सोमवार, 8 मई 2023

भारतीय राजनीति में शिक्षा का अभाव: सुशील कुमार भारद्वाज

 भारतीय राजनीति की शुचिता को बचाए रखने की जरूरत है। लोकतंत्र की खामियों से बचने की जरूरत है। जरूरत है भविष्य को सुधारने की। आज जब ज्ञान -विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। शिक्षा की सुलभता जन-जन तक हो गई है। तब भी कोई अनपढ़ और अनगढ़ आदमी हमारा नेता बन जाता है। हमारा मंत्री बनकर मार्गदर्शन करने लगता है। प्रशासनिक पदाधिकारी तक को संबोधित करने लगता है। तो इससे बढ़कर शर्मनाक बात क्या हो सकती है?


कहा जाता है कि भारतीय चुनाव आयोग बहुत ही शक्तिशाली संस्था है। निष्पक्ष कार्य करती है। अनेक सुधार कार्य किये। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए प्रयासरत है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आखिर चुनाव आयोग क्यों नहीं प्रत्याशियों के शैक्षणिक योग्यता पर भी प्रश्न चिह्न लगा रही है? दिन रात पीआईएल की झड़ी लगाने वाले क्यों नहीं प्रत्याशियों के लिए भी शैक्षणिक मानक तय करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं?


कितनी अजीब बात है कि बिहार में जाति आधारित गणना में भी निरक्षर शब्द लिखने से मना किया गया। निरक्षर की बजाय पूर्व प्राथमिक शिक्षा शब्द का प्रयोग किया गया इस तर्क के साथ कि निरक्षर शब्द कलंक समान है। आज के आधुनिक तकनीक वाले युग में सब कोई पढ़ा-लिखा है। जबकि दूसरी ओर आठवीं या नौवीं पास इंसान बिहार में उप-मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री तक बन जाता है उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती है। शायद बेशर्म वे प्रशासनिक पदाधिकारी भी हैं जो उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। यदि शासक ही सबकुछ है और उसके तर्क़ -कुर्तक से ही राज्य चलना है तो चार पैर वाला जानवर कुत्ता -गधा क्या बुरा है? उसे भी चुनाव लड़ने और जीतने का मौका मिलना चाहिए।


यूं तो मेरी बुद्धि सीमित है, फिर भी 1947 ई के दौर को भी याद करते हैं तो सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पढ़े-लिखे ही थे। शायद सभी मंत्री भी काफी पढ़े लिखे थे। लेकिन अफसोस कि आजादी के 75 वर्षों के बाद, जब शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका है, बिहार जैसे राज्य में जातिवाद का ऐसा जहर घुला हुआ है कि कम पढ़े लिखे लोग को अपना शासक चुनकर भी लोग गौरवान्वित हो रहे हैं। पता नहीं वह दिन कब आएगा जब बिहार में शिक्षा की पूजा होगी?


#भारतीयराजनीति, #शिक्षा

रविवार, 7 मई 2023

भारतीय राजनीति में महिला: सुशील कुमार भारद्वाज

 एक समय था भारतीय राजनीति में जब महिलाओं का दमदार प्रदर्शन दिखता था। लोग इन्हें भारतीय राजनीति की त्रिदेवियां भी कहते थे। तमिलनाडु में जयललिता का जो जलवा था, वही उत्तर प्रदेश में मायावती का था। बंगाल की शेरनी तो ममता बनर्जी है ही। दक्षिण में राजनीति अब भी है। महिलाएं भी हैं। लेकिन जयललिता की जगह अब भी खाली ही है। मायावती तो अपनी नीतियों की वजह से ही सिमटे सिमटे अप्रासंगिक सी हो गई है। अब तो लगता है कि भारतीय राजनीति में एक मात्र शेरनी ममता बनर्जी ही बचीं हैं जो किसी को भी ताल ठोककर कभी भी चुनौती देने की हिम्मत रखती है। लेकिन वो भी अब उम्र के ढ़लान पर ही हैं।

ऐसा नहीं है कि भारतीय दलों में महिलाओं की कमी है या टिकट नहीं मिल रहा है या महिलाएं खुलकर राजनीति नहीं कर रही हैं। सब कुछ हो रहा है लेकिन अफसोस कि कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो रहा है। कोई ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा है जिससे भविष्य में उम्मीद की जा सके। 

कुछ लोग प्रियंका गांधी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन मेरी नज़र में उनकी उपलब्धि गांधी परिवार में जन्म लेने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उससे तो कई गुणा बेहतर सोनिया गांधी हैं जिन्होंने नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में लंगड़ाते कांग्रेस को न सिर्फ अपने दम पर संभाला बल्कि लगातार दो बार भारत को प्रधानमंत्री भी दिया। और आज भी कांग्रेस में जो कुछ भी शेष है उसमें भी सोनिया गांधी का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है।

आखिर भारतीय राजनीति से महिलाओं का दबदबा कम क्यों होता जा रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है और इस पर विचार किया जाना चाहिए।


#राजनीति #भारतीय_राजनीति #महिला

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा

 




नीतीश कुमार खुश हैं कि सलमान खुर्शीद ने उनकी वकालत कांग्रेस में करने की बात कही है। यदि किस्मत में लिखा होगा तो वे अगले प्रधानमंत्री भारत के बन भी सकते हैं। लेकिन आश्चर्य है कि उन्होंने इस महत्वकांक्षा की पूर्ति के जदयू का राजद में विलय का रास्ता क्यों चुना? वे सीधे -सीधे कांग्रेस में भी तो मर्ज कर सकते हैं पार्टी को! क्या सिर्फ कुर्सी की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह रास्ता चुना? कांग्रेस ने एक बार पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया और दो बार मनमोहन सिंह को। लेकिन तब गांधी परिवार की स्थिति कुछ और थी। परंतु अब जब राहुल गांधी मिशन की तरह "भारत जोड़ो यात्रा" को पूर्ण कर चुके हैं। एक अलग पहचान बनाने में सफलता हासिल की  है तब यहां से पीछे मुड़ने की उम्मीद है? यदि यह मौका चुक गये तो गांधी परिवार भविष्य में राहुल या प्रियंका के लिए कुछ सोच पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। इस दृष्टिकोण से तो यह सहज नहीं लगता है कि कांग्रेस खुर्शीद की बात मानेगी।  और नीतीश कुमार का व्यक्तित्व लालूजी जैसा तो कम से कम है नहीं जो केंद्र की सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हों। और इस बात की उम्मीद कम ही है कि नीतीश कुमार महज एक मंत्रालय के लिए केंद्र की राजनीति में जाएं। हां, संभव है कि उप-प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल जाय। या आगामी सत्र में उप-राष्ट्रपति या राष्ट्रपति की कुर्सी मिल जाय। या राज्यपाल की कुर्सी चाहें तो कभी भी मिल सकती है।


वैसे आने वाला वक्त बताएगा कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा का अंत किस पद पर जाकर होगा और कब होगा एवं इसके लिए उन्हें कौन कौन सी कुर्बानी देनी होगी?


#बिहार_की_राजनीति #बिहार

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

जननायक का जन्मदिन: प्रेमकुमार मणि

 जननायक का जन्मदिन 


प्रेमकुमार मणि 



बिहार में 24 जनवरी की तारीख राजनीतिक गलियारों में खूब चहल -पहल वाली होती है। यह दिन बिहार के समाजवादी नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर ( 1924 - 1988 ) का जन्मदिन है।  वह समाजवादी पार्टी और विचारों  के नेता थे, और जब थे, तब वर्चस्वप्राप्त सामंती सामाजिक समूहों के आँखों की किरकिरी बने होते थे।  किन्तु कुछ तो है कि उनका जन्मदिन एकाध छोड़ लगभग  सभी दलों के नेता किसी न किसी रूप में मनाते हैं।  भारतीय जनता पार्टी तक के लोग भी,  जिनका सामान्यतया उनसे आजीवन विरोध रहा।  1979 में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए जनता पार्टी के जनसंघी धड़े (भाजपा का पूर्व रूप ) और कांग्रेस में एकता हो गई थी। लेकिन आज इन दोनों पार्टियों के नेता भी उनका वंदन -अभिनंदन करते हैं। 


कर्पूरी ठाकुर अनेक मामलों में अजूबे थे। उनका जन्म सामाजिक रूप से एक अत्यंत पिछड़े परिवार में हुआ था। पिता गोकुल ठाकुर पारम्परिक जाति- व्यवस्था में नाई थे, जिनका पेशा हजामत बनाना और बड़े लोगों की सेवा करना होता था।  ऐसे ही परिवार में 1920 के दशक में उनका जन्म हुआ।  वह जमाना राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का था।  समाज करवट ले रहा था। शायद करवट का ही असर था कि उन्हें स्कूल जाना नसीब हुआ था।  कहते हैं जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, तब उनके पिता उन्हें साथ ले कर गाँव के  एक सामंत के घर गए। बेटे की सफलता से उल्लसित पिता ने  बतलाया  कि बेटा मैट्रिक पास कर गया है और आगे पढ़ना चाहता है। सामंत अपने दालान पर लकड़ी के कुंदे की तरह लेटा हुआ था। हिला और किशोर कर्पूरी को एक नजर देखा। बोला - ' अच्छा तूने मैट्रिक पास किया है ? आओ मेरे पैर दबाओ।'  यह  बिहार का सामंतवादी समाज था, जो जातिवाद के दलदल में भी बुरी तरह धंसा था।  हजार तरह की रूढ़ियाँ और उतने ही तरह के पाखंड। शोषण का अंतहीन सिलसिला। 


ऐसे ही समाज में कर्पूरी ठाकुर ने आँखें खोली।  वह उस बिहार से थे, जहाँ 1930 के दशक में जयप्रकाश नारायण की पहल पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी थी,  जहाँ  स्वामी सहजानंद ने  किसान आंदोलन को खड़ा किया था। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हो गया था।  त्रिवेणी सभा के नेतृत्व में पिछड़े किसानों, मजदूरों, दस्तकारों ने सामाजिक परिवर्तन की नई मुहिम शुरू की थी।  कर्पूरी ठाकुर चुपचाप समाजवादी आंदोलन और पार्टी से जुड़े और जल्दी ही उनके बीच अपनी पहचान बना ली। 1952 में जब पहला आमचुनाव हुआ, तब वह समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ कर बिहार विधानसभा में पहुंचे। उसके बाद वह लगातार धारासभाओं में बने रहे।  बिहार के एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री बने। जब सरकार से बाहर रहे तब प्रतिपक्ष के पर्याय बने रहे। 


लेकिन क्या यही उनकी विशेषता है, जिनके लिए आज उनकी चर्चा होती है ? शायद नहीं।  सच्चाई यह है कि वह सरकार में बहुत कम समय के लिए रहे।पहली दफा 22  दिसम्बर 1970  से 30  जून 1971  तक और दूसरी दफा 24 जून 1977 से 30 जून 1979 तक।  दोनों बार मिला कर उनका कार्यकाल ढाई साल का होता है।  इसके अलावे 1967_68 में दस महीनों के लिए उपमुख्यमंत्री भी रहे। यही उनके हुकूमत की अवधि थी।  इस अल्पकाल में ही बिहार के सामाजिक -राजनीतिक जीवन को उन्होंने जिस तरह प्रभावित किया उसकी चर्चा आज तक होती है।


बिहार में केवल एक बार शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ और वह कर्पूरी ठाकुर  ने किया।  पढाई में अंग्रेजी की अनिवार्यता को ख़त्म कर के उसे किसान मजदूरों के बच्चों के लिए सुगम बना दिया, जो अंग्रेजी के कारण अटक जाते थे और जिनकी पढाई बाधित  हो जाती थी।  जिंदगी भर नॉन मैट्रिक बने रहने की पीड़ा वह झेलते रहते थे।  अंग्रेजी के बिना भी बहुत अंशों तक पढाई की जा सकती है।  इसे उन्होंने  रेखांकित किया। दलित -पिछड़े तबकों और स्त्रियों  में इससे शिक्षा में आकर्षण बढ़ा। उनका दूसरा काम स्कूलों में टूशन फीस को समाप्त करना था। इससे स्कूलों में बच्चों का ड्रॉपआउट कमजोर हुआ।  शिक्षा सुधार का  यह एक क्रांतिकारी कदम था। 1977 में उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर सरकारी नौकरियों में पिछड़े तबकों के लिए छब्बीस फीसद आरक्षण सुनिश्चित किया। कार्यपालिका के जनतंत्रीकरण का उत्तर भारत में यह पहला प्रयास था। इसके साथ सभी स्तरों पर भूमिसुधार कानूनों को लागू कर बिहारी समाज के सामंतवादी ढाँचे की चूलें हिला दी।  इन सब के लिए बिहार के सामंतों ने कर्पूरी ठाकुर को कभी मुआफ नहीं किया। सामंती ताकतों से तिरस्कार और विरोध का जो तेवर कर्पूरी ठाकुर को झेलना पड़ा, वैसा किसी कम्युनिस्ट नेता को भी नसीब नहीं हुआ।  1980 के आरम्भ में मध्य बिहार के ग्रामीण इलाके  जब नक्सलवाद से प्रभावित हुए तब सामंतों ने पटना जिले के बिक्रम में एक सशस्त्र जुलूस निकाला; जिसमें मुख्य नारा था - ' नक्सलवाद कहाँ से आई, कर्पूरी की माई बिआई .' सामंतों का आकलन बहुत हद तक सही था।  गरीबों को उठ कर अपनी आवाज बुलंद करने का साहस कर्पूरी ठाकुर ने ही दिया था।  वही उनके टारगेट थे।


      बावजूद इन सब के  उन्होंने कभी किसी से बैर भाव नहीं पाला। वह जो कर रहे थे, न्याय के लिए कर रहे थे, नफरत फ़ैलाने के लिए नहीं।  एकबार उनके मुख्यमंत्री रहते सामंतों ने उनके पिता की पिटाई की।  कलक्टर ने पिटाई करने वालों के खिलाफ कड़ा रुख लिया। कर्पूरी ठाकुर ने कलक्टर को उन्हें यह कहते  हुए छोड़ देने के लिए कहा कि मेरे पिता की तरह बहुत से गरीबों की रोज पिटाई हो रही है।  जब सब की पिटाई बंद हो जाएगी मेरे पिता की भी  पिटाई नहीं होगी।  समस्या के व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक निदान में उनका विश्वास था। इसलिए कि वह सच्चे समाजवादी थे। उनमें जिम्मेदारी का बोध और संवेदनशीलता अद्भुत थी। उनके मुख्यमंत्री रहते पुलिस थाने में एक सफाई मजदूर ठकैता डोम की पिटाई से मौत हो गई। कर्पूरी ठाकुर ने खुद पूरे मामले की तहकीकात की। ठकैता डोम को उन्होंने अपना बेटा कहा। उसे स्वयं मुखाग्नि दी। ऐसा ही उन्होंने भोजपुर के पियनिया में किया, जब एक गरीब की दो बेटियों रामवती और कुमुद के साथ बड़े लोगों ने बलात्कार किया। घटनास्थल पर जाकर बलात्कार का शिकार हुई लड़कियों को उन्होंने बेटी कहा और उनकी देखभाल की व्यवस्था की। ऐसे मामलों में कभी-कभार पुलिस बाद में जाती थी, कर्पूरी जी पहले जाते थे।  गरीबों से उन्होंने खुद को आत्मसात कर लिया था।सादगी और ईमानदारी का जो आदर्श उन्होंने रखा, वह किंवदंती बन चुकी है। 


जिस मात्रा में उन्हें बड़े लोगों का तिरस्कार मिला, उसी मात्रा में उन्हें दलित -पिछड़े समाज का प्यार भी मिला। गरीब -गुरबे अच्छी तरह समझते थे कि कर्पूरीठाकुर को इतनी जिल्लत आखिर किसके लिए झेलनी पड़ रही हैं। उनका अपने लिए कोई स्वार्थ नहीं था। पूरे जीवन विधायक -सांसद, मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बने रह कर भी उन्होंने कहीं अपना ठिकाना नहीं बनाया।  तमिलनाडु के नेता कामराज जब मरे थे, तब उनके संदूक से दो जोड़ी कपडे और सौ रूपए मिले थे। लगभग यही स्थिति कर्पूरी जी की थी। जैसे आए थे, वैसे ही गए।  यही कारण है कि जैसे -जैसे समय बीत रहा है और लोग तरह -तरह के राजनेताओं को देख रहे हैं, कर्पूरी ठाकुर एक बड़े हीरो की तरह उभर रहे हैं। वंचित तबकों को राजनीतिक धारा से जोड़ने के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था।  इसी तबके ने उन्हें जननायक कहा। वह सच्चे मायने में जननायक थे।

सोमवार, 16 जनवरी 2023

सिर्फ गुलाबी नहीं है सिनीवाली की मछलियां: प्रशांत





हिंदी कथा जगत में महिला कथाकारों के अभिव्यक्ति में ग्रामीण परिवेश में मौजूद कच्च-पक्की सड़क और धूल-मिट्टी से सने समाज का वृतांत, आधुनिकता और  उदारीकरण के बाद के दौर में कमोबेश गायब सा हो गया है। जब आधुनिक भौतिक-संसाधन के साथ तुरंत पैसे कमाने की मानसिकता लोगों के विकासवाद का प्रतीक बन चुका है। वहां सिनीवाली का कहानी संग्रह ”गुलाबी नदी की मछलियां“  आंचलिकता की झलक के साथ, ग्रामीण समाज में बदली हुई चुनौतियों को समेटकर रचनात्मक प्रहार करती है। मौजूदा हिंदी कथा-साहित्य में ग्रामीण समाज के जीवन में हो रहे  बदलाव और उस समाज की महत्वकांक्षा का विस्तार अदृश्य सा हो गया है, वहां सिनीवाली अपने कहानी संग्रह ”गुलाबी नदी की मछलियां“  ग्रामीण समाज में मौजूद संवेदनाओं का पुर्नपाठ करती हुई दिखती है।

कहानी संग्रह में पहली कहानी ”रहौं कंत होशियार“ ग्रामीण समाज में लालच से घिरे समाज में खेती-किसानी से जाता हुआ मोह, अपनी परेशानीयों से मुक्ति पाने की चाह के बाद भी खेती करनी विवशता और ग्रामीण समाज की तमाम संवेदनाओ-समस्याओं को एक सार्थक देने की कोशिश दिखती है। कहानी में जब तेजों कहता है कि धरती के तरह-तरह के सौदागर होते हैं। वो पेट भरती है सबका पर सुलगाती तो अपनी ही देह है।  एक ही संवाद में बहुत कुछ कह देता है। तेजो जब ईट-भट्टी के लिए पैसा लेकर जब अपनी जमीन पट्टे पर ना दे उसे खुद जोतने का फैसला कर अधिकतर गांव वालों के उपहास का पात्र बन जाता है और धूर्त सेठ से ठंगे जाने पर गांव वालों का नेतृत्व भी करता है।

शीर्षक कहानी तो अलग ही नायाब कहानी है एक अपहरण किए गए नौजवान से अपहरण में शामिल परिवार की युवती लौगिया  की मोहक प्रेम कहानी है गुलाब नदी की मछलियां। प्रेमी जोड़े के साथ पाठक मछली के तरह गोते लगाते हुए अंत में हैरान भी हो जाते है कि अरे ये क्या? कहानी में घटित प्रेम एक बेहद विरल क्षण से सृजित रूपक से बना है। अपहरण पर आधारित विषय पर पहले भी कहानियां लिखी गई हैं , लेकिन वे ज्यादातर अपराध के इर्द-गिर्द केन्द्रित रही है, उस महौल में प्रेम को बुनना ही किसी चुनौति से कम नहीं है।

अतिथीकहानी में जरूरी काम से शहर के बाहर गया पति के गैरमौजूदगी में, देर रात घर पर आए अनजान अतिथी को वह (जो दो छोटी बच्चियों की मां भी है), रात गुज़ारने के लिए अपने दो कमरों के घर में जगह दे तो देती है मगर आशंकाओं से चलते रात भर सो नहीं पाती है। अधजली बड़ी ही मार्मिक कहानी है जिसमें किसी प्रकार एक औरत पारिवारिक मजबूरी क शिकार होकर मानसिक कुंठा की शिकार हो जाती है और अपनों की ही दुश्मन बन जाती है। किसी को सब कुछ मिल के भी कुछ नहीं मिलता, भाभी घर में पति के रहते मां नहीं बन पाती और ननद को तो ब्याह के बाद से ही पति लेने नहीं आता।

हमलोगकहानी उन युवाओं की है जो घर बाहर के तानों से परेशान होकर काम की तलाश में गांवों से शहर की ओर पलायन तो कर बैठे हैं, मगर शहरों के दड़बेनुमा कमरों में जीवन बस काट रहे है। नायक हताशा और कुंठा से इस कदर भरा हुआ कि भावनात्मक मगर विवेकहीन फैसलों के तरह बढ़ने लगता है। कहानी इत्रदानसंपन्न घर की बेटी के ब्याह कर गांव के अमीर घर में जाने और फिर किस्मत के चलते गरीब हो जाने के वितांत को बयां करती है।  करतब बायस कहानी गांव-देहात में चुनावी सरगर्मीयों का जायज़ा लेती है कि किस तरह पुलिस की आंखों से बचाकर शराब गांव में पहुंचती और बांटी जाती है, आम जनता पैदा और शराब दोनों तरफ से अपना उल्लू सीधा करती है और स्वयं के उल्लू बन जाने से बेखबर रहती है।

बंटवाराकहानी आधुनिक समाज का कठोर सत्य है जिसमें एक वृद्ध जोड़ा अपने ही बेटों के बीच एक ही घर में बंट जाता है। बालकृण्ण बाबू और सुभाषिणी को उनके बुढ़ापे में अलग होना पड़ता है पर उनका एक-दूसरे से बेहद प्रेम परिस्थितियों के बाद भी लुप्त नहीं हो पाता है। इसीतरह दुल्हा बाबू को व्यग्यात्मक कहानी कह सकते है जिसको सिनी वाली ने स्थानीय भाषा के प्रयोंग के साथ सबसे अधिक जींवत बना दिया है। शादी के उम्र निकल जाने के बाद देर से हो रही शादी में युवक परेशान है कि शादी से पहले गांव बिरादरी की एक बुढ़िया मरणासन्न हालात में है और अगर वो मर गई तो सामाजिकता निभाने के चक्कर में इस साल भी शादी रह जाएगी।

सिनीवाली अपने कहानी संग्रह ”गुलाबी नदी की मछलियां“ के  हर  रचना  में एक अपनेपन का जुड़ाव पाठकों को देती है। हर कहानी की में आंचलिकता की झलक संग्रह की यूएसबी है। जैसे ग्राम संस्कृति आज भी शहरी बनावटीपन से बहुत दूर है वैसे ही गुलाबी नदी की मछलियां कहानी संग्रह के हर कहानी के हर पात्र पर केंद्रित विषयवस्तु  में लोकजीवन की झलक मिलती है। कथ्य और भाषा शैली का वह प्रभाव पैदा करती है कि पाठक बहता ही नहीं बंधता भी चला जाता है। ग्रामीण समाज में आचंलिकता की पगडंडियो को पकड़कर अलग राह पकड़ने का कौशल लेखिका सिनीवाली  को एक अलग कतार में खड़ा करती है और पाठकों के मन में एक अलग पहचान गढ़ती है। सम-विषम परिस्थितियों में सिनीवाली  का कहानी संग्रह पाठकों को ग्रामीण जीवन में बदल रहे समाज से आत्मसाक्षात्कार कराने में सफल होती है, यहीं सिनीवाली जी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

किताब का नाम- 'गुलाबी नदी की मछलियाँ'-


लेखिका- सिनीवाली


प्रकाशन- अन्तिका प्रकाशन


मूल्य- 180/- पेपरबैक


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समीक्षक: प्रशांत


सिनिवाली के फेसबुक वॉल से साभार।




शनिवार, 14 जनवरी 2023

विचारधारा की वाहियात पोटली: सुशील कुमार भारद्वाज

 सुख जो चाहिए मुझे, वही सुख चाहिए आपको और सबको। सच पूछिए तो सुख किसे नहीं भाता है? भले चाहें आप इस पार हों चाहें उस पार? परंतु समय की यह अजीब कहानी है कि हम सच को सच और झूठ को झूठ नहीं कह पाते हैं। ऐसा नहीं है कि सच और झूठ का फर्क नहीं मालूम है। मालूम सबकुछ है लेकिन हम अजीब अदृश्य राजनीतिक डोर से बंधे हैं। हम एक सामान्य इंसान (आम जनता) होने की बजाय स्वयंसेवी राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए हैं। हम सत्ता पक्ष अथवा विपक्ष की ओर सुविधानुसार चले जाते हैं और उसके हर निर्णय पर कुछ यूं टिप्पणी करने लगते हैं, सक्रियता से उसके पक्ष में बल्लेबाजी करने लगते हैं गोया मेरे पक्ष-विपक्ष में तर्क रखने से उनकी सरकार सुरक्षित रह जाएगी या चली जाएगी। देखने लायक मुंह तो तब बनता है जब वह पार्टी ही देर -सबेर अपने बयान से मुकर जाती है अथवा माफ़ी मांग लेती है।

क्या हमलोग शुरू से ऐसे ही थे? या राजनीतिक जागरूकता का यह साईड इफेक्ट है? या तकनीकी जीवन शैली ने हमें उग्र बना दिया है? आखिर हम क्यों एक दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं? विचारधारा की पोटली तो मुझे सबसे वाहियात चीज मालूम पड़ती है। जीवन जीने से भी बड़ी कोई विचारधारा है क्या? भाईचारा और मेलमिलाप से भी बड़ा कोई विचारधारा है क्या? लेकिन हमलोग इस्तेमाल हो रहे हैं दूसरों के हित के लिए, जिसका हमसे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई नाता -रिश्ता नहीं है। जितना पाप नहीं हो रहा है दुनिया में, उससे अधिक पापी होते जा रहे हैं हम सब।




-सुशील कुमार भारद्वाज 

रविवार, 8 जनवरी 2023

जाति आधारित जनगणना की मुसीबतें : प्रेमकुमार मणि

 जाति आधारित जनगणना की मुसीबतें 


प्रेमकुमार मणि 


बिहार में जातिवार जनगणना की प्रक्रिया आज से आरम्भ हो गई है और जिस तरह से इसका प्रचार किया जा रहा है, उससे मैं बेहद क्षुब्ध हूँ। राजद और जदयू इसे इस तरह रख रहा है, मानो यह कोई उपलब्धि हो। इस विषय पर मैं पहले से कहता रहा हूँ कि जाति आधारित वर्ग के आधार पर चूकि कई तरह के आरक्षण और सुविधाएं मुहैय्या की जा रही हैं, इसलिए सरकार को इसकी जानकारी रखनी चाहिए। इस आधार पर जनगणना को मैं आवश्यक भी मानता हूँ। लेकिन यह भी मानता हूँ कि यह अत्यंत गोपनीय स्तर पर हो। डाक्टर बीमार व्यक्ति का परीक्षण करवाता है,लेकिन उसकी रिपोर्ट को गोपनीय मानता है। वह डाक्टर के समझने केलिए है, न कि प्रचार केलिए। लेकिन बिहार सरकार उसका प्रचार कर रही है, मानो यह उसकी कोई कार्य- योजना और उपलब्धि  हो। 


जाति को लेकर समाज और राजनीति में लम्बे समय से अध्ययन चल रहा है। दुनिया भर में हर देश - समाज की कुछ खास तौर की बुनावट होती है। उसका अध्ययन अपेक्षित होता  है। भारत में जाति और इसकी प्रथा-परिपाटी को लेकर लम्बे समय से अध्ययन- चिंतन चल रहा है। एक दौर था, जब गांधी जैसे व्यक्ति की इस विषय पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भिड़ंत हुई और गांधी ने इसे विश्व संस्कृति को भारत की अनुपम भेंट के रूप में चिह्नित किया। रवीन्द्रनाथ का कहना था कि इसी जातिप्रथा के कारण भारत गुलाम हुआ है और आधुनिक समाज में इसका वजूद नहीं होना चाहिए। जब आम्बेडकर ने इसे लेकर नया विमर्श खड़ा किया और अपने ' अनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट ' शीर्षक वृहद् आलेख में इसकी धज्जियाँ उड़ाईं, तब गांधी इस विषय पर सतर्क हुए। जाति का जोर जन्म पर होता है और एक खास अवस्था में आकर यह वर्ण  पर टिक जाता है। वर्ण अर्थात् रंग। जब जोर रंग अथवा नस्ल पर होता है तब वह वर्ण बनने लगता है। जाति बुनियादी चीज है,जो पेशेगत समूह के रूप में एक जड़ वर्ग का रूप ले लेता है। वर्ण एक व्यवस्था है, जो समाज विकास के एक खास चरण में कुछ लोगों द्वारा गढ़ा गया और जिसे सामाजिक स्मृतिकारों में से एक मनु ने संहिताबद्ध किया। मनु की खासियत या कमजोरी यह थी कि उसने पेशा चुनने का अधिकार व्यक्ति की जगह समाज को दिया और अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न कथित वर्णसंकर समूहों को इस आधार पर विभाजित किया कि पुरुष और ब्राह्मण वर्चस्व को बल मिले। इससे भारतीय समाज में एक रूढ़ि  विकसित हुई, गतिहीननता आई। स्वाभाविक सामाजिक गतिशीलता के लिए आवश्यक होता है कि जाति और वर्ण की कड़ियाँ कमजोर हों। व्यक्ति जब पेशा बदलना चाहे तब उस पर सामाजिक दबाव नहीं हो। एक ही पेशे में जमे रहने से ऊब और गतिहीनता की संभावना अधिक हो जाती है। मनु ने उसे अधिक स्थिर करने की कोशिश की और पाबंदी लगाईं। हालांकि यह केवल मनु की परिकल्पना नहीं रही होगी। समाज पर प्रभावशाली रहे लोगों की समवेत चाहना रही होगी। मनु ने तो इसे संहिताबद्ध किया था। इससे भारतीय समाज में कुछ  जातियों का वर्चस्व मजबूत हुआ और एक सामाजिक साम्राज्यवाद की स्थिति विकसित हुई। इसे ही ब्राह्मणवाद कहा जाता है; क्योंकि मनु की संहिता से ब्राह्मणों की स्थिति समाज में मजबूत हुई थी। आज से पचास साल पहले मैंने ' मनुस्मृति : एक प्रतिक्रिया ' पुस्तक लिखते हुए इस पाखण्ड को समझने की कोशिश की थी। 


ब्रिटिश काल में जनगणना जातिआधारित होती थी। और इसके मूल में सांप्रदायिक जनगणना थी। इससे समाज अध्ययन के क्षेत्र में कुछ आंकड़े मिले, लेकिन कुछ मुश्किलें भी आईं। आख़िरी जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई। आज़ाद भारत में राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य से इसे स्थगित किया गया। मोटे तौर पर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों को तीन अलग -अलग समूहों में रखा गया और उन्हें वर्ग रूप में अभिहित किया गया। अनुसूचित जातियों का एक वर्ग है। पिछड़ी जातियों का एक वर्ग है -- अन्य पिछड़ा वर्ग। कोशिश यह थी कि सदियों से चले आ रहे जाति आधारित सामाजिक वर्चस्व को ध्वस्त करते हुए एक आधुनिक समाज की रचना हो। एक व्यक्ति एक वोट के अधिकार के फलस्वरूप विधायिका  में तो सभी तबकों की भागीदारी धीरे -धीरे दिखने लगी, किन्तु कार्यपालिका और न्यायपालिका में खास तबकों का वर्चस्व बना रहा। अन्य पिछड़े वर्गों की भागीदारी अफसोसजनक रही थी। इसके लिए ही विशेष अवसर के सिद्धांत के तहत एक समय सीमा तक केलिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था उद्देश्य पूरा होने तक चलनी ही चाहिए।


लेकिन हमारी मंजिल एक ऐसा जातिविहीन समाज ही है, जिसमें व्यक्ति की गरिमा हो, उसके समूह या जाति की नहीं। यह जाति प्रथा हमारे आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज की भावना के विरुद्ध है,अतएव इसे हमें हर हाल में यथाशीघ्र ध्वस्त करना है। उत्पादन के नए संसाधन और पूंजीवादी मान्यताएं जातिप्रथा को ध्वस्त करती हैं ,क्योंकि पारम्परिक पेशों को किसी जाति तक सीमित करने से ये इंकार करती हैं।  पूंजीवादी समाज के  समाजवादी रुझान लेने के पूर्व ही जातिप्रथा निर्मूल हो जाता है। हमारे समाज का सम्यक विकास नहीं हुआ। कायदे से पूंजीवादी समाज भी नहीं बना। लेकिन अधकचरे विकास ने भी जातिप्रथा की जड़ें हिला दी हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बहुत हद तक जाति के आधार कमजोर हुए हैं। जातियों के अंतर्गत उपजातियों की व्यवस्था लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। आज से बस सौ साल पहले के समाज को देखें तो हर जाति के भीतर एक आंतरिक वर्णविभाजन था। उदाहरण केलिए  कायस्थ एक जाति है तो श्रीवास्तव कायस्थों का ब्राह्मण था और कर्ण शूद्र। कूर्मियों के बीच अवधिया ब्राह्मण था, तो धानुक शूद्र। हर जाति में ऐसी व्यवस्था थी। आज नहीं है। उसी तरह आज की दिख रही जातिप्रथा भी अन्ततः ध्वस्त होगी।  शिक्षा का विस्तार, रोजगार के नए संसाधन और औरतों की आज़ादी जैसे -जैसे बढ़ेगी जातिप्रथा कमजोर होती जाएगी। उत्पादन के पुराने तरीके बदल रहे हैं, गाँवों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, लड़कियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। ये सब जातिप्रथा को ध्वस्त करने के कारक होंगे। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया का एक लेख है ' जाति और योनि के दो कठघरे '। इसे तो उन समाजवादियों को पढ़ लेना था,जो समाजवाद की अधिक दुहाई दे रहे हैं । लेकिन वैज्ञानिक समाजवाद की जगह जातिवादी -समाजवाद स्थापित करने की इस मुहीम पर अफ़सोस ही व्यक्त किया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दिमाग से खाली लोग जब हुक्मरान बनते हैं ,तब ऐसा ही होता है।


जातिप्रथा कमजोर हो रही है। इसे जांचने का एक तरीका बताता हूँ। साल भर तक आए विवाह के आमंत्रण पत्रों को इकठ्ठा कीजिए। फिर उनमें चिह्नित कीजिए कि कितने जातिमुक्त विवाह हैं।पांच वर्षों तक यह कीजिए। आप को पता चलेगा कि किस रफ़्तार से  जातिमुक्त विवाह हो रहे हैं। गांव कस्बों तक प्रचलन तेजी पर है। सामान्य जातियों के लोग, जो  स्वयं को ऊँची जाति मानते आए हैं आपस में घुलमिल कर, धीरे -धीरे अब अपर कास्ट बन रहे हैं। दलितों का अलग समूह बन रहा है। अन्य पिछड़े वर्गों का अलग। एक ऐसा दिन भी आएगा जब ये बड़े ढूहे भी ध्वस्त होंगे। विवाहों में अनेक व्यवधान समाप्त हो रहे हैं।उनके तरीके बदल रहे हैं। यदि हमने समान शिक्षा, समान स्वास्थ्य और रोजगार की पुख्ता व्यवस्था की ,तो एक ऐसा  समय आएगा जब जातिव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। 


लेकिन सरकार जो यह नाटक कर रही है, वह न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि शरारतपूर्ण भी है। आजकल समाज में एक नया जाति -व्याकुल समाज उभरा है। वह हर जाति का सबसे निकृष्ट तबका है। राजनीति से लेकर समाज के विभिन्न स्तरों पर ये जातिप्रथा को जीवित रखना चाहते हैं। क्योंकि इसी के आधार पर उनकी पूछ संभव है। ऐसे लोग जातिवार जनगणना से अतिरिक्त रूप से उत्साहित हैं। कुछ अधिक संख्या वाली जातियों के शातिर नेताओं को भरोसा है कि जब जाति जनगणना की रिपोर्ट आ जाएगी तब इसे बैनर बना कर कम संख्या वाली जातियों पर रौब जमाएंगे कि हमारी राजनीतिक गुलामी अथवा अधीनता स्वीकार करो। यही कारण है कि वे इसका बिगुल बजा रहे हैं।  

 मेरा आग्रह होगा कि प्रबुद्ध जन इस पर विचार करें और इस दकियानूसी राजनीति के मर्म को समझें। समान शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार गारंटी के मांग को अपनी राजनीति का केन्द्रक बनावें, तभी नया समाज बनेगा। इस जाति आधारित जनगणना से ध्वस्त हो रही जातिप्रथा को केवल बल मिलेगा।



फेसबुक वॉल से साभार।

शनिवार, 7 जनवरी 2023

बर्फवारी, हिमपात : डॉ शोभा भारद्वाज

 बर्फवारी, हिमपात

डॉ शोभा भारद्वाज 

शादी के कुछ समय बाद मसूरी स्नोफाल का नजारा देखने के लिए गये इंतजार करते रहे बर्फ तो नहीं गिरी हाँ ठंड बढ़ने लगी होटल वाले ने एक सुबह बताया मसूरी के पास धनौल्टी में रात को स्नोफाल हुआ है हम तुरंत बस में बैठ कर बर्फ का लुत्फ़ उठाने चल दिये धनौल्टी की हरी भरी पहाड़ी के पास उतर गये  वहां के लोगों ने बताया ऊपर बर्फ पड़ी है आनन्द मगन हरियाली का आनन्द लेते फोटोग्राफी करते पहाड़ी पर पहुंचे वहाँ एक मन्दिर था बर्फ पड़ी थी परन्तु उसे बर्फ बारी नहीं कहा जा सकता कई चित्र खींचे जमीन से बर्फ इकठ्ठी कर बाल बना कर इन पर मारने की इच्छा थी हाथ मे पिघलने लगी हाँ हथेलियों में उठा कर मैने चित्र खिचवाये यह मेरा मजाक उड़ा रहे थे | पहाड़ी से हिमालयन रेंज एवं बर्फ से ढकी चोटियाँ नजर आ रही थीं |

 कुछ वर्ष बाद इन्हें ईरान की पोस्टिंग मिली उसी वर्ष अक्टूबर में मेरा वीजा लग गया | तेहरान एयर पोर्ट पर उतरते ठंडी हवा के थपेड़ों ने स्वागत किया |खुर्दिस्तान में प्रवेश करते ही हवा और भी बर्फीली महसूस हुई लेकिन बस गर्म थी | खुर्दिस्तान की राजधानी सननदाज के आखिरी छोर की घाटी के अस्पताल में इनकी पोस्टिंग थी अस्पताल कैम्पस में घर था थोड़े ढलान पर रुद्खाना ( पहाड़ी नदी ) बहती थी घाटी की छटा अनुपम थी छोटे बड़े हर पेड़ों पर पत्ते सुनहरे रंग के थे इस महीने को वहाँ पाईस (पतझड़ ) कहते है था कुछ दिनों में बाद पत्ते झड़ने लगे पेड़ बिलकुल खाली हो गये, वहाँ घर खोखली ईंटों से बनाये जाते हैं दोहरी छत ऊपर से ढलाव दार घर को गर्म करने के लिए भारी लोहे की बुखारियाँ जिनमें मिट्टी का तेल जलता था पाईप से चिमनी के रास्ते धुँआ बाहर निकलता रहता , शोफाश जो फर्निस आयल से गर्मी देते थे |

अब बेसब्री से स्नोफाल का इंतजार था एक शाम मौसम में गर्मी थी बुखारी हल्की कर दी स्वेटर की जरूरत महसूस नहीं हुई |सुबह उठे कांच के दरवाजों से बाहर झांका घर के बाहर बर्फ ही बर्फ कांच के दरवाजे जाम, अस्पताल का चोकीदार बर्फ हटा कर अस्पताल एवं घर से निकलने के लिए पगडंडी बना रहा था शुक्रवार की छुट्टी थी बाहर देखा छत पर 24 इंच बर्फ की परत घबरा कर घर के अंदर आ गयी कुछ देर बाद छत से बर्फ फिसलती छपाक की आवाज आती लगातार छप- छप घर के चारो तरफ बर्फ की दीवार बनती जा रही थी दहशत लगने लगी हाय यह होती है स्नोफाल हिम युग का अहसास हुआ जैसे साईबेरिया में आँखें खोली हों बर्फ में धंसी बड़ी गाड़ी नजर नहीं आ रही थी पेड़ों की टहनियां बर्फ से ढकी थीं कुछ देर बाद फिर बर्फबारी होने लगी लगातार रूई की तरह जम कर गिर रही थी साथ ही अस्पताल , घर की छत से गिरती बर्फ की आवाजें छपाक रसोई में गयी कांच की खिडकियों पर बर्फ जमी थी बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था कुछ देर में बर्फीला तूफ़ान चलने लगा सांय – सांय की आवाजें पहले बर्फ के सीजन की तैयारी के लिए घर की खिडकियों को बंद करते समय रूई लगा दी गयी थी लेकिन कांच के बड़ें दरवाजों की संधों से बारीक बर्फ अंदर आने लगी | दूर- दूर तक केवल बर्फ पहाड़ियां भी आँख से ओझल थीं यहाँ कैसे दिन कटेंगे  ?

 नल में पानी जमा नहीं था समझ में आया चौकीदार ने नल की हल्की दार खुली रखने की हिदायत दी थी |मिट्टी के तेल से चलने वाला गीजर , एवं फ्रिज (बिजली या मिट्टी के तेल से चलता था ) चलता रहे नहीं तो बाहर रखा सामान बर्फ हो जाएगा आलू और प्याज दूध के पैकेट में दूध बर्फ हो जाएगा   गर्म पानी के बिना हाथ गलने लगेंगें हैरानी हो रही थी यहाँ के आम लोगों का जीवन कैसे चलता होगा विदेशी डाक्टर का वहाँ का निजाम ख़ास ख्याल रखता था बर्फबारी रूकी शाम हो गयी बाहर खम्बो में जलने वाली रोशनी भी रोती लग रही थी काली रात और भी डरावनी थी चारो और सन्नाटा | अस्पताल में  मजबूर इक्का दुक्का मरीज आये इन दिनों राजधानी के आसपास के गावँ शहर से कट जाते हैं उस वर्ष बेहद बर्फवारी हुई थी शाम को टीवी में मौसम का हाल सुना हमारे एरिया का टेम्प्रेचर माईन्स 18 डिग्री था आगे और गिरेगा बताया गया कई वर्षों बाद ऐसी बर्फबारी हुई है भूखे भेड़िये शहर में देखे गये हाय यह सब हमारे ही भाग्य में था |

बहुत बड़ा गर्म घर बाहर देखने की हिम्मत नहीं बाहर के कमरे में रस्सी बाँध कर कपड़े सुखाये जा सकते थे धूप निकली सोचा बाहर कपड़े सुखा दूँ बाहर गाउन बर्फ की तरह कड़ा हो गया साँस की भाफ जमने लगी भाग कर अंदर आ गयी सामने चौकीदार की बीबी हंस कर बोली थी खानम खूबी सलामती |

पहाड़ों को कन्दराओं में जमी बर्फ से पूरे वर्ष पीने का पानी राजधानी को मिलता था अस्पताल की टंकी अलग थी | 

मार्च की शुरुआत – घनघोर बारिश बिजली के कड़कने से घाटी थर्रा रही थी बर्फ पिघलने लगी पेड़ों पर नन्हे – नन्हे पत्ते डालियाँ सफेद फूलों से भर गयीं हर फूल फल था |पहाड़ों पर झरने ,झरने लगे जमीन पर लाल रंग के फूलों के बीच में अनेक रंग के फूलों के गलीचे बिछ गये बहार का सीजन था कल- कल की मधुर आवाज से रुद्खाना तेजी से बह रहा था 

बर्फबारी का दिल में डर बैठ गया था इसे देखने हमारे यहाँ के लोग पहाड़ों पर जाते है ,लेकिन अबकी बार आने वाला वर्ष बहुत सुहाना था बर्फ का सीजन आया बर्फ गिरी अच्छी लग रही थी सफेद बादलों से झरते बर्फ के फूल बाद में साफ़ नीला स्वच्छ आकाश एक अलग सा परिंदा जिसे शायद जय पक्षी कहते हैं मीठी आवाज में गाता दिखाई देता प्रकृति का अद्भुत रूप रात को चन्द्रमा  की चांदनी पहाड़ों , पेड़ों पर बने बर्फ के फूलों, जमीने पर बनी बर्फ की छोटी – छोटी पहाड़ियों पर अद्भुत छटा बिखेरती चांदनी राते छत से गिरती बर्फ की आवाज डरावनी नहीं लगती थी बच्चों ने बर्फ का गुड्डा बनाया ,एक दूसरे पर बर्फ के गोले फेके ख़ास बात वहाँ के बच्चों के साथ थोड़ी ऊंची पहाड़ी पर गिरी जमी बर्फ पर बेटी फिसलती हुई खिलखिलाती थी | कई वर्ष तक दिलकश घाटी में हम रहे बर्फ के दिनों में एक पहाड़ी पर चढ़ कर हम दूर तक नजारा देखते उसका नाम वहाँ के लोगों ने थपे डाक्टर रख दिया शायद अब भी यही नाम चलता होगा |


फेसबुक वॉल से साभार।



बुधवार, 4 जनवरी 2023

राहुल और मोदी के बहस में उलझी भारतीय राजनीति

 सर्द मौसम में जब सब घर में दुबके रहने की जुगत में हैं तो राजनीति कुछ हद तक उबाल खाकर गर्माहट पैदा कर रही है। बिहार में तो यूं भी खरमास यानि कि मकरसंक्रांति के बाद उलट-पुलट की परंपरा रही है। अब इस वर्ष परंपरा बरकरार रहेगी या कुछ नया होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है। फिलवक्त बिहार में जातिय जनगणना की शुरूआत हो चुकी है। लेकिन इस बार दिल्ली में भी सर्दी के मौसम में राहुल गांधी अपने व्यवहार से गर्माहट पैदा किये हुए हैं। यूं तो टेलीविजन चैनलों पर कपड़ों के प्रचार में ही "सर्दी में भी गर्मी" श्लोगन को प्रचारित -प्रसारित किया जा रहा है बाबजूद इसके राहुल गांधी के टी-शर्ट पर छिड़ी बहस अंत होने का नाम ही नहीं ले रही है।

क्या यह भारतीय राजनीति के लिए भी विचारणीय नहीं है कि हमलोग राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय मुद्दों/ समस्याओं पर चर्चा करने की बजाय किसी के पहनावे और रहन-सहन में ही उलझकर रह गये हैं? ऐसा नहीं है कि इस तरीके की बहसें पहले नहीं हुई है, लेकिन सच यह है कि वह प्रतीकात्मक कार्य होता था यथा- टोपी या पगड़ी, हरा रंग या केसरिया रंग। कपड़े के ऊपर या नीचे जनेऊ धारण करना, आदि।

अब किसी ने टी-शर्ट पहन ली तो उसकी शक्ति का बखान करना। उसे तपस्वी बताना, उसकी शक्ति का जागरण आदि बेतुकी बातें करना, समय की बर्बादी ही है। यदि बहस ही करनी है तो गौर करनी चाहिए कि लगभग एक दशक की एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर के नाव पर सवार होकर कौन राजनीतिक बैतरणी पार उतरने की कूबत रखता है? राष्ट्रीय पार्टी सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी या क्षेत्रीय पार्टियां नेतृत्व करने को तैयार बैठी है? साठ वर्षीय युवा नेता ही देश का नेतृत्व करने के लिए अंतिम विकल्प हैं कि कुछ तीस-पैंतीस वर्षीय युवा नेता भी अचानक परिदृश्य में नजर आ सकते हैं? जब जिंदगी में तकनीक का इतना दखल बढ़ गया है कि जिंदगी ही डिजिटल हो गई है तो शेष चीजें के प्रति संकुचित नजरिया कितना उचित है? माना कि भारत में लोगों की क्रयशक्ति इतनी बढ़ गई है कि हर महंगाई को मात देने पर आमादा है, लेकिन विचारणीय है कि इतनी कुर्बानी के बाद भी क्या देश सही रास्ते पर चल रही है? एक सामान्य आमजन अपने आप को इस माहौल में सहज सुरक्षित जीवनयापन की स्थिति में पाता है? ढ़ेरों ऐसी समस्याएं हैं जिन पर बहस किया जाना शेष है फिर राहुल या मोदी के बहस में क्या उलझना? इन्हें तो विचार करना चाहिए कि यदि राहुल गांधी में ही विकल्प दिखता है तो उनके राजनीतिक हथियार को तेज करें, उन्हें हर मोर्चे पर मोदी से बीस दिखाने की कोशिश करें न कि कपड़ा और दाढ़ी के ही महिमा मंडन में उलझे रहें। यदि मोदी इस बार भी सत्ता में काबिज होने में सफल रहे तो यकीनन एक इतिहास लिखा जाएगा कि एक से एक दिग्गज नेता भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन किन्हीं में उन्हें रोक पाने की कूबत नहीं।

- सुशील कुमार भारद्वाज 




गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

लोहा सिंह ने खदेरन की मदर से कहा, बजने दो भोजपुरिया गीत.... दीपक दक्ष

 दीपक दक्ष के लेखन में एक अजीब आकर्षण है। इस बार उनकी कलम भोजपुरिया गीत के लिए चली है लोहा सिंह और खदेरन की मदर जैसे कालजयी चरित्र के बहाने ने। आप भी गौर करें।




लोहा सिंह ने खदेरन की मदर से कहा, बजने दो भोजपुरिया गीत....

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लोहा सिंह----

अरे ओ खदेरन की मदर... तू हमरा नाक पोल पर कउवा के माफिक लोल चलाती है... अकिल की अलमारी... बुद्धि की बटलोही... ज्ञान की गगरी... चलाकी के चिलम... बजने दो भोजपुरिया गीत...


खदेरन की मदर--- 

अरे मार बढ़नी रे... पहिले दिन-  रात काबुल के मोरचा,  काबुल के मोरचा बउआते थे  अउर अब  भोजपुरिया गीत, भोजपुरिया गीत बउआ रहे हैं...सुनना है भोजपुरिया गीत त ईयर फोन लगाके सुनिए...कनखोसवा बटन लगाके...बुझाया... घर का संस्कार मत बिगाड़िये... घुटने में बुद्धि रह गया...? 


लोहा सिंह--- 

खदेरन की मदर मेरे महमण्ड को गरम मत करो...तुमको भोजपुरी मतलब  सिर्फ उहे सब बुझाता है... भोजपुरी मतलब खाली गंदे गीत होता है का....? 


खदेरन की मदर--- 

ना भोजपुरी मतलब रामायण होता है...पूरा रामायण... सीता जी कुटिया से गायब हुई थी....अउर तोहार भोजपुरी गीत सुन लइका सब रात में खटिया से गायब हो रहा है... सीता जी पुष्पक विमान पर देखी गई थी ...अउर  भोजपुरी सुन लइका सब मचान पर दिख रहा है...छि छि...लाजो नहीं लगता है... आजकल का भोजपुरी सुनने लायक है जी ? ठेला- रिक्शावाला का घर समझ लिया है  का... केतना शरम लगता है, जब टेम्पुआ में बजाता है...राम राम...ई सबको मारने वाला कोई नहीं है... भोजपुरिया समाज का मान  माटी में मिला रहा है  सब ...गायक कहलाता है और भोजपुरिया माई को गारी देता है...कानून बनना चाहिए...कोड़ा मारना चाहिए...दिमग्वे ठंडा जाएगा...


लोहा सिंह-----

ऐ फाटक बाबा !  हमको त बुझईबे नहीं करता है कि खदेरन की मदर मेम है कि मेमिन ...आप ही समझाइए... अभिव्यक्ति की आजादी कुछ होता है कि नहीं...


खदेरन की मदर-----

अरे मार बढ़नी रे... अभिव्यक्ति की आजादी  का मतलब अपना माई के गारी देना होता है का... समाज बिगाड़ना होता है का...


लोहा सिंह-----

अरे ओ अकिल की अलमारी... बुद्धि की बटलोही.... कभी दूसरा एंगल से भी सोचो... भोजपुरी वालों ने बमबईया ठसक की हवा निकाल दी है... अब गांव-गांव भोजपुरी बज रहा है... भांगड़ा के बदले भोजपुरी पर लोग झूम रहे हैं... बिआह चाहे रमुआ का हो या रोहन की... दुआरे बरियात समय बजेगा भोजपुरिए गीत...ई पंडित जी का मंत्र हो गया है... ओम नोम स्वाहा ...लॉली पॉप लागे स्वाहा...


खदेरन की मदर---

अरे मार बढ़नी रे...लाजो नहीं लगता है...गंदा गीत का पैरवी करते...?


लोहा सिंह----

अरे ओ चालाकी के चिलम ! अश्लीलता के नाम पर भोजपुरी को किनारे लगाने की कोशिश मत करो.... 


तुमको हिंदी में हम समझाता है ....सुनो


भोजपुरी गीत और भोजपुरी सिनेमा बर्बाद हो गया.... भोजपुरिया हीरो अउर आजकल के नौछटिया गायकों ने भोजपुरी का नाम डुबो दिया... यही कहना चाहती हो ना ... खूब गरिआओ ...मन भर कर गरिआओ... मैं भी तुम्हारे साथ- साथ अश्लीलता का विरोध करता हूं....

सचमुच,  इन्होंने अपने कुछ गानों से और कुछ  कारनामों से भोजपुरिया समाज का सिर झुकाया है... 


लेकिन कलेजे पर हाथ रखकर कहना कि क्या भोजपुरी सिनेमा के साथ कभी न्याय हुआ? क्या हिंदी सिनेमा के आगे हमारे समाज ने भोजपुरी सिनेमा को उस तरह  तवज्जो दिया? क्या किसी फिल्म समीक्षक ने भोजपुरी सिनेमा पर स्याही खत्म किया? हिंदी के अखबारों में भोजपुरी सिनेमा पर समीक्षा लिखी गई?  क्या पटना के सिनेमा हॉल मालिकों ने 12 से 3 भोजपुरी सिनेमा चलाने का साहस दिखाया?  कुणाल साहब भोजपुरी सिनेमा के महानायक हैं, लेकिन क्या हमारे समाज ने उनको अमिताभ वाला सम्मान दिया? 


बगैर गार्जियन का बेटा आवारा होता ही है... इसलिए हमारे भोजपुरी के नायकों में कुछ आवारगी दिखती है... लेकिन इन नायकों ने जो किया है,  वह अपने दम पर किया है... इन्हें तो डूब मरने के लिए दो दशक तक छोड़ दिया था, हमारे समाज ने... लेकिन वर्ष 2000 के बाद  भोजपुरिया युवा तन कर खड़े हो गए... और आज भोजपुरी का डंका बजा रहे...

जानती हो खदेरन की मदर, 

हिंदी फिल्मों के समर्थक  भोजपुरी फिल्मों को अश्लील मानकर ही चलते हैं... भोजपुरी शब्द सुनते ही नाक मुंह सिकुड़ते हैं ... लेकिन राज कपूर को हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा शो मैन कहते नही थकते  हैं... एक ऐसा शो मैन जो मंदाकिनी को राम तेरी गंगा मैली में सिर्फ एक साड़ी में नहाते हुए दिखाते हैं,मंदाकिनी का स्तन दिखता है... सिनेमा हॉल में सीटियां बजती है लेकिन यहां अश्लीलता नहीं दिखती... बॉबी में डिंपल कपाड़िया बिकनी में कहर ढाती हैं... मोहरा में रवीना टंडन मस्त मस्त लगती हैं... लेकिन  हिंदी सिनेमा वाले इन्हें अश्लील नहीं मानते, बोल्ड कह कर कॉलर टाइट करते हैं... भोजपुरी में पल्लू गिरा नहीं कि हीरोइन अश्लील ...फिल्म अश्लील...हीरो रोड छाप... गंवार

 तो भैया हमारे हीरो गंवार ही हैं।  गांव के गंवार .. .एक ऐसे गवार जिन्होंने नायक होने का मतलब बदल दिया है...


जी हां,  हमारा भोजपुरी का नायक सलमान की तरह मुम्बई का नहीं, गांव का है... पान की गुमटी पर पान लगाते हुए प्रेमिका के इंतजार में बैठने वाला प्रेमी है...हमारी नायिका कंगना की तरह कार में घूमने वाली नहीं... बल्कि एक कोको कोला से ही खुश हो जाने वाली है....(ये राजा छूटता पसीना.....) हमारी नायिका  दिल्ली-गुजरात- सऊदी अरबिया में मजदूरी करने वाले अपने पिया को याद करने वाली है... वह गाती है----- रेलिया रे हमरो के ओही देसे ले चल रे, पियवा बसेला जवना देस रे.... साहब !  आज भोजपुरी इंडस्ट्री ने जिस तरीके से गांव के युवकों को रोजगार दिया है... पहचान दिया है ...उसे आप इंकार नहीं कर सकते... आप तो इन्हें गंवार मानकर चल रहे थे...हैं न ? 


खदेरन की मदर---- 

अरे मार बढ़नी रे... कईसन कईसन तर्क गढ़ रहे हैं... ई कलमुहा सब देवर भौजाई के रिश्ता को बदनाम कर दिया.... रिमोट से लहंगा उठवा दिया... और का  का भयंकर भयंकर चीज करवा दिया..


लोहा सिंह-----

अरे ओ ज्ञान की गगरी! हम मानते हैं कि गंदगी फैला दिया, लेकिन अच्छाई भी देखो ...इनकी क्रिएटिविटी भी देखो.... कैसे-कैसे गीत गढ़  रहे हैं--- दिलवा ले  गइले राजा बोतल में भर के... हा हा हा


अरे ओ खदेरन की मदर कभी नजरिया फेर के तो देखो----आज के इसी भोजपुरी में मिसरी चैनल है... पुरबिया तान है... कल्पना पटवारी हैं ...चंदन तिवारी हैं... अलका पहाड़िया हैं... नीतू नवगीत हैं... मनोज भावुक हैं... मनोरंजन ओझा हैं... सत्येंद्र संगीत हैं... 


सबको एक ही लाठी मत हांको खदेरन की मदर... ई महेंदर मिसिर... भिखारी ठाकुर, विंध्यवासिनी देवी के भोजपुरी है... बुझ सूझ के बोला करो.... और बढ़िया गीत सुनल करो ... अठन्नी- चवन्नी,  टूटहा- भांगड़ा, छुरछुरी- पटाखा, हर काल में,  हर समाज में होते हैं... इसलिए उ सब को इग्नोर करो ... सुनबे मत करो... धीरज धरो, कानून बनेगा ... लफुआ सब पर सोटा चलेगा...टेंशन छोड़ बढ़िया गीत सुनो... गांव देहात के लइका सब एक से एक बढ़िया गीत लिख रहे हैं..... एगो दुगो गीत के नाम बता दे रहे हैं, सुन लेना मन हरिअर हो जाएगा.... और समझ में आ जाएगा कि आज बढ़िया गीत भी लिखा रहा है...


# नेहिया के फुलवा...

# पिया जी के मुस्की लागे लाजवाब...

# कहां बाड़ी धनिया हमार....


चलो खदेरन की मदर... इसी बात पर बजने दो भोजपुरिया गीत ...


अरे मार बढ़नी रे...


दीपक दक्ष के फेसबुक वॉल से साभार।