रविवार, 21 मई 2017

दूसरा शनिवार पर नरेंद्र कुमार की रपट

दिनांक 20.05.2017 शनिवार, शाम 5 बजे। पटना में सीजन का सबसे गर्म दिन―तापमान 42.2℃ था। ऐसी गर्मियों में जब महा जनकवि बिना वातानुकूलित हॉल के किसी भी गोष्ठी का निमंत्रण स्वीकार नहीं करते, हमलोग खुले वातावरण में गाँधी मैदान की गाँधी मूर्ति के पास कवि राकेश प्रियदर्शी को सुनने के लिए उपस्थित थे। संजय कुमार कुंदन, भावना शेखर, राजकिशोर राजन, प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, समीर परिमल, डॉ सुजीत वर्मा, रामनाथ शोधार्थी, हेमंत दास 'हिम', कुमार पंकजेश, शशांक, अमरनाथ झा एवं नरेन्द्र कुमार 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में सम्मिलित हुए। भावना शेखर की उपस्थिति गोष्ठी की उपलब्धि रही। कवि राकेश प्रियदर्शी ने 'पिता का चश्मा', 'एक युग का अवसान', 'नदी', 'कागज बिनता बच्चा', 'इतिहास' (मगही एवं हिंदी), 'जहाँ प्रेम तड़प रहा है', 'लोमड़ी', 'पालतू कुत्ता' (मगही एवं हिंदी), 'मुक्तिपथ', 'मछली', 'घास और बकरी', 'साँप', 'हर्ष-विषाद' एवं 'असफ़लता' शीर्षक वाली कविताएं सुनाई।


राकेश प्रियदर्शी को सुनना जीवन को सुनना था। कवि की सरलता एवं सहजता उनकी रचनाओं में पिरोई हुई थी, पर भाव एवं अर्थ में कई गूढ़ बातें उद्घाटित कर रही थीं। कविता-पाठ के उपरांत कुमार पंकजेश का कहना था कि कवि की रचनाएं सरल एवं सुगम हैं। इन्हें सुनने के लिए कोई माथा-पच्ची करने की जरूरत नहीं पड़ती। सुनने के उपरांत श्रोताओं के मन में अपना बिंब छोड़ जाती हैं। कविताओं में आम आदमी की तकलीफ है तथा कई कविताएं व्यंग्य शैली में लिखी गयी हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं। हिम दास 'हिम' का मानना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं लोकभाषा में मुखर होती हैं। पालतू कुत्ता शीर्षक वाली कविता व्यंग्यात्मक शैली में बहुत असरदार है। वे रचनाओं में मुहावरों का प्रयोग करते हैं तो कई मुहावरे गढ़ भी लेते हैं। रामनाथ शोधार्थी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सभी कविताएं अच्छी लगीं। शब्दों का चयन एवं संयोजन बेहतरीन है तथा कविताएं अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं।



संजय कुमार कुंदन ने दूसरा शनिवार का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राकेश प्रियदर्शी जैसे लो-प्रोफाइल कवि को एकल-पाठ के लिए चुनना सार्थक रहा। कवि जितने सीधे एवं सरल हैं, कविताएं भी वैसी ही दिख रहीं हैं पर असीम गहराई लिए हुए है। बिंबों का अद्भुत प्रयोग उनकी कविताओं में है। समीर परिमल कविता-पाठ से सन्तुष्ट दिख रहे थे। उनका कहना था कि सहज-सुबोध कविताएं प्रभावित कर गयीं। प्रत्यूष चन्द्र मिश्र ने कहा कि इतना सहज-सरल कवि आज के साहित्यिक समाज में हाशिये पर क्यों है जबकि कवि का दो संग्रह आ चुका है। कविताएं प्रचलित फॉर्मेट में रची गयी हैं तथा लयात्मकता इनकी विशेषता है। भावना शेखर ने दूसरा शनिवार में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की तथा कविताओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सरल-सुबोध कविताएं समय के माकूल हैं तथा समाज की समस्याओं  को हौले-से छू जाती हैं। इन कविताओं में तपन है। सुजीत वर्मा ने "कविता जीवन की आलोचना होती है" उद्धृत करते हुए कहा कि राकेश जी की कविताएं सीधे मन में उतरती हैं।

नरेन्द्र कुमार ने कहा कि कवि की रचनाओं में दो तरह के भाव आये हैं। एक तरफ वे समय एवं समाज की विद्रूपता को अपने व्यंग्यात्मक लहजे में पुष्ट करते हैं, वहीं प्रेम या अन्य संबंधों पर रची कविताएं उनकी सहज एवं घनीभूत संवेदना को पूर्णता में व्यक्त करती हैं। जहाँ तक आलोचकों का ध्यान न जाने का प्रश्न है तो आज अधिकांश रचनाकारों के अपने आलोचक हैं तो आलोचकों के अपने रचनाकार। इसमें सीधे-साधे एवं इन छद्मों से अलग रचनाकारों को हाशिये पर डाल ही दिया जाता है। आलोचकों को रचनाओं में चमत्कार दिखाना होता है। शशांक ने कहा बांग्ला एवं तमिल साहित्य में रचनाकर पाठकों से सीधे जुड़ते हैं क्योंकि वे स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं। आज की कविताएं सीधे श्रोताओं तक पहुंची हैं। राजकिशोर राजन का कहना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं सहजता की साधना है और इसी कारण साहित्यिक समाज में अलक्षित रह गयी हैं।

चर्चा के उपरांत सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाएं सुनाईं। उसके बात चाय एवं बतकही का एक और दौर बिस्कोमान भवन के पास।

शनिवार, 20 मई 2017

इंतज़ार (कहानी) :सुशील कुमार भारद्वाज

इंतज़ार (कहानी)
                                    -सुशील कुमार भारद्वाज




“मैं क्यों किसी लड़की का इंतज़ार कर रहा हूँ? क्या है वो? अगर वो नज़र के सामने आ भी जाएगी, तो क्या फर्क पड़ जाएगा?” – इन सवालों को खुद से पूछकर ध्यान बटाना चाह रहा था|
पर मन था कि मानने को तैयार ही नहीं| बरबस नज़रें चारों ओर उसी को ढूंढें जा रही थी| चार – पांच बार कैम्पस में चक्कर लगा चुका| पर दिखी एक बार भी नहीं| फोन पर बोली थी कि तीन बजे तक रुके रहना मुश्किल है| इसलिए न चाहते हुए भी बारह बजे ही कॉलेज पहुँच गया| पर यह क्या? दोपहर का डेढ़ बज चुका| रास्ते पर नज़र गडाये इंतज़ार करता रहा| भूख लगी तो होटल में खाने बैठ गया, लेकिन नज़र रास्ते पर ही टिकी थी कि कहीं वह चली मत जाय|
मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि उसे देखने के लिए इतना उतावला क्यों हूँ? अगर मेरी इस बैचेनी पर किसी परिचित की नज़र पड़ जाएगी तो क्या जबाब दूँगा? कोई कुछ कहे या न कहे खुद सोचना चाहिए कि जो कर रहा हूँ – क्या वह ठीक है?
दोपहर की चिलचिलाती धूप में इंतज़ार करते करते खुद पर गुस्सा आने लगा| कैसा आवारा हूँ? जो पढाई छोड़ यहाँ उसके इंतज़ार में समय बर्बाद कर रहा हूँ? क्या जरुरी है कि वो मुझसे प्रेम करती भी होगी? हंसकर बोलना और मजाक करना तो उसकी आदत है| फोन पर वह कुछ कही नहीं – यही क्या कम है? मुझ जैसे से कोई दिल लगाने की बात कैसे कोई सोच सकती है? क्या है मेरे पास? 4 G के ज़माने में 2 G का साधारण – सा मोबाइल जो कि अपने नेटवर्क की ही तरह कभी – कभी आउट ऑफ सर्विस भी हो जाता है, जैसे आज| अभी मोबाइल ठीक होता तो कॉल नहीं भी करता, तो कम से कम फेसबुक से तो संपर्क कर ही सकता था? एक से बढ़ एक नए फैशनेबल माडल वाले बाइक के ज़माने में पुरानी स्कूटर चला रहा हूँ| किसी बड़े होटल में जाने की बात आ जाए तो बगलें झांकने लगूं|
उस दिन दफ्तर में बात बात मेंवो बोली – “आप अपने लिए एक लड़की खोज लीजिए|” उसने ये बात क्यों कही? आज तक ठीक से समझ नहीं पाया| पर अपने मुंहफट आदत के कारण कहा –“आप ही खोज दीजिए न! वर्ना मुझे तो मिलेगी ही नहीं|”
बोलने को तो बोल दिया पर मन ने कहा –“आप को छोड़ मैं किसे खोजने जाऊँ?”
खुद को हंसी का पात्र बना उससे रोज पूछने लगा –“कोई मिली क्या?” और वह रोज खोजने का बहाना बना टाल जाती थी| गोया रोज बातचीत शुरू करने का एक मंत्र मिल गया| एक दिन बोली –“कल आपको उसका नाम बताउंगी|” दिल में खुशी के गुब्बार फूटने लगे| बस इसी कल्पना में दिन बीत गया कि कल जब वो मुझसे अपने प्रेम का इजहार करेगी तो क्या होगा ? कैसे वो अपने झिझक को तोड़ कर पहली बार कहेगी? मैं क्या करूँगा? उसके हाथों को कसके थाम लूँगा? नहीं, बिल्कुल नहीं| थोडा मजा तो उसे भी जरुर चखाऊंगा| बहुत मुझे परेशान की| थोडा तो उसे जरूर तडपाउंगा| हाँ, इतना तो मुझे भी हक है| ...... अरे उसे तो किसी और लड़की का नाम बता कर जलाऊंगा भी| मैं कोई कम हूँ| बहुत नखरे दिखाई अब थोडा मुझे भी झेले|
अहले सुबह दफ्तर में काफी पहले ही पहुँच गया| थोडा माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करने लगा| कुछ भी नया नही था| वही टेबल, कुर्सी, कंप्यूटर, और ताजे समाचारों की झलक दिखलाती टेलीविजन | लोग भी तो वही थे| लेकिन पता नही क्योंकर तो सबकुछ नया नया लग रहा था| उसका इंतज़ार करता रहा| और जब आयी तो उसके पीछे ही पड़ गया| लेकिन ढलते दिन के साथ दिल बैठता ही चला गया| मेरे सारे सपने एक एक कर टूटते चले गए| वो किसी का नाम नही बतायी| समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ? फेसबुक से भी सवाल पूछ लेने की इच्छा हुई लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया? जब वो लिफ्ट में चढ गयी तो मन के वशीभूत हो बाबला की तरह उसके पीछे चला गया| और अपने दारुण स्वर में पूछ बैठा –“नाम बताने में कितना समय लीजिएगा?” और वो गर्दन हिलाते हुए बोली – “अभी मिली ही नहीं है|” होठों पर हलकी सी हंसी नाच गयी और दिल से आवाज आयी –“किसको इतना बड़ा बेबकूफ समझ रही हो| मैं तुम्हारे हामी के इंतज़ार में तड़प रहा हूँ और तुम हो कि .......” फिर मन को संयमित कर सख्त स्वर में बोला –“आप जाइये| कल मैं आपको उसका नाम बताऊंगा|” – शायद इसके सिवा कोई चारा भी न था| शायद उसे भी मेरे मुँह से हाँ सुनने का इंतज़ार था|
लेकिन अंदर से एक आवाज आयी – “खुद पर हंसना बुरा नहीं है, लेकिन किसी को अपनी भावनाओं से खेलने देना समझदारी का काम नहीं है|” फिर इन सारी बातों से दूर रह अपने काम पर ध्यान देना ही अच्छा लगा| अगली सुबह इन सब बातों से बेपरवाह हो मैं अपने कागजों में उलझा था| तभी पीछे से आकार मेरे हाथ से कलम छीन कर बोली –“क्या बात है? बहुत व्यस्त हैं?” उसके चेहरे पर नजर पड़ी तो उसकी भाव – भंगिमा देखकर मन अंदर तक गुदगुदा गया| इच्छा हुई कि कहूँ – “तडपाने के सिवा कुछ आता भी है या बस ......? लेकिन कहा कुछ नहीं| चुपचाप अपने काम में फिर लग गया|
“बहुत नाराज हैं क्या?” – कान से उसकी आवाज टकरायी| झटके से उसके चेहरे पर नज़र पड़ी और उसके आँखों में देखने लगा| मन में बुदबुदाने लगा – “तो क्या आपको मेरी भी चिंता है| यदि हाँ तो फिर क्यों नहीं खोल रहें हैं अपने दिल के दरवाजे? सिर्फ जले पर नमक छिडकने आयी है? कमाल पर कमाल किये जा रही हो| अपने मजनू से उसके लैला का नाम पूछ रही हो? आखिर क्यों?”
“आप बोल रहे थे कि आज आप अपने प्रेमिका का नाम बताएँगे| मैं कब से आपके मुँह से  उसका नाम सुनने को बैठी हूँ और आप हैं कि ....” उसकी पतली सी आवाज उसके होठों से निकली| जी में तो आया कि उसे तड़पने को छोड़ दूँ| लेकिन मुझसे संभव ही कहाँ था| खुद तो खुजली हो रही थी| और पता नहीं कहाँ से तो हिम्मत आ गयी? और मैंने एक कागज पर लिख दिया – “एन.आर”| देखते ही देखते उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्की-सी छाया दिख गयी – मतलब नंदिता रानी | परंतु जिसका मुझे डर था वही हुआ| वह तुरंत हंस कर नंदिनी और रजनी का नाम लेने लगी, जिसका कोई मतलब न था| फिर भी मैंने कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा| इंतज़ार करता रहा कि शायद कभी वह सीरियस होगी| लेकिन उसके लिए यह सब, शायद मजाक से ज्यादे कुछ था ही नहीं| हंसी मजाक का यह दौर कुछ और खींचता उससे पहले ही एक मीटिंग की खबर आ गयी|
यह मीटिंग नहीं एक वज्रपात था, जिसकी उम्मीद हममें से किसी को नहीं थी| महज पांच मिनट में हमलोग समझ गए कि तत्काल प्रभाव से कंपनी बंद हो रही है| जिस बड़ी कम्पनी ने इसे ख़रीदा है वे अपने अनुसार लोगों को काम पर रखेंगें| फिर तो सबके चेहरे का रंग ही उड़ गया| कोई नयी नौकरी की तलाश में जुट गया तो कोई फिर से आगे की पढाई करने कॉलेज की ओर चल पड़ा| जीवन में आगे बढते रहने के सिवाय कुछ है नहीं और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हमेशा कुछ न कुछ डिग्री या अनुभव हासिल कर सबसे अलग दिखने की कोशिश न की तो बेरोजगारों के लाइन में आ कर सरकार और सिस्टम को गाली देकर भरास निकालते रहिए| उससे मिलेगा तो कुछ नहीं बस अपनी जिंदगी को बर्बाद करते रहिए. खैर कुछ दिनों तक, लोग मोबाइल और फेसबुक से संपर्क में रहे, लेकिन धीरे – धीरे दूरी बढ़ता ही चला गया| फुर्सत नहीं है भैया| रोजी –रोटी है तो हँसी-मजाक, प्रेम सब अच्छा लगता है और लोग भी मिल जाते हैं वर्ना....  वैसे निठ्ठलों की जमात चाहिए तो बात अलग है|  
अरसे बाद यूँ ही एक बार उससे फेसबुक पर बात – बात में पूछ लिया – “मुझे क्योंकर कोई याद रखेगा?” झट से जबाब दी –“अपनों को भी कोई भूलता है क्या?” दिल को सुकून मिला| चलो कम से कम अपनेपन का एहसास तो है| फिर भी दिल के एक कोने में कुछ कचोटते रहता था| और एक बार यह सोचकर फोन किया कि अब बेबजह में उसे क्यों तंग करूँ? अंतिम बार साफ़ – साफ़ बता देता हूँ कि  -“मैं आपको पसंद करने लगा इसलिए बात कर लेता था| फिर न  कभी फोन करूँगा न ही दिखूंगा और न ही फेसबुक पर मैसेज करूँगा|” अंतिम बार मिलने के इरादे से हिम्मत कर मिलने की बात कहीं तो पटना कॉलेज में ही आ जाने की बात कही|
पर शायद वो मुझसे वास्तव में मिलना ही नहीं चाहती हो| फेसबुक पर प्यार के इजहार और और इंकार में वक्त ही कितना लगता है? शब्दों में थोड़ी सख्ती आयी नहीं कि कब आपका परवान चढ़ता प्रेम ब्लाक हो जाय कहा नहीं जा सकता| इसके चक्कर में कम लोगों ने जान गँवाई है जो इस पर विश्वास किया जाय? क्या पता? उसकी नज़र मुझ पर पड़ी हो और चुपके से घर चली गयी हो? या फिर आयी ही न हो? दिल में एक ही इच्छा बार – बार हो रही थी – काश! एक बार दिख जाती| दिल को मनाने की हर संभव कोशिश करता रहा| पर दिल उसे देखने को बेक़रार था| दिन के दो बज चुके| दरवाजे में तालें लटकने लगे| फिर भी आँख और पैर कॉलेज की ओर ही बढे जा रहे थे| मिलने की सारी उम्मीदें समाप्त हो रही थी| कंठ भर आया| आंसू निकलने को ही थे, तभी आंसू को पीछे धकेल मन से धिक्कार की एक लपट उठी– “कैसा बदनसीब हूँ कि किसी से मिलने के लिए इतना बेक़रार हूँ| और वो है कि दिख ही नहीं रही है| मन बार – बार ईश्वर से प्रार्थना करने लगा – “हे भगवान! आज तक मैंने यदि एक भी अच्छा काम किया है तो उससे मिलवा दे| मैं कुछ अनुचित तो नहीं मांग रहा? दूर से ही सही उसकी एक झलक दिखला दे|”
निराशा में भाषा भवन के कोरिडोर के पास वाली पायदान पर बैठकर क्रिकेट देखने लगा| लेकिन क्रिकेट का कोलाहल भी मन को अपनी ओर नहीं खीच पा रहा था| कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कौन आउट हुआ और किसने बौलर की छक्के –चौके से बखिया उधेड़ दी| अचानक एक विचार दिमाग में आते ही होठों पर थिरकन होने लगी| यही वह कॉरिडोर है जहाँ फ़िल्मकार सत्यजीत रॉय ने अपने फिल्म “अभियान” की शूटिंग की थी| जहाँ मैं बैठा हूँ, यहीं कहीं पर नायक की मुलाकात नायिका से हुई थी| कितना विचित्र है न? फिल्म में नायक एवं नायिका की मुलाकात हो जाती है, लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता है|
 तभी एक आवाज ने ध्यान भंग किया| लगा किसी के सैंडिल के चलने की खट – खट की आवाज है, शायद पीछे से कोई गुजर रही थी| आवाज धीरे धीरे तेज होती जा रही थी, और उस आवाज के साथ बढती जा रही थी मेरी धडकन| खुद को रोक न सका तो पीछे मुड़ा, एक लड़की जा रही थी| लगा शायद नंदिता ही जा रही है| आवाज देना चाहा पर डर गया कि कहीं कोई दूसरी लड़की हुई तो बेमतलब का बबाल हो जाएगा| पर ज्यों – ज्यों वह आगे बढती जा रही थी त्यों – त्यों दिल भारी होता जा रहा था| ऐसा लगा जैसे कि नंदिता पास होकर भी दूर होती जा रही थी| यदि इसे रोका नहीं तो शायद बहुत देर हो जाएगी| खुद को बहुत जब्त करते हुए बोला – “हल्लो!”

पर वह लड़की मेरी आवाज से अनजानी आगे बढती रही| कोई उपाय नहीं सूझ रहा था| इच्छा हुई दौड कर उसे रोक लूँ लेकिन हाथ मलने और आँख भीचने के सिवा कुछ न कर पा   रहा था| हमेशा भागने को तैयार रहने वाले पैर हिलने को तैयार नहीं थे| अचानक मेरे मुँह से एक जोर की आवाज निकली – “नंदिता”| समझ में नहीं आया क्या हो गया? अंदर तक डर गया| इस बार वो लड़की रुक गयी, और अपने लंबे बालों को झटकते हुए पीछे मुड गई| मैं अवाक् रह गया, काटो तो खून नहीं| गुलाबी सलवार सूट में खुले बालों वाली वो लड़की कोई और नहीं नंदिता ही थी| वो सिर्फ मुस्कुराये जा रही थी| वह मेरे पास आ गयी| मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? मैं पागल की तरह उसे सिर्फ एक टक देखता रहा| उसके कहने पर फिर मैं वहीं पायदान पर उसके साथ बैठ गया, और वह इधर उधर के सवाल मुझसे पूछे जा रही थी| मैं उत्तर दिए जा रहा था लेकिन मेरी नज़रें उसके चेहरे पर जमी हुई थी| उसके चेहरे पर छाई खुशी को तलाशने की कोशिश करता रहा ताकि यह जान सकूँ कि दोनों तरफ एक ही भावना संचारित हो रही है या बस यूँ ही ..... | लेकिन मेरा ध्यान तभी भंग हुआ जब हाथ में किसी चीज के छुअन का एहसास हुआ| नंदिता मेरे हाथों को अपनी हथेली से कसने की कोशिश कर रही थी| थोड़ी देर के बाद एहसास हुआ कि लोगों की निगाहें हमलोगों पर जमनी शुरू हो गई| तो खुद को संभालते हुए वहां से हटने के इरादे से बोला – “आपको देर हो रही होगी चलिए, आपको आगे तक छोड़ आता हूँ| इधर – उधर देखने के बाद वह अपनी हाथ पीछे खीच ली, नज़रें नीची की ओर झुकी हुई थी| फिर हम लोग बाहर कि ओर चल पड़े| गप्प करते हुए लोगों के कारण अलग – अलग चलने की कोशिश कर रहे थे| लेकिन बार बार नजदीक आ ही जा रहे थे| चलते चलते मेरे मुँह से निकला- “आपके शादी की तैयारी चल रही होगी ना?” वह झटके से मेरी ओर देखने लगी| मैं थोडा डर गया| थोड़ी देर बाद वह कुछ बोले बगैर चुपचाप चलने लगी| ऑटो के आते ही वह उसमें मुस्कुराते हुए बैठकर चली गई और मैं उसे जाते हुए देखता रह गया कि उसके मुस्कुराहट में इजहार था या इंतज़ार करने का जबाब?   

बुधवार, 17 मई 2017

उषाकिरण खान का संस्मरण

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान हिन्दी और मैथिली साहित्य में एक महत्वपूर्ण नाम है। कहानी, उपन्यास के साथ -साथ वे अन्य विविध क्षेत्रों में भी ससमय दखल देती रहती हैं। पिछले दिनों उनके फेसबुक वॉल पर एक संस्मरण नजर आया जिसमें उन्होंनें भारतीय संस्कृति में जबरदस्त पैठ बनाये पर्दा -प्रथा का जिक्र किया है। आप भी पढ़कर देखें। पसंद आएगी।


१३मई कावह दिन तूफ़ानी  था सन १९६८ में तुहिन और मेरे भतीजे सोमू का मुण्डन बाबा वैद्यनाथ धाम में होने वाला था । मैंपटना में थी तनु के जन्म की तारीख़ तय थी ऐसे में बाबा का फ़रमान कि तुहिन को लेकर बाबा धाम आ जाओ पर रामचन्द्र खान साहब झींकते हुए अंशु (अनुराधा शंकर) तुहिन को लेकर चल दिये मुझे मेरे छोटे भाई विश्वेश और सहेलियों स्नेहलता तथा लीला सिंह यादव के भरोसे। दरभंगा से आनेवाली गाड़ी बरौनी जंक्शन पर  बदलनी पड़ती । पूरा हुजूम बरौनी मे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ नाश्ता पानी करने में लग गया । मेरे ससुर जी ने छोटी सी अटेची सासुजी को पकड़ाते हुए बोले-सम्हालिए कै राखू टका छै।घुटने तक घूँघट वाली सासु माँ ने रख लिया। कई बार मेरी माँ ने और ससुरजी नेकहा कि घूँघट हटाकर बैठें पर वो नहीं मानी । ट्रेन आते ही सब चल पड़े सासुमां बैठी रह गईं। तब घूँघट सरकाया देखा सारे तो चले गये ,वो रोने लगीं पर बैठी रही ।ससुर जी ने देखा अर्द्धांगिनी छूट गईं ।वो अगले स्टेशन पर उतर गये और स्टेशन मास्टर से कहकर बरौनी मे अनाउन्स करवाया कि स्टेशन पर बैठी गंगा देवी प्रतीक्षा करे उनके पति श्री बहादुर खां शर्मा आ रहे हैं।सासुजी के कान खड़े हुए । एक सिपाही आया और पूछा कि आप ही गंगा देवी हैं? आग्रह किया कि चलकर वेटिंग रूम में बैठें आपके पति आ रहे हैं । पर वो टस से मस न हुईं।ससुरजी के आने पर ही उठीं। दरअसल यह शहर की ओर उनकी दूसरी यात्रा थी।
मुण्डन वग़ैरह हुआ और रामचन्द्र जी रात में ही लौट आये ।दूसरे दिन सुबह ७बजे से कुछ आभास हुआ ।हम महेन्द्रू के पी एन सिन्हा रोड में थे वहाँ से पी एम सी एच निकट ही था। रिक्शेपर मैं गई । वहाँ मेरी क्लासमेट्स इन्टर्नशिप कर रही थीं वो पास आ गईं ।जा नरौने के साथ होंगी सो मुझे खिलाने चाय पिलाने की जुगत में भिड़ गईं । वह दिन बुद्ध पूर्णिमा का था सो स्टाफ़ गंगा नहाने चले गये थे १२ बजे तनु का जन्म हुआ जिसे हमारी सहेलियाँ सुलेखा और माला ने संभाला । साफ कर जब सामने आई तो इसे गोद लेने की होड़ मच गई सफ़ेद गहरे भूरे घने घुंघराले केशवाली ८-३० पौंड की बच्ची।
सन्ध्या ६-३० मे हम रिक्शे में बैठकर घर की ओर चले कि ज़ोरदार आँधी आई । रिक्शावाला और रामचन्द्र जी ने पकड़ कर रखा मेरे कमज़ोर हाथों में तनु दबी पड़ी थी। घर में अंशु और तुहिन उमा नामक मेड और भाई प्रतीक्षा में थे ।तुहिन तथा अंशु ने लैक्टोकेलेमाइन वग़ैरह से मेकअप किया था नये बच्चे को इम्प्रैस करने को ।

सोमवार, 15 मई 2017

बिहार वाली बस : ( सुशील कुमार भारद्वाज)

बिहार वाली बस
सुशील कुमार भारद्वाज



बस में चढा तो भीड़ बहुत थी लेकिन चढ़ना भी मज़बूरी थी. पूरे एक घंटे के इंतज़ार के बाद बस जो आई थी. मालीपुर जैसे छोटे इलाके के लिहाज से स्थिति कोई बुरी नहीं थी. ट्रक, ऑटो और जीप तो सरपट दौड़ ही रहे थे. फर्क बस इतना था कि गाडियां हसनपुर और रोसड़ा की ओर जा रही थीं और मुझे जाना था बेगूसराय.
अब सुबह-सुबह तो सबकी अपनी मज़बूरी होती है ऐसे में बस को आखिर छोड़े तो कौन? उसमें भी आज ठंढी हवा जाते हुए माघ महीने का एहसास कराने के लिए फिर से धमक चुकी है.
बस में तिल रखने भर की भी जगह न सूझती थी, पर कंडक्टर था कि न तो बार-बार गाड़ी रुकवाने से बाज आता था न ही भूसे की तरह आदमी को ठूंसने से. संयोग से बीस मिनट की धक्का –मुक्की के बाद मुझे एक सीट मिल ही गया. ओह! खुशी के क्या कहने? लगा जैसे जग जीत लिया. सारे कष्ट दूर. सच भी था कि बेगूसराय तक तो शायद ही कोई मुझे उठाने की हिमाकत करता. ठाठ से बैठने के बाद खिड़की की ओर मुंह करके हरे भरे बगीचे और खेत को देखने लगा तो देखते ही रह गया. आंखों के साथ-साथ मन को भी अजीब सुकून मिला. खेत से लगे ही आम, जामुन, लीची, बेल, कटहल, चौह, शीशम, पीपल, बरगद, ताड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. पटना में ये नज़ारे अब कहां नसीब होते हैं? जो कुछ पेड़–पौधे सड़क किनारे या यहां–वहां थे, वे भी सड़क चौड़ीकरण, पुल–निर्माण आदि के नाम पर गायब हो गए. एक कसक उठी. क्या इस हरियाली की परिकल्पना अब कंक्रीट के जंगल बने शहरों में की जा सकती है? यहां भी जो हरियाली बची हुई है वह भी कब तक बची रह पाएगी? वर्षों पहले घने बगीचे नज़र आते थे लेकिन अब यहां भी सड़क किनारे खेत तेजी से बाजार बनते जा रहे हैं. जमीन के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं. कभी ये पेड़ –पौधे घरों की शोभा हुआ करते थे. अब गाँवों में भी स्थिति बुरी होती जा रही है. अभाव के दौर में लकड़ी भी इतने महंगे होते जा रहे हैं कि गाँव के लोग भी खिड़की –कवाड़ी के लिए लोहा, स्टील या प्लाई का इस्तेमाल करने लगे हैं. अब तो गरीबों के घर में भी लकड़ी के फर्नीचर दुर्लभ-वस्तु बनते जा रहे हैं. समझ में नहीं आता कि आने वाली पीढ़ी साल, शीशम बरगद और पीपल के पेड़ सचमुच में देख भी पाएगी या फिर शहरीकरण के अंधी दौर में वह सिर्फ तस्वीरों से संतोष करके रह जाएगी? कितना दुर्भाग्यपूर्ण वह दिन होगा जब बच्चे ये पूछने को मजबूर हो जाएगें कि फल-फूल पेड़–पौधों से आते हैं कि फैक्टरी से? हंसी भी आती है खुद की बातों पर. लेकिन डर भी लगता है भविष्य की बातों से.
“मर साला मर” की तेज आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी. सिर घुमाकर देखा तो सामने सांवले रंग के एक युवक अपने तेवर में दिखा. सिर पर काली टोपी, और गले में माला और चैन गडमड थे. तैश में वह साथ की महिला पर चिल्ला रहा था– “ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा.”
एक चुप्पी के बाद, “ये साला बिहार देश नहीं सुधरेगा! देखो, दिल्ली, पंजाब और कलकत्ता में. कैसे लोग कायदे से रहते हैं? दिल्ली की बसों में इतनी भीड़ रहती है क्या? वहां दस–दस मिनट पर गाड़ी हैं, मेट्रो है. और यहां साला दो घंटे में एक मरियल–सी बस चें-पों करते हुए आवेगी और भूसे की तरह आदमी पर आदमी लाद कर ले जावेगी .... साला यहां का आदमी भी मुर्दा है. कभी कुछ नहीं बोलेगा... सिर्फ राजनीति करेगा.... इसको –उसको सबको प्रधानमंत्री बनावेगा बकिर बस सुविधा के लिए कोई नहीं बोलेगा. ट्रेन के लिए कोई नहीं बोलेगा?”
“चुप भी करिये. बस में क्यों तमाशा करते हैं?” – साथ की महिला उसे चुप कराने की गरज से कही. बच्चा बस में चढ़ गया था. आगे वाली सीट के पास ही खड़ा था. कंडक्टर से ही काहे नहीं पूछ लेते हैं कि लड़का वहां है कि नहीं?”
“साली, मैं कंडक्टर से पूछूँगा? तू खुद क्यूँ नहीं आगे जाकर देख आती है?”
“कितने जिद्दी आदमी हैं? मैं महिला होकर, इतने लोगों की कश्मकस भीड़ में अब आगे जाकर देखूं लेकिन मर्द होकर आप नहीं जावेंगें?” – चेहरे का भाव बदलते हुए गुस्से में महिला बोली.
“जादे फटर–फटर मत कर साली! तूझे अपने बेटे की नहीं पड़ी है तो मैं क्यूँ इस भीड़ में मरने जाऊँ?... तेरा बेटा है ..तू जान ...”
“क्यों इतना शोर मचा रहे हो भाई? आपका बच्चा यहीं पर खड़ा है.” कंडक्टर की आवाज आई.
“मरने दे हरामखोर को. इतनी आवाज दे रहा हूं. साला एक जबाब तक नहीं देता है.”
“अब चुप करों भाई. पूरे बस को सिर पर उठा रखा है.” – कंडक्टर ने शांत कराने के गरज से उसे डपटा.
गुस्से से तमतमाकर युवक “साला मैं अपना बच्चा खोज रहा हूं और ये बस वाला कहता है– पूरे बस को सिर पर उठा रखा हूं. हद हो गई. कहां का न्याय है? मेरा बेटा भूला जाएगा तो ये बस वाला मुझे बेटा लाके देगा क्या? ..... अपनी औकात ही भूल जाता है?.... एक मरियल बस का कंडक्टर क्या बन गया, पता नहीं खुद को क्या समझने लगा है.... यही बात दिल्ली में बोलता तो इतनी मार पड़ती कि होश ठिकाने लग जाते.......”
“बस रोको बस” – कंडक्टर अचानक तैश में आते हुए बीच में ही बस रूकवाते हुए बोला – “उतरो जी ... उतरो... दिल्लीवाली बस से ही जाना ... बिहारवाली बस तुम जैसों के लिए नहीं है.”
और एक झटके के साथ बस सड़क पर खड़ी हो गई. अच्छा खासा तमाशा बन गया. गाली-गलौज सब हो गया. सिर्फ हाथ उठना बच गया. कंडक्टर हाथ भी चला बैठता यदि जो लोगों ने बचाव नहीं किया होता. कुछ लोग उसको नीचे उतरवाने पर तुले थे तो कुछ ने मानवता दिखलाते हुए कहा –“अरे भाई, माफ कर दो, कहां बीच जंगल में छोड़ोगे? बीबी –बच्चे साथ में हैं. बेगूसराय पहुंचा दो .... अभी नया नया शहर का हवा लगा है... समय के साथ अपने ठीक हो जाएगा.”
काफी मानमनौवल के बाद बस खुली. दो लोगों ने अपनी सीट भी छोड़ दी जिसमें वह युवक अपने बीबी–बच्चे के साथ बैठ गया. उसके बाद बस में सिर्फ हल्की कानाफूसी होती रही. बस चलती –रूकती बेगूसराय पहुँच गई और बस-स्टैंड में लोग सारी बातों को भूल अपने –अपने रास्ते चले गए.


रविवार, 14 मई 2017

सआदत हसन मंटो की कहानी : खोल दो

मंटो की कहानी "खोल दो" अपने -आप में एक बहुत ही सारगर्भित  कहानी है जो एक साथ कई बिन्दुओं को रेखांकित करती है। कहानी में जहाँ काफी कुछ खुली नजरों से दिखती है वहीं बहुत कुछ ईशारों में कही गई है। याकि बचाव के पक्ष में कोई कह सकता है कि मंटों की यह सबसे बड़ी गलती रही जो शायद बहुत ही साहसी और स्पष्टवादी होने के बाबजूद कहने से चूक गये। यह सच है कि विभाजन एक दंश के रूप में उभरा था जो शायद ही किसी को प्रियकर रहा हो सिवाय राजनेताओं और बलवाइयों और लूटेरों के। राजनेताओं को गद्दी दिख रही थी तो असभ्य या जरूरतमंद मौकापरस्तों को माल-असबाब और अस्मत लूटने का एक बहाना। साम्प्रदायिकता और दंगा जैसे शब्द उन लुटेरों के लिए कितने मायने रखते हैं? प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उनको क्या स्वार्थ दिखता है यह भी गौरतलब है। निस्वार्थ भाव से कितने कार्य होते हैं मुझे नहीं मालूम लेकिन कहानी से यह जरूर परिलक्षित हो जाता है कि रजकार कितने भलमानस थे? उसे सकीना में न बेचारगी दिखी न तरस की गुंजाईश। दिखी तो सिर्फ शायद उसकी चढ़ती जवानी, जिसकी मदद तो शायद कहीं नहीं दिखती अलबत्ता उसकी पहचान ही उसके मरणासन्न तक के दुःख का कारण जरूर बन गई। वे शोषक हिन्दू थे या मुसलमान या सिर्फ बहशी दरिंदे या फिर नेक -फरिश्ते-- यह तो सिर्फ विचार का विषय है। संभव है उन रजकारों ने अपना फरीश्ताई स्वरूप कुछ लोगों को दिखाया हो लेकिन उस दंगें की आग में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के सरहद को बार-बार पार करने के बदले में वे क्या पा रहे थे ? क्या खो रहे थे शायद किसी को मालूम नहीं और मालूम था तो आवाज उठाने की हिम्मत नहीं। मरणासन्न सकीना यदि हिलती -डुलती है तो जितना मानवता शर्मसार होती है उतनी ही खुशी एक पिता को पुत्री को पा जाने की है। लेकिन क्या जिंदगी यहीं रूक जाती है? नहीं। फटेहाल पिता उसके किस किस जख्म को और किस हद तक किस रूप में भरने की कोशिश करेगा? क्या वह जिंदा बचकर भी किसी जिंदा लाश से कम है?
मंटों की यह कहानी न सिर्फ विभाजन के त्रासदी का चित्रांकन है बल्कि यह समय समय पर समाज में दिखने वाले हर विद्रूप का रेखांकन है। आज पढ़ते हैं सआदत हसन मंटो की कहानी "खोल दो"

अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए।
सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं। वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था। उसके होशो-हवास गायब थे। उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था।
गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं। तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा। ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना...सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया।
पूरे तीन घंटे बाद वह ‘सकीना-सकीना’ पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला। चारों तरफ एक धांधली-सी मची थी। कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी। सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतड़ियां बाहर निकली हुईं थीं। उससे आगे वह और कुछ न सोच सका।
सकीना की मां मर चुकी थी। उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी , जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था, "मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ।"
सकीना उसके साथ ही थी। दोनों नंगे पांव भाग रहे थे। सकीना का दुप्पटा गिर पड़ा था। उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था। सकीना ने चिल्लाकर कहा था "अब्बाजी छोड़िए!" लेकिन उसने दुप्पटा उठा लिया था।....यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब का तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुप्पटा था, लेकिन सकीना कहां थी?
सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका। क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था?- क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी?- रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए?
सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था। उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ जितने भी इनसान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी। सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की। आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे।
छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुसत हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे। आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं। सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआऐं दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है... मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी...उम्र सत्रह वर्ष के करीब है।...आंखें बड़ी-बड़ी...बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल...मेरी इकलौती लड़की है। ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा।
रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढे¸ सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी।
आठों नौजवानों ने कोशिश की। जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए। कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली।
एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी। लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया। रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे। एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया। देखा, तो बहुत खूबसूरत थी। दाहिने गाल पर मोटा तिल था। एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?
लड़की का रंग और भी जर्द हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है।
आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की। उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया। एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी।
कई दिन गुजर गए- सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली। वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला। रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे।
एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा। लारी में बैठे थे। सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया। लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला?
सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा। और लारी चला दी। सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया।
शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई। चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे। उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी। लोग उसे उठाकर लाए हैं। सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया। लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए।
कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया। कमरे में कोई नहीं था। एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी। सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा। कमरे में अचानक रोशनी हुई। सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना
डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है?
सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं...जी मैं...इसका बाप हूं।
डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो।
सकीना के मुद्रा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी। बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है-। डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।
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शनिवार, 13 मई 2017

तीन तलाक और वकीलों की नैतिकता (आलेख):राजकिशोर

गरीब से गरीब जनता के लिए न्याय की आखिरी मंजिल के रूप में जानी जाती हैं अदालतें। फिर भी सांसों को रोके हर निर्णय की ओर टकटकी लगाये ये लोग टूटने लगते हैं जब उनकी अपेक्षाओं पर कुठाराघात होता है। धन के बदौलत न्याय और अन्याय की महीन कड़ी को धूमिल कर देने के बाबजूद आखिरी उम्मीद भी यही है चाहे इसके लिए मानवता और नैतिकता तार-तार क्यों न हो जाय। और आज जब तीन तलाक पर एक खुली बहस चारो ओर छिड़ी हुई है वैसी स्थिति में तीन पूर्व भारतीय कानून मंत्री का सुप्रीम कोर्ट में एक -दूसरे के विरूद्ध बहस करना काफी कुछ सोचने को विवश करता है। और इस संदर्भ में रविवार डाइजेस्ट के संपादक राज किशोर जी का आलेख गौरतलब है। आप स्वयं पढ़कर देखें।


तीन तलाक और वकीलों की नैतिकता
राजकिशोर

तीन तलाक की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में जिस मसले पर विचार किया जा रहा है, उसका सर्वाधिक रोचक पहलू है, वकीलों की नैतिकता। इस मुकदमे में विभिन्न पक्षों की ओर से तीन पूर्व कानून मंत्री भी दलील दे रहे हैं। इनके नाम हैं – कपिल सिब्बल, राम जेठमलानी और सलमान खुर्शीद। सलमान खुरशीद इस मुकदमे में कोर्ट मित्र हैं। उनके अनुसार, तीन तलाक एक गुनाह है और यह शरीयत का हिस्सा कदापि नहीं हो सकता। कपिल सिब्बल और राम जेठमलानी के मुवक्किल तीन तलाक के पक्षधर हैं, इतः इन दोनों वकीलों की कोशिश है कि तीन तलाक की प्रथा बनी रहनी चाहिए। चूँकि तीन तलाक के मुकदमे में दो ही पक्ष हो सकते हैं – हाँ और नहीं का, इसलिए ये पूर्व केंद्रीय मंत्री दो अलग-अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यदि कोई तीसरा पक्ष भी हो सकता है, तो हो सकता है उसकी तरफ से दलील देने वाला कोई और पूर्व कानून मंत्री खड़ा हो जाता।

सामान्य वकीलों की नैतिकता के बारे में हम जानते हैं :  उनकी कोई नैतिकता नहीं होती। अदालत में वे क्या कहेंगे, यह उन्हें मिलने वाली फीस पर निर्भर है। जो उनकी फीस देने को तैयार हैं, वे उसका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे। वे इस पर बिलकुल विचार नहीं करेंगे कि जिसका ब्रीफ वे ले रहे हैं, वह अपराधी है या बेगुनाह। उनका प्रोफेशन अपनी फीस ले कर अपराधी को बेगुनाह या बेगुनाह को अपराधी साबित करने की कोशिश करना है। नाथूराम गोडसे के पास भी वकील थे, जिनका तर्क था का कि गांधी जी के हत्यारे को हत्यारा नहीं कहा जा सकता। मुंबई होटल हत्याकांड के अभियुक्त कसाब को कोई वकील नहीं मिल पा रहा था। कसाब के कहने पर बंबई हाई कोर्ट ने उसके लिए एक वकील नियुक्त कर दिया। उस वकील ने न्यायालय का सम्मान करते हुए कसाब के पक्ष में तर्क-वितर्क किया, पर चाहता तो वह भी उच्च न्यायालय से क्षमा माँग ले सकता था। नहीं तो वह कसाब को ही यह कानूनी सलाह दे सकता था कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और अदालत से माफी माँग ले। हो सकता है, तब कसाब को शायद फाँसी के फंदे पर न चढ़ना पड़ता। सब कुछ जानते हुए भी बेचारे वकील को कसाब को निर्दोष साबित करने के लिए अपने कानूनी ज्ञान और अनुभव का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि उसका पेशा यही ठहरा।

जो लोग वकालत के पेशे में हैं, वे कह सकते हैं कि हम अदालत नहीं हैं, वकालत हैं। हर आदमी को कानूनी मदद पाने का हक है। जिस तरह कोई डॉक्टर किसी घायल का इलाज करने से इस आधार पर मना नहीं कर सकता कि वह स्वयं हत्यारा है और किसी की हत्या करने के प्रयास के दौरान ही उसे यह चोट लगी है, उसी तरह कोई वकील भी ऐसे मुवक्किल की कानूनी मदद करने से मना नहीं कर सकता, जो हत्या करने के बाद सीधे वकील के चैंबर में चला आया है और जिसके हाथों पर मकतूल के खून के छींटे चमक रहे हैं। इस तर्क में खोट यह है कि हर जख्मी आदमी को स्वस्थ होने का अधिकार है। जेल में भी डॉक्टर होते हैं और युद्धबंदियों का भी इलाज किया जाता है। लेकिन हर अपराधी को एक वकील मिलना ही चाहिए, यह तर्क नैतिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।    

फिर भी साधारण वकील को उसकी इस अनैतिकता के लिए माफ किया जा सकता है, क्योंकि यह उसके पेट का सवाल भी है। लेकिन हमारे पूर्व कानून मंत्रियों को क्या हुआ है? वे क्यों एक-दूसरे का विरोध कर रहे हैं? जब वे कानून मंत्री थे, तब उन्हें निश्चित रूप से तीन तलाक प्रथा के खिलाफ होना चाहिए था। इसका एक बड़ा कारण यह है कि वे भारत के संविधान से बँधे हुए थे जो सरकार को यह निर्देश देता है कि वह एक समान निजी कानून बनाने का प्रयास रेगी। जब सभी भारतीयों के लिए एक समान निजी कानून बनेगा, तो क्या उसमें तीन तलाक जैसी घिनौनी चीज को शामिल किया जा सकता है? अब मोटी फीस पाने के बाद उनमें से कुछ की राय बदल गयी है और वे तीन तलाक का समर्थनकर रहे हैं, तो कम से कम मैं उन्हें भद्र व्यक्ति (जेंटलमैन) कहने के लिए बाध्य नहीं हूँ।
फेसबुक वॉल से साभार।

समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी राधेश्याम तिवारी की रचना "कनस्तर में गंगा" पर


              राधेश्याम तिवारी उन कवियों में हैं, जो आदतन बिना किसी दबाव के कविता लिखते रहे हैं। सच यह भी है, कविता जब जीवन से जुड़ी होगी तो उसका कला-स्तर जैसा भी होगा, मान्य होगा, इसलिए कि एक सच्चे कवि के लिए मनुष्य-जीवन हमेशा ज़रूरी होता है, महान आलोचकों की बताई हुई कला नहीं। एक सचेत कवि मनुष्य-जीवन को अधिक महत्व देगा-ही-देगा। राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के साथ अकसर यही करते हैं। कवि अपनी कविता में इसीलिए हर प्यार वाली झिड़की पाने के लिए मनुष्य-जीवन के बिलकुल क़रीब खड़ा रहता आया है। पढ़ते हैं कवि-समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी राधेश्याम तिवारी की रचना "कनस्तर में गंगा" पर।

                                                                                  'कनस्तर में गंगा' ( राधेश्याम तिवारी ) : एक ऐसे कवि की कविताएँ जो सूअर को सूअर और कुत्ता को कुत्ता बोलने का हुनर जानता है
● शहंशाह आलम

कविता को जहाँ से आना होता है, वह आती है। एक सत्य यह भी है कि कविता को जहाँ पर आना होता है, आ जाती है। यूँ कहिए कि कविता को आने के लिए कोई दिन, कोई तारीख़ अथवा कोई समय पहले से मुक़र्रर नहीं होता। अब कोई दुष्ट आदमी यह कह सकता है कि अपनी दुष्टता सिद्ध करने के लिए जब वह दिन, तारीख़ और समय वह निर्धारित कर सकता है तो कोई कवि अपनी कविता के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता। अब जो दुष्ट है, वह ऐसा ही कुछ सोचेगा। लेकिन कवि किसी कविता को आने देने के लिए ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता। कविता जब आप जागे हैं, तब आती है। आप सोए हैं, तब भी आ सकती है। और आप सोए से उठकर कविता क़लमबद्ध कर लेते हैं। अब कोई कवि देवता तो होते नहीं कि खर्राटे मारकर अपनी कविता पूरी कर लेंगे, जैसे देवता लोग खर्राटे मारते हुए भी अपना सारा काम कर लेते हैं, ऐसा देवता-कवि-प्रेमी लोगों से सुना है। हालाँकि मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि जो कवि अपने को देवता टाइप मानते होंगे, वे खर्राटे भरते हुए कविता पूरी नहीं कर लेते होंगे। लेकिन राधेश्याम तिवारी समकालीन हिंदी कविता के देवता-कवियों में नहीं हैं। अगर देवता-कवि होते तो अपने कनस्तर में गंगा को बचाए रखने की बात नहीं करते। टीन के बने कनस्तर में हम सिर्फ़ पानी भर नहीं रखते, घी, तेल, आटा आदि भी रखते हैं। आम आदमी से गहरे भावनात्मक जुड़े कवि राधेश्याम तिवारी को मालूम है कि आम आदमी के कनस्तर से घी, तेल, आटा आज की सरकारों ने कबका चुरा लिया है। अब 'नमामि गंगे' के नाम पर आज की संवेदनहीन सरकारें बची-खुची गंगा भी ग़ायब कर देंगी, इस कवि को पता है। कवि को यह भी पता है कि आज की सरकारें जब ख़ुद अपने हिस्से की सारी गंदगी गंगा में डालती आई हैं तो 'नमामि गंगे' का हश्र क्या होगा, यह हमें स्वत: जान लेना चाहिए। यही वजह है कि राधेश्याम तिवारी जैसे कोमल, विनम्र और कठोर जनता के कवि अपनी सद्य प्रकाशित कविताओं की किताब का नाम 'कनस्तर में गंगा' रखते हैं। ताकि कहीं नहीं तो जीवन को बचाए रखने वाली गंगा कवि के कनस्तर में ही बची रहेगी। यह हमारे समय का सौभाग्य है कि सरकारें जब आम आदमी के हिस्से का सारा कुछ हड़प लेने के इंतज़ार में घात लगाए बैठी हैं तो आम आदमी के हिस्से का सबकुछ कवि बचाने के जतन में लगा है। राधेश्याम तिवारी की कोशिशें और इनकी बेचैनियाँ इस बात में अधिक हैं कि इनकी कोई कविता व्यक्तिवादी न होकर उस जमात के लोगों के लिए हो, जो समय के हर हिस्से से बेदख़ल कर दिए जाते रहे हैं। मेरा ख़ुद का यही मानना है कि जो कविताएँ वंचित समाज, वंचित जन, वंचित समय के लिए लिखी जाती हैं, वे ही कविताएँ कविता-इतिहास में बहुमूल्य बनी रहेंगी :

          लुधियाना स्टेशन पर
          अगर कभी आप जाएँ
          और सामान हो कुछ ज़्यादा
          तो बिल्ला नम्बर-56 की कुली
          आपके सामने खड़ी मिल जाएगी
          भारतीय रेल के इतिहास में
          यह पहली महिला कुली है
          जिसका नाम है मायादेवी
          जो सत्ता की मायादेवियों से अलग है

          मायादेवी अपने यूनिफॉर्म में
          सुबह नौ बजे
          हाज़िर हो जाती है स्टेशन पर
          और दिन ढलते ही चली जाती है घर
          वहाँ भी उसके लिए
          बोझ कुछ कम नहीं है
          जिसे वह धरती की तरह वहन करती है
          फिर भी वह जीवन से नहीं हारी
          उसे पूरा भरोसा है
          कि उसका इकलौता बेटा
          एक दिन ज़रूर बनेगा
          रेलवे अधिकारी

          वह बेटे को पढ़ाकर
          अपने दिवंगत कुली पति का
          सपना पूरा करना चाहती है
          जो एक असाध्य रोग का
          हो गया था शिकार
          मायादेवी को अनुकंपा पर
          मिला है यह आधार
          उसे बिल्ला देते हुए
          रेलवे के बाबू को
          कुछ संशय ज़रूर हुआ था
          मगर अब उसे मायादेवी पर गर्व है

          पहले-पहल लुधियाना स्टेशन पर
          जब वह मिली थी
          तो पत्नी ने अचरज से पूछ लिया
          'क्या तुम कुली हो?'
          सामान उठाते हुए
          मायादेवी ने कहा -
          'बहन जी,
          औरत के लिए इसमें नया क्या है…!'

          उस समय लगा
          जैसे पूरी धरती लुधियाना स्टेशन हो
          और हर स्त्री मायादेवी ( 'बिल्ला नम्बर-56', पृ. 17-18 )।

     राधेश्याम तिवारी की कविताएँ दो टूक, जिसे आप खरी-खोटी कहना कहते हैं, हमारे हिस्से का जो कुछ कहना होता है, कह जाती हैं। हमारे समय के महान आलोचकों के इस बयान से बेफ़िक्र कि दो टूक कहने वाली कविताएँ अपना वास्तविक सौंदर्य खो चुकी होती हैं। अब कोई सोची-समझी कविता लिखेगा, तब न कविता के सौंदर्य को बचाने का मामला आड़े आएगा। राधेश्याम तिवारी उन कवियों में हैं, जो आदतन बिना किसी दबाव के कविता लिखते रहे हैं। सच यह भी है, कविता जब जीवन से जुड़ी होगी तो उसका कला-स्तर जैसा भी होगा, मान्य होगा, इसलिए कि एक सच्चे कवि के लिए मनुष्य-जीवन हमेशा ज़रूरी होता है, महान आलोचकों की बताई हुई कला नहीं। एक सचेत कवि मनुष्य-जीवन को अधिक महत्व देगा-ही-देगा। राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के साथ अकसर यही करते हैं। कवि अपनी कविता में इसीलिए हर प्यार वाली झिड़की पाने के लिए मनुष्य-जीवन के बिलकुल क़रीब खड़ा रहता आया है।

     राधेश्याम तिवारी बीज को बोने के बाद उसके बढ़ने का इंतज़ार करते हैं। इसी बोए हुए बीज के पास खड़ा रहकर इस धरती को सेतु बनाते हुए हर रोज़ नई सुबह का स्वागत भी करते हैं ताकि कवि का अपना भोर आए और कवि मजूर के, किसान के, दुकानदार के, कुली के, रिक्शा-ठेले वाले साथियों के पसीने की गंध से अपनी कविताओं को सराबोर कर सके। कवि इसी देह-गंध में विभोर रहना चाहता है, मस्त-मत्त रहना चाहता है। यह सब होना यहीं संभव है। आप पेड़ काटते जाएँगे, राधेश्याम तिवारी पेड़ उगाते जाएँगे। आप अँधेरा खड़े करते जाएँगे, राधेश्याम तिवारी आपके खड़े किए अँधेरे को अपने चराग़ से गिराते जाएँगे। यह कमाल यही कर सकते हैं, सो राधेश्याम तिवारी यह कमाल करते चले आ रहे हैं। तभी 'कनस्तर में गंगा' की कविताएँ हर उस आदमी की तरफ़ हाथ बढ़ाती हैं, जो मनुष्य-जीवन को किसी-न-किसी तरह बचाए रखने में विश्वास रखते हैं। आज हर तरफ़ रंजो-ग़म यानी चिंता और दुःख पसरा हुआ है। ऐसे में कविताएँ जब आदमी को सहारा देती हैं तो आदमी अपनी चिंता, अपना दुःख कुछ देर के लिए ही सही, अपने जीवन के पतझड़ के पत्तों को भुलाकर अपने शहद-से मीठे दिनों को याद ज़रूर कर लेता है : मेरा आना तो / उसी दिन तय था / जिस दिन शुरू हुई / पृथ्वी बनने की प्रक्रिया / पृथ्वी के साथ-साथ / मैं भी बनने लगा / धीरे-धीरे / तब यह पृथ्वी अग्निपिंड थी / फिर भी मैं उसी तरह बचा रहा / जिस तरह / बाघिन के जबड़े में /  दबा उसका बच्चा / लम्बे समय तक आग के साथ रहते हुए / इसी से आत्मीयता हो गई गहरी / कि आज भी उसकी गर्माहट / मुझमें मौजूद है / इससे दूर होते ही / ठंडा हो जाता है बदन / बर्फ़ की तरह / कौन जानता था / इस पृथ्वी पर / लौटूँगा बार-बार मैं / रूप बदल-बदलकर / नदी की तरह कहाँ-से-कहाँ होता हुआ / मैं यहाँ पहुँचा हूँ / लेकिन यह तो तय है / कि मेरे भीतर / सृष्टि का वह प्राणी / अभी तक जीवित है / वह पहला प्राणी भी कोई और नहीं / मैं ही हूँ / धरती के सभी मनुष्यों में / मेरी ही व्याप्ति है / यह है एक ऐसा मर्म / जिसे जान लेने के बाद / एक लगने लगी है पृथ्वी / सारी नस्लें / और सारे धर्म / करोड़ों वर्ष बीत गए / इस धरती माँ के साथ रहते हुए / आगे भी रहना है अनंत काल तक / इसी के साथ / कहना है बस यही / जब तक यह धरती रहेगी / किसी न किसी रूप में / बचा रहूँगा मैं भी / मेरे हैं सारे धर्म / सभी नाम मेरे हैं / इसीलिए यह मत पूछना / कि मैं कौन हूँ / मैं वह मौन हूँ / जिसकी अभिव्यक्ति / भाषा में संभव नहीं ( 'भाषा में संभव नहीं', पृ. 11-12-13 )।

     राधेश्याम तिवारी की कविताएँ किसी हरीफ़ के ख़िलाफ़ लिखी गई कविताएँ नहीं हैं। तब भी ये कविताएँ घुट-घटकर जी-मर रहे आदमियों की कविताएँ ज़रूर हैं। आज का पूँजीवादी, आज का सत्तावादी, आज का सट्टावादी, आज का कट्टरतावादी, आज का धर्मवादी, आज का मारकाटवादी, आज का जातिवादी, आज का शत्रुवादी समय हम कवियों की जमात को सिर्फ़ इसलिए अलग-थलग करता आया है कि हमारी जमात ऐसे किसी समय की भर्त्सना सदियों से करते आई है और इसीलिए यह जमात सदियों से वंचितों की जमात में शामिल है। यहाँ उन दरबारी कवियों के बारे में क़तई नहीं कहा जा रहा, जो सत्ता के संरक्षण में रहते हुए हमेशा ख़ुद को सुरक्षित-संरक्षित रखते आए हैं। ये वे कवि होते हैं, जिन्हें सत्ता की निंदा और लांछन और गाली झेलनी नहीं होती है। जबकि राधेश्याम तिवारी वंचित कवियों की जमात के कवि हैं यानी सत्ता की निंदा और लांछन और गाली सुनने वाली जमात के कवि हैं। इसमें संदेह नहीं। उजाड़ रास्ते के कवि-सरीखे राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के ज़रिए भटके हुए मुसाफ़िरों को बेहद उम्दा तरीक़े से रास्ता दिखाते हैं। इनके 'सागर प्रश्न', 'बारिश के बाद', 'इतिहास में चिड़िया' के बाद आया 'कनस्तर में गंगा' कविता-संग्रह की कविताएँ पहले की कविताओं से ज़रा अलग तेवर और मिज़ाज की कविताएँ हैं। ऐसा इसलिए कि इस ताज़ा संग्रह की कविताओं में कवि सूअर को सूअर और कुत्ता को कुत्ता कहने की हिम्मत किसी प्रार्थना की तरह नहीं बल्कि इस अँधेरे के जंगल में पूरी ताक़त लगाकर कहता है। कवि का यह रंगो-नूर थोड़ा जुदा है, थोड़ा अलहदा है और थोड़ा नई चमक लिए हुए भी है। 'कनस्तर में गंगा' की कविताओं के ये रंग 'शब्द-संवेदन', 'शब्द-भंगिमा' तथा 'धारा के विरुद्ध' खण्डों के माध्यम से प्रकट किए गए हैं। पहले हिस्से में चौदह, दूसरे में उनचास तथा तीसरे में तेईस कविताएँ हैं। राधेश्याम तिवारी की इन सारी कविताओं की चमक ऐसी है, इन कविताओं का मंज़र ऐसा है, इन कविताओं का विस्तार ऐसा है कि ये कविताएँ हमारी रगों में दौड़ने को बेक़रार दिखाई देती हैं। यह सच है कि कवि के आगे हमेशा खुला आसमान रहता है और कवि जो चाहता है, जब चाहता है, जैसा चाहता है धूप को अपनी क़लम से लपेटकर लिख डालता है :

          भूख  है  तो  भोजन  नहीं
          भोजन  है  तो  भूख  नहीं
          प्यास  है  तो   पानी  नहीं
          पानी  है  तो   प्यास  नहीं
          घास  है  तो  घोड़ा   नहीं
          घोड़ा  है  तो   घास  नहीं
          जिसे       नहीं       चाहा
          वह    कितना   पास   है
          जिसे      बहुत     चाहा  
          वह    मेरे  पास     नहीं ( 'वह मेरे पास नहीं', पृ. 33 )।
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कनस्तर में गंगा ( कविता-संग्रह ) / कवि : राधेश्याम तिवारी / प्रकाशक : संजना प्रकाशन, डी-70/4, अंकुर एन्कलेव, करावल नगर, दिल्ली-110090 / मोबाइल संपर्क : 08860898399 / मूल्य : ₹300


समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद, पटना-800015 / मोबाइल : 09835417537

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गलती किसकी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज


निराशा के अंधकारमय वातावरण में जो चमकती हुई चीज नजर आती है उसमें लोगों का विश्वास जमता है। उसमें वे एक रहनुमा का अक्स देखते हैं। इसी सहारे उसे एक तय वक्त देते हैं लेकिन जब वह उस उम्मीद पर खड़ा नहीं उतरता है तो वे उसे क्षमा करने की स्थिति में भी खुद को नहीं पाते हैं। आश्चर्य जैसी कोई बात यहाँ नजर नहीं आती। क्रांति की चाह सबकी होती है क्योंकि बदलाव हर कोई चाहता है पर कोई रहनुमा नहीं बनना चाहता है क्योंकि हर इंसान बीबी -बच्चा वाला है। घर-परिवार की समस्याओं से उसे फुर्सत कहाँ है जो वह देश -समाज की बात सोच सके। उसके पास फुर्सत है तो सिर्फ किसी को गरिया लेने का। देश- दुनिया में सबको भ्रष्ट और सबसे अनैतिक करार देने की क्षमता है। वह घूसखोरी के खिलाफ सौ पेज का भाषण उड़ेल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे पहले लेन-देन कर मामले को शांतिपूर्वक निपटाने का भरसक प्रयास करेगा। विफलता की स्थिति में ही शायद वह क्रांतिकारी के रूप में नजर आए वर्ना उनके पास सफाई के सौ अफसाने जरूर होंगें। मूढ़ जनता तब भी थी आज भी है। फुर्सत है किसके पास कि कोई किसी के फटे में टाँग अड़ाए। कहा गया है न कि जिनके घर खुद शीशे के हों वो दूसरों ......। दरअसल में बात वही है। यहां बेदाग है कौन? जिस तरह भगवान बुद्ध ने अपने बेटे के मृत्यु के दुख से दुखी बुढिया को कहा था कि यदि तुम एक मुट्ठी सरसों ला दो तो मैं तुम्हारे संतान को जिंदा कर दूँगा बशर्तें उस घर में आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई ह़ो। बुढ़ी अम्मा अपने संतान की खातिर किस किस दरवाजे नहीं गई? लेकिन अंत में निराशा के सिवाय मिला क्या? और बुद्ध को भी वह कोई दोष नहीं दे पाई । कहीं न कहीं वही स्थिति हमारी भी है। कोई भी इंसान न तो परिपूर्ण है न पूर्ण परिपक्व और न ही दोष रहित। इंसानी खामियां उसे भी कहीं न कहीं किसी मोड़ पर समझौता करने को मजबूर कर देती हैं। लेकिन जिन्हें हम भगवान मान लेते हैं उनसे हम गलती होने की अपेक्षा ही कहाँ रखते हैं? और शेष काम के लिए तो आलोचक दिन -रात मौके की ताक में तो आँखें बिछाये बैठे ही रहते हैं। फिर विवश होकर सोचना ही पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? इतनी अपेक्षाओं को पालने को किसने कहा था? किससे पूछकर हमने दूसरे पर इतना विश्वास कर लिया? किस भरोसे हमने दूसरे के कंधे पर अपनी उम्मीदें लाद दी? क्या यह न्यायसंगत था? फिर बाबेला किस बात का? यदि जो गलती खुद की है तो भुगतो। दूसरे को गरियाने से क्या मिलने वाला है सिवाय अपने अंदर की गंदगी से बाहरी समाज और वातावरण को गंदा करने के?

धंधा है चलता ही रहेगा ः सुशील कुमार भारद्वाज


लगातार जारी है और जारी ही रहेगा। ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। भूतकाल में भी लोगों ने इनके जलवे देखे हैं लेकिन वो क्या कहते हैं न कि थेथरई इतनी जल्दी छुटती नहीं। चोरी करके भी सीनाज़ोरी करके गर्व से आगे बढ़ते जाते हैं। आखिर उनका दोष भी कहाँ है? दोषी तो शायद वे हैं जो सबकुछ जानकर भी उनके अंधभक्त हैं। उनके छिछाले में भी उनके अद्भूत कारनामें और हिम्मत देखते हैं। उनके जयकारे में ही सारी शक्ति उड़ेल देते हैं। दुःख में भी चूँ करने की हिम्मत नहीं कर पाते। इसलिए नहीं कि उन्हें बोलना नहीं आता बल्कि इसलिए कि उन्हें अपने थूके को ही चाटना पड़ेगा। चाहे ऐंठन कितनी ही क्यों न पड़ जाए वे हिलेंगें नहीं और जो कहीं हिल गये तो समझ लो कि उनको कोई नया आका मिल गया। वह संरक्षित और सुरक्षित महसूस कर रहा है। फिर तो वह विभीषण की तरह अपने पुराने घर में भी आग लगाने से नहीं चुकेगा। आखिर राजनीतिक दांवपेच सीख कर ही तो वे यहाँ तक पहुँचे हैं। आखिरकार क्योंकर उनसे कोई ईमानदारी की आस लगाये बैठा है। अब तो ईमानदारी की आस लगाना ही बेईमानी है। अभी भी शक है तो मारते रहो अंधेरे में तीर। निशाने पे गया तो भी वाह वाह चूक गया तो भी वाह वाह। अपना क्या है? हम तो कह देंगें - राम राम भाई राम राम।

बुधवार, 3 मई 2017

कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की संक्षिप्त टिप्पणी

कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की  टिप्पणी


योगेंद्र आहूजा मूलत:  कहानीकार हैं, लेकिन उनकी हर कहानी अपने गर्भ में औपन्यासिक जीवन की समग्रता और संश्लिष्टता छिपाए हुए है। चूंकि वे मौन के सर्जक कलाकार हैं, और शब्दों के किफायती प्रयोक्ता, उनकी कहानियां संदर्भों-संकेतों से अटी पड़ी हैं। कहानियों में घटनाएं हैं, लेकिन विवरण न के बराबर। उन घटनाओं के भीतर छुपे राजनीतिक षड़यंत्रों, सांस्कृतिक संदर्भों, आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों को एक-दूसरे की संगति में गुने बिना लेखक के मूल आशय को समझना कठिन हो जाता है। चूंकि उनकी कहानियां उद्बोधन का स्थूल और दंभपूर्ण 'सृजनात्मक पाखंड' नहीं रचतीं, संवाद के सहारे अपने और परिवेश के भीतर की थाह लेकर साझा रणनीति बनाने की दुर्धर्ष लड़ाई लड़ती हैं, इसलिए पाठक को उनकी कहानियों में यहां-वहां बिखरे संकेतों को ब्यौरों में, ब्यौरों को युगीन विडंबनाओं के आर्तनाद में, और आर्तनाद को सृजन की सूक्ष्म अर्थव्यंजनाओं में तब्दील करते हुए खुद ही अपने आस्वाद तंत्र को विस्तृत और गहन करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए कहानी 'एक्यूरेट पैथोलॉजी' में निरुपित पहली ही घटना को लिया जा सकता है जो पात्र, वातावरण और ब्यौरों के साथ घुलमिल कर समय की सीमा के आर पार व्यवस्थागत विघटन और मानवीय शोषण की एक-सी कहानी रचने लगती है।


कौतूहल को जगाना और उत्तरोतर उसी के सहारे त्रासदी की चरम अवस्था में संघर्ष के बीज बो आना योगेंद्र आहूजा की कथा-शिल्प की खासियत है। कहानी की शुरुआत वे गनपत नाई के बारे में एक स्टेटमेंट से करते हैं - ''आख़िरी दाढ़ी उसने पच्चीस साल पहले उसी दिन बनाई थी, उस साल के आखरी दिन जब . .  .।'' लेकिन नहीं, पाठक के प्राण कंठ तक अटका कर वे जानबूझकर वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। न, दरअसल वही बने रहते हैं - शब्दकार नहीं, कैमरामैन की तरह। बस, कैमरे का फोकस बदल देते हैं। गनपत के निर्णय से नहीं, उम्रदराज गनपत के अनुभवों से अब वे बावस्ता हैं जो दूर से ही दमन और उत्पीड़न की आहट तो लेना जानता है, उससे जूझना नहीं, और इस प्रक्रिया में अपनी ही जड़ता में वह एक के बाद एक घटनाओं के जरिए वक्त को विकरालतर होते देखने को बाध्य है। पाठक थोड़ी सी राहत भरी सांस लेकर गनपत के अनुभवों में डूबने की तैयारी करता ही है कि योगेंद्र आहूजा कैमरे का एंगिल पहली स्टेटमेंट के छूटे अंतिम शब्द पर केंद्रित कर देते हैं - ''जब . . . झंडापुर चौराहे पर . . . दो आदमी मार दिए उन्होंने, एक कोई हाशमी साहब, एक रामबहादुर . .  ।''
पाठक सन्न! तो यह गनपत की नहीं, प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की हत्या की कहानी है? वह अपने से ही सवाल पूछता है खूब आशंकित होकर। संशय की ठोस वजह भी है उसके पास। अभी.अभी लेखक के कैमरे की आंख से उसने एक बेहद भयावह लेकिन कलात्मक चित्र देखा था। 31 दिसंबर की ठिठुरती रात के घने अंधेरे में अपने सैलून में असहाय सा अकेला खड़ा है गनपत। लाइट नहीं है, इसलिए अंधेरे की काली परतों को चीरने के लिए धुंआती ढिबरी जल रही है।  प्रकाश की लौ कितनी मद्धम और कंपकपाती क्यों न हो, वह अंधेरे के शाप में बिंधे अक्स को धुंधला धुंधला उजागर कर ही देती है। फिर यह ढिबरी तो सैलून में जल रही है जहां ग्राहक और हज्जाम दोनों की सुविधा के लिए हर दीवार पर कई कई कोणों में आईने टंगे हैं। आईने ढिबरी के कांपते उजाले को प्रतिबिंबित कर-कर के उजाले की एक श्रृंखला बना देते हैं। साथ ही गनपत की असहायता को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। इसी के साथ अनायास फोकस में आता है झंडापुर के नुक्कड़ नाटक से लौटे गनपत के तरुण पुत्र रोशनलाल का दहशत भरा चेहरा। दहशत मौत का स्मरण कराती है, मौत का पर्याय नहीं होती। दहशतजदा आदमी भी शायद यह सत्य नहीं जानता। जानता है कैमरा जो सैंकड़ों ढिबरियों के आवर्धित प्रकाश में हृदय के अंतस्तल में दबी-ढकी परतों के चेहरे को भी उघाड़ लाता है। कैमरा देखता है, खौफ के बावजूद ''बेइंसाफी और क्रूरता के विरुद्ध उसके हृदय में जो प्रतिवाद जन्मा था, जीवन का प्रथम प्रतिवाद, पहला इंकार, पहला विशाल गुस्सा और अपार घृणा, उसे उसने हृदय में ही रखने का फैसला किया, उस दिन तक के लिए, जब . .   .।''
एक बार फिर 'जब'। यानी फिर रस में व्यवधान! लेकिन अब पाठक ने झल्लाना छोड़ दिया है। वह उमग कर योगेंद्र आहूजा के खेल में शामिल हो गया है। शायद बचपन की स्मृतियों को ताजा करके घुटन भरे माहौल में 'टीलो' खेलने का शौक चर्रा आया हो। वह समझ गया है, लेखक उसे भरमाने के लिए इशारे करके गोटी को कहीं छुपा आता है और खुद इत्मीनान से टहलता हुआ कहीं दूर निकल जाता है, मानो पिछली बात से कोई वास्ता नहीं।
पाठक जानता है, लेखक की इत्मीनान भरी अगली यात्रा में ही उसे टीलो की अगली गोटी मिलेगी। इसलिए अपनी अंतश्चेतना को दो भागों में विभाजित कर वह नेपथ्य और रंगमंच दोनों जगह पर बनी रहने वाली सक्रियता को देखने नहीं, गुनने लगता है। टीलो खेल को जीतने का एक ही मूलमंत्र है - अंतर्सूत्रों पर गहरी पकड़।
योगेंद्र आहूजा चूंकि औपन्यासिक संवेदना के कथाकार हैं, इसलिए कहानी में अनेक अंतर्कथाओं और चरित्रों को बुनते हुए युग की विडंबनाओं को नहीं, विडंबनाओं को बनाने वाली परिघटनाओं, मानसिकताओं और प्रक्रियाओं को थहा लेना चाहते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में समय एकरैखिक गति से आगे नहीं बढ़ता, तमाम नियमों और अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी वर्तुलाकार गति में कभी बदलाव के अंधेरों को लिए आता है, कभी बदलाव से पहले की दमघोंटू सर्जक चुप्पी' की अनिवार्यता को। 'पांच मिनट' कहानी में उनकी यह तकनीक अपने चरम उत्कर्ष पर है।

रोहिणी अग्रवाल के फेसबुक वॉल से साभार।