही तो सही वक़्त है चाय का / रात है, चाँद है ढलता हुआ, हवा तेज़ / हत्यारे घूमते, फौज की गश्त, दरवाज़े बन्द / बत्तियाँ गुल, साँसें धौंकतीं / उठो-उठो मेरे दोस्त / वहाँ एक चूल्हा जल रहा है कोने में / गली के मुँह पर / एक बहुत बुढ़ी माँ वहाँ बैठी है देग में चाय उबालती / ये कैसी बेचैन भाप है जो बुला रही है — / चलो चाय पीते हैं आज इस रात के तीसरे पहर / अरे सब आ रहे हैं, ज्ञान जी आ रहे हैं इस ठण्ड में / कमाण्डर, देखो सब आ रहे हैं, अरे साथी ग़दर भी — / चलो चाय पीते हैं आज रात सबकी रात सबको पुकारे / केदार जी, चाय का पहला उल्लेख किस कवि में मिलता है / त्रिलोचन शास्त्री से पूछेंगे, चलो अभी चाय पीते हैं (सुबह की पहली ख़बर : सरकार ने चाय पर रोक लगाई)।’ या फिर : ‘प्रिय मित्र, आप ज़रा भी परेशान ना हों / आप में से किसी का नाम वहाँ नहीं है / ना तो संसद बुलाएगी काव्य-पाठ के लिए / ना राष्ट्र का प्रधान रात्रि भोज पर / मरने पर ग्यारह बन्दूक़ों की सलामी भी आपको नसीब नहीं / आपको भले ग़लतफ़हमी हो / किन्तु इस देश की सत्ता को कोई ग़लतफ़हमी नहीं / तुम्हारी जगह बाहर है, साथियो बाहर / तुम्हारी जगह उन लोगों के पास है साथियो / जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं।’

     इस लोकप्रिय सरकार का कैसा हँगामा है, कैसा झूठा प्रचार-प्रसार है। जबकि सभी दुखी हैं। सभी परेशान हैं। और राष्ट्र का प्रधान, जो मासूम लोगों की ज़ात तक का सौदा करता फिर रहा है। यह प्रधान तो सौदा करना जानता है या फिर शोर करना जानता है। हालात अज़ीयतनाक हैं, बदतर हैं, ख़राब हैं। अरुण कमल ऐसे हालात का फ़ैसला किसी और पर ना छोड़कर अपनी कविता पर छोड़ते हैं। यही कारण है कि अरुण कमल की कविता वंदना, स्तुति अथवा प्रार्थना की कविता नहीं है। वंदना है भी, तो उस सुग्गे के लिए, जो उड़ते-उड़ते मरा। वंदना है भी, तो उस इंसान के लिए, जो ठनका गिरने से राख बन गया। वंदना है भी, तो उस शव के लिए, जिसको पहचानने वाला कोई नहीं। वंदना है भी, तो उन जन-मजूर परिवारों के लिए, जिनको चाशनी में तले मालपुए मयस्सर नहीं। वंदना है भी, तो उनके लिए, जिनके घर ढह गए। अब कोई भी लोकप्रिय सरकार हो, संभव यही है, आपके जीवन का योगफल बस इतना भर हो उस सत्ता की दृष्टि में कि आप उनको वोट दें और कोई चाह मन में ना रखें। चाहत रखनी भी होगी आपके द्वारा पूरे मनोयोग से चुनी हुई सरकार से, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ रखेंगीं। झूठे समाचार बेचने वाले मालिकान रखेंगे। मक्कारी से चकाचौंध बाज़ार सजाने वाले रखेंगे। अरुण कमल को मालूम है, आपकी भूमिका इत्ती-सी है कि पाँच साल तक महँगाई का नौहा गाते रहें और बेबस होकर ज़िंदा रहें, फिर उसी सत्ता के झाँसे में आकर वोट दे आएँ, अगले पाँच वर्ष फिर रोने-धोने के लिए : ‘कितना वीभत्स है इन वृद्धों का यौन-नृत्य / के है अगला पी एम कौन कृत्य या भृत्य / उठो / चलो मेरे गुइयाँ उठो मेरे साथी उठो / वे जो मारे गए तुम्हें पुकार रहे हैं / वे हर दरवाज़ा पीट रहे हैं / वे खड़े हैं उस ओर / देखो वे रात में जगमग / जो जीवित हैं वे वंशज हैं मृतकों के।
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योगफल (कविता-संग्रह) / कवि : अरुण कमल / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002 / मूल्य : ₹150 / मोबाइल संपर्क : 9931443866
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शहंशाह आलम
हुसैन कॉलोनी
पेट्रोल पाइप लेन के निकट
नोहसा बग़ीचा
नोहसा रोड
फुलवारी शरीफ़
पटना – 801505, बिहार
मोबाइल : 9835417537

रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है



मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अनश्वर तोहफा : सुशील कुमार भारद्वाज (कहानी)

अनश्वर तोहफा
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चित्र साभार

गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है।
खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।
लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।
अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?
प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।
इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?
 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ।
अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!
बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।
सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"
-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "
वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा तो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी।
वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।
सुशील कुमार भारद्वाज

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

बालदिवस और घटिया राजनीति ( आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

कल कुछ लोग #बालदिवस पर बतकही टीप रहे थे। राजनीतिक रंग में रँगने की यूँ कोशिश कर रहे थे जैसे इससे पहले देश में पक्ष-विपक्ष का मामला ही ना रहा हो। भाई, ये सच है कि बाल दिवस, चाचा नेहरू यानि पं० नेहरू के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

लेकिन बच्चों के लिए बालदिवस का कुछ और ही मतलब होता है। खेल-कूद, नाटक आदि में शरीक हो मस्ती में डूबा दिन और मिठाई-टॉफी में गुलजार होता मुँह का स्वाद। इसके अलावे बच्चे नेहरूजी के जीवन में कितनी रूचि लेते हैं? उनके जीवन-दर्शन आदि के बारे में अपने बालमन में कितना और क्या सोचते हैं? - ये बातें उन बच्चों से बेहतर कोई नहीं जानता है। और विद्यालय से बाहर के बच्चों के लिए बाल दिवस कोई मायने भी रखता है।- ये भी किसी शोध से कम का विषय नहीं है।

और बदलते समय, परिवेश और तकनीक के युग में जहाँ हर होश सँभालता बच्चा सोशल मीडिया, सेल्फी, टेलीविजन चैनल या यूट्यूब या अन्य में अपने जीवन के स्वर्णिम पलों को खोता जा रहा है उस युग में बालदिवस और इतिहास के पन्नों का उनके जीवन में क्या और कितना महत्व शेष रह गया है- यह एक विचारणीय प्रश्न है।

जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मैं समझ और देख पा रहा हूँ वहाँ शिक्षक दिवस और बाल दिवस दोनों ही अपना महत्व समय के साथ खोता जा रहा है। अन्य दिवसों की तरह इसका भी निर्वाह कर दिया जा रहा है। यह पूँजीवादी व्यवस्था का परिणाम है या शिक्षक-विद्यार्थी के बीच बदलते भावनात्मक और पेशेवर रिश्ते का परिणाम? कारण जो भी हो, लेकिन मूल भावना और आस्था दोनों ही विलुप्त होते जा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में नेहरूजी या किसी भी पुराने स्वतंत्रता सेनानी को लोग कब तक और कितना याद रख पाएंगे - कह पाना मुश्किल है। उसमें भी वैसे युग में जब बच्चे परनाना-परदादा तक का भी नाम मुश्किल से याद रख पाते हैं।

और इस बुते पर राजनीति करना कितना उचित है?- ये शायद राजनीति करनेवाले ही बेहतर ढ़ंग से बता सकते हैं।

चर्चा में बने रहने के लिए और भी मुद्दे रखे हुए हैं। कुछ सार्थक बात हो तो कोई बात हों। बेबजह का क्या बाबेला मचाना?

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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

मतलब : सुशील कुमार भारद्वाज

मतलब
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"तुम चादर तान के सो क्यों नहीं जाते?" -उसने अपनी बात बेबाकी से कह दी।
तुरंत तपाक से सामने वाला बोला- "सो जाऊँ?... कैसे सो जाऊँ? किसके लिए सो जाऊँ? कब -कब सो जाऊँ? कहाँ-कहाँ सो जाऊँ?"
"तो ठीक है तुम जिंदगी भर जगे ही रहो। जब, जहाँ ,जैसे इच्छा हो जगे रहो। अपनी आँखों को नींद से दूर ही रखना। देखता हूँ तुम जग कर ही इस भ्रष्ट दुनियां में कब , क्या और कितना कुछ बचा पाते हो? .... और जो कुछ  बचाने में भी सफल हो गए तो देखूँगा कि तुम क्या-क्या अपने साथ ऊपर ले जाओगे?"
"तो तुम्हारे कहने का मतलब है कि ईमानदारी..."
"छोड़ो भी यार! मेरे कहने का कुछ भी मतलब नहीं है। जो बुझाय करो। यहाँ तो हर कोई सिर्फ अपने ही स्वार्थ में डूबा है। यहाँ तो दुनियां का हर इंसान भ्रष्ट है सिवाय खुद को छोड़ के।"
"मेरे कहने का मतलब..."
"अब बस करो। बहुत सुन लिए तुम्हारा मतलब। मतलबी दुनियां में हर किसी का मतलब भी मतलब के अनुसार बदलते और परिभाषित होते रहता है।"
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#सुकुभा

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

दुर्गापूजा और वामपंथी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

दुर्गापूजा और वामपंथी
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हर साल की तरह इस साल भी दुर्गापूजा की शुरूआत आज कलश स्थापन के साथ शुरू हो रही है। लेकिन शक्ति की प्रतीक दुर्गा अपने ही अनुयायियों के द्वारा कितनी छलनी शब्दवाणों से की जा रही हैं। ये किसी से छिपा नहीं है। और यह करदानी पिछले कुछ वर्षों में कुछ ज्यादे ही हो गया है क्योंकि वामपंथियों की आँखें इन दिनों कुछ ज्यादे ही प्रगतिशील हो गई है। मजेदार बात तो ये है कि ये वामपंथी अपने-अपने घरों में बैठकर एकांत में घंटों माला जपेंगें और बाह्याडंबर वाले कर्मकांडों को प्रोत्साहित करेंगें और बाहर निकल कर उसी आवेग और त्वरा में देवी-देवताओं और ब्राह्मणों को गरियाते नजर आएंगें। और कभी कर्मकांडी के रूप में पकड़े जाएंगे तो पत्नी, बच्चे आदि पारिवारिक लोगों के इच्छा के सम्मान की बात करने लगते हैं। सच तो कभी बोलते ही नहीं।अरे भाई! जो इंसान प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी सभ्यता-संस्कृति पर थूके। जो करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करने से गुरेज न करे वो इंसान किसी व्यक्ति विशेष के अरमानों के आगे घुटना टेक देगा? इससे बड़ा सफेद झूठ क्या हो सकता है? छी: छी: इनकी इस दोगली नीति का कोई अंत नहीं है।

कभी-कभी ये समझ में नहीं आता है कि वे ब्राह्मण रूपी रावण का बचाव करते हैं या महिषासुर आदि का या फिर असत्य और दुर्गुण के प्रतीक इन महानुभावों का? ब्राह्मण को गाली देते हो तो रावण को क्यों बचाते हो? क्या आप रावण के दुर्गुणों से अपरिचित हैं? जबकि रावण इस बात का प्रतीक है कि कोई भी इंसान किसी भी उच्च या निम्न वंश में क्यों न जन्म ले? उसकी आखिरी गति उसके कर्मों से ही निर्धारित होती है। खैर, इसमें मैं क्यों उलझूँ? क्योंकि आपकी सोच ही आपकी स्थिति को स्पष्ट कर देती है।

आज से जब पूजन विधि की शुरूआत विधिवत होगी। मंत्रों और श्लोकों की गूंज माहौल को उत्सव में ढ़ाल रही होगी तो आपके कानों में दर्द शुरू हो जाएगा। आप ध्वनि प्रदूषण और पता नहीं क्या-क्या बकैती करते नजर आएंगे। मेले-ठेले से आपको परेशानी शुरू हो जाएगी क्योंकि आपके जीवन में उत्सव जैसा कोई चीज है ही नहीं। है तो सिर्फ एकांत और कुंठाग्रस्त पक्षपाती मानसिकता। सुविधा की राजनीति। बहुत ही अजीब लगता है आपका ये व्यवहार। लेकिन आप तो स्वतंत्रता के सबसे बड़े पोषक हैं। सभ्यता-संस्कृति और विरासत को भी तिलांजलि देकर भी आपको स्वतंत्रता चाहिए। शायद आप स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और उच्छश्रृंखलता के बीच के महीन अंतर को ही भूल गए हैं। जबकि आपको याद रखना चाहिए कि अनुशासन भी कोई चीज है। जो कि जीवन के लिए सबसे उपयोगी है।

इन दिनों मैंनें एक और चीज गौर की है। संभव है कि मेरा अवलोकन गलत हो लेकिन तथ्य यही है कि आप अपराधियों के बचाव में अक्सर सामने झंडे लिए नजर आते हो मानवता के नाम पर। लेकिन भूल जाते हैं उस निर्दोष की मानवता जो शिकार बन जिंदगी भर उस नासूर को अपने अंदर सहेजे रह जाता/जाती है। कभी आपकी अंतरात्मा आपको धिक्कारती नहीं? क्यों भूल जाते हैं कि दुर्गा भी एक स्त्री ही हैं। उन्हें भी अपने मान-मर्यादा को सुरक्षित रखने का अधिकार है। और जब आप दुर्गा रूपी स्त्री, जो कि महज एक आस्था है, मिट्टी का पुतला है, को ही पल -पल अपने शब्दों से आहत करते रहते हैं तो वास्तविक जीवन में आपसे क्या अपेक्षाएं शेष रह जाती हैं? महज राजनीति के लिए घिनौना खेल खेलकर भले ही आपको मजा आता हो लेकिन आप तो पूरी सभ्यता-संस्कृति को ही तहस-नहस किए हुए हैं।
★★★★★★★★★★★★★★★★ 
सुशील कुमार भारद्वाज
★★★★★★    ★★★★★★★

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

हिन्दी का झगड़ा

कुछ लोग आज हिन्दी हिन्दी की रट यूँ लगाए हुए हैं कि उनके बिना हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं। और कुछ प्रगतिशील लोग हिन्दी के विरोध में यूँ खंभा लेकर खड़े हैं कि पहले से हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं। लेकिन दोनों के दोनों हैं नकली।

फर्क बस इतना है कि कुछ लोग अँग्रेजी की गुलामी सहते हुए भी हिन्दी को छोड़ते नहीं और कुछ हैं जो हिन्दी की टाँग -हाथ तोड़ते हुए भी अँग्रेजी को मजबूरी में अपनाते रहते हैं।

लेकिन विशेष प्रगतिशील लोग, जो हमेशा स्वतंत्रता स्वतंत्रता की रट लगाए रहते हैं उन्हें शायद इस बात का इल्म ही तब नहीं रहता कि इस सृष्टि में कुछ भी स्वतंत्र नहीं है। दुनियां में उपलब्ध सारी चीजें किसी न किसी अदृश्य बंधन से बँधी है। जिसे शायद सभ्य समाज में अनुशासन के नाम से जाना जाता है।

और यदि जो हिन्दी को सम्मानित करने के लिहाज से राष्ट्रभाषा की माँग की जाती है तो बुराई क्या है? हिन्दी कम-से-कम अँग्रेजी की तरह विदेशी भाषा तो नहीं? संबंध और सम्पर्क भाषा के रूप में अँग्रेजी की जगह हिन्दी क्यों नहीं? ये कैसी समझ है कि ईर्ष्या-द्वेष और राजनीतिक विचारधारा की खातिर वर्षों तक उन्हें गुलामी पसंद है जबकि वे दिन-रात स्वतंत्रता की बात करते रहते हैं। क्या उनकी विचारधारा भी वैसी ही खोखली है?

अब वर्षों पुरानी बात दुहराना भी ठीक नहीं लगता कि नेहरूजी भारत को जैसे जम्मूकश्मीर जैसी समस्या दे गए वैसे ही भाषाई झगड़ा का भी बीज बो गए जबकि लोहिया जी ने इस भाषाई समस्या को दूर करने की भरसक कोशिश की लेकिन इंदिरा गांधी भी तो अपने पिता के ही पदचिन्हों पर चली!

★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 19 अगस्त 2018

लेखक बनने की शर्त: सुशील कुमार भारद्वाज






वे कहते हैं कि लेखक बनना है तो वामपंथी बनना होगा और चरमपंथी तो आप अपनेआप बन जाएंगे। दोहरे चरित्र को जीने की आदत डालिए। सुविधानुसार विरोध-प्रदर्शन में शरीक रहिए। दिनभर खुद को गाली देते रहिए मने गाली देने का नाटक करते रहिए। दलित-महादलित और अन्य उत्पीड़न के नाम पर आठ-आठ आँसू बहाते रहिए।

और जातिगत भावना को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखने के लिए आरक्षण का माला जपते रहिए। आरक्षण में भी आरक्षण की संभावना को तलाशते रहिए। और फिर सामने वाले को मनुवादी-मनुवादी कह कर गरियाते रहिए। और स्वयं न सिर्फ सामंतवादी व्यवहार में समायोजित होते रहिए बल्कि जमकर पूजा-पाठ भी करते रहिए। कभी कोई तस्वीर पूजा करते हुए वायरल हो जाए तो पत्नी या घरवालों की इच्छा का सम्मान कहकर चुपके से निकल लीजिए और दूसरे पर ताना मारते रहिए।

भाई, इतना आसान नहीं है लेखक बनना! आपको सिर्फ गुटबाजी करना ही नहीं आना चाहिए बल्कि गुट के लेखकों की घटिया-से-घटिया रचना पर भी वाह -वाह करते रहना आना चाहिए। और गुट के सच्चे सिपाही की ही तरह प्रचार प्रसार में ही महारत हासिल मत कीजिए बल्कि गालीगलौज करने के लिए भी तैयार रहिए।

कविता-कहानी के लिए विषयों को कौन पूछता है? कुछ भी लिख डालो। बस ख्याल सिर्फ इतना रहे कि उसमें उत्पीड़न की भावना दिखनी चाहिए। और यदि आप इसमें सफल रहे तो आप सबसे चर्चित और सबसे अच्छे साहित्यकार के रूप में जल्द ही स्थापित हो जाएंगे।

हाँ, कुछ लोगों को जाति-धर्म, समाज और सुंदरता का तड़का भी चाहिए। और भी बहुत कुछ लेकिन शेष बातें फिर कभी......

★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

शुक्रवार, 22 जून 2018

अज्ञेय की कहानी मुस्लिम मुस्लिम भाई भाई


मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई/अज्ञेय
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छूत की बीमारियाँ यों कई हैं;पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक,कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? -और मारती है तो स्वयं नहीं,दूसरी बीमारियों के ज़रिये।कह लीजिए कि वह बला नहीं,बलाओं की माँ है...

नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है,वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष,और कमीनापन आ घुसते हैं,और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!

घृणा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा।छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है;सरदारपुरे में इस छूत को लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक -रोज़ाना अखबार!

यों अखबार में मार-काट,दंगे-फ़साद,और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं,और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे - दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे।पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।

उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाटों और मुसलमानों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं - ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। केवल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’

इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।

सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या... फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो भी लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं...

गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े।दरवाजों से, खिड़कियों से,जो जैसे घुस सका,भीतर घुसा।जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये,छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये।जाना ही तो है,जैसे भी हुआ,और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो...

गाड़ी चली गयी।कैसे चली और कैसे गयी,यह न जाने,पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!
और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल,जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े,कुछ रोगी,कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली,जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।

सकीना ने कहा,“या अल्लाह,क्या जाने क्या होगा।”
अमिना बोली,“सुना है एक ट्रेन आने वाली है - स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी - उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न?उसी में क्यों न बैठे?”

“कब जाएगी?”
“अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..”
जमीला ने कहा,“उसमें हमें बैठने देंगे?अफ़सर होंगे सब...”
“आखिर तो मुसलमान होंगे - बैठने क्यों न देंगे?”
“हाँ,आखिर तो अपने भाई हैं।”

धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर।अमिना,जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं।उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी...

तीनों के स्वामी बाहर थे- दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे - उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा!

सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी,उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी।अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे;जमीला का खाविन्द शादी के बाद ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये चार बरस हो गये थे।

अब... तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं,और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक... न जाने कब क्या हो - और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है,अभी उन्होंने देखा ही क्या है?

सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी,सो अब वह भी नहीं,न जाने कब क्या हो...अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही...

स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई,और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।

अमिना,सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था,एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली।जो कुछ गहना-छल्ला था,वह ट्रंक में अँट ही सकता था,और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे।और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।

ज़मीला ने कहा, “वह उधर ज़नाना है!” - और तीनों उसी ओर लपकीं।
ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं,दो की गोद में बच्चे थे।एक ने डपटकर कहा, “हटो, यहाँ जगह नहीं है।”

अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, “बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे - मुसीबत में हैं...”

“मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ,आगे देखो...”
जमीला ने कहा, “इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।”

“जाना है तो जाओ,थर्ड में जगह देखो।बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!”और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर,उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।

जमीला को बुरा लगा।बोली, “इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं...”

इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया।उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं,पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे,नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।

सकीना ने कहा,“तो बुला लो न गार्ड को।आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।”

“जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न!कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल,ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है,पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि...” एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, “भैया!ओ अमजद भैया!देखो ज़रा,इन लोगों ने परेशान कर रखा है...”

‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये।चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले,“क्या है?”

“देखो न,इनने तंग कर रखा है।कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं।कहा कि स्पेशल है,सेकंड है,पर सुनें तब न।और यह अगली तो...”

“क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-”

जमीला ने कहा, “क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के लोग ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं,पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और...”

“और टिकट?”

“और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?”

अमिना ने कहा, “मुसीबत के वक्त मदद न करे,तो कम से कम और तो न सताएँ!हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? -

हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर - या अल्लाह!”

“अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?”

किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाकलर चिकटनी खोले,दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें।

जिधर जमीला थी,उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।

भीतर से आवाज़ आयी, “खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को...

सकीना ने तड़पकर कहा, “कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया...”

“बड़ी पाक़दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच भागकर जा रही हो, आखिर कैसे?

उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने...”

जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, “छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!”

सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, “या अल्लाह!”

गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।

जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, “थूः!” और क्षण-भर बाद फिर, “थूः!”

आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, “गयी पाकिस्तान स्पेशल।या परवरदिगार!”
                                    (इलाहाबाद,1947)