सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी
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"सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है" की खूब चर्चा हो रही है। पत्रिकाओं , ब्लॉग्स और प्रसंशकों ने एक बार फिर मनोज वाजपेयी के अभिनय क्षमता की खूब तारीफ़ की है। मैं इस फ़िल्म पर कुछ और भी कहना चाहता हूँ। अपूर्व सिंह कार्की की यह पहली फीचर फ़िल्म है। अपूर्व सिंह कार्की ने चार टी वी सीरीज़ बनाएं हैं जिनमें aspirants ने अच्छी खासी चर्चा बटोरी है।
इस फ़िल्म के बरक्स जॉली एलएलबी को रखकर देखिए क्योंकि यह भी एक कोर्ट रूम फ़िल्म है। जहां इस फ़िल्म में अरशद वारसी, वोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला , संजय मिश्रा, मोहन अगासे , मनोज पहवा , बीजेन्द्र काला जैसे धुरंधर कलाकारोंने अपने अभिनय से एक जादू भर दिया है वहीं अकेले मनोज वाजपेयी ने "सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है" के टाइटल को जस्टीफाइ कर दिया है। मनोज के अलीगढ़ को देखने के बाद अभी कुछ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ेगा जिससे अलीगढ़ के उस अभूतपूर्व अभिनय के ज़द से बाहर निकला जा सके। लेकिन यह फ़िल्म एक सच्ची घटना और हाई प्रोफाइल केस पर आधारित है इसलिए फ़िल्म मेकिंग के लिहाज़ से दृश्य, भूमिका और घटनाक्रम जॉली एलएलबी से बदल जाते हैं। भारतीय सिनेमा में मनोज वाजपेयी एक हीरा हैं। उनकी चमक बिलकुल अलग दिख जाती है , ख़ासकर ऐसी गंभीर फिल्मों के किरदार को तो वे इतना जीवंत कर देते हैं कि फ़िल्म खत्म होने के बाद तंद्रा टूटती है कि मनोज महज़ एक किरदार थे। इस फ़िल्म में भी सिर्फ़ मनोज थे। और मनोज के चारो ओर जितने भी क़िरदार थे वे अपनी क्षमता से मनोज को और भी प्रॉमिनेंट कर रहे थे।
यहां गौर करने की बात यह है कि फ़िल्म जिस बाबा के ऊपर बनी है, वे कोई साधारण बाबा नहीं थे। उनके अधिकांश अनुयायियों का अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। यह एक समझदार फिल्मकार की सोच है कि बाबा को फ़िल्म का कैमरा जितना कम फेस करवाना पड़े। पूरी फ़िल्म में बाबा सांकेतिक रूप से अपनी उपस्थिति और वर्चस्व का एहसास दिलाते रहे लेकिन बाबा का ना तो इंटेरोगेशन दिखाया गया और ना ही बाबा से कोई ज़िरह हुई। बाबा नॉट गिल्टी के अलावा कोर्ट के सम्मुख या पुलिस के सम्मुख कुछ नहीं बोले। आजकल 3 को 32000 दिखाने की जो राजनैतिक प्रवृति निर्देशकों में पनपी है उनके लिए इस युवा फ़िल्मकार ने चुनौती पेश की है। बाबा के कई कारनामों से सिर्फ़ एक कारनामा उठाकर एक मुकम्मल फ़िल्म बना देना इस फ़िल्मकार की काबिलियत है। प्रतिगामी सोच के फ़िल्मकारों को सिनेमा हॉल की फिल्में मिलती हैं, टैक्स फ्री भी होता है और केंद्र से लेकर राज्य की सरकारें प्रॉपगंडा फ़िल्मों के प्रचार-प्रसार में भिड़ जाते हैं जबकि एक सच्ची घटना पर अपनी बात मज़बूती से रखकर भी ओ टी टी प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ता है। फ़िल्म और डाक्यूमेंट्री के लिए इन अनुसंगिक माध्यमों ने बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इस फ़िल्म के बजट के बारे में मुझे नहीं पता लेकिन उनकी कास्टिंग बहुत बढ़िया है। फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके विषय में हमें पता नहीं है। इसे हमने पाँच साल तक टी वी और अखबार के जरिये खूब देखा और पढ़ा है। जिसकी जानकारी हमें नहीं थी वो थी कोर्ट सेशन के दौरान की बहस। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि असली के कोर्ट रूम में ऐसे नाटकीय अंदाज में ही बहस हुई होगी।
बाबा की पैरवी में जिन हाई प्रोफाइल वकीलों को बहस करते हुए दिखाया गया है उसकी झलक हमने वोमन ईरानी के रूप में देख चुके हैं। उनसे बेहतर इस तेवर को दिखा पाना मुमकिन भी नहीं था। कुछ पत्रिकाओं में मनोज की तारीफ़ करते हुए उन्हें एक मामूली वकील बताया है क्योंकि भारतीय समाज का मनोविज्ञान यही है कि जीतने वालों को हारने वालों के मुकाबले इतना छोटा दिखा दो कि यह एक असंभव लगने वाला जादू लगे। दरअसल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति हमारा यह दया भाव ही कई बार हमारी ही इच्छाशक्ति को नष्ट करता है। वकील की डिग्री एक ही होती है। जिन्हें हम महिमा मंडित करते हुए हाई प्रोफाइल वकील कहते हैं वे दरअसल बड़े अपराधियों को मुक्ति दिलाने का काम करते हैं। ऐसे वकीलों की भर्त्सना अगर लिखने वाले नहीं करेंगे तो भला कौन करेंगे। खैर , इस फ़िल्म ने जिस तरह से सबकुछ बचाकर न्याय मिल जाने की कहानी को दिखाया है उस पर सवाल भी उठता है। सिर्फ़ बाबा के गुंडों के द्वारा ही अड़चन डालने के दृश्यों को दिखाया गया है। उनके द्वारा गवाहों की हत्याएं दिखाई गई हैं लेकिन एक पीड़िता को समाज और सिस्टम से जो लड़ाई करनी पड़ती है , उसका फ़िल्म में अभाव है। एक रेप विक्टिम नाबालिग लड़की की मनोदशा को अद्रिजा सिन्हा ने जीवंत कर दिया है। कुछ दृश्य बहुत विचलित करते हैं। बाबा के प्रति घृणा तो पनपती है लेकिन घिन पैदा करने से बचा ले जाते हैं फ़िल्मकार। सिनेमा आपकी संवेदना और विवेक को भी नापती है और यही एक संवेदनशील फ़िल्मकार का काम है। नफ़रत फैलाने वाले फ़िल्मकारों के लिए यह फ़िल्म एक सीख की तरह है।
अंत इस बात से करना चाहता हूँ कि अच्छी फिल्में समाज को धीरे-धीरे बदल सकती है लेकिन बुरी और नफ़रत के लिए बनाई गई फ़िल्मों का असर समाज पर तुरंत होता है। इसलिए अच्छी फ़िल्मों को तरज़ीह मिले इसी बाबत इसकी खूब चर्चा होनी चाहिए। अगर आप फ़िल्मों पर नहीं भी लिखते हैं तब भी ऐसी फ़िल्मों पर अवश्य लिखें, यह एक गंभीर सिनेमा प्रेमी का दायित्व है।
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| प्रशांत विप्लवी |