गुरुवार, 15 नवंबर 2018

बालदिवस और घटिया राजनीति ( आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

कल कुछ लोग #बालदिवस पर बतकही टीप रहे थे। राजनीतिक रंग में रँगने की यूँ कोशिश कर रहे थे जैसे इससे पहले देश में पक्ष-विपक्ष का मामला ही ना रहा हो। भाई, ये सच है कि बाल दिवस, चाचा नेहरू यानि पं० नेहरू के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

लेकिन बच्चों के लिए बालदिवस का कुछ और ही मतलब होता है। खेल-कूद, नाटक आदि में शरीक हो मस्ती में डूबा दिन और मिठाई-टॉफी में गुलजार होता मुँह का स्वाद। इसके अलावे बच्चे नेहरूजी के जीवन में कितनी रूचि लेते हैं? उनके जीवन-दर्शन आदि के बारे में अपने बालमन में कितना और क्या सोचते हैं? - ये बातें उन बच्चों से बेहतर कोई नहीं जानता है। और विद्यालय से बाहर के बच्चों के लिए बाल दिवस कोई मायने भी रखता है।- ये भी किसी शोध से कम का विषय नहीं है।

और बदलते समय, परिवेश और तकनीक के युग में जहाँ हर होश सँभालता बच्चा सोशल मीडिया, सेल्फी, टेलीविजन चैनल या यूट्यूब या अन्य में अपने जीवन के स्वर्णिम पलों को खोता जा रहा है उस युग में बालदिवस और इतिहास के पन्नों का उनके जीवन में क्या और कितना महत्व शेष रह गया है- यह एक विचारणीय प्रश्न है।

जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मैं समझ और देख पा रहा हूँ वहाँ शिक्षक दिवस और बाल दिवस दोनों ही अपना महत्व समय के साथ खोता जा रहा है। अन्य दिवसों की तरह इसका भी निर्वाह कर दिया जा रहा है। यह पूँजीवादी व्यवस्था का परिणाम है या शिक्षक-विद्यार्थी के बीच बदलते भावनात्मक और पेशेवर रिश्ते का परिणाम? कारण जो भी हो, लेकिन मूल भावना और आस्था दोनों ही विलुप्त होते जा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में नेहरूजी या किसी भी पुराने स्वतंत्रता सेनानी को लोग कब तक और कितना याद रख पाएंगे - कह पाना मुश्किल है। उसमें भी वैसे युग में जब बच्चे परनाना-परदादा तक का भी नाम मुश्किल से याद रख पाते हैं।

और इस बुते पर राजनीति करना कितना उचित है?- ये शायद राजनीति करनेवाले ही बेहतर ढ़ंग से बता सकते हैं।

चर्चा में बने रहने के लिए और भी मुद्दे रखे हुए हैं। कुछ सार्थक बात हो तो कोई बात हों। बेबजह का क्या बाबेला मचाना?

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