बुधवार, 11 सितंबर 2019

अस्मुरारी नंदन मिश्र का पत्र जनेऊ के लेखक सुशील कुमार भारद्वाज के नाम





प्रिय मित्र Sushil Kumar Bhardwaj,
सप्रेम नमस्कार!
आपका कहानी-संग्रह- 'जनेऊ' प्रकाशन से मँगवाकर पढ़ गया|
मैं पत्र के रूप में किताब पर लिखने से कुछ संकोच कर रहा था, लेकिन इस शैली में मैंने यहाँ लिखा है, तो लगा इसी रूप को अपनाया जाए|
सबसे पहले तो पहली किताब के लिए बधाई देता हूँ| पहली रचना हर किसी के लिए महत्त्वपूर्ण होती है| यदि मेरी जानकारी दुरुस्त हो तो यह रचना पहले किंडल पर आ चुकी थी, यह शायद उसी की किताब रूप में प्रस्तुति है|
“जनेऊ” संग्रह में शामिल कहानियों की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसका लोकल स्पष्ट है| आपने तथ्यात्मक जानकारी दी है, जिससे विशेष क्षेत्र के प्रति एक उत्सुकता और आकर्षण जगता है, लेकिन कहीं-कहीं ऐसा भी प्रतीत होता है, जैसे कहानी उसे छूकर निकल जाती है|
मुझे छोटे आकार की कहानी जैसे “पगली का तौलिया” अथवा “धर्म” विशेष पसंद आयी| लम्बी कहानियों में यथा ‘जनेऊ’ और ‘नंदिनी’ में कुछ बनावटीपन सा लगा|
आपकी कुछ कहानियों को पढ़कर लगता है, जैसे एक ही घटना से कई-कई कहानियाँ निकाल लेने का प्रयास हो| इस सन्दर्भ में ‘धर्म’, ‘मँझधार’ और ‘जाति बदल लीजिए’ कहानियों को देखा जा सकता है| ‘जाति बदल लीजिए’ कहानी में ‘धर्म’ और ‘मँझधार’ दोनों कहानियाँ समाहित हैं| तीनों कहानियों की नायिका का नाम सोफिया होने से ही यह बात नहीं कह रहा हूँ बल्कि चिंतन, विचार, संवाद और शैली भी एक हैं| अंतर बस इतना है कि ‘धर्म’ और ‘मँझधार’ दो कहानियाँ, जबकि ‘जाति बदल लीजिए’ दोनों को मिलाकर तीसरी| ऐसी स्थिति में बाकी दो की आवश्यकता नहीं बचती|
यही बात कमोबेश जनेऊ और नंदिनी के लिए भी सच है| ‘जनेऊ’ की ‘शिवानी’ ही ‘नंदिनी’ की ‘नंदिनी’ है| दोनों कहानियों को पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे एक विशेष सोच को साबित करने के लिए ये कहानियाँ लिखी गयी हैं| आपकी किताब के परिचय में लिखा है- “सामंती जीवन की मार्मिक कहानियाँ”| जबकि सच्चाई यह है कि यह सामंती मूल्यों के टूटने की बेचैनी की कहानियाँ है| मानो लेखक उस टूटन से दुखी है और इन कहानियों द्वारा अपनी खुन्नस निकालना चाहता हो| यदि इस विषय पर एक कहानी होती तो परिस्थिति-विशेष की कहानी मानकर उसका मूल्यांकन किया जा सकता था, लेकिन दोनों मिलाकर लेखक की सोच पर सवाल खड़े करते हैं| जनेऊ में प्रोफ़ेसर चौधरी और उनके प्रेम प्रसंग में स्पष्ट ही मटुकनाथ और जूली की छवि है| नंदिनी में भी यही प्रोफ़ेसर हैं, यद्यपि नाम वही नहीं है|
ऐसी कहानियाँ एक दूसरे रूप में “लव-जिहाद” के प्रचारित राजनीति से आतंकित नज़र आती हैं| दलित-वर्ग का आदमी सवर्ण युवती को उसी तरह फँसा लेता है| यह अनायास नहीं है कि अंतरधार्मिक प्रेम-प्रसंग में जाति और धर्म बदलने की बात मुसलमान चरित्र से कहवायी जाती है, भले ही वह स्त्री-चरित्र हो|
इस तरह से देखें तो यह कहानियाँ सामंती जीवन की ही कहानी नहीं रह जाती, बल्कि सामंती मूल्यों के सरंक्षण की कहानियाँ हो जाती हैं| इस मामले में मेरी उत्सुकता आपकी आगे की कहानियों के लिए है |
एक ज़रूरी बात यह कि भाषा में लापरवाही दिखती है| बिहारी हिंदी में जो दोष है, वह इन कहानियों की भाषा में अविरल रूप में मौजूद है| वह इस तरह भी नहीं आया है कि उसे बिहारीपन के प्रयोग के  रूप में देखें, क्योंकि फिर अन्य विशेषताएँ भी आनी चाहिए| हम जो ‘ने’ के प्रयोग को छोड़ देते हैं और ‘सीता खायी’, ‘तुम कही’ जैसे प्रयोग करते हैं, इस किताब में ये प्रयोग वैसे ही शामिल है| ज्यादातर स्त्री पात्र के साथ यह समस्या रही है- ‘आज धोखा नहीं दी होती’(जनेऊ), ‘झट से जवाब दी’(इन्तजार), जैसे ख़ूब प्रयोग हैं|
मैं कहानियों का बढ़िया पाठक अपने को नहीं मानता और न ही आलोचना की क्षमता है| ऐसा भी देखता रहा हूँ कि जिन कहानियों ने मुझे ज़रा भी प्रभावित नहीं किया, वह पूरी किताब बहु-पुरस्कृत रही| तो मेरा कहा कोई अंतिम नहीं है| आप इसपर विचार कर सकते हैं, अथवा छोड़ भी सकते हैं|
मैं आपके रचनात्मक रहने की दुआ करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आपकी आगामी कहानियाँ आपके कहानी-लेखन में ही विकास लेकर नहीं आए, बल्कि हिंदी कहानी के विकास में भी योगदान दे| धन्यवाद |
आपका-
अस्मुरारी
अस्मुरारी नंदन मिश्र


मंगलवार, 27 अगस्त 2019

प्रेमचंद की कहानी कफन और उसकी कमियाँ

प्रेमचंद का कफ़न एक अतार्किक कहानी
 -    सुशील कुमार भारद्वाज



गत दिनों यूँ ही बैठा हुआ था कि प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ने की इच्छा हुई. किताब में पहली कहानी “कफ़न” को देखकर पहले तो पन्ना उलटते हुए आगे बढ़ गया लेकिन पुनः उसी कहानी पर आकर अटक गया. और अटका तो कहानी में एक ऐसा सूत्र मिल गया जिसने एहसास करा दिया कि प्रेमचंद की यह कहानी अपनी कमियों से भरी हुई है. संभव है कि पत्रिका में छपने के लिए जल्दबाजी में कहानी वे लिख गए और त्रुटियों पर उनका ध्यान गया ही नहीं. आखिर प्रेमचंद ने घीसू के एक मात्र पुत्र माधव का ही जिक्र क्यों किया है जबकि उसके नौ पुत्र थे? और जिस पिता के नौ पुत्र हों, उस पिता का ऐसा फक्कड़ जीवन संभव है क्या? क्या प्रेमचंद का कफ़न एक अतार्किक कहानी है?
 
कफ़न प्रेमचंद की सबसे अंतिम और सबसे चर्चित कहानी है. इस कहानी में पात्रों के मनोविज्ञान के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और मानवीय पक्ष को भी प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है. इस कहानी को रंगमच पर ही सिर्फ सम्मान नहीं मिला बल्कि अनुवाद के साथ साथ इस पर टेलीफिल्म भी बनी. सबसे मनोरंजक बात है कि सर्वप्रथम कफ़न को उर्दू में लिखा गया था जो कि 1935 ई० में जामिया मिलिया इस्लामियां के पत्रिका “जामिया” में प्रकाशित हुई थी. जिसका हिंदी रूपांतरण 1936  ई० में “चाँद” में प्रकाशित हुई थी. साथ ही स्पष्ट करता चलूँ कि कहानी के आधिकारिक अनुवाद की प्रति अनुपलब्ध होने की बात कई विद्वान करते हैं. लेकिन इस बात में कोई दोमत नहीं है कि प्रेमचंद जब जामिया मिलिया इस्लामियां में भाषण देने गए थे तो ‘जामिया’ पत्रिका के लिए वहां के लोगों ने एक कहानी लिखने की अपील की थी.
तीन सौ से अधिक कहानी लिखने वाले, 31जुलाई 1880 ई० में जन्में प्रेमचंद 08 अक्टूबर1936 को इस दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए अपने जीवन के सारे संघर्षों के बीच चले गए. लेकिन उनकी सारी चर्चित सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक और मानवीय कहानियों में से सिर्फ अंतिम कहानी “कफ़न” को ही उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी मानी गई और यह कहानी सिर्फ उनकी ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानी मानी जाती है. प्रेमचंद के सम्पूर्ण कथा जीवन को कुछ विद्वान तीन तो कुछ विद्वान चार भागों में बांटकर प्रारंभ से परिपक्वता के क्रम में अध्ययन करते हैं, जबकि वे अपने सम्पूर्ण जीवन में आस्तिकता से नास्तिकता की ओर बढ़ते रहे. और अपने जीवन संघर्ष के बीच अपनी रचनाओं में आदर्शवाद पर यथार्थवाद को तवज्जो देते चले गए. बाद की कहानियों में तो यथार्थ की सिर्फ खुरदुरी सतहें ही दिखती हैं. वे कहानी –कला में कोरी –कल्पना को नकारने की बात करते हैं. जीवन और साहित्य के संबंध में जो बातें वो कहते हैं उसी में उनकी कहानी कभी कभी उलझने लगती है. कई बिंदु पर तो गोदान और कफ़न के बीच ही विरोधाभास सिर उठाने लगता है.
कफ़न विवादरहित भी नहीं है. इस कहानी पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा तो कई बार बहुत कुछ छिपा लेने की भी. कई बार दलित पात्र में सवर्ण मन को आरोपित करने की बात उठी तो कई बार गलत नियत से कहानी लिखने की बात भी.
खैर, कफ़न पढ़ते हुए पहला सवाल मन में उठा कि माधव जैसे बेगैरत आलसी की शादी बुधिया जैसे कमासुत के साथ कैसे हो गई? जो कि ना सिर्फ घर-गृहस्थी की रस्सी खींचने के लिए घर के बाहर भी देह्तोड़ मेहनत करती है और इन कामचोरों को खाना भी बनाकर खिलाती है! बल्कि सामाजिक और पारिवारिक वजह से जमींदारों या औरों के गिद्धदृष्टि का भी शिकार बनती है.
इसमें कोई शक दोमत नहीं कि 1935 के आसपास बालविवाह का ही प्रचलन सामान्य रूप से था तो बुधिया की उम्र कम ही रही होगी लेकिन माधव की उम्र का अंदाजा लगाना आसान नहीं क्योंकि घीसू अपने जीवन के साठ वर्ष आकाशवृत्ति में गुजार चुका है और माधव कितने नम्बर पर पैदा हुआ इसका कहीं कोई जिक्र ही नहीं है. अलबत्ता घीसू की पत्नी पहले ही मर चुकी है और माधव-बुधिया की जोड़ी लगभग साल भर से है.
गौतलब है कि शादी के बाद पटफेरन में भी बुधिया मायके-ससुराल के बीच आवाजाही की कि नहीं- यह भी प्रश्न के घेरे में है क्योंकि गर्भावस्था में भी कोई मायके से सुध लेने वाला नहीं आया. और मरने के बाद भी नहीं. क्या बुधिया के माता-पिता भी निष्ठुर प्राणी ही थे? कोई भी माता-पिता इतना क्रूर कैसे हो सकता है? उसमें भी तब जब सास जैसे किसी सहारा का भी नामोनिशान घर में नहीं था. क्या बुधिया माता-पिता के लिए भी बोझ के सिवाय कुछ नहीं थी?
कैसा था यह रिश्ता कि माधव को भी अपने ससुराल का कोई सुख नहीं मिला. जब घीसू ठाकुर की बारात में मिले भोजन का बखान कर रहा था तो माधव अपनी शादी या ससुराल में हुए मेहमानबाजी का भी तो जिक्र कम से कम कर ही सकता था?
अगला सवाल उठता है कि क्या बुधिया खरीद कर लायी गई थी? कोई भी माता-पिता अपने कर्मठ बेटी की शादी निठल्ले माधव से मुफ्त में क्यों करेगा वो भी ऐसे दरिद्र घर में? जिस घर (झोपड़ी) में दो-चार मिट्टी के बर्तन के सिवा कुछ भी नहीं है? और फिर घीसू-माधव ने शादी के लिए रूपये कहाँ से लाए होंगें? यह इसलिए भी कि गोदान में ही शादी में बेटी को बेचने की भी चर्चा है.
और थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि घीसू-माधव जो थे सो थे लेकिन ये भी किसी आश्चर्य से कम नहीं कि कहानी ठण्ड की रात की है और चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है. और बुधिया की प्रसवपीड़ा की तीक्ष्ण कराह झोपड़ी के बाहर गरमागरम पके आलू खाने के लोभ में बैठे घीसू –माधव के अलावे किसी को सुनाई नहीं पड़ती है. जबकि कहानी में स्पष्ट है कि यह – “चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम”. मतलब कि आसपास में चमारों के कई और घर थे. आखिर वे लोग बुधिया को क्यों नज़रंदाज़ कर रहे थे जबकि वो कमासुत थी तो स्वाभाविक है कि उसका आसपड़ोस की महिलाओं से तालमेल ठीकठाक ही रहा होगा और समय-असमय एक-दूसरे की मदद भी करते होंगें. और बुधिया तो कम से कम मधुर संबंध बनाने की कोशिश करती ही होगी ताकि सास विहीन घर में मुसीबत में कोई उसकी मदद को आगे आए? एक बात और कि गर्भावस्था जैसी नारी-कुतूहल के बीच भी उसके समाज के लोग उसमें रूचि क्यों नहीं ले रहे थे जबकि स्त्रियों का एक अलग संसार होता है जहां स्त्री-सुलभ केंद्रित बातें ही होतीं हैं और लाख दुश्मनी के बाबजूद स्त्रियां पुरूषों का निषेध कर स्वतः आगे बढ़ जाती हैं. और जिस समाज के लोग घीसू-माधव को बिना वसूली की उम्मीद के बिना भी रूपये उधार देने को तैयार रहते हैं उस समाज के लोग मानवीय मदद को भी आगे नहीं आ सकते?
माना कि सम्पूर्ण समाज ही कर्तव्यहीन और संवेदनहीन था. लेकिन घीसू के जो नौ बेटे थे वे कहाँ चले गए इस संकट की घड़ी में? आखिर प्रेमचंद ने यह सपष्ट क्यों नहीं किया कि घीसू का अपने नौ बेटों के साथ कैसा संबंध था? वे जिन्दा हैं तो कहाँ हैं? उनकी शादी हुई थी कि नहीं? उनके बच्चे थे कि नहीं? घीसू खुद स्वीकारता है कि- “मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया.”
क्या यह संभव है कि नौ बेटों का पिता अपनी साठ वर्ष की उम्र बेफिक्री में गुजार दे? उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आए? और वो मार व गालियाँ खाकर भी दूसरे के खेत से ही आलू, मटर और ऊख उखाड़ कर पेट भरता रहे? उसमें भी तब जब यह कहानी में स्पष्ट है कि- “जबसे यह औरत आई थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी.” फिर शेष बेटे और उनकी पत्नियां क्या कर रहीं थीं?
कुछ विद्वान मानते हैं कि बुधिया के पेट में पलने वाला बच्चा किसी जमींदार या अन्य का है इसलिए घीसू निष्ठुर बना उसके मरने का इंतज़ार करता रहता है. मतलब कि घीसू स्वाभिमानी है. तो फिर उसने अपने इज्ज़त को बचाने के लिए कौन-सा उपाय किया? खुद बाप-बेटा तो अक्सर मार खाता और गालियाँ सुनता ही जान पड़ता है. फिर बुधिया की अस्मत कैसे सुरक्षित रह सकता है ऐसे माहौल में? और बुधिया भी कितनी सत्यवती या पतिव्रता थी कि वह इस अमानवीय माहौल में, कठिन मेहनत और बदहाली के बीच भी जिंदगी गुजारती रही जबकि प्रेमचंद के स्त्री पात्र प्रेम में विजातीय साथी के साथ भी फरार होते रहे हैं?
मैत्रेयी पुष्पा मानती हैं कि बुधिया के पेट में पलने वाला शिशु माधव का है. संभव है कि ऐसा ही हो, क्योंकि माधव के मन में भावी संतान व पत्नी के प्रति ममत्व और अपनत्व है. वह अपने पिता की तरह संवेदनहीन होने की बजाय रोता भी है और कहता भी है- “मैं सोचता हूँ कि कोई बाल-बच्चा हुआ तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में?”
लेकिन सवाल यह भी उठता है कि प्रसव के बाद की आवश्यक सामग्री के बारे में माधव कैसे जाना? जबकि वह किसी काम का आदमी नहीं है और वह पहली बार पिता बनने जा रहा है. और दूसरी बात कि यदि उसे इसकी जानकारी थी तो वह पहले से इसकी व्यवस्था क्यों नहीं करता है जबकि- “वसूली की बिल्कुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न कुछ कर्ज दे देते थे.”
माधव घीसू की तुलना में कुछ संवेदनशील है, जिसे अपने कर्तव्य व जिम्मेदारी का अहसास है लेकिन घीसू का दुनयावी सामाजिक अनुभव उसे अपने जैसा बनने को प्रेरित करता है. बाबजूद इसके, कहानी में स्वाभाविकता से अधिक कृत्रिमता है. जब घीसू साठ वर्षों से दूसरे के खेतों से चोरी करके ही अपना पेट भरने को अभ्यस्त है तो उसके लिए नया क्या था जो गरमागरम आलू को मुंह में डालने के लालच को रोक नहीं पाता है? यदि जो लालच उसे बांधे भी रखता है तो वह पड़ोस की औरतों को बैठे-बैठे ही आवाज देने की कोशिश क्यों नहीं करता है? यहाँ तो बुधिया का कराहना ही संवाद के जरिये कहानी को आगे बढ़ाने का एक तरीका मात्र साबित होता है.
घीसू भी आलसी, निकम्मा या आरामतलबी या व्यवस्था का विद्रोही नहीं है बल्कि एक अवसादग्रस्त पात्र है, जो नकारात्मकता के बीच अपने परिवेश में भी सिर्फ नकारात्मकता को ही महसूस करता है. और अपने ही जैसे माधव को भी बनाना चाहता है. मेहनत के मूल्य को मलूकदास के सिद्धांत पर ही माधव को भी देखने के लिए प्रेरित करता है अपने मानसिक संकीर्णता में. हालांकि यहाँ सामंतों द्वारा कराये जाने वाला बेगारी और गालीगलौज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
गौरतलब यह भी है कि प्रेमचंद दलितों की अमानवीयता के विरुद्ध सामंतों के सामाजिक, नैतिक व मानवीय पक्ष को उजागर करते हुए घीसू से कहलवाते हैं- “मैं कहता हूँ, उसे कफ़न मिलेगा, तू मानता क्यों नहीं?.... वही लोग देंगें, जिन्होंने अबकी दिया. हाँ, अबकी रूपये हमारे हाथ न आयेंगें.”
कफ़न में पूंजीवाद का भी असर दिखने लगा है. लोग हर मामले में किफायती होने लगे हैं. कर्मकांड आदि में होने वाले खर्च को भी कम करने की तरकीबें खोजी जा रहीं हैं तो क्या यह माना जा सकता है कि कर्मकांड का विरोध करनेवाले घोर पूंजीवादी हैं भले ही उनके बोलने का तरीका प्रगतिशील वाला हो? लेकिन घीसू गरीबी में भी दर्शन को महसूसता है – “कफ़न लगाने से क्या मिलता है?” और तर्क भी क्या खूब देता है – “जिसे जीते जी तन ढांकने को चिथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न क्यों चाहिए?”
क्या यह माना जा सकता है कि प्रेमचंद ने सहानुभूति पाने के लिए पाठकों के भावना का दोहन करते हुए पिता-पुत्र की संवेदनहीन कोरी कल्पना को देश-काल से पूरी तरह से काटकर जल्दबाजी में बिना विशेष विचार के प्रस्तुत कर दिया? क्या यह माना जा सकता है कि कहानी को जामिया में छपने के लिए लिखा गया इसलिए हर तरीके के कर्मकांड पर तंज कसने की कोशिश की गई?

 

संपर्क –sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

सोमवार, 29 जुलाई 2019

एक संस्मरण

अचानक पड़ी नजर तो मैं चौंका उस सभागार में। चौंका इसलिए कि वे इन दिनों कम ही शिरकत करती हैं कार्यक्रमों में। कोई चार-पाँच साल बाद नजर आईं थीं तो दिल के भावनात्मक तार उद्वेलित होने लगे। लगा कि पैर छूकर आशीष लें लूँ उनसे और उनके हाल समाचार पूछ लूँ। 70 वर्ष कोई कम उम्र तो होती नहीं! स्वाभाविक ही उम्र का असर उनके हौंसले को पस्त कर रहा होगा। जिम्मेदारी तो कुछ शेष है नहीं फिर भी शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा इस पृथ्वी पर जिन्हें चिंताएं किसी वजह से परेशान न करती हों।
लेकिन सारी भावनाएं कुछ ही देर में शांत पड़ने लगतीं हैं और मैं कार्यक्रम में वक्ताओं के धीर-गंभीर आख्यान को सुनने में मशगूल हो जाता हूँ। ये भी सच है कि उनसे पहली  और आखिरी बार प्रेम से सौहार्दपूर्ण माहौल में सात साल पहले बतियाया था। उस समय एक अजीब रोमांच था दिल में। उनके घर में खाए हुए खिचड़ी को वैसे ही नहीं भूलता जैसे वक्त-बेवक्त उनकी याद तरोताजा हो आती हैं।
कार्यक्रम के बाद भी उनसे बात करता इसकी संभावना न्यूनतम ही थी लेकिन मेरी निगाहों ने पूरे सभागार में ढ़ूढ़ा उन्हें जरूर। मुझ पर उनकी निगाह पड़ी तो होगी जरूर, अलबत्ता बुढ़ापे में पहचान न पाई हों, इसकी भी संभावना ना के ही बराबर है। बाबजूद इसके एक कसक रह गई दिल में दूर से ही सही देख लेने की, हाल-चाल समझ लेने की। रिश्तों का क्या है वे तो समय के साथ बनते और बिगड़ते ही रहते हैं लेकिन भावनाएं शायद किसी न किसी रूप में मौजूद ही रहती है उन चुप्पियों और संवादहीनता के बीच भी। हाँ, कभी कभी दिल पूछता है जरूर कि वर्षों बाद जब आपकी नजर मुझ पर पड़ती है तो दिल के किसी कोने से कोई आवाज भी आती है?
★★★★★★★★★★★★★★★★★
जिंदगी में रिश्ते तो बनते-बिगड़ते ही रहते हैं पर भावनाएं.....  #सुकुभा

रविवार, 7 अप्रैल 2019

सुकुभा की कविता कवि

एक कवि, दो कवि, तीन कवि।
एक कहे दूजे से- काहे का कवि?
जबाब मिले- तू कवि सो मैं कवि।

एक पूछे -तूने मेरी कविता सुनी?
चेहरा देख- आप तो मेरे प्रिय कवि।
पुलकित हो कवि-अच्छा सुनें! एक नई कविता।
धैर्य से दूजा-जी!जी! आपकी कविताएं तो बस...
वाह कविता! वाह वाह कविता! और आह कविता!
एक नज्म तरन्नुम के साथ आपकी खिदमत में मेरी भी?

कुटिलता में मुँह चमकाते -क्यों नहीं? क्यों नहीं?
बहुत खूब! बहुत खूब! आप भी मेरे प्रिय कवि।

मिलने की एक आस में, विदा होते एक-दूसरे से कवि।
फिर मिलता तीसरा कवि- आपके इंतजार में मैं कवि।
 जबाब मिला- क्या बताऊँ बीच रास्ते मिला एक अकवि!
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

मंगलवार, 5 मार्च 2019

कवि अरूण कमल की योगफल की समीक्षा शहंशाह आलम की कलम से।




सुसुम धूप में फिर से ढूँढ़ो
वही शब्द लुप्त
संदर्भ : अरुण कमल की कविताओं का संग्रह योगफल
• शहंशाह आलम

          अभी ठीक से खेत कोड़ा भी नहीं
          अभी ठीक से मिट्टी बराबर भी नहीं की
          अभी ठीक से रोपनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से पटाया भी नहीं
          अभी ठीक से पौधा उठा भी नहीं
          अभी ठीक से बालियाँ भी नहीं फूटीं
          अभी ठीक से दाने पके भी नहीं
          अभी ठीक से कटनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से दौनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से ओसाई भी नहीं हुई
          अभी ठीक से दाने चाले भी नहीं गए
          अभी तो दाने बटोरे भी नहीं गए कि
          द्वार पर आकर खड़े हैं
          वसूली वाले

          नहीं महाराज, नहीं, अभी तैयार नहीं।

अपनी पसंद के कवियों को पढ़ते हुए अकसर सोचा करता हूँ कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है। हो सकता है, ऐसा सोचना, मेरे अंदर रह रहे कविआदमी के लिए कोई अच्छा लक्षण ना हो। स्वीकार्य है, यह वाला लक्षण मेरे जैसों के अंदर होना भी नहीं चाहिए। ख़ास कर, कविता के महान कवियों को पढ़ते हुए। यह है भी, तो एक कविधर्मी होने के कारण है। यही कारण है, अरुण कमल को पढ़ा-पढ़ी के समय भी यह ख़्याल आता रहा है कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है? सोचने का यह भाव, एक सनातन भाव है, सो ऐसा सोचते रहने को कोई ख़राब गुण मैं नहीं मानता। बहुत सारे मूर्धन्य आलोचक इस गुण को अच्छा नहीं मानते। उनका मानना है, इस गुण से उनके बहुत सारे प्रिय कवि कविता की आलोचना में आने से रह जाएँगे। आलोचना का यह जड़वाद है, जिसकी वजह से आज भी बहुत सारे जेनुइन कवि उनकी आलोचना का हिस्सा बनने से रह गए हैं। समकालीन हिंदी आलोचना की यह बड़ी कमज़ोरी रही है। पहले भी, अभी भी। यह कमज़ोरी आगे भी रहने वाली है।
     हिंदी आलोचना अरुण कमल की कविता के साथ ऐसा कोई जड़ रास्ता नहीं तलाश सकती थी। दरअसल कविताई का जो गुण अरुण कमल के पास था, बहुत कम हिंदी के कवियों के पास यह गुण होता है, जिनकी कविता सिर्फ़ हिंदी कविता को नहीं, विश्वकविता को प्रभावित करे। सीधे-सीधे कहिए, तो अरुण कमल की कविता, कविता का कोई विश्वकोश अगर है, तो उसी कोश में रखी जाने वाली कविता है। अरुण कमल की कविता हिंदी कविता की ऐसी निधि है, जो भविष्य के लिए संभाल कर रख ली जानी चाहिए। यह कविता हमारे वक़्त की ऐसी कविता है, जिसमें हमारे वक़्त का ज़ख़्म भी है और मरहम भी। वक़्त कहीं ख़ामोशी में है, तो कहीं हो-हल्ला में है। तभी हाकिमे वक़्त पूँजीपतियों से हमारा सौदा करता है और ऐसे सौदे पर बिना शर्मिन्दा हुए रक़्स करता है और रक़्स करते हुए हमको ज़ख़्म देता है और अरुण कमल की कविता मरहम देती है। उनकी कविता एक लोकप्रिय सरकार के सात दिन का आस्वाद लीजिए और समझिए कि कोई हाकिमे वक़्त रक़्स ही काहे करता है बिना शर्मिन्दा हुए : ‘पहले ही दिन सरकार ने आँगनबाड़ी सेविकाओं पर लाठियाँ भाँजीं / दूसरे दिन वृद्धावस्था पेंशन पर पानी के फ़व्वारे / तीसरे दिन छँटनीग्रस्त शिक्षामित्रों के धरने पर कुत्ते छोड़े / चौथे दिन उजड़े झोंपड़वासियों पर घोड़े दौड़ाए / पाँचवें दिन बेरोज़गारों के जुलूस को रौंदा / छटे दिन मूक-बधिर-नेत्रहीनों पर आँसू गैस के गोले ठोंके / सातवें दिन बालिकाहत्या का विरोध करतीं औरतों पर गोलियाँ दागीं / और सात को मौक़े पर ढेर किया / सबने स्वर से गाया / ऐसी लोकप्रिय न्यायप्रिय / देवानाम प्रिय प्रियदर्शी सरकार / धम्माशोक बाद कभी नहीं आई / कभी नहीं / नहीं।’ इस कविता के बाद एक और कविता माननीय के नाम सन्देश भी लीजिए और मेरे कहे का अर्थ निकालिए : ‘माननीय / आज इस ऐतिहासिक प्राचीर से / मैं, भारत का एक नागरिक / स्वाधीनता दिवस की पूर्व वेला में / आपको सम्बोधित कर रहा हूँ / और आपसे पाँच प्रश्न करता हूँ - / पहला, आपका ख़र्चा कौन चलाता है? / दूसरा, कौन-सी शक्ति है आपके पास? / तीसरा, यह शक्ति आपको कहाँ से आती है? / चौथा, आप यह शक्ति किसके हित में प्रयोग करते हैं? / और पाँचवाँ, आपकी अन्तिम इच्छा क्या है? / जय हिन्द!’

     अर्थ निकालने में कोई कठिनाई आ रही हो, तो सारे अर्थ मैं ही उद्घाटित कर देता हूँ। दोनों कविताओं का अर्थ सीधे-सीधे यही है कि अरुण कमल की कविता पढ़ते-गुनते-सुनते समय ऊपर-ऊपर शीत लगती है, तो इसके नीचे-नीचे बहती हुई धाह ऐसी है कि इससे निकलने वाली लपट किसी ज्वालामुखी के ताप से कम नहीं। यह कविता औरों की कविता से पृथक् इस मायने में है कि कवि ख़ुद अपनी कविता को ‘नीचे धाह ऊपर शीत’ कहता है और हमेशा की तरह कवि सच कहता है। बिना किसी लाग-लपेट के कहता है। तभी अरुण कमल की कविता काल-बोध की कविता है। तभी इनकी कविता कवि के जी रहे भारी दिनों का आख्यान है। आख्यान भी कैसा, जिसे कोई माननीय पढ़ ले, तो उसके होश उड़ जाएँ। सच ही तो है, कौन माननीय है, जो कविता में ख़ुद के विरुद्ध फैल रही इस लपट को, इस लौ को, इस अग्निशिखा को सह पाएगा, कोई नहीं। सहेगा वही, जो घाम वाले दिनों को सहकर जनता का सच्चा सेवक बना होगा। ख़ुद को ऊँचा उठाने की बजाय देश की जनता को ऊँचा उठाने की चाह लिए संसद या  राज्यसभा, विधानसभा या विधान परिषद् पहुँचा होगा। कवि का भी और मेरा भी अभिप्राय यही है कि जनता सबकुछ का आकलन करती है, आपके त्याग का भी, आपकी जुमलेबाज़ी का भी। असल कवि तो देश की असल जनता ही है बिरादर, हम तो माध्यम भर हैं, शब्द भर हैं, हम तो आवाज़ भर हैं।
     अरुण कमल की कविता किसी अँधेरी कोठरी की कविता नहीं है। यह कविता ऐसी है, जो हमेशा आदमी के दरमियाँ रहती आई है। वही आदमी, जिसको कोई योगफल निकालने नहीं आता। इन आदमियों का योगफल यानी आम आदमी के अच्छे-बुरे का हिसाब-किताब, जोड़-घटाव, लेखा-जोखा सब कवि ही करता रहता है। सच में, अगर जनता हिसाबी होती, तो देश का महामात्य जिस तरह से अपने हर भाषण में पूरी तरह निर्लज्ज उनकी इज़्ज़त-आबरू उछालता फिर रहा है, तार-तार करता फिर रहा है, ऐसे महामात्य को उसकी कुर्सी से खींचकर, उसे अपनी बस्ती लाकर उसकी लज्जा को बिना पछतावे के किसी बंदी गृह की तरह ढा नहीं देती। यह कितनी अच्छी बात है कि जनता को कवि पर इस बात का भी भरोसा है कि ऐसे नक़ली और फ़र्ज़ी महामात्य का पर्दाफ़ाश कोई कवि ही करेगा। तभी अरुण कमल देश की जनता का भरोसा अपनी कविता चलो पीते हैं चाय में बचाए रखते हैं : ‘चलो पीते हैं चाय, राजेश को बुलाते हैं / मंगलेश को, विष्णु नागर को, विजय को भी पुकार लो / सबको पुकारो, जो नहीं पीते उनको भी, शकील-वीरेन्द्र यादव / जगाओ नीलेश को, श्योराज भी तो यहीं होंगे / अरे यार, यही तो सही वक़्त है चाय का / रात है, चाँद है ढलता हुआ, हवा तेज़ / हत्यारे घूमते, फौज की गश्त, दरवाज़े बन्द / बत्तियाँ गुल, साँसें धौंकतीं / उठो-उठो मेरे दोस्त / वहाँ एक चूल्हा जल रहा है कोने में / गली के मुँह पर / एक बहुत बुढ़ी माँ वहाँ बैठी है देग में चाय उबालती / ये कैसी बेचैन भाप है जो बुला रही है — / चलो चाय पीते हैं आज इस रात के तीसरे पहर / अरे सब आ रहे हैं, ज्ञान जी आ रहे हैं इस ठण्ड में / कमाण्डर, देखो सब आ रहे हैं, अरे साथी ग़दर भी — / चलो चाय पीते हैं आज रात सबकी रात सबको पुकारे / केदार जी, चाय का पहला उल्लेख किस कवि में मिलता है / त्रिलोचन शास्त्री से पूछेंगे, चलो अभी चाय पीते हैं (सुबह की पहली ख़बर : सरकार ने चाय पर रोक लगाई)।’ या फिर : ‘प्रिय मित्र, आप ज़रा भी परेशान ना हों / आप में से किसी का नाम वहाँ नहीं है / ना तो संसद बुलाएगी काव्य-पाठ के लिए / ना राष्ट्र का प्रधान रात्रि भोज पर / मरने पर ग्यारह बन्दूक़ों की सलामी भी आपको नसीब नहीं / आपको भले ग़लतफ़हमी हो / किन्तु इस देश की सत्ता को कोई ग़लतफ़हमी नहीं / तुम्हारी जगह बाहर है, साथियो बाहर / तुम्हारी जगह उन लोगों के पास है साथियो / जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं।’

     इस लोकप्रिय सरकार का कैसा हँगामा है, कैसा झूठा प्रचार-प्रसार है। जबकि सभी दुखी हैं। सभी परेशान हैं। और राष्ट्र का प्रधान, जो मासूम लोगों की ज़ात तक का सौदा करता फिर रहा है। यह प्रधान तो सौदा करना जानता है या फिर शोर करना जानता है। हालात अज़ीयतनाक हैं, बदतर हैं, ख़राब हैं। अरुण कमल ऐसे हालात का फ़ैसला किसी और पर ना छोड़कर अपनी कविता पर छोड़ते हैं। यही कारण है कि अरुण कमल की कविता वंदना, स्तुति अथवा प्रार्थना की कविता नहीं है। वंदना है भी, तो उस सुग्गे के लिए, जो उड़ते-उड़ते मरा। वंदना है भी, तो उस इंसान के लिए, जो ठनका गिरने से राख बन गया। वंदना है भी, तो उस शव के लिए, जिसको पहचानने वाला कोई नहीं। वंदना है भी, तो उन जन-मजूर परिवारों के लिए, जिनको चाशनी में तले मालपुए मयस्सर नहीं। वंदना है भी, तो उनके लिए, जिनके घर ढह गए। अब कोई भी लोकप्रिय सरकार हो, संभव यही है, आपके जीवन का योगफल बस इतना भर हो उस सत्ता की दृष्टि में कि आप उनको वोट दें और कोई चाह मन में ना रखें। चाहत रखनी भी होगी आपके द्वारा पूरे मनोयोग से चुनी हुई सरकार से, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ रखेंगीं। झूठे समाचार बेचने वाले मालिकान रखेंगे। मक्कारी से चकाचौंध बाज़ार सजाने वाले रखेंगे। अरुण कमल को मालूम है, आपकी भूमिका इत्ती-सी है कि पाँच साल तक महँगाई का नौहा गाते रहें और बेबस होकर ज़िंदा रहें, फिर उसी सत्ता के झाँसे में आकर वोट दे आएँ, अगले पाँच वर्ष फिर रोने-धोने के लिए : ‘कितना वीभत्स है इन वृद्धों का यौन-नृत्य / के है अगला पी एम कौन कृत्य या भृत्य / उठो / चलो मेरे गुइयाँ उठो मेरे साथी उठो / वे जो मारे गए तुम्हें पुकार रहे हैं / वे हर दरवाज़ा पीट रहे हैं / वे खड़े हैं उस ओर / देखो वे रात में जगमग / जो जीवित हैं वे वंशज हैं मृतकों के।
—-

योगफल (कविता-संग्रह) / कवि : अरुण कमल / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002 / मूल्य : ₹150 / मोबाइल संपर्क : 9931443866
—-

शहंशाह आलम
हुसैन कॉलोनी
पेट्रोल पाइप लेन के निकट
नोहसा बग़ीचा
नोहसा रोड
फुलवारी शरीफ़
पटना – 801505, बिहार
मोबाइल : 9835417537

रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है



मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अनश्वर तोहफा : सुशील कुमार भारद्वाज (कहानी)

अनश्वर तोहफा
----------------------
चित्र साभार

गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है।
खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।
लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।
अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?
प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।
इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?
 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ।
अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!
बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।
सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"
-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "
वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा तो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी।
वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।
सुशील कुमार भारद्वाज