बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

दुर्गापूजा और वामपंथी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

दुर्गापूजा और वामपंथी
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हर साल की तरह इस साल भी दुर्गापूजा की शुरूआत आज कलश स्थापन के साथ शुरू हो रही है। लेकिन शक्ति की प्रतीक दुर्गा अपने ही अनुयायियों के द्वारा कितनी छलनी शब्दवाणों से की जा रही हैं। ये किसी से छिपा नहीं है। और यह करदानी पिछले कुछ वर्षों में कुछ ज्यादे ही हो गया है क्योंकि वामपंथियों की आँखें इन दिनों कुछ ज्यादे ही प्रगतिशील हो गई है। मजेदार बात तो ये है कि ये वामपंथी अपने-अपने घरों में बैठकर एकांत में घंटों माला जपेंगें और बाह्याडंबर वाले कर्मकांडों को प्रोत्साहित करेंगें और बाहर निकल कर उसी आवेग और त्वरा में देवी-देवताओं और ब्राह्मणों को गरियाते नजर आएंगें। और कभी कर्मकांडी के रूप में पकड़े जाएंगे तो पत्नी, बच्चे आदि पारिवारिक लोगों के इच्छा के सम्मान की बात करने लगते हैं। सच तो कभी बोलते ही नहीं।अरे भाई! जो इंसान प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी सभ्यता-संस्कृति पर थूके। जो करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करने से गुरेज न करे वो इंसान किसी व्यक्ति विशेष के अरमानों के आगे घुटना टेक देगा? इससे बड़ा सफेद झूठ क्या हो सकता है? छी: छी: इनकी इस दोगली नीति का कोई अंत नहीं है।

कभी-कभी ये समझ में नहीं आता है कि वे ब्राह्मण रूपी रावण का बचाव करते हैं या महिषासुर आदि का या फिर असत्य और दुर्गुण के प्रतीक इन महानुभावों का? ब्राह्मण को गाली देते हो तो रावण को क्यों बचाते हो? क्या आप रावण के दुर्गुणों से अपरिचित हैं? जबकि रावण इस बात का प्रतीक है कि कोई भी इंसान किसी भी उच्च या निम्न वंश में क्यों न जन्म ले? उसकी आखिरी गति उसके कर्मों से ही निर्धारित होती है। खैर, इसमें मैं क्यों उलझूँ? क्योंकि आपकी सोच ही आपकी स्थिति को स्पष्ट कर देती है।

आज से जब पूजन विधि की शुरूआत विधिवत होगी। मंत्रों और श्लोकों की गूंज माहौल को उत्सव में ढ़ाल रही होगी तो आपके कानों में दर्द शुरू हो जाएगा। आप ध्वनि प्रदूषण और पता नहीं क्या-क्या बकैती करते नजर आएंगे। मेले-ठेले से आपको परेशानी शुरू हो जाएगी क्योंकि आपके जीवन में उत्सव जैसा कोई चीज है ही नहीं। है तो सिर्फ एकांत और कुंठाग्रस्त पक्षपाती मानसिकता। सुविधा की राजनीति। बहुत ही अजीब लगता है आपका ये व्यवहार। लेकिन आप तो स्वतंत्रता के सबसे बड़े पोषक हैं। सभ्यता-संस्कृति और विरासत को भी तिलांजलि देकर भी आपको स्वतंत्रता चाहिए। शायद आप स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और उच्छश्रृंखलता के बीच के महीन अंतर को ही भूल गए हैं। जबकि आपको याद रखना चाहिए कि अनुशासन भी कोई चीज है। जो कि जीवन के लिए सबसे उपयोगी है।

इन दिनों मैंनें एक और चीज गौर की है। संभव है कि मेरा अवलोकन गलत हो लेकिन तथ्य यही है कि आप अपराधियों के बचाव में अक्सर सामने झंडे लिए नजर आते हो मानवता के नाम पर। लेकिन भूल जाते हैं उस निर्दोष की मानवता जो शिकार बन जिंदगी भर उस नासूर को अपने अंदर सहेजे रह जाता/जाती है। कभी आपकी अंतरात्मा आपको धिक्कारती नहीं? क्यों भूल जाते हैं कि दुर्गा भी एक स्त्री ही हैं। उन्हें भी अपने मान-मर्यादा को सुरक्षित रखने का अधिकार है। और जब आप दुर्गा रूपी स्त्री, जो कि महज एक आस्था है, मिट्टी का पुतला है, को ही पल -पल अपने शब्दों से आहत करते रहते हैं तो वास्तविक जीवन में आपसे क्या अपेक्षाएं शेष रह जाती हैं? महज राजनीति के लिए घिनौना खेल खेलकर भले ही आपको मजा आता हो लेकिन आप तो पूरी सभ्यता-संस्कृति को ही तहस-नहस किए हुए हैं।
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सुशील कुमार भारद्वाज
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