शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

हिन्दी का झगड़ा

कुछ लोग आज हिन्दी हिन्दी की रट यूँ लगाए हुए हैं कि उनके बिना हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं। और कुछ प्रगतिशील लोग हिन्दी के विरोध में यूँ खंभा लेकर खड़े हैं कि पहले से हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं। लेकिन दोनों के दोनों हैं नकली।

फर्क बस इतना है कि कुछ लोग अँग्रेजी की गुलामी सहते हुए भी हिन्दी को छोड़ते नहीं और कुछ हैं जो हिन्दी की टाँग -हाथ तोड़ते हुए भी अँग्रेजी को मजबूरी में अपनाते रहते हैं।

लेकिन विशेष प्रगतिशील लोग, जो हमेशा स्वतंत्रता स्वतंत्रता की रट लगाए रहते हैं उन्हें शायद इस बात का इल्म ही तब नहीं रहता कि इस सृष्टि में कुछ भी स्वतंत्र नहीं है। दुनियां में उपलब्ध सारी चीजें किसी न किसी अदृश्य बंधन से बँधी है। जिसे शायद सभ्य समाज में अनुशासन के नाम से जाना जाता है।

और यदि जो हिन्दी को सम्मानित करने के लिहाज से राष्ट्रभाषा की माँग की जाती है तो बुराई क्या है? हिन्दी कम-से-कम अँग्रेजी की तरह विदेशी भाषा तो नहीं? संबंध और सम्पर्क भाषा के रूप में अँग्रेजी की जगह हिन्दी क्यों नहीं? ये कैसी समझ है कि ईर्ष्या-द्वेष और राजनीतिक विचारधारा की खातिर वर्षों तक उन्हें गुलामी पसंद है जबकि वे दिन-रात स्वतंत्रता की बात करते रहते हैं। क्या उनकी विचारधारा भी वैसी ही खोखली है?

अब वर्षों पुरानी बात दुहराना भी ठीक नहीं लगता कि नेहरूजी भारत को जैसे जम्मूकश्मीर जैसी समस्या दे गए वैसे ही भाषाई झगड़ा का भी बीज बो गए जबकि लोहिया जी ने इस भाषाई समस्या को दूर करने की भरसक कोशिश की लेकिन इंदिरा गांधी भी तो अपने पिता के ही पदचिन्हों पर चली!

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सुशील कुमार भारद्वाज

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