सोमवार, 28 नवंबर 2022

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

 


युवा कवि रश्मि भारद्वाज की कविताएं यथार्थ को जितना बयां करती हैं उतना ही आपके मर्म को सहलाते हुए आगे बढ़ती है। जितनी कविता जिन्दगी में घूमती है उतनी ही आपकी आंखों को खोलते चलती है। आइए पढ़ते हैं रश्मि भारद्वाज की कुछ कविताएं:-



1

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कातिक चढ़े पहली बार छिदे थे कान

सुनार ने तांबे की सुई दन्न से आर पार कर दी थी 

 इससे पहले कि चीख निकलती

हाथों में थमा दी थी नानी ने गुड़ की धेली

मीठा मीठा गप्प, सब दर्द छू 

ओस लगा लेना भोर में पत्तों पर पड़ी 

सब घाव भर जाएगा 


बाद में जाना

दुनिया में होना है 

तो कान छिदवाने के दर्द से बार-बार गुज़रना होगा 

बहुत अनावश्यक , बहुत व्यर्थ 

लेकिन कुछ सुंदर की उम्मीद में 

घटती जा रही एक प्रक्रिया

गुड़ की धेली जीभ पर घुलती है

आंखें मींच क़ैद कर दिया जाता है सब पानी 

ओस पर नंगे पाँव चलते हुए

सोचती हूँ 

सब घाव ऐसे ही भरे जा सकते 

तो कितना अच्छा होता 

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रश्मि

2.

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अपने पहाड़ से पृथक हो आए सभी पत्थर

देव नहीं बने

वे जीवन में घुले हुए थे

 किसी अश्रव्य राग की तरह 

उन्होंने चुनी मृत्यु की नीरवता

एक भीड़ के गुज़र जाने के बाद भी

हाथ बांधे, नत रहे

वे मूक साक्षी हैं अपने समक्ष घटित 

 भव्यता और क्षुद्रता के 

मनुष्य की दैन्यता, 

ईश्वर की कातरता के


वे गवाह हैं ऐसे ही किसी बेहद मामूली दिन के भी

जब एक स्त्री और एक पुरूष

जिन्हें दुनिया एकांत खोजते प्रेमियों की तरह देख रही थी

अपने वर्तमान की असंख्य निर्रथक ध्वनियों के मध्य 

भविष्य से उतने ही निर्लिप्त

जितना अतीत से

सूदूर प्रदेश की यात्रा कर

अपना मौन सुन सकने चले आए थे


नवम्बर के मंद पड़ते प्रकाश में

मैं ऐसे ही समाधिस्थ पत्थरों का स्वप्न देखती हूँ

जिनकी तप्त छाती पर सिर टिकाए

एक बार मैं उनके ह्रदय के कोलाहल को सुनना चाहूंगी 

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रश्मि भारद्वाज

3.

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बीती रात, बहुत देर रात

जब उसे अपने नर्म बिछौने में होना चाहिए था

बड़े मीठे कण्ठ से वह गाती जा रही थी

मैंने कल्पना की उसके थपकते पैरों की

एक उष्ण हथेली पकड़े वह झूलती जाती होगी 

उमगती वह

गाती थी रोशनी के किसी देश की बात

शायद चाँद के बारे में

वहाँ से लाए जाने वाले धानी सपनों के बारे में

पिता ही होंगे शायद 

जो घर चलकर सो जाने की हिदायत दे रहे थे


बीती रात, बहुत देर रात

नींद हम दोनों की ही गुम थी 

बस कारण अलग थे

वह जिस झूठ को गुनगुनाती जागती जा रही थी 

मैंने अपना वह सच कहीं खो दिया था 


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रश्मि

4.

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सब अबूझ चीज़ें औचक ही मिलती हैं

मृत्यु, प्रेम और जीवन


एक मृत्यु नींद के बाद मिला है जीवन

एक दीर्घ प्रतीक्षा के बाद मिला है प्रेम 

कल कुछ भी शेष नहीं रहा

तब भी

तुम रहोगी 


जीवन संतुलन साधते रहने का व्यापार नहीं है 

कई बार नहीं हो अंगुल भर आधार

फिर भी छोड़ देना होता है स्वयं को 

एक अज्ञात विश्वास के सहारे 

किसी तरह टिके रहना जीना नहीं है

जीने के लिए उतारने होते हैं

भय और संशय के सारे कवच 

मोह और क्षोभ के अधिकांश केंचुल


बार- बार मरती रहोगी इसी एक जीवन में

तो मृत्यु के लिए क्या शेष छोड़ जाओगी


रश्मि!



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