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शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

प्रलेस की गतिविधियां इन दिनों (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक
सुशील कुमार भारद्वाज

वर्तमान परिदृश्य को देखकर लगता है कि यदि बिहार प्रगतिशील लेखक संघ निष्क्रिय नहीं है तो कम-से-कम अपने आप को जन्मशताब्दी और शोकसभा तक ही जरूर सिमटाते जा रही है. विस्तार की तो बात ही जुदा है. बिहार इकाई से तात्पर्य राज्य के अड़तीस जिलों से होना चाहिए. लेकिन देखा जाए तो इसकी सक्रिय गतिविधि पटना, गया, बेगूसराय, लखीसराय, समस्तीपुर, आरा, भागलपुर और बक्सर आदि तक ही नज़र आती है.
बिहार प्रलेस के महासचिव रवीन्द्रनाथ राय कहते हैं –“पिछले दो-तीन वर्षों में लगभग पन्द्रह कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. भीष्म सहनी का शताब्दी वर्ष मनाया गया. जिसमें अन्य गणमान्य साहित्यकारों के साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी मुख्य वक्ता थे. फिर मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी मनाया गया जिसमें अवधेश प्रीत, संतोष दीक्षित, रमेश कुमार, राजेंद्र राजन समेत दर्जन भर वक्ता थे. लगभग सभी वक्ता बिहार से ही थे.”
इसके आलावा वे गोदार्गमा, मटिहानी, सिमरिया (बेगूसराय), गया, आरा , भागलपुर, बक्सर, लखीसराय , समस्तीपुर में होने वाली छोटी-बड़ी कविता-पाठ, गजल और विमर्श गोष्ठियों की चर्चा करते हैं. राजधानी पटना की गतिविधि पर रबिन्द्रनाथ राय कम बोलते हैं. पटना की गतिविधि पर कहते हैं किपिछले दिनों रानी श्रीवास्तव के नेतृत्व में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध को श्रद्धांजलि दी गई और काव्य पाठ किया गया.

जबकि बताता चलूँ कि सुरेन्द्रजी को  श्रद्धांजलिसुमन अर्पित करने का कार्यक्रम रानी श्रीवास्तव के निजी आवास पर किया गया था जिसमें शिवनारायण, अनिल विभाकर, रबीन्द्र कुमार दास, समीर परिमल समेत दर्जन भर साहित्यकार उपस्थित हुए. और वहीं पर पहली बार सुनने को मिला कि प्रलेस की ओर से मौखिक रूप में कहा गया कि कोई कार्यक्रम करने की क्या जरूरत है? बस एक प्रेस विज्ञप्ति बना दिया जाय.  वैसी स्थिति में रानी श्रीवास्तव ने अपने आवास पर कार्यक्रम का आयोजन किया था. उसी गोष्ठी में ज्ञात हुआ कि केदार भवन में स्थित प्रलेस के कार्यालय को किसी प्रलेस पदाधिकारी के इशारे पर ही निजी आवास में तब्दील कर दिया गया है. जहां कोई भी साहित्यिक गतिविधि करा पाना असंभव है. प्रलेस कार्यालय में साहित्यिक गतिविधि नहीं करा पाने आदि अन्य कारणों से ही पटना इकाई के सचिव शहंशाह आलम ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.

गौरतलब है कि केदार भवन में पिछले पांच वर्ष पहले राजेंद्र राजन आदि के प्रयास से कन्हैया लाल मुंशी के नाम पर एक कमरा प्रलेस कार्यालय को आवंटित किया गया था जिसका उद्घाटन प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने किया था. और तब से उसमें अक्सर छोटी-छोटी गतिविधियां होती रहीं हैंजबकि बड़े-बड़े आयोजन शिक्षक संघ के भवन में अमूमन आयोजित होते हैं. लेकिन पिछले कुछ महीने सेदफ्तर का यह कमरा निजी आवास बन चुका है.

जबकि रबीन्द्रनाथ राय कहते हैं-पटना इकाई लचर हो गई है और कोई भी ढंग का कार्यक्रम करने में असफल रही है. जल्द ही नई टीमगठित  की जाएगी.

जबकि प्रलेस पटना इकाई के बैनर तले शहंशाह आलम के नेतृत्व में मदन कश्यप समेत कई प्रतिष्ठित कवियों की काव्य-गोष्ठियां टेक्नो-हेराल्ड के दफ्तर में विगत कई महीनों से आयोजित होते रहे हैं.

आश्चर्य यह भी है कि बिहार प्रलेस के सदस्यों में हृषिकेश सुलभ, संतोष दीक्षित, कर्मेन्दु शिशिर जैसे कई लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार शामिल हैं. तो क्या ये साहित्यकार पटना में रहकर भी इन सब गतिविधियों से अनभिग्य हैं? क्या वे प्रलेस के दफ्तर कभी नहीं जाते या सबकुछ जान कर भी चुप हैं? या ये सब फिजूल की बातें हैं? क्या हिन्दी के साहित्यकार प्रलेस के प्रति अभी भी वही नजरिया रखते हैं जो स्थापना के वक्त थी? प्रेमचंद की तरह दर्शक दीर्घा में बैठने वाले?

जबकि एक तरफ प्रलेस के नेतृत्व में जयपुर में पूंजीवादी लिट फेस्ट के विरुद्ध समानांतर लिट फेस्ट आयोजित किया जा रहा है. और बिहार प्रलेस आगामी महीनों में राहुल सांस्कृत्यायन पर एक आयोजन की तैयारी में है. जिसमें इतिहास, दर्शन आदि पर बातचीत करने के लिए रोमिला थापर, केदारनाथ सिंह, और विजय चौधरी आदि को आमंत्रित किया जाना है.

प्रलेस के इतिहास पर किताब लिखने वाले ब्रज कुमार पांडे कहते हैं-1935 में प्रलेस का जब घोषणा-पत्र तैयार किया जा रहा था तो दो ही लक्ष्य रखे गए थे. पहला था फासिज्म का विरोध और दूसरा था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.
1936 ई० में स्थापित प्रलेस का लक्ष्य सिर्फ इसी से पूर्ण हो जाता है कि कल्बुर्गी, पन्सारे, और गौरी लंकेश आदि के हत्या की विरुद्ध प्रदर्शन कर दिया और शोक सभाएं आयोजित कर दीं? क्या साहित्य का इतना ही महत्त्व रह गया है? प्रलेस खुद किस स्थिति में है?

रबीन्द्रनाथ राय स्वीकारते हैं कि पाठकीयता घटी है. इंटरनेट भी एक कारण है लेकिन लेखक भी कहीं दोषी हैं. लेखक प्रलेस के सिद्धांत के अनुरूप जनता के बीच जाकर, जनता की समस्या से रूबरू होकर लिखने की बजाय बंद कमरे में लिखेंगें तो वो भाव, वो जुड़ाव कहां से आएगा?” आगे राय कहते हैं-इसी परंपरा को बनाए रखने के लिए कुछ समय पहले किसान सभा और प्रलेस के तत्वावधान में सिवान में एक आयोजन किया गया था. जिसमें खगेन्द्र ठाकुर भी शरीक हुए थे. लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जो वाजिब माहौल चाहिए वो बन नहीं पा रहा है.  जो सक्रियता होनी चाहिए उसमें कहीं न कहीं चूक हो रही है. समाज में लोगों को उतरना पड़ेगा. उनके बीच से लेखन करना पड़ेगा. तभी पाठकीयता को विस्तार दिया जा सकता है.

ब्रज कुमार पांडे भी कहते हैं-अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवाज उठाई जा रही है. प्रलेस में महान साहित्यकारों के जन्मदिन और वर्षगांठ मनाएं जा रहे हैं.
तो सवाल उठता है कि क्या अब प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक रह गई है? स्थापना के 81 वर्ष देख चुकने के बाबजूद प्रलेस इतने तक ही सिमट कर रह गया है? जरूरी है समय के साथ बदलने की. अपनी अहमियत साबित करने की.


संपर्क :- 

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

सुरेन्द्र स्निग्ध और विनय कंठ को प्रलेस द्वारा श्रद्धांजलि एवं काव्य-गोष्ठी




गत दिनों पटना में कवि, उपन्यासकार, संपादक एवं अध्यापक प्रो सुरेन्द्र स्निग्ध की गंभीर बीमारी की वजह से असमय मृत्यु हो गई. शोकसंतप्त साहित्यकार, रंगकर्मी एवं अध्यापक समेत सभी संबद्ध लोग विभिन्न बैनर तले देश के विभिन्न हिस्से में अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई के तत्वाधान में आज 25 दिसंबर 2017 को लेखराज परिसर, पटेल नगर में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा तथा काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया. समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज तथा संचालन प्रलेस की सचिव डॉ रानी श्रीवास्तव ने किया. इस अवसर पर जहां रानी श्रीवास्तव ने सुरेन्द्र स्निग्ध की दो कविताओं 'अंतिम एकांत' तथा 'वर्षा' का पाठ किया वहीं वरिष्ठ कवि एवं कथाकार डॉ शिवनारायण ने सुरेन्द्र स्निग्ध के संस्मरण सुनाते हुए उनके प्रारंभिक जीवन से अब तक के संघर्ष एवं उनके व्यक्तित्व पर चर्चा की.



दूसरे सत्र में कवि शिवनारायण, शहंशाह आलम, समीर परिमल, रबिन्द्र के दास, अनिल विभाकर, राजकिशोर राजन, विजय प्रकाश, सुजीत वर्मा, ज्योति स्पर्श, नवनीत कृष्ण, गणेशजी बाग़ी, इति मानवी, राजेश कमल आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया. जबकि सुशील कुमार भारद्वाज ने एक लघुकथा सुनाई.



काव्य-गोष्ठी के बीच ही खबर मिली कि बिहार इप्टा के संरक्षक मंडल के सदस्य व जनपक्षधर शिक्षाविद प्रो विनय कुमार कंठ का भी आज असमय निधन हो गया. जिसके बाद अध्यक्ष से बातचीत के बाद दोनों ही कलाप्रेमी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए एक साथ दो मिनट का मौन रखा गया. सभा का समापन गौरव के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ.


गुरुवार, 27 जुलाई 2017

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर  

 सुशील कुमार भारद्वाज  

प्रगतिशील लेखक संघ,बिहार के तत्वावधान में आयोजित मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह में जब अधिकांश वक्ता मुक्तिबोध के विभिन्न विचारों एवं रचनाओं को उद्धृत करते हुए समकालीन परिदृश्य में दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार पर निशाना साधते हुए भारत में फासिस्टों के आ जाने और उसके प्रभावों के तांडव को रेखांकित कर रहे थे. बाजारवाद और अस्मिता की चर्चा कर रहे थे. तब अध्यक्षीय भाषण देने के लिए उठे पटना के वयोवृद्ध आलोचक व प्रलेस के पूर्व महासचिव खगेन्द्र ठाकुर एक अलग रूप में दिखे. ससमय अध्यक्षीय वक्ता के रूप आमंत्रित होने की सूचना नहीं मिलने की नाराजगी उन्होंने मंच पर ही जाहिर कर दी. और उसके बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं भी मुक्तिबोध की तरह नेहरू के विचारों से पहले सहमत नहीं था. लेकिन जिस तरह अक्सर नेहरू की खबर रखते हुए अंत समय में मुक्तिबोध कहने लगे थे कि “नेहरू के बाद फासिस्ट आ जाएगा. इसलिए नेहरू का होना जरूरी है”. वैसे ही आज मैं भी मानता हूं कि नेहरू अच्छे थे उनके जाने के बाद फासिस्ट का खतरा है. और यह भी सच है कि आज वे सत्ता में आ गए हैं लेकिन अभी तक फासिज्म आया नहीं है. और इसके लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेवार है. जब-जब वामपंथ कमजोर होता है जनतंत्र कमजोर होता है. आगे उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को समझना कठिन है. रामविलास शर्मा जो उन्हें वाम और दक्षिण अवसरवाद का जंक्शन मानते थे और नामवर सिंह जो उन्हें 'अस्मिता की खोज'वाला कवि कहते हैं. इन दोनों ने ही इनका मूल्यांकन गलत किया है. ‘जिस तरह उनकी कविता ‘अंधेरे में’ को पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है. जितना उनके व्यक्तित्व का बखान किया जा रहा है. उतना वे हैं नहीं. सबसे बड़े कवि के रूप में नागार्जुन हैं. और मुक्तिबोध से कई मायने में बेहतर और जनवादी कवि हैं. मुक्तिबोध की कविता का 'अंधेरा'पूंजीवाद का अंधेरा है जो दिखाई नहीं देता इस कारण वो खतरनाक है. लोगों को सामंती फासीवाद दिखता है जबकि पूँजीवादी फासीवाद सबसे खतरनाक है.”  आगे उन्होंने कहा कि “मुक्तिबोध ने किताबों पर जो आलोचना प्रस्तुत की है वह उन्हें कुछ हद तक अलग बनाता है.”


खगेन्द्र ठाकुर की बातों का जबाब दूसरे सत्र में आलोक धन्वा ने देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि कोई भी कवि छोटा या बड़ा नहीं होता है. जिसने एक भी कविता की वह कवि है. कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे किसी को छोटा और किसी को बड़ा कहा जा सके. मुक्तिबोध ने भी नागार्जुन की तरह जीवन में कई कष्ट देखे. बहुत संघर्ष किए. कोई भी महान कवि यूं ही नहीं बन जाता है. वह अपने परिवेश और पहले से मिले चीजों से भी बहुत कुछ सीखता है. मैंने तो मुक्तिबोध और नागार्जुन  दोनों से ही सीखा है. जिस जमीन को निराला ने तैयार किया उसी को मुक्तिबोध ने आगे बढ़ाया. यदि निराला नहीं होते तो मुक्तिबोध भी नहीं होते.’


दूसरे सत्र 'मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलताको संबोधित करते प्रख्यात कवि आलोकधन्वा  ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा "एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा 'मुक्तिबोध'. मुक्तिबोध एक लाइट हाउस की तरह से थे." आलोकधन्वा ने आगे कहा "मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे. यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता. जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता. मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया जो उन्हें विजातीय बनाता है. जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता. मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे." 



मुक्तिबोध की कहानी क्लाइड इथरलीपक्षी और दीमकका जिक्र करते हुए चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा "मुक्तिबोध कहते हैं कि इस देश के हर नगर में एक अमेरिका है. ये कहानियां बाजारवाद पर चोट करती है. मुक्तिबोध साम्राज्यवादपूंजीवाद के खतरों को बखूबी समझते थे."
संस्कृकर्मी अनीश अंकुर ने कहा " मुक्तिबोध ने घर-परिवार की बदहाली के राजनीतिक श्रोत को तलाशने की बात की. उन्होंने हमेशा राज्य को अपने निशाने पर रखा. भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के 'रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध होने की परिघटना की गहरी समझ से उन्होंने साठ के दशक में ही उस खतरनाक संभावना को पहचान  लिया था जो  समकालीन परिदृश्य में भयावह  ढंग से साकार हो गई प्रतीत होती है. इससे कैसे लड़ा जाएइसके लिए एक लेखक को अपने व्यक्तिवादी सीमाओं का अतिक्रमण कर सर्वहारा के संघर्ष में शामिल होनेउस स्तर की वैचारिक तैयारी के युगीन कार्यभार को उठाना चाहिए."

  पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर व आलोचक  तरुण कुमार ने कहा " मुक्तिबोध की पंक्ति 'तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब'. सरकार पोषित प्रतिक्रियावादियीं के अड्डे बगैर इनके ढाहे काम नहीं चलेगा. कुछ गढ़मठ वो भी है जिनके बीच हम काम कर रहे हैं. हमारे बीच अवसरवादी और संस्कारी रुझानों के भी गढ़ को तोड़ना है. मुक्तिबोध को सिर्फ मार्क्सवादी आलोचना के औजारों से नही समझा जा सकता. " तरुण कुमार ने  प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और मुक्तिबोध के बीच के पत्र सन्दर्भ का उदाहरण देते हुए कहा " प्रगतिशील लेखन के बीच नए संदर्भो में बदलाव आना चाहिए.  लेखकों पर  प्रहार ज्यादा  हुआ जबकि उनकी विचारधारा पर  आक्रमण होना चाहिए था. "  
 प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने'मुक्तिबोध जन्मशताब्दी  समारोह  के प्रथम सत्र मेंसमकालीन परिदृश्य और मुक्तिबोध'  को संबोधित करते हुए कहा कि “मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय लोगों से ये आग्रह किया कि अपनी सीमाओं से आगे जाकर जनता के संघर्ष में व्यापक रूप से  शामिल हों. मुक्तिबोध वैसे लेखक नहीं थे जो सृजनात्मक कार्यों में ही सिर्फ लगे रहे. वे संगठनात्मक कामों में भी भाग लिया करते थे. प्रगतिशील लेखक संघ की उज्जैन यूनिट की इन्होंने स्थापना की. 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया जिसका राहुल सांकृत्यायन ने उद्घाटन किया था.” बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष ब्रज कुमार पांडे ने  समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विषय प्रवेश किया " समकालीन वक्त में पूरे देश में फासीवादी खतरा है. जिसका नृशंस स्वरूप  हिटलर की आतताई  सत्ता में दिखती है. उस सत्ता का मुकाबला समाजवादी सोवियत संघ ने स्तालिन के नेतृत्व में किया  और उसे पराजित किया. आज भारत को उस महान लड़ाई से सबक सीखना  चाहिए. मुक्तिबोध हमें उसमें हमारी सहायता करते हैं. " जन संस्कृति मंच के सुधीर सुमन ने कहा " अभावों के बीच बहुसंख्यक  जनता का जो संघर्ष है उसमें अपने सवालों को शामिल करने की बात मुक्तिबोध किया करते थे. धारा के प्रतिकूल किस तरह जिया सकता हैएक सार्थकताएक जिद के उदाहरण हैं मुक्तिबोध. संवादों के जरिये निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति हमें मुक्तिबोध सिखाते हैं.” चर्चित कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार  ने परिवारभाषासमाज  से उनके अलगाव का जिक्र करते हुए कहा " मुक्तिबोध का बाह्य और अंतर जगत से संघर्ष बेहद बीहड़ था. मुक्तिबोध जैसी अदम्य जिज्ञासा दूसरी जगह नही मिलता. उनका युगबोध इतना व्यापक थाऐसी स्थितियां बनाई जिससे हमशा उनके जीवन मे तनाव रहता है. सरकारी नौकरी से इनकार,  कविता लिखना व प्रेम इन सब उनके फैसलों को भी  देखना होगा मुक्तिबोध को समझने के लिए. अपने ही अचेतन में इंडिस्कोप डालकर उसे निहारते का काम करने का काम मुक्तिबोध करते थे." 
कवि रमेश ऋतंभर ने अपना कहा "मुक्तिबोध जागने और रोने वाले कवि हैं. समय के,यथार्थ से जलने वाले कवि थे. आत्म भर्त्सना के कवि थे. रूढ़िवादी वादी स्मृतियों से वे लगातार लड़ता है. बेटे को  नौकरी भी लग जाये,पुरस्कार भी मिल जाये और बड़ी कविता भी लिख लें ऐसा नही हो सकता. चुनौती देने वाला कवि है मुक्तिबोध. कविता लिखने के लिए जलना पड़ता हैगलाना पड़ता है." 
प्रलेस के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय  के अनुसार "एक तरफ सुविधाएं हैं दूसरी तरफ  संघर्ष है.  मध्यमवर्गीय बुद्धजीवी का संघर्षकैसे मार्शल ला लग जाता है. मुक्तिबोध  के अंतःकरण का आयतन  बेहद विस्तृत है. प्रगतिवादी कविता को समाप्त करने की साजिश को वे बखूबी पहचान गए थे. वे यांत्रिक नहीं थे.”  दूसरे सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर ने कहा "रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे महत्वपूर्ण आलोचक मुक्तिबोध को मैं मानता हूं. सबसे अधिक उन्होंने लेखक के आत्मसंघर्ष की बात उठाई."

प्रथम सत्र को डॉ श्री राम तिवारीडॉ सुनीता कुमारी  गुप्तासंजीवसीताराम प्रभंजन आदि ने संबोधित किया. संचालन प्रलेस के  प्रदेश महासचिव रवींद्र नाथ राय ने किया. जबकि दूसरे सत्र को परमाणु कुमार,शशांक शेखर ,  रवींद्र नाथ राय ने भी संबोधित किया. संचालन  कवयित्री  पूनम सिंह ने किया.