सुसुम धूप में फिर से ढूँढ़ो
वही शब्द लुप्त
संदर्भ : अरुण कमल की कविताओं का संग्रह योगफल
• शहंशाह आलम
अभी ठीक से खेत कोड़ा भी नहीं
अभी ठीक से मिट्टी बराबर भी नहीं की
अभी ठीक से रोपनी भी नहीं हुई
अभी ठीक से पटाया भी नहीं
अभी ठीक से पौधा उठा भी नहीं
अभी ठीक से बालियाँ भी नहीं फूटीं
अभी ठीक से दाने पके भी नहीं
अभी ठीक से कटनी भी नहीं हुई
अभी ठीक से दौनी भी नहीं हुई
अभी ठीक से ओसाई भी नहीं हुई
अभी ठीक से दाने चाले भी नहीं गए
अभी तो दाने बटोरे भी नहीं गए कि
द्वार पर आकर खड़े हैं
वसूली वाले
नहीं महाराज, नहीं, अभी तैयार नहीं।
अपनी पसंद के कवियों को पढ़ते हुए अकसर सोचा करता हूँ कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है। हो सकता है, ऐसा सोचना, मेरे अंदर रह रहे कविआदमी के लिए कोई अच्छा लक्षण ना हो। स्वीकार्य है, यह वाला लक्षण मेरे जैसों के अंदर होना भी नहीं चाहिए। ख़ास कर, कविता के महान कवियों को पढ़ते हुए। यह है भी, तो एक कविधर्मी होने के कारण है। यही कारण है, अरुण कमल को पढ़ा-पढ़ी के समय भी यह ख़्याल आता रहा है कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है? सोचने का यह भाव, एक सनातन भाव है, सो ऐसा सोचते रहने को कोई ख़राब गुण मैं नहीं मानता। बहुत सारे मूर्धन्य आलोचक इस गुण को अच्छा नहीं मानते। उनका मानना है, इस गुण से उनके बहुत सारे प्रिय कवि कविता की आलोचना में आने से रह जाएँगे। आलोचना का यह जड़वाद है, जिसकी वजह से आज भी बहुत सारे जेनुइन कवि उनकी आलोचना का हिस्सा बनने से रह गए हैं। समकालीन हिंदी आलोचना की यह बड़ी कमज़ोरी रही है। पहले भी, अभी भी। यह कमज़ोरी आगे भी रहने वाली है।
हिंदी आलोचना अरुण कमल की कविता के साथ ऐसा कोई जड़ रास्ता नहीं तलाश सकती थी। दरअसल कविताई का जो गुण अरुण कमल के पास था, बहुत कम हिंदी के कवियों के पास यह गुण होता है, जिनकी कविता सिर्फ़ हिंदी कविता को नहीं, विश्वकविता को प्रभावित करे। सीधे-सीधे कहिए, तो अरुण कमल की कविता, कविता का कोई विश्वकोश अगर है, तो उसी कोश में रखी जाने वाली कविता है। अरुण कमल की कविता हिंदी कविता की ऐसी निधि है, जो भविष्य के लिए संभाल कर रख ली जानी चाहिए। यह कविता हमारे वक़्त की ऐसी कविता है, जिसमें हमारे वक़्त का ज़ख़्म भी है और मरहम भी। वक़्त कहीं ख़ामोशी में है, तो कहीं हो-हल्ला में है। तभी हाकिमे वक़्त पूँजीपतियों से हमारा सौदा करता है और ऐसे सौदे पर बिना शर्मिन्दा हुए रक़्स करता है और रक़्स करते हुए हमको ज़ख़्म देता है और अरुण कमल की कविता मरहम देती है। उनकी कविता एक लोकप्रिय सरकार के सात दिन का आस्वाद लीजिए और समझिए कि कोई हाकिमे वक़्त रक़्स ही काहे करता है बिना शर्मिन्दा हुए : ‘पहले ही दिन सरकार ने आँगनबाड़ी सेविकाओं पर लाठियाँ भाँजीं / दूसरे दिन वृद्धावस्था पेंशन पर पानी के फ़व्वारे / तीसरे दिन छँटनीग्रस्त शिक्षामित्रों के धरने पर कुत्ते छोड़े / चौथे दिन उजड़े झोंपड़वासियों पर घोड़े दौड़ाए / पाँचवें दिन बेरोज़गारों के जुलूस को रौंदा / छटे दिन मूक-बधिर-नेत्रहीनों पर आँसू गैस के गोले ठोंके / सातवें दिन बालिकाहत्या का विरोध करतीं औरतों पर गोलियाँ दागीं / और सात को मौक़े पर ढेर किया / सबने स्वर से गाया / ऐसी लोकप्रिय न्यायप्रिय / देवानाम प्रिय प्रियदर्शी सरकार / धम्माशोक बाद कभी नहीं आई / कभी नहीं / नहीं।’ इस कविता के बाद एक और कविता माननीय के नाम सन्देश भी लीजिए और मेरे कहे का अर्थ निकालिए : ‘माननीय / आज इस ऐतिहासिक प्राचीर से / मैं, भारत का एक नागरिक / स्वाधीनता दिवस की पूर्व वेला में / आपको सम्बोधित कर रहा हूँ / और आपसे पाँच प्रश्न करता हूँ - / पहला, आपका ख़र्चा कौन चलाता है? / दूसरा, कौन-सी शक्ति है आपके पास? / तीसरा, यह शक्ति आपको कहाँ से आती है? / चौथा, आप यह शक्ति किसके हित में प्रयोग करते हैं? / और पाँचवाँ, आपकी अन्तिम इच्छा क्या है? / जय हिन्द!’
अर्थ निकालने में कोई कठिनाई आ रही हो, तो सारे अर्थ मैं ही उद्घाटित कर देता हूँ। दोनों कविताओं का अर्थ सीधे-सीधे यही है कि अरुण कमल की कविता पढ़ते-गुनते-सुनते समय ऊपर-ऊपर शीत लगती है, तो इसके नीचे-नीचे बहती हुई धाह ऐसी है कि इससे निकलने वाली लपट किसी ज्वालामुखी के ताप से कम नहीं। यह कविता औरों की कविता से पृथक् इस मायने में है कि कवि ख़ुद अपनी कविता को ‘नीचे धाह ऊपर शीत’ कहता है और हमेशा की तरह कवि सच कहता है। बिना किसी लाग-लपेट के कहता है। तभी अरुण कमल की कविता काल-बोध की कविता है। तभी इनकी कविता कवि के जी रहे भारी दिनों का आख्यान है। आख्यान भी कैसा, जिसे कोई माननीय पढ़ ले, तो उसके होश उड़ जाएँ। सच ही तो है, कौन माननीय है, जो कविता में ख़ुद के विरुद्ध फैल रही इस लपट को, इस लौ को, इस अग्निशिखा को सह पाएगा, कोई नहीं। सहेगा वही, जो घाम वाले दिनों को सहकर जनता का सच्चा सेवक बना होगा। ख़ुद को ऊँचा उठाने की बजाय देश की जनता को ऊँचा उठाने की चाह लिए संसद या राज्यसभा, विधानसभा या विधान परिषद् पहुँचा होगा। कवि का भी और मेरा भी अभिप्राय यही है कि जनता सबकुछ का आकलन करती है, आपके त्याग का भी, आपकी जुमलेबाज़ी का भी। असल कवि तो देश की असल जनता ही है बिरादर, हम तो माध्यम भर हैं, शब्द भर हैं, हम तो आवाज़ भर हैं।
अरुण कमल की कविता किसी अँधेरी कोठरी की कविता नहीं है। यह कविता ऐसी है, जो हमेशा आदमी के दरमियाँ रहती आई है। वही आदमी, जिसको कोई योगफल निकालने नहीं आता। इन आदमियों का योगफल यानी आम आदमी के अच्छे-बुरे का हिसाब-किताब, जोड़-घटाव, लेखा-जोखा सब कवि ही करता रहता है। सच में, अगर जनता हिसाबी होती, तो देश का महामात्य जिस तरह से अपने हर भाषण में पूरी तरह निर्लज्ज उनकी इज़्ज़त-आबरू उछालता फिर रहा है, तार-तार करता फिर रहा है, ऐसे महामात्य को उसकी कुर्सी से खींचकर, उसे अपनी बस्ती लाकर उसकी लज्जा को बिना पछतावे के किसी बंदी गृह की तरह ढा नहीं देती। यह कितनी अच्छी बात है कि जनता को कवि पर इस बात का भी भरोसा है कि ऐसे नक़ली और फ़र्ज़ी महामात्य का पर्दाफ़ाश कोई कवि ही करेगा। तभी अरुण कमल देश की जनता का भरोसा अपनी कविता चलो पीते हैं चाय में बचाए रखते हैं : ‘चलो पीते हैं चाय, राजेश को बुलाते हैं / मंगलेश को, विष्णु नागर को, विजय को भी पुकार लो / सबको पुकारो, जो नहीं पीते उनको भी, शकील-वीरेन्द्र यादव / जगाओ नीलेश को, श्योराज भी तो यहीं होंगे / अरे यार, यही तो सही वक़्त है चाय का / रात है, चाँद है ढलता हुआ, हवा तेज़ / हत्यारे घूमते, फौज की गश्त, दरवाज़े बन्द / बत्तियाँ गुल, साँसें धौंकतीं / उठो-उठो मेरे दोस्त / वहाँ एक चूल्हा जल रहा है कोने में / गली के मुँह पर / एक बहुत बुढ़ी माँ वहाँ बैठी है देग में चाय उबालती / ये कैसी बेचैन भाप है जो बुला रही है — / चलो चाय पीते हैं आज इस रात के तीसरे पहर / अरे सब आ रहे हैं, ज्ञान जी आ रहे हैं इस ठण्ड में / कमाण्डर, देखो सब आ रहे हैं, अरे साथी ग़दर भी — / चलो चाय पीते हैं आज रात सबकी रात सबको पुकारे / केदार जी, चाय का पहला उल्लेख किस कवि में मिलता है / त्रिलोचन शास्त्री से पूछेंगे, चलो अभी चाय पीते हैं (सुबह की पहली ख़बर : सरकार ने चाय पर रोक लगाई)।’ या फिर : ‘प्रिय मित्र, आप ज़रा भी परेशान ना हों / आप में से किसी का नाम वहाँ नहीं है / ना तो संसद बुलाएगी काव्य-पाठ के लिए / ना राष्ट्र का प्रधान रात्रि भोज पर / मरने पर ग्यारह बन्दूक़ों की सलामी भी आपको नसीब नहीं / आपको भले ग़लतफ़हमी हो / किन्तु इस देश की सत्ता को कोई ग़लतफ़हमी नहीं / तुम्हारी जगह बाहर है, साथियो बाहर / तुम्हारी जगह उन लोगों के पास है साथियो / जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं।’
इस लोकप्रिय सरकार का कैसा हँगामा है, कैसा झूठा प्रचार-प्रसार है। जबकि सभी दुखी हैं। सभी परेशान हैं। और राष्ट्र का प्रधान, जो मासूम लोगों की ज़ात तक का सौदा करता फिर रहा है। यह प्रधान तो सौदा करना जानता है या फिर शोर करना जानता है। हालात अज़ीयतनाक हैं, बदतर हैं, ख़राब हैं। अरुण कमल ऐसे हालात का फ़ैसला किसी और पर ना छोड़कर अपनी कविता पर छोड़ते हैं। यही कारण है कि अरुण कमल की कविता वंदना, स्तुति अथवा प्रार्थना की कविता नहीं है। वंदना है भी, तो उस सुग्गे के लिए, जो उड़ते-उड़ते मरा। वंदना है भी, तो उस इंसान के लिए, जो ठनका गिरने से राख बन गया। वंदना है भी, तो उस शव के लिए, जिसको पहचानने वाला कोई नहीं। वंदना है भी, तो उन जन-मजूर परिवारों के लिए, जिनको चाशनी में तले मालपुए मयस्सर नहीं। वंदना है भी, तो उनके लिए, जिनके घर ढह गए। अब कोई भी लोकप्रिय सरकार हो, संभव यही है, आपके जीवन का योगफल बस इतना भर हो उस सत्ता की दृष्टि में कि आप उनको वोट दें और कोई चाह मन में ना रखें। चाहत रखनी भी होगी आपके द्वारा पूरे मनोयोग से चुनी हुई सरकार से, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ रखेंगीं। झूठे समाचार बेचने वाले मालिकान रखेंगे। मक्कारी से चकाचौंध बाज़ार सजाने वाले रखेंगे। अरुण कमल को मालूम है, आपकी भूमिका इत्ती-सी है कि पाँच साल तक महँगाई का नौहा गाते रहें और बेबस होकर ज़िंदा रहें, फिर उसी सत्ता के झाँसे में आकर वोट दे आएँ, अगले पाँच वर्ष फिर रोने-धोने के लिए : ‘कितना वीभत्स है इन वृद्धों का यौन-नृत्य / के है अगला पी एम कौन कृत्य या भृत्य / उठो / चलो मेरे गुइयाँ उठो मेरे साथी उठो / वे जो मारे गए तुम्हें पुकार रहे हैं / वे हर दरवाज़ा पीट रहे हैं / वे खड़े हैं उस ओर / देखो वे रात में जगमग / जो जीवित हैं वे वंशज हैं मृतकों के।
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योगफल (कविता-संग्रह) / कवि : अरुण कमल / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002 / मूल्य : ₹150 / मोबाइल संपर्क : 9931443866
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शहंशाह आलम
हुसैन कॉलोनी
पेट्रोल पाइप लेन के निकट
नोहसा बग़ीचा
नोहसा रोड
फुलवारी शरीफ़
पटना – 801505, बिहार
मोबाइल : 9835417537




