रविवार, 7 अप्रैल 2019

सुकुभा की कविता कवि

एक कवि, दो कवि, तीन कवि।
एक कहे दूजे से- काहे का कवि?
जबाब मिले- तू कवि सो मैं कवि।

एक पूछे -तूने मेरी कविता सुनी?
चेहरा देख- आप तो मेरे प्रिय कवि।
पुलकित हो कवि-अच्छा सुनें! एक नई कविता।
धैर्य से दूजा-जी!जी! आपकी कविताएं तो बस...
वाह कविता! वाह वाह कविता! और आह कविता!
एक नज्म तरन्नुम के साथ आपकी खिदमत में मेरी भी?

कुटिलता में मुँह चमकाते -क्यों नहीं? क्यों नहीं?
बहुत खूब! बहुत खूब! आप भी मेरे प्रिय कवि।

मिलने की एक आस में, विदा होते एक-दूसरे से कवि।
फिर मिलता तीसरा कवि- आपके इंतजार में मैं कवि।
 जबाब मिला- क्या बताऊँ बीच रास्ते मिला एक अकवि!
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें