रविवार, 28 मई 2023

नये संसद भवन का उद्घाटन हिन्दू राष्ट्र बनने की पहली कोशिश: सुशील कुमार भारद्वाज

 नये #संसद_भवन के उद्घाटन से पहले बहुत सारे विवादित बयान आये। और आगे भी आते रहेंगे। लेकिन मैं कुछ चीजों के बारे में सोचता रहा। पहली बात #सेंगोल की। आखिर तमिलनाडु से जुड़े इस प्रतीक का इतने वर्षों बाद प्रासंगिक होने की वजह क्या है? सर्वप्रथम तो ये सत्ता-हस्तांतरण से जुड़ी है और धर्म से भी जुड़ी है। 1947 ई में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी यह प्रतीक चिह्न दिया गया था परन्तु उन्होंने इसे म्यूजियम का हिस्सा बनाकर छोड़ दिया कारण उस समय जो कुछ भी रही हो। लेकिन मोदीजी ने इसे सदन में उचित स्थान दिया। जब चुनाव की बात होगी तब मालूम पड़ेगा कि वोट किसे मिले? लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मोदीजी ने तमिलनाडु के वोटरों को अपने पक्ष में करने की एक पहल की है और उसमें भी तब, जब 2026 में लोकसभा क्षेत्र के लिए परिसीमन होना शेष है। क्योंकि इस नये परिसीमन में तमिलनाडु को सबसे अधिक सीटों के नुकसान होने की संभावना है।


नया संसद भवन 


दूसरी बात कि 28 मई को ही उद्घाटन की तिथि क्यों निर्धारित की गई? जबकि मोदीजी ने प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार 26 मई 2014 और दूसरी बार 30 मई 2019 को शपथग्रहण लिया। 

काफी विचार के बाद याद आया कि 28 मई 1964 ई को ही नई दिल्ली में नेहरू जी अंतिम संस्कार किया गया था। क्या यह माना जाय कि पुरानी संसद भवन और पुराने भारत को नेहरू जी के अंतिम संस्कार से जोड़ते हुए प्रतीकात्मक रूप में एक युग के समापन की घोषणा हो गई है? साथ ही साथ धर्मनिरपेक्ष युग भी अपने प्रस्थान की ओर है?

और सबसे मज़ेदार बात है कि 28 मई 1883 ई को विनायक दामोदर सावरकर का भी जन्म हुआ था जिन्होंने हिन्दुत्व का हिन्दी राष्ट्रवादी दर्शन तैयार किया था। क्या यह माना जा सकता है कि नये संसद भवन के उद्घाटन के साथ ही धर्म खासकर हिन्दू राष्ट्र के पथ पर भारत की शांतिपूर्ण यात्रा शुरू हो गई है? या यह सबकुछ महज एक संयोग है?

सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी

 सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी 

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"सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है" की खूब चर्चा हो रही है। पत्रिकाओं , ब्लॉग्स और प्रसंशकों ने एक बार फिर मनोज वाजपेयी के अभिनय क्षमता की खूब तारीफ़ की है। मैं इस फ़िल्म पर कुछ और भी कहना चाहता हूँ। अपूर्व सिंह कार्की की यह पहली फीचर फ़िल्म है। अपूर्व सिंह कार्की ने चार टी वी सीरीज़ बनाएं हैं जिनमें aspirants ने अच्छी खासी चर्चा बटोरी है। 

इस फ़िल्म के बरक्स जॉली एलएलबी को रखकर देखिए क्योंकि यह भी एक कोर्ट रूम फ़िल्म है। जहां इस फ़िल्म में अरशद वारसी, वोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला , संजय मिश्रा, मोहन अगासे , मनोज पहवा , बीजेन्द्र काला जैसे धुरंधर कलाकारोंने अपने अभिनय से एक जादू भर दिया है वहीं अकेले मनोज वाजपेयी ने "सिर्फ़ एक  बंदा काफ़ी है" के टाइटल को जस्टीफाइ कर दिया है। मनोज के अलीगढ़ को देखने के बाद अभी कुछ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ेगा जिससे अलीगढ़ के उस  अभूतपूर्व अभिनय के ज़द से बाहर निकला जा सके। लेकिन यह फ़िल्म एक सच्ची घटना और हाई प्रोफाइल केस पर आधारित है इसलिए फ़िल्म मेकिंग के लिहाज़ से दृश्य, भूमिका और घटनाक्रम जॉली एलएलबी से बदल जाते हैं। भारतीय सिनेमा में मनोज वाजपेयी एक हीरा हैं। उनकी चमक बिलकुल अलग दिख जाती है , ख़ासकर ऐसी गंभीर फिल्मों के किरदार को तो वे इतना जीवंत कर देते हैं कि फ़िल्म खत्म होने के बाद तंद्रा टूटती है कि मनोज महज़ एक किरदार थे। इस फ़िल्म में भी सिर्फ़ मनोज थे। और मनोज के चारो ओर जितने भी क़िरदार थे वे अपनी क्षमता से मनोज को और भी प्रॉमिनेंट कर रहे थे। 

यहां गौर करने की बात यह है कि फ़िल्म जिस बाबा के ऊपर बनी है, वे कोई साधारण बाबा नहीं थे। उनके अधिकांश अनुयायियों का अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। यह एक समझदार फिल्मकार की सोच है कि बाबा को फ़िल्म का कैमरा जितना कम फेस करवाना पड़े। पूरी फ़िल्म में बाबा सांकेतिक रूप से अपनी उपस्थिति और वर्चस्व का एहसास दिलाते रहे लेकिन बाबा का ना तो इंटेरोगेशन दिखाया गया और ना ही बाबा से कोई ज़िरह हुई। बाबा नॉट गिल्टी के अलावा कोर्ट के सम्मुख या पुलिस के सम्मुख कुछ नहीं बोले। आजकल 3 को 32000 दिखाने की जो राजनैतिक प्रवृति निर्देशकों में पनपी है उनके लिए इस युवा फ़िल्मकार ने चुनौती पेश की है। बाबा के कई कारनामों से सिर्फ़ एक कारनामा उठाकर एक मुकम्मल फ़िल्म बना देना इस फ़िल्मकार की काबिलियत है। प्रतिगामी सोच के फ़िल्मकारों को सिनेमा हॉल की फिल्में मिलती हैं, टैक्स फ्री भी होता है और केंद्र से लेकर राज्य की सरकारें प्रॉपगंडा फ़िल्मों के प्रचार-प्रसार में भिड़ जाते हैं जबकि एक सच्ची घटना पर अपनी बात मज़बूती से रखकर भी ओ टी टी प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ता है। फ़िल्म और डाक्यूमेंट्री के लिए इन अनुसंगिक माध्यमों ने बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इस फ़िल्म के बजट के बारे में मुझे नहीं पता लेकिन उनकी कास्टिंग बहुत बढ़िया है। फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके विषय में हमें पता नहीं है। इसे हमने पाँच साल तक टी वी और अखबार के जरिये खूब देखा और पढ़ा है। जिसकी जानकारी हमें नहीं थी वो थी कोर्ट सेशन के दौरान की बहस। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि असली के कोर्ट रूम में ऐसे नाटकीय अंदाज में ही बहस हुई होगी। 

बाबा की पैरवी में जिन हाई प्रोफाइल वकीलों को बहस करते हुए दिखाया गया है उसकी झलक हमने वोमन ईरानी के रूप में देख चुके हैं। उनसे बेहतर इस तेवर को दिखा पाना मुमकिन भी नहीं था। कुछ पत्रिकाओं में मनोज की तारीफ़ करते हुए उन्हें एक मामूली वकील बताया है क्योंकि भारतीय समाज का मनोविज्ञान यही है कि जीतने वालों को हारने वालों के मुकाबले इतना छोटा दिखा दो कि यह एक असंभव लगने वाला जादू लगे। दरअसल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति हमारा यह  दया भाव ही कई बार हमारी ही इच्छाशक्ति को नष्ट करता है। वकील की डिग्री एक ही होती है। जिन्हें हम महिमा मंडित करते हुए हाई प्रोफाइल वकील कहते हैं वे दरअसल बड़े अपराधियों को मुक्ति दिलाने का काम करते हैं। ऐसे वकीलों की भर्त्सना अगर लिखने वाले नहीं करेंगे तो भला कौन करेंगे। खैर , इस फ़िल्म ने जिस तरह से सबकुछ बचाकर न्याय मिल जाने की कहानी को दिखाया है उस पर सवाल भी उठता है। सिर्फ़ बाबा के गुंडों के द्वारा ही अड़चन डालने के दृश्यों को दिखाया गया है। उनके द्वारा गवाहों की हत्याएं दिखाई गई हैं लेकिन एक पीड़िता को समाज और सिस्टम से जो लड़ाई करनी पड़ती है , उसका फ़िल्म में अभाव है। एक रेप विक्टिम नाबालिग लड़की की मनोदशा को अद्रिजा सिन्हा ने जीवंत कर दिया है। कुछ दृश्य बहुत विचलित करते हैं। बाबा के प्रति घृणा तो पनपती है लेकिन घिन पैदा करने से बचा ले जाते हैं फ़िल्मकार। सिनेमा आपकी संवेदना और विवेक को भी नापती है और यही एक संवेदनशील फ़िल्मकार का काम है। नफ़रत फैलाने वाले फ़िल्मकारों के लिए यह फ़िल्म एक सीख की तरह है। 

अंत इस बात से करना चाहता हूँ कि अच्छी फिल्में समाज को धीरे-धीरे बदल सकती है लेकिन बुरी और नफ़रत के लिए बनाई गई फ़िल्मों का असर समाज पर तुरंत होता है। इसलिए अच्छी फ़िल्मों को तरज़ीह मिले इसी बाबत इसकी खूब चर्चा होनी चाहिए। अगर आप फ़िल्मों पर नहीं भी लिखते हैं तब भी ऐसी फ़िल्मों पर अवश्य लिखें, यह एक गंभीर सिनेमा प्रेमी का दायित्व है।

प्रशांत विप्लवी 



बुधवार, 17 मई 2023

लालूजी और नीतीशजी के राज में फंसीं बिहार की जनता: - सुशील कुमार भारद्वाज

 बिहार की जनता उपलब्धि का भागीदार है या उपहास का? - यह अब पूर्ण रूप से विचारणीय हो गया है। कभी लोग आर्यभट्ट और पतंजलि के बहाने अपना पीठ थपथपाते नजर आते हैं तो कभी गांधीजी और जेपी के बहाने क्रांति के जनक के रूप में गौरवान्वित होते रहते हैं। कभी ज्ञान की भूमि बताकर गौतम बुद्ध और महावीर जैन के साथ साथ गुरू गोविन्द सिंह को जपते रहते हैं। बिहार का तो खैर नाम भी बौद्ध विहारों की ही वजह से है।

बुद्ध स्मृति पार्क 


अगर इतिहास इतना ही बुद्धिजीवियों से पटा है तो आधुनिक बिहार को बर्बाद किसने किया? लगभग 33 वर्षों से तो बिहार में लालूजी और नीतीशजी का ही एकछत्र राज रहा है। और दोनों के दोनों जेपी के अनुयायी हैं। छात्र आंदोलन की उपज हैं। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही अवर्ण या जातिवाद की राजनीति करने में अव्वल हैं। बाबजूद इसके बिहार पिछड़ा है आखिर क्यों? आखिर बुद्धिजीवियों / विद्वानों की यह भूमि अंधविश्वासियों की भूमि क्यों और कैसे बन गई? कैसे कोई शहर में एक बाहरी आदमी आता है और लाखों लोग उनके आगे शरणागत हो जाते हैं?

यदि बिहार की सम्पूर्ण आबादी को आंकड़ों के नजरिए से देखने की कोशिश की जाय तो लगभग 75% आबादी 33 साल से कम उम्र की है। अर्थात बिहार की 75 प्रतिशत जनता का जन्म लालूजी और नीतीशजी के शासन काल में हुआ है। तब तो सवाल जायज है न कि इन दोनों महान राजनेताओं ने राज्य में कैसी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया कि शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी हो गए? जबकि जाति आधारित गणना के दौरान भी सरकार ने माना कि अब बिहार में निरक्षरों की संख्या नगण्य है।

पटना म्यूजियम 


इसमें राजनेताओं को दोषी माना जाय या जनता को? जो जातिवाद के नंगा नाच को देख समझ कर भी मजा ले रही है। आजादी के इतने वर्षों के बीत जाने, तकनीक के युग में भी पिछले इतिहास में उलझी हुई है? आखिर कैसे होगा बिहार का कल्याण?

सोमवार, 8 मई 2023

भारतीय राजनीति में शिक्षा का अभाव: सुशील कुमार भारद्वाज

 भारतीय राजनीति की शुचिता को बचाए रखने की जरूरत है। लोकतंत्र की खामियों से बचने की जरूरत है। जरूरत है भविष्य को सुधारने की। आज जब ज्ञान -विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। शिक्षा की सुलभता जन-जन तक हो गई है। तब भी कोई अनपढ़ और अनगढ़ आदमी हमारा नेता बन जाता है। हमारा मंत्री बनकर मार्गदर्शन करने लगता है। प्रशासनिक पदाधिकारी तक को संबोधित करने लगता है। तो इससे बढ़कर शर्मनाक बात क्या हो सकती है?


कहा जाता है कि भारतीय चुनाव आयोग बहुत ही शक्तिशाली संस्था है। निष्पक्ष कार्य करती है। अनेक सुधार कार्य किये। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए प्रयासरत है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आखिर चुनाव आयोग क्यों नहीं प्रत्याशियों के शैक्षणिक योग्यता पर भी प्रश्न चिह्न लगा रही है? दिन रात पीआईएल की झड़ी लगाने वाले क्यों नहीं प्रत्याशियों के लिए भी शैक्षणिक मानक तय करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं?


कितनी अजीब बात है कि बिहार में जाति आधारित गणना में भी निरक्षर शब्द लिखने से मना किया गया। निरक्षर की बजाय पूर्व प्राथमिक शिक्षा शब्द का प्रयोग किया गया इस तर्क के साथ कि निरक्षर शब्द कलंक समान है। आज के आधुनिक तकनीक वाले युग में सब कोई पढ़ा-लिखा है। जबकि दूसरी ओर आठवीं या नौवीं पास इंसान बिहार में उप-मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री तक बन जाता है उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती है। शायद बेशर्म वे प्रशासनिक पदाधिकारी भी हैं जो उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। यदि शासक ही सबकुछ है और उसके तर्क़ -कुर्तक से ही राज्य चलना है तो चार पैर वाला जानवर कुत्ता -गधा क्या बुरा है? उसे भी चुनाव लड़ने और जीतने का मौका मिलना चाहिए।


यूं तो मेरी बुद्धि सीमित है, फिर भी 1947 ई के दौर को भी याद करते हैं तो सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पढ़े-लिखे ही थे। शायद सभी मंत्री भी काफी पढ़े लिखे थे। लेकिन अफसोस कि आजादी के 75 वर्षों के बाद, जब शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका है, बिहार जैसे राज्य में जातिवाद का ऐसा जहर घुला हुआ है कि कम पढ़े लिखे लोग को अपना शासक चुनकर भी लोग गौरवान्वित हो रहे हैं। पता नहीं वह दिन कब आएगा जब बिहार में शिक्षा की पूजा होगी?


#भारतीयराजनीति, #शिक्षा

रविवार, 7 मई 2023

भारतीय राजनीति में महिला: सुशील कुमार भारद्वाज

 एक समय था भारतीय राजनीति में जब महिलाओं का दमदार प्रदर्शन दिखता था। लोग इन्हें भारतीय राजनीति की त्रिदेवियां भी कहते थे। तमिलनाडु में जयललिता का जो जलवा था, वही उत्तर प्रदेश में मायावती का था। बंगाल की शेरनी तो ममता बनर्जी है ही। दक्षिण में राजनीति अब भी है। महिलाएं भी हैं। लेकिन जयललिता की जगह अब भी खाली ही है। मायावती तो अपनी नीतियों की वजह से ही सिमटे सिमटे अप्रासंगिक सी हो गई है। अब तो लगता है कि भारतीय राजनीति में एक मात्र शेरनी ममता बनर्जी ही बचीं हैं जो किसी को भी ताल ठोककर कभी भी चुनौती देने की हिम्मत रखती है। लेकिन वो भी अब उम्र के ढ़लान पर ही हैं।

ऐसा नहीं है कि भारतीय दलों में महिलाओं की कमी है या टिकट नहीं मिल रहा है या महिलाएं खुलकर राजनीति नहीं कर रही हैं। सब कुछ हो रहा है लेकिन अफसोस कि कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो रहा है। कोई ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा है जिससे भविष्य में उम्मीद की जा सके। 

कुछ लोग प्रियंका गांधी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन मेरी नज़र में उनकी उपलब्धि गांधी परिवार में जन्म लेने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उससे तो कई गुणा बेहतर सोनिया गांधी हैं जिन्होंने नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में लंगड़ाते कांग्रेस को न सिर्फ अपने दम पर संभाला बल्कि लगातार दो बार भारत को प्रधानमंत्री भी दिया। और आज भी कांग्रेस में जो कुछ भी शेष है उसमें भी सोनिया गांधी का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है।

आखिर भारतीय राजनीति से महिलाओं का दबदबा कम क्यों होता जा रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है और इस पर विचार किया जाना चाहिए।


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