गुरुवार, 29 जून 2017

बदलती पत्रकारिता और हमारी पसंद



अखबार शायद तब से है जब सूचना क्रांति का प्रस्फुटित होना शेष था। लेकिन समय के साथ चीजें बहुत तेजी से बदलती चली गई। अखबार के अलावे रेडियों एक मात्र सहारा नहीं रहा। 1990 ई० के विनिवेश नीति का असर हमारे अर्थशास्त्र पर ही नहीं पड़ा बल्कि इसने पूरे जनसंचार को ही प्रभावित करने की कोशिश की। परिणामस्वरूप समाचार चैनलों की ऐसी व्यवस्था और बाढ़ आई की पल-पल की खबरें नजरों के सामने आने लगी। इंटरनेट के प्रचार -प्रसार ने तो रही-सही कसर निकालने की पूरी कोशिश कर दी। बस एक क्लिक पर सब पत्रकार और एक क्लिक पर सारी खबरें। लगा जैसे कि अखबारों के दिन लदने वाले हैं। लेकिन फिलवक्त तक ऐसा हुआ नहीं है। अखबारों ने भी अपने उपलब्ध संसाधनों के सहारे अपने -आप को बदलते हुए मौजूदा रेस में भागीदारी की कोशिश की है। बहुत कुछ बदलते हुए भी बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है। खैर, मैं बचपन से हिन्दुस्तान पढ़ता आया हूँ आज भी पढ़ता हूँ। दैनिक जागरण, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, द हिन्दू, द टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द पायोनियर, द स्टेटस मैन, आदि समेत दर्जनों हिन्दी अंग्रेजी के अखबारों को विद्यार्थी जीवन में पढ़ा। लेकिन फिर घुम-फिर कर हिन्दुस्तान पर ही लटका। सब अखबारों की अपनी-अपनी खूबियाँ और कमियाँ थी लेकिन बात सहजता, उपलब्धता, रूचि और पसंद और जरूरत पर अटक जाती है। जिससे आपकी जरूरत पूरी होती है। वही आपके लिए खास है।
संपादक विशेष पर कभी गौर नहीं फरमाया। बस अपनी जरूरत पूर्ति से खुश होता रहा। अब रही बात सुझाव और बदलाव की तो स्वाभाविक रूप से इस गलाकाट युग में जब अखबार ही बाजार के हवाले है तो आप संपादक की स्वतंत्रता की बात नहीं कर सकते। पत्रकारिता को मिशन के रूप देखना खुद को दु:ख देना है। क्योंकि संपादक भी इन दिनों महज अपनी नौकरी निभा रहे हैं। वे त्याग, बलिदान और समाज कल्याण के लिए नहीं हैं, भले ही उनकी दिलीइच्छा कुछ भी हो। उन्हें सत्ता के पक्ष या विपक्ष में से एक को चुनना है। अन्यथा में न लें तो अब अखबारों /समाचार चैनलों का राजनीतिकरण हो गया है। वे अब निष्पक्ष खबरों की बजाय सुविधाजनक पत्रकारिता करते हैं। सुविधानुसार खबरें बनाते और दिखाते हैं। जनमानस को पक्ष-विपक्ष में करने के लिए खबरों को परोसते हैं। और पूँजीवाद के इस दौर में पत्रकारिता के बचे रहने में ही जब संशय है तो फिर अखबार की क्या बात की जाय? जहां, पूँजीपति ही अखबारों और चैनलों के मालिक हों वहां सुझाव और सलाह के कोई मतलब नहीं होते। सीधी भाषा-पसंद है तो स्वीकार करो वर्ना नकार, लेकिन वे करेंगें वही जिनसे उनका व्यापार बढ़ेगा।
- सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 27 जून 2017

हिमांशी शेलत की कहानी "चुड़ैल की पीठ"

वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में स्त्री हमेशा से परिस्थितियों की शिकार होती रही है। निर्दोष होकर भी वह अपना बचाव नहीं कर पाती है। नियति और इंतजार के बाद मौत के सिवा बचा ही क्या है उसके पास? खुद को जिंदा रखने की जिद्द और दूसरों के बच्चों के सुख में ही सुखी होने की प्रवृत्ति दूसरों की नजर में खटकती जरूर है। वह डायन, चुड़ैल और पता नहीं क्या -क्या कहलाती है? ऐसी स्त्रियों से लोग अपने बच्चों को दूर रखने में ही भलाई समझते हैं। समाज में गिद्ध की नजर रखने वाले लोग अपनी पैनी निगाह से कपड़े के भीतर जिस्म में सुराख करने से भी बाज नहीं आते हैं। लेकिन जब स्वार्थलोलुप्त अंधविश्वासी समाज में खुली आँखों वाले बिना किसी नशे के ही नशे में हों तो लाल आँखों वाले नशेड़ी से क्या उम्मीद पालना? लेकिन डूबते को तो आखिरी तिनके का भी सहारा नसीब नहीं हो पाता है। आर्थिक के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर टूटती-बिखरती स्त्रियों को न तो ससुराल वालों से राहत मिलती है न मायके वालों से सहयोग। हर स्तर पर विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों को जब समाज में सम्मान ही न मिले तो हम खुद को सभ्य -समाज का हिस्सा कैसे मान लें? हिमांशी शेलत की मार्मिक व यथार्थ परक कहानी "चुड़ैल की पीठ" का हिन्दी में अनुवाद डॉ मालिनी गौतम ने किया है। आइये पढ़ते हैं इस कहानी को - सुशील कुमार भारद्वाज

चुड़ैल की पीठ

गुजराती कहानीकार- हिमांशी शेलत 

दरवाज़ा ज्यादा मजबूत नहीं था । बाहर आवाज़ें बढ़ती जा रहीं थीं । पेटी-पिटारा और जो कुछ भी खींचा जा सके वह सब दरवाज़े से सटा कर पसीने में लथपथ, बेबाक भाणकी कमरे के बीचोबीच खड़ी हुई थी। कुछ भी करने की स्थिति नहीं थी अब, सिवाय इसके कि वह झमकू के घर की तरफ खुलने वाली ख़िड़की खोल कर वहाँ से भाग जाये । वहाँ भी इस बात का डर तो था ही कि दिन भर खाँसता रहता भगले का बुढ्ढा कहीं देख न ले। पर बुढ्ढे की नज़र कमज़ोर थी...ज्यादा दिखाई नहीं देता था उसे। अब जो भी हो,....या तो उसे भागना पड़ेगा या फाँसी लगानी पड़ेगी.....
  “ अबे खोल रही है कि तोड़ दें......
तोड़ ही दो...देर किस बात की, अंदर छुपकर बैठी है अपने-आप बाहर आयेगी....साली पूरा गाँव खाने को बैठी है...
ऐय रवला, सामने से तीकम लेकर आ.....
दरवाज़ा थरथरा रहा था । डंडा, लकड़ी, धड़ाधड़ मुट्ठियाँ और अब इन सबसे जोरदार हथियार मँगाया जा रहा था। वहीं एक कोने में रड़की, आकुल-व्याकुल आँखों से बोले जा रही थी।
“.......रोज़ रात को सिकोतरी ( भूतनी) बुलाती थी। मैं कितने ही दिनों से कह रही थी कि भाणकी रात को कुछ करती है, पर किसी ने नहीं माना, लो अब खुद ही देख लो कि क्या हुआ है...
भाणकी की साँस तो जैसे दरवाज़े पर ही लगी हुई थी। कमरे के बीच तो वह मात्र परछाईं बन कर खड़ी थी। ये दरवाज़ा टूटा, ये भीड़ घर में घुसी, सटासट लकड़ियाँ, पीठ पर सोटियाँ, खिंचे हुए कपड़े और बिल्कुल नग्न शरीर, पूरे गाँव में दौड़ती-हाँफती वह अकेली और पीछे पूरा टोला....धधकते दाग, नुकीले पत्थर और खून का रेला.....
यूँ तो पिटारे में रस्सी रखी हुई थी। खोलकर फन्दा तैयार करने में क्या देर लगनी थी ? ये
लटकाया और ये खेल खत्म । पर हाथ जैसे पिटारे तक पहुँचने को तैयार न थे। जीव कहीं फँसा हुआ था...कह नहीं सकते शायद पेमा में ही अटका पड़ा हो ...
गाँव में ऐसी घटना कोई पहली बार तो बनी नहीं थी । न जाने कितनों के बालक चल बसे थे। उन्हीं में से गीगला भी एक था । उस दिन भाणकी के घर के पास खेल रहा था। अकेला भी नहीं था साथ में दाजी और उकड़ के टोपलाभर नंगे-मुंगे थे। टिटिहा-रोह हुआ तो खटिया में पड़े हुए बुढ्ढे-डोकरे और फुर्सत मिलते ही सब के सब उसी दिशा में दौड़े चले आये । लड़के की नसें खिंच गईं थीं और आँखें चढ़ गईं थीं। सवारी तुरंत कैसे मिल जाती...बड़ी मिन्नत-मसाजत करके भीमा कहीं से रिक्शा ले आया था। अस्पताल में बहुत सुईयाँ खोंसीं पर गीगला तो उसकी माँ की आँखों के सामने ही सूखी लकड़ी-सा हो गया।
यह ख़बर जब गाँव में पहुँची तब भाणकी चूल्हे के पास बैठी हुई थी । एक समान आँच पर सिंकती रोटी की काली-बदामी डिज़ाइन को ताकती हुई वह वहाँ से इंच भर भी नहीं हिली। गीगा चल बसा, इसमें उसका कोई दोष नहीं था यह वह जानती थी, फिर भी किसी अनजाने डर की आशंका से उसके पैर काँपते रहते थे। पेमा के शहर जाने के बाद जब कितने ही दिनों तक उसकी कोई ख़बर न आई उस समय किसी को भी अपने घर की तरफ आते देखकर काँपते थे बिल्कुल वैसे ही । पेमा को कितना समझाया था, गाँव छोड़कर जाने को कितना ही मना किया था। पर पेमा तो बड़ा ही झक्की और अड़ियल था। छीबा ने छ्प्पर डलवा लिया...दीवाल भी पक्की करवा ली...शहर में तो मजदूरों की हमेशा ही ज़रूरत रहती है...कुछ ठीक-ठाक मिलेगा तो बचेगा भी....बाकी गाँव में अब क्या रखा है....
यह एक की एक बात घुमा-घुमाकर कहता हुआ पेमा गया सो गया । वह नहीं आया पर उसके बारे में तरह-तरह की बातें आती रहीं—“ दंगा फ़साद में खत्म हो गया,...कहीं हाथ-सफ़ाई करता हुआ पकड़ा गया इसलिए जेल में सड़ रहा है,...बस की चपेट में आ गया है ...तो कोई यह भी कहता कि शहर में तो सबकुछ मिलता है इसलिए सिर्फ औरत के लिए पेमा को गाँव आने की भला क्या ज़रूरत है।
छप्पर अच्छा-खासा गल गया था। मूसलाधार बारिश वाली रात में भाणकी बैठी रहे या सो जाये यह निश्चित नहीं कर पाती और रातभर दीया जलाती और बुझाती रहती ।यही कारण था कि माणेक और रड़की कानाफूसी करने लगीं कि भाणकी रातबिरात कुछ करती है और उसे जरूर भूतनी चिपक गई है। वेलजी ( ओझा) गाँव में यूँ ही चक्कर लगाता रहता था, भूतनी वाली बात सुनने के बाद वह भी गाँव में ही रहने लगा । 
-और उसी समय यह गीगला टप्पदिना से मर गया...
दरवाजा बस अब टूटने ही वाला था। दीवार से चिपक-चिपक कर भाणकी खिडकी तक पहुँची। 
अधिकतर बंद रहने वाली यह खिडकी जकड़बंद हो गयी थी इसलिए धकेलने पर नहीं खुली। दाँत भींचकर उसने पूरा ज़ोर खिड़की पर लगाया। खिडकी ज़रा-सी हिली, पल भर के लिए भाणकी को लगा कि अभी कोई आकर उसे पकड़ लेगा। डर कुछ कम हुआ तो चारो तरफ सुनसान पाया ...सारी चीख-पुकार और धमाधम तो दरवाज़े पर मची हुई थी। बिल्कुल नीची-सी यह खिडकी खुल गयी इसलिए भाणकी भगवान का आभार मानते हुए कूद पड़ी और दौड़ने लगी।
वह दौड़ तो रही थी पर दौड़कर जाना कहाँ था यह उसे नहीं पता था। पैर काँप रहे थे और साँसें 
तेज़ चल रही थी। तभी... भाणकी वो भाग रही है...कैसी भाग रही है....जैसे दहकते शब्द उसके कानों में पड़े। इधर-उधर दौड़कर टोले को उलझाने के सिवाय दूसरी कोई सुध-बुध भाणकी को नही थी। खुद के दौड़ते पैरों की आवाज़ और साँसों की धौंकनी की आवाज़ के सिवाय दूसरी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है यह निश्चित हो जाने पर वह देवालय के पास पीपल के पेड़ की आड़ में ज़रा देर खड़ी रही ।  उसकी बावरी आँखें एक ही दिशा में देख रही थीं। इस तरफ बस्ती कम थी, कुछ तितर-बितर झोंपड़े थे, भीमनाथ के चबूतरे की आसपास ही कहीं दत्तु और बावजी खर्राटे भर रहे होंगे ।
........शायद दोनों पी कर पड़े होंगे…..यह विचार आते ही भाणकी का हाथ तुरंत अपनी पसीने से
लथपथ छाती पर आँचल ढँकने के लिए उठ गया । दत्तु की यही आदत थी। भाणकी चाहे कहीं भी हो...बीच बज़ार में या सुनसान पगडंडी पर, बेशर्मी से बस एक ही जगह ताकता रहता था। 
एक बार जगु की दुकान पर सामान बँधवा कर पैसे निकालने के लिये ज्यों ही ब्लाउज़ में हाथ 
डाला, दत्तु वहीं थोड़ा पीछे खड़ा हुआ टुकुर-टुकुर ताकता दिखाई दिया। उस दिन से उसने पैसे साड़ी के किनारे बाँधने शुरू कर दिये थे। पर तब भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा था ...दत्तु की नज़र तो जैसे सबकुछ चीरकर आर-पार हो जाती थी। भाणकी को लगता कि उसकी आँखें छाती को छू जाती हैं और वह आकुल-व्याकुल हो उठती। लेकिन आँखें दत्तु की एकदम साफ थीं, पीने के कारण थोड़ी-सी लाल रहती थीं बस । वैसे न तो  वो बोलता-चालता था और न ही कोई छेड़-छाड़ करता था बस चुपचाप देखता रहता था। दिखने में तो बड़ा भला था। उस दिन बड़े अस्पताल से दवा लेकर भाणकी बस पकड़ने के लिये हड़बड़ाती-हड़बड़ाती दौड़ रही थी कि किसी ने बस खड़ी रखवायी। भाणकी को पूरा विश्वास था कि वह दत्तु ही था। बस में दत्तु के सिवाय दूसरा था ही कौन जो भाणकी के लिए बस खड़ी रखवाता। सबेरे-सबेरे भी निठल्ला दत्तु चक्कर लगाता रहता था। भाणकी सबेरे कुछ न कुछ काम निकाल कर चबूतरे पर आती-जाती रहती थी। कारण बस इतना ही था कि सामनेवाले चबूतरे पर रतन अपने हष्ट-पुष्ट जुड़वाँ बच्चों को छाती से चिपकाकर बैठी रहती थी। बच्चे दूध पीकर तृप्त होने पर हाथ-पैर उछाल कर खेलते...भाणकी की प्यास जैसे उन बच्चों में छिपी हुई थी। ऐसे समय पर इधर-उधर भटकता दत्तु उसे भला कैसे दिखाई देता। और इसीलिये बेखबर भाणकी को दत्तु एकटक......
पीपल के नीचे ही पड़ा रहने को मिल जाये तो कितना अच्छा हो....इस कल्पना मात्र से ही भाणकी की आँखें बंद हो गई। किसी के साथ नींद में बात कर रही हो इस तरह उसके होठ थोड़े-थोड़े फड़फड़ा रहे थे.......दत्तु को कह्ती हूँ कि छुपा दे मुझे कहीं....कर दिखा सचमुच...अगर मैं तुझे इतनी ही ज्यादा....बाकी पेमा तो बिल्कुल झूठा है। यूँ कहाँ से मर गया होगा.....ये तो सब भागने के बहाने हैं.....
भाणकी की पलकें भारी हो रहीं थीं तभी हो-हो और धम-धम की आवाज़ें तेज़ी से पीपल की दिशा में आने लगीं और वह फुर्ती से सीधी भीमनाथ के चबूतरे की तरफ़ दौड़ी। हवा में बेफाम पत्थर फेंके जा रहे थे...डांग-कुल्हाड़ियाँ लहरा रही थीं।
वंतरी (भूतनी) को खत्म कर दो आज....छोड़ना मत
कहाँ छुप रही है चुड़ैल, सामने आ...बताते हैं तुझे.....गाँव की जिम्मेदारी हमारी है...समझी..
अईला जोर लगाओ सब....वंतरी भेस बदल कर भाग जायेगी...
भाणकी के बाल जूड़ा खुल जाने से हवा में लहरा रहे थे। लंबी लटें गाल और कपाल पर बिख़र गयीं थीं। आँचल का ठिकाना नहीं था, बल्कि हमेशा ढँका रहने वाला छाती की बाँयी तरफ का बड़ा सा लाखू भी साफ दिखायी दे रहा था। भाणकी को इस रूप में देखकर दत्तु का रहा-सहा नशा भी चला गया। वह कुछ समझ नहीं पाया । हाँफती हुई भाणकी को बस पैर स्थिर करने जितना ही समय मिला। तभी दत्तु पीछे से सुनाई देने वाली चिचियारियों में खिंचने लगा।
अईला दत्तुड़ा...पकड़..साली डाकण को...
दत्तु क्या खाक पकड़ेगा....होश में हो तब न...
दत्तु...मार...
दत्तु भागने मत देना चुड़ैल को...बच्चे-आदमी सबको खा जायेगी कुलटा साली...
भाणकी बहुत कुछ कहना चाहती थी दत्तु से, पर दत्तु मानों घबरा गया हो इस तरह पीछे ख़िसकता चला गया । भाणकी को लगा कि जैसे उसके हाथ कुछ ढूँढ रहे हैं । शायद उसकी डांग,या फिर.....। नज़र के बिल्कुल सामने ढली हुई भाणकी की लगभग उघड़ी हुई छाती दत्तु को दिखना बंद हो गयी थी। वह तिरछी नज़रों से इधर-उधर देखने लगा।
मार सोंटी खींच के,..देख क्या रहा है...इन आवाज़ों के दबाव में फँसा हुआ दत्तु कुछ करे उसके पहले भाणकी चबूतरा कूद कर हवा में तीर बन गयी। उसके मजबूत पतले पैर ज़मीन पर टिकते न थे।
वंतरी...साली...मर्द भी पीछे रह जायें इतना तेज़ दौड़ रही है...”  
नदी में डूब मरूँगी पर किसी के हाथ नहीं आऊँगी...यह सोचकर भाणकी ने ऊबड़-खाबड़ टेकरियों वाला रास्ता चुना। पैरों में कितना कुछ उलझ रहा था और ऐसी ही किसी चीज़ से ठोकर लगने पर वह नीचे गिर पड़ी। गिरने के साथ ही मानों उसके पैर पूरी तरह टूट गये। वजन उठाने लायक न रहे..टें हो गये और भाणकी लाचार हो गयी। उकड़ू पड़ी हुई वह पसीने में  घुलती गयी।
चिचियारी और धमाधम की आवाज़ें अब बिल्कुल नज़दीक आने लगीं थीं। किसी ने उसे पीछे से खींचा। ज़मीन पर उगी हुयी घास से भाणकी चिपकी रही। कपड़े चीर-चीर हो गये..पीठ खुल्ली हो गयी...और उस पर पड़ने लगे डाँग, पत्थर, लात, गालियाँ ...और फिर सब के सब टूट पड़े पूरी ताकत से।
संपूर्ण होश उसने कब खो दिया यह तो पता नहीं...पर बस होश खोने से पहले मन में विचार आया...
साले भड़वे....कीड़े पड़ें तुमको......दत्तु जैसा सच्चा आदमी इनके बीच में हो ही नहीं सकता...आज पिया हुआ न होता तो बिचारा दत्तु....कैसा सच्चा...मर्द है.....
यूँ तो गाँव वाले सब मानते थे कि चुड़ैल की पीठ में भी आँखें होती हैं । बिल्कुल झूठी बात.....अगर होतीं तो भाणकी को टोले में खड़ा हुआ पहाड़ जैसा दत्तु दिखाई न दिया होता .??

डॉ. मालिनी गौतम


अनुवादक- डॉ. मालिनी गौतम
4/475, मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
जिला- महीसागर्
गुजरात
मो. 09427078711


सोमवार, 26 जून 2017

समकालीन कविता में परिवेश और मूल्य: राजकिशोर राजन की कविता के सन्दर्भ में - सुशील कुमार

युवा कवि राजकिशोर राजन का काव्य-परिवेश प्रकृति और मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के यथार्थ के मध्य दुर्निवार दुःख-तंत्र और उसके अंत:संघर्ष की वह काव्य-कथा है जो सहज भाषा में लोकजीवन की संश्लिष्ट और अविकल अर्थ-छवियाँ रचती हैं। इनसे होकर गुजरना लोक के समकालीन स्पंदन के बीच से गुजरते हुए लोक से अपने को पुनर्नवा करने जैसा है। पढ़ते हैं समीक्षक सुशील कुमार  की टिप्पणी को:-


राजकिशोर राजन



समकालीन कविता में परिवेश और मूल्य
[राजकिशोर राजन की कविताओं से गुजरते हुए]       - सुशील कुमार


राजकिशोर राजन की कविताओं में जीवन के शाश्वत मूल्यों को बचाने के बजाए विघटित होते जीवन को बचाने की अंदरुनी छटपटाहट ज्यादातर दृष्टिगत होती है। आप देखेंगे कि मूल्यों के निरंतर अवगाहन से कविता प्रायः उपदेशपरक और आग्रहशील होने लगती है जो उसे कमजोर बनाती है पर राजकिशोर राजन कविता के इस क्रियाव्यापार से साफ बच निकलते हैं और मूल्यों के अन्वेषण पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, उनका सारा प्रयत्न सीधे जीवन के सत्यान्वेषण पर केंद्रित होता है। यही समकालीन कविताओं की पहचान है जहाँ लोक का आंतरिक यथार्थ और उसकी संचेतना जीवन-मूल्यों के बजाए सीधे परिवेश से ग्रहण करता है जिससे क्षण की तह की सच्चाई कविता में एकदम टटका दिखती है। इसके बावजूद कविकर्म के कार्यसाधना की यह विडम्बना है कि जो उसके जीवन-पर्यन्तछूट जाता है, वही बची हुई अप्रकाशित पांडुलिपियां ही उसके मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं, देखिए राजकिशोर राजन की कविता अप्रकाशित का यह अंश कुछ आलोचक, विचारक, काव्य-प्रेमी मानते हैं/ उस कवि को समझने के लिए/ महत्वपूर्ण है उन्हें पढ़ा जाना /चुकि यही होता आया है अब तक/ प्रकाशित से ज्यादा/ कवि रह जाता है अप्रकाशित । राजन की एक अन्य कविता भगदड़ में छूटी हुई चप्पलेंमें कवि की संवेदना मन को कुरेदती हुई यथार्थ के उस सिरे को जा पकड़ती है जहाँ बहुत कम कवियों का ध्यान जाता है।माता रोएगी पुत्र के लिए/ पुत्र पिता के लिए/प्रमिकाएँ प्रेमी के लिए और पत्नियाँ पतियों के लिए/पर कोई नहीं रोएगा/ गदड़ में छुटी हुई चप्पलों के लिए। - यह पाठक के भीतर जो एब्सट्रेक्ट भाव रचती है वह परिवेशगत यथार्थ के वास्तविक संधान का ही प्रतिफलहै। टूटी हुई चप्पलें कितने बड़े फलक की कविता है,देखने के लायक है! क्योंकि दुर्दिन में महज अपने-अपने सम्बन्धों तक सीमित रहकर हमारी आत्मिक सम्पदा संकुचित रह जाती है, इस अर्थ में यह कविता यहाँ हमारे हृदय को विस्तार देती दिखती है।उपर्युक्त दोनों कविताओं में कवि की चिंता मूल्यगत न होकर परिवेशगत है  है।
     परम्परा, मिथक और इतिहास में जो सुहै उसे समय की घानीपेरकर उससे मूल्य-तत्व को उत्पन्न करता है पर जब मूल्यों को कवि इतना कसकर पकड़ ले कि परिवेश उसकी मुट्ठी से फिसल जाए तो वह लोक के यथार्थ से दूर होने लगता है। उसके आसपास और पूरी दुनिया में जो चिरनवीन क्षण की तह में घटितसत्य है (जिसे हम कविता का खनिज कहते हैं) उसकी पकड़ से बाहर जाने लगता है। परिवेश से दूर जाने की यह पलायन-वृति हम उन कवियों में अधिक देखते हैं जिनमें लोक के सत्य को भोगने का साहसऔर संघर्षनहीं होता। उनकी मनोगत दशाएँ अंतर्मुख होती हैं और उकी काव्य-प्रक्रिया अंदर से बाहर की ओर गमन करती है,(बाहर से अंदर की ओर नहीं)। उनमें कमरे में बंद होकर कृत्रिम वस्तुओं और किताबी मूल्यों का अवगाहन कर बुर्जुआ-सौंदर्य को रचने की आदत-सी पड़ जाती है जहाँ से साहित्य में रूपवाद का जन्म होता है। आप देखेंगे कि छायावादोत्तर काल में पूरा आरम्भिक प्रगतिशील साहित्य ही मूल्यों की आड़ में परिवेश से कहीं न कहीं कटा हुआ है। इसका प्रमाण यह है कि तारसप्तक के अधिकांश कवियों ने 'नई कविता'या प्रयोगधर्मी कविता' के रूप में साहित्य-जगत को लोक से कटी हुई, निहायत ही आत्मबद्ध-व्यक्तिपरक कृतियाँ दी जिसकी विशद् चर्चा करना इस आलेख का वर्ण्य-विषय नहीं। पर भारतीय साहित्य ही नहीं, पूरी दुनिया के चिंतक-लेखक अब यह महसुस करने लगे हैं कि यथार्थ के अंत:सूत्र खोलने में परिवेश का देखा-सुना-भोगा सत्य ही कविता के असल काम की चीज है। मूल्य परिवेश की अभिव्यक्ति का साधन है, वह साध्य नहीं हो सकता। इतिहास और मिथक भी परिवेश के द्वन्द्व से ही रगड़ खाकर कविता में अपनी रूपाभा और चमक पाते हैं। इसका अन्यतम उदाहरण राजकिशोर राजन जी की कविता-पुस्तक कुशीनारा से गुजरतेहै जिससे गुजरना भारतीय मिथक-मूल्यों के एक अंध-पथ से गुजरना नहीं, बल्कि परिवेश के उस विस्तार से गुजरना है जिसमें जीवन और चेतना की मानवीय उपस्थिति दीप्त है। युवा कवि राहुल झा ने राजन के इस संग्रह की कविताओं पर इस बावत एक जगह बड़ी उल्लेखनीय बात कही है कि भारतीय मनीषा के अस्तित्वगत चिंतन की महायात्रा में 'बुद्ध' की पूर्णकालिक उपस्थिति दरअसल जीवन के संबुद्ध एकाँत और विरोधाभासी संसार के भीतरी यथार्थ से सीधा औसहज साक्षात्कार है। राजकिशोर राजन की कविता की धार में पँखुड़ी-सी तैरती दार्शनिकता बुद्ध के जीवन और उनके प्रगल्भ छवि को एक अद्भुत अर्थ देती हुईदिखती है,शायद इसीलिए उनकी कविताएँ जिन जगहों, चीज़ों, पात्रों के बीच से गुज़रती हैं उनके गहरे मर्म भी साथ लेकर चलती हैं और वह तथागत की संबुद्ध महायात्रा की ज़मीन पर बीज की तरह पड़ती हैं और अंततः अपना एक विशिष्ट यथार्थ पाती हैं।...  और बेशकउनकी कविता इतिहास और यथार्थ के बीच का एक स्थगित पुल हैऔर यह पुल इधर या उधर की राह नहीं हैबुद्ध की सम्यक्-संबुद्ध महायात्रा पर उनकी ये सारी कविताएँ दरअसल हलचल के भीतर की स्थिरता को देखने की एक भरपूर कैफ़ियत है। इन कविताओं को कवि राहुल झा का देखने का जो तरीका है उसमें परिवेशगत मूल्यों के प्रति उनकी गहरी अंतर्दृष्टि और आग्रह है जो इस संग्रह की कविताओं की काया में प्रवेशकर उनमें उन लोकगत तत्वों को ढूंढता है जो कवि राजकिशोर राजन को परिवेश के आत्मसंघर्ष से हासिल हुआ है। परिवेश के साथ मूल्यों का यह घर्षण ही इनकी कविताओं में प्राण फूँकता हैवरिष्ठ कवि और लोक-चिंतक विजेंद्र का काव्य-सौंदर्य संबंधी चिंतन भी इन्हीं बातों को लेकर कविता-जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है जिसे वे लोकधर्मिता के विस्तृत फलक से जोड़कर काव्य-मूल्यों को उसीमें अंतर्भूत कर देते हैं अर्थात् उनके काव्य-संसार में मूल्य परिवेशगत है, उससे अलग नहीं। कथाकार स्व. कमलेश्वर की किताब नई कहानी की भूमिकासे भी यह बात समझ में आती है कि कथ्य के यथार्थ-अन्वेषण में कहानी और उपन्यास पर भी परिवेश संबंधी उपर्युक्त बातें उतनी ही शिद्दत से लागूहोती हैं।
     हर कवि को परिवेश और मूल्य के बीच के इस अन्तर्संघर्ष को जानना और समझना चाहिए। इसे जाने-गुने बिना कोई कवि सही अर्थों में समकालीन नहीं हो सकता क्योंकि समकालीन यथार्थ को केवल मूल्यगत काव्य-वस्तु से समझना-परखना चीजों को दूर किसी टीले पर बैठकर दूरबीन से देखने जैसा है, उसके पास जाकर नहीं ।
     देखा जाए तो आलोचना और कविता का भारतीय चित्त तुलसी-सूर के काल से ही नहीं, बल्कि हिन्दी के उद्भव-काल से ही शाश्वत मूल्यों और परंपराओं के प्रति आग्रहशील रहा है लेकिन जैसे ही कविता साठ के दशक से आगे आई, वह अपना पुराना चोला तेजी से उतारने लगी, कविता की मुक्ति-प्रक्रिया में उसके रूप और कथ्य में ही नहीं, उसकी भाषा में भी अविश्वसनीय परिवर्तन दृष्टिगत हुए। इससे नई कविता में शाश्वत मूल्यों की आग्रहमूलकता न केवल खंडित होने लगी, बल्कि बहुत हद तक इन मूल्यों के प्रति अस्वीकार-भाव भी आने लगे। निरंतर बदलते परिवेश में आदमी के अस्तित्व-संकट के रूप और संघर्ष की प्रकृति भी पहले से भिन्न हो गई। जीवन-संघर्ष के सामने उन मूल्यों की अमरता को एक प्रकार से धक्का लगने लगा जिसे आदिकाल से प्रगतिशील साहित्य तक महाकवियों और मनीषी-आलोचकों ने रच रखा था, अथवा कहें तो पूरे विश्व में आदर्शवाद को यथार्थवादने समय की चादर से ढँक लिया। इसलिए जीवन-मृत्यु के सिवाय अब और बातें उतनी शाश्वत और टिकाऊ नहीं रही। परिवेश ने पुराने मूल्यों को धीरे-धीरे नए और आधुनिक मूल्यों में बदलना शुरू कर दिया। समकालीन कविता के मूल्यांकन की दृष्टि से कवियों और आलोचकों का यह साझा नया परिवेश जितना विवादास्पद और उत्तेजक है उतना ही महत्वपूर्ण और रचनात्मक, जो समकालीन हिन्दी कविता की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। कवियों के नई पीढ़ी ने एकदम नंगी और बेलौस आवाज और खुरदुरी भाषा में परिवेश के यथार्थऔर अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करना शुरू किया जिन पर अखबारीपन, रिपोर्ताज, गद्यमयता, सरलीकरण, सपाटबयानी, लयहीनता आदि केतरह-तरह के आरोप लगने लगे लेकिन बकौल नामवर सिंह वर्तमान की सही पहचान, सूक्ष्म पर्यवेक्षण और अप्रतीकी अभिव्यक्तिके कारण वह सार्थक हुई। कहना न होगा कि बिम्ब और प्रतीक ही एक मात्र रचनात्मक माध्यम नहीं है नंगे तथ्यों का नाटकीय उपयोग भी उतना ही रचनात्मक है’’ (कविता के नए प्रतिमान: पृ. सं. 206)। लेकिन लोकधर्मी परंपरा के अग्रधावक कवि-चिंतक विजेंद्र (प्र. सं. कृति ओर) ने इसके उलट, लोकधर्मी सौंदर्यशास्त्र के आख्यान में अपना तर्क देते हैं कि कविता के सौंदर्यशास्त्र में यह बात प्रमुख है कि हम किसी भाव को कितना संश्लिष्ट बना पाते हैं। जीवन की कोई भी क्रिया सामान्य होकर भी कविता में संश्लिष्ट रूप ले लेती है। बिंब उसी संश्लिष्ट भाव का मूर्तन है। यही वजह है कि कविता बिना बिंब के सतही और इकहरी बनी रहती है। भाषा के चमत्कार और वाग्मिता से संश्लिष्टता पैदा नहीं होती। वह होती है क्रियाशील जीवन, प्रकृति और समाज को गहराई तक समझने से। फिर भावों की संश्लिष्टता तभी आती है जब हम अपनी सामान्य संवेदना को बुद्धिगत बनाकर उसे पुनर्गठित कर लेते हैं। या कहें जब विचार भावमय हो जाता है। यही काव्य-रस है। कविता के सौंदर्य की सहज प्रक्रिया भी। यह भी लक्ष्य किया जा सकता है कि जब कवि अपना कथ्य और सामाजिक सरोकार बदलता है, सौंदर्यशास्त्र भी बदलता है। कविता के रूप, शिल्प, लय, भंगिमा, भाषा, पद-रचना और स्थापत्य में भी बदलाव होते हैं। पर यह सब कविता में घुलमिल कर ही होता है। बाहर से कुछ टाँका या थोपा नहीं जाता। आदि कवि बाल्मीकी यही कर रहे हैं।‘’(सौंदर्यशास्त्र: भारतीय चित्त और कविता, पृ. सं. 80)। कविता में संश्लिष्ट भावों की मूर्तनता, विचार की भावमयता, काव्य-बिंबों और प्रतीकी अभिव्यक्ति को लेकर दो परस्पर विरोधी स्थापनाओं का यह परिणाम रहा कि जनधर्मी कविता के अंदर दो अलग-अलग प्रवृतियाँ सामने आईं। एक तो सपाटबयानी की ओर मुड़ गई जो रुखड़ीऔर लगभग बिम्बरहित भाषा में परिवेश के आंतरिक यथार्थ को व्यक्त करने लगी और दूसरी, बिंब वाली लोकधर्मी कविता-धारा में। (लेकिन लोकधर्मिता के कवि भी जाने-अनजाने बिम्ब-रहित गद्य-कविताएँ खूब लिख रहे हैं)। हालाकि विजेंद्र जी ने यह स्वीकार किया है कि जब कवि अपना कथ्य और सामाजिक सरोकार बदलता है, सौंदर्यशास्त्र भी बदलता है। कविता के रूप,शिल्प,लय, भंगिमा, भाषा, पद-रचना और स्थापत्य में भी बदलाव होते हैं। लेकिन उनकी पक्षधरता काव्य-बिंब की ओर है। यहाँ यह महसुस किया जा सकता है कि विजेंद्र जी का परिवेशकाव्य-बिंबों से बना वह सक्रिय-सचेतन जन (अभिजन नहीं) का लोक है जो इंद्रियबोध की राह से होकर गुजरता है अर्थात उनकी कविता की दुनिया दृश्य-श्रव्य-स्पर्श-गंध से प्रतिकृत और प्रकृति के धूप-धुल-ताप-जल-रश्मि-वायु आदि उपकरणों से युक्त है जबकि नामवर सिंह सापेक्ष स्वतन्त्रताके साथ कविता की एक स्वायत्त दुनिया रचने की वकालत करते हैं और कोई भी सेंसर लगाने के पक्षधर नहीं हैं। उनके इस खुलेपन और उदारवाद आलोचना-दृष्टि से जहाँ एक ओर जनधर्मी कविताओं के विकास को व्यापक पाट मिला, कविता के नए डाइमेंशन्सका उदय हुआ, कविता की सपाटबयानी शैली में उत्कृष्ट रचनाओं का सृजन हुआ वहीं दूसरी ओरकविता में रूपवादी झुकाव और बुर्जूआ-सौंदर्य को भी तवज्जो मिली जो स्वभाव से लगभग अभिजनवादी है यानि कविता के अपने प्रतिमान-पाश में ही नामवर जी ने कविता के विष-तत्व भी छिपा रखे हैं। अपने प्रतिमान के द्वितीय संस्करण की भूमिका में इस पर उन्होंने जो स्पष्टीकरण दिए हैं उसे पढ़कर यही लगता है कि रूपवाद को कविता के प्रतिमान में अभिव्यक्ति जानबूझ कर नहीं दी थी। कविता में मूल्य की प्रासंगिकता पर गहरी बात करते हुए आगे कहते हैं कि निसंदेह किसी कविता का सिरजा हुआ संसार ही उसका मूल्य है किन्तु उस मूल्य की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर है कि वह सिरजा हुआ संसार कितना वास्तविक है अथवा वास्तविकता के बारे में हमारी समझ को कितना गहरा और कितना समृद्ध करता है, हमारे आसपास के संसार को अर्थ प्रदान करने में ही किसी कविता के अपने संसार की सार्थकता है। वास्तविकता की इस अर्थ-भूमि पर ही मूल्यों का सच्चा संघर्ष होता है।’(कविता के नए प्रतिमान: पृ. सं. 217)। यहाँ सिरजा हुआ संसारका मतलब कवि के परिवेश यानि कविता-लोक से है। स्पष्टतः उनके परिवेश का दृष्टिकोण विशुद्ध यथार्थवादी है और मूल्यका खनिज भी वह वहीं से लेते हैं।  उसमें बिंबों-प्रतीकों कामहत्वपूर्ण स्थान नहीं। कविता में बिंबों को लेकर उनकी चुप्पी से उनकी अप्रतीकी अभिव्यक्तिकी पक्षधरता साफ झलकती है।तबसंतोष की बात यह है कि इन दोनों विपरीत ध्रुवों की स्थापनाओं का लक्ष्य सर्वदा एक ही रहा है: वह है जनधर्मिता।
     अगर इन स्थापनाओं के मध्य नब्बे के दशक से आगे समकालीन कवियों के कविताओं को रखकर बात करें तो यह साफ झलकता है कि उनके काव्य-संसार कापरिवेश न तो केवल काव्य-बिंबों और प्रतीकों से बना है न मात्र सपाट शैली की अप्रतिकी अभिव्यक्तिसे। सच्चाई तो यह है कि कोई भी कवि न पूरा सपाट होताहै, न पूरा बिंबों का धनी। सबमें न्यूनाधिक दोनों बातें पाई जाती है जिसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अभी लोकधर्मी प्रतिमान के अंतर्गत ये वर्जनाएँ या सेंसर्स सक्रिय हैं जो जनधर्मी रचनाओं की सही और निष्पक्ष समीक्षा से आलोचकों को रोक रही है। फिर भी इन वर्जनाओं की बिना परवाह किए नब्बे के दशक से अब तक के लोकधर्मी कवियों ने जो कविताएँ रचीं, वे अपने रूप, कथ्य, अभिव्यक्ति के ढंग और उसकी भंगिमा, अंतरलय व बनक, सरोकार की गहराई व व्यापकता, और सबसे बड़ी बात कि जनसंघर्ष की लहक के कारण जनधर्मी कविताओं में शुमार हुई हैं। इनमें एक बेहद महत्वपूर्ण नाम है – राजकिशोर राजन जिनकी कविताएं इस आलेख के केंद्र में है।    
     राजकिशोर राजन की कविता में जब मिथक कवि के परिवेश में अपना स्वरूप ग्रहण करता है तो वहाँ भी यह बात साफ तौर पर घटित होती है,“कुशीनारा से गुजरतेसंग्रह की पहली कविता कला और बुद्धको देखिए, सौंदर्य संधान में किसी प्रतिमान की आवश्यकता नहीं पर मन के बीहड़में प्रवेश करती है – ‘सौंदर्य तो पात-पात में/क्या देखना पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण/ऊपर-नीचे/वह नित परिवर्तित सौंदर्य/ है कण-कण में विद्यमान/वही सत्य का आधार/जिसका, न आर-न-पार/जो कर लेता/अपने हृदय में/उस अप्रतिम सौंदर्य का संधान/कला करती उसी का अभिषेक/करती उसी का सम्मान/जब तक, इसका ज्ञान नहीं/तब तक,सकल मान-अभिमान। -मिथ का सोना कवि के परिवेश की भाँथी में गलकर वर्तमान के द्वंद्व से कितना टकराता है और दमकता है, देखिए बैरकविता का एक अंश - परसों ही, एक पड़ोसी ने मुझे छला था/उसके बाद देर तक/मैं क्या-क्या सोचते गला था...क्यों नहीं लौटा दिया उसे, जिससे लिया/बैर से, स्वयं को भरता रहा। -  यह कविता अपने कथ्य में जितना प्राचीन है, भाव में उतना ही अर्वाचीन अर्थात क्षण का सूक्ष्म निरीक्षण। जगत के बैर- भाव का तथागतीकरण ! मिथक-मूल्य के उपकरण से वर्तमान का अवगाहन कविता में बहुत ही जटिल और श्रमसाध्य कार्यहोता है जिसे कवि राजकिशोरनेबखूबी किया है, यही वस्तु का पुनःसृजन है जो विशिष्टता का सर्वव्यापीकरण (जेनरलाईजेशन)करता है, जब वस्तु बिल्कुल वही नहीं होती जो उसका मूल स्वरूप है बल्कि कवि के परिवेश यानि आभ्यांतर से प्रतिकृत होकर नए संघटन में पुनर्रचित हो जाती हैऔर तब सृजन जन-संप्रेष्य हो जाता है जो उसकी सफलता है।
     अक्षत दुनिया कभी किसी कवि का काव्य-संसार नहीं होती। जब हम काव्य-संसार की बात कर रहे होते हैं तो यह कवि द्वारा आत्मसात किया हुआ उसके परिवेश का वह हिस्सा है जो उसपरिवेश से निष्पन्न होकर भी उससे भिन्न होता है। जैसे सब व्यक्तियों का चेहरा एक सा नहीं होता, उनका स्वभाव एक सा नहीं होता, उसी प्रकार एक जगह, एक भौगोलिक परिवेश में रहते हुए भी कवियों के आपसी रचना-परिवेश में वैयक्तिक भिन्नता होती है। अगर किसी कवि में रचनाशीलता नहीं दिखती है तो इसका मतलब यह है कि कवि ने काव्य-वस्तु को मूल परिवेश से ज्यों का त्यों उठा लिया है, गृहीत परिवेश की अर्थवत्ता के संधान का प्रयास कवि के द्वारा नहीं किया गया अर्थात् वस्तु के पुनस्सृजनमेंचुक हुई है। साहित्य का यथार्थ अखबारी समाचार की तरह नहीं होता बल्कि रचनाकर द्वारा भुक्त यथार्थ की पुनर्रचना होती है, यह परिवेश का नकल मात्र भी नहीं होता। परिवेश की पुनर्रचना कवि की जीवन-दृष्टि, आत्मसातीकरण की क्षमता, इन्द्रियबोध की प्रखरता और जीवनानुभव से बनती है। हमें राजकिशोर राजन की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि उनका काव्य-परिवेश लोकजीवन का वह देखा-सुना-भोगा हुआ यथार्थ है जिसमें कविता गरीबों की हुकऔर किरकिराते आँखों में फूँककी तरह महसुस होती है, कहीं वह आँखों का पानीबनकर तो कहीं प्रेम और जादू का रूप बनकरआती है जिसमें कवि की पृथ्वी घूमती है अपनी वृत्त पर। यहाँ कवि के लोक का विद्रुप स्वर भी उतना ही मुखर है -खुरपी और हँसुआ से भी तेज है बोली/पता नहीं, कब, किस बात पर/चल जाए लाठी-गोली/दरिद्रता में भी हठी बेजोड़/एक कट्ठा खेत में डाली जाती/कितनी राजनीति की खाद/कभी जानना हो/तो पधारिए हम्मर गाँव’ -कविता (पधारिए हम्मर गाँवसे)।कहना न होगा कि कवि का परिवेश वह जीती-जागती जगह है जिसमें अस्तित्व के लिए अंतर्द्वंद और जद्दोजहद पूरे स्वरित तेवर में मौजूद हैं। इसमें आदमी के श्रम का औजार हँसुआ और खुरपीही केवल नहीं, बदरंग होते समाज में हिंसा-प्रतिहिंसा की प्रतिध्वनियाँ भी हैं अर्थात् कहीं गोली और लाठीहै तो कहीं जल बिन छूँछऔर बेरौनक होती नदियां। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके काव्य-संसार में कविताएं उसी तरह पक रही है जैसे समय की धौंकनी में खेतों में धान पकती है। इसमें जीवन प्राकृतिक ऊष्मा और पूरी गति के साथ में उपस्थित और दीप्त है (किसी किताबी कवि के कुंठित नैराश्य का प्रतिबिंबन नहीं।) राजकिशोर राजन कविता में मूल्यों के गढ़ने के आदी नहीं, वहाँ कविता का परिवेश ही एक ऐसे दुर्निवार समय का आख्यान रचता है जिसमें मूल्य स्वंय परिवेशगत हो जाता है और जन से लेकर प्रकृति तक लोकजीवन की अविकल अंदरुनी व्यग्रता दीखती है - गोया कि, वहाँ नदियों का समुद्र से मिलने की इच्छा खत्म हो चुकी है, कोयल कूकना बंद कर चुकी है, तितलियों में चपलता नहीं रही, हँसी भी दिल से नहीं, दिमाग से आने लगी है और यह सब देखते-सुनते कवि भी अब बूढ़ा हो रहा है पर जिजीविषा मरी नहीं है, वह उद्दीप्त है स्फुट चिंगारियों की तरह। उनके लेखक का मूल्य लोक से संपृक्त होकर कितना समसामयिक और जीवन की गतिकी से भर उठता है, यह आप इस कविता के सहारे देख सकते हैं:मिट्टी में पड़ा धान- ठीक नहीं लगता, जब दादी चुनती/ मिट्टी से धान का एक-एक दाना/ अकसर दादी से कहता/ क्या! इतने गरीब हैं हम/ कि तुम नाखुनों से उठाती हो धान/ परन्तु दादी बुरा मान जाती/ और हम मिट्टी से चुनने लगते धान/ उन दिनों बैलों को भर दुपहरिया/ गोल-गोल चलना पड़ता धान के पुआल पर/ हम भी चलते गोल-गोल/ जैसे पृथ्वी को नाप लेंगे आज ही/ सन जाते हाथ-पैर, कपड़े, पसीने-मिट्टी से/ होने लगती सांझ/ तब दादी को आता हम पर दुलार/ चूम लेतींहमारा माथा/ और बताती, मिट्टी में पड़ा धान रोता है बेटा/ कि मिट्टी से आये और मिट्टी में मिल गए/ तब बरकत नहीं होती किसान की/ नहीं रही दादी, पर/मिट्टी में पड़ा धान/ आज भी दिखाई देता है रोते।अन्न के बर्बाद न करने का यह पुराना मिथलोक-बिम्ब के जिस ऐन्द्रिक रचाव और पोएटिक विजनके साथ पाठक के अन्तस्तल को छूता है, मिथ का मूल्य जिस तरह परिवेश के तत्व में रूपांतरित होता है कि इसकी अन्विति से पाठक बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाता! यहाँ बिम्बों की बहुलता नहीं, कथ्य बिम्ब को स्वभावतः रचते हैं। देशज भंगिमा और संवेदना की नव्यता राजन के कविता-संसार में अँटा पड़ा है, फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी रसप्रियामें कवि ने उसी भंगिमा का कविता-रूप में नवोन्मेष किया है जहाँ अपरूप प्रेम की प्रतिच्छाया पाठक के मन को हिलोर कर रख देती है, देखिए-
असमाप्त ही रह जाती है रसपिरिया की कथा/ रह-रह फूटती, मिरदंगिया की हूक/कि रसपिरिया नहीं सुनेगा मोहना!/देख न! आ गया कैसा कठकरेज वक्त/ कि पहले रिमझिम वर्षा में लोग गाते थे बारहमासा/ चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर, लगनी/ अब तो भूलने लगी है कूकना कोयल भी/ पंचकौड़ी मिरदंगिया को पता होगा जरूर/ अगर परमात्मा कहीं होगा, तो होगा रस-रूप ही/ तभी तो टेढ़ी उँगली लिए/ बजाता रहा आजीवन मृदंग/ और इस मृदंग के साथ फूटता रहा रमपतिया का करूण-क्रंदन/ कि मिरदंगिया है झूठा! बेईमान! फरेबी!/ऐसे लोगों के साथ हेलमेल ठीक नहीं बेटा/ भौचक है मोहना!/ ठीक मेरी तरह/ इस अपरूप प्रेम की कथा में।अनुभवसिक्त परंपरा मूल सबन्धों के रूप में कवि के यहाँ इस कदर ढलता है कि कवि पूछता भी है : मेरा तो मानना है/ऐसे अनुभव को ले तुम ओढ़ोगे कि बिछाओगे/ खाओगे कि नहाओगे... / दादा की अनुभवी आँखों में कितनी घृणा थी अनुभव से/कि जब कोई बच्चा उन्हें चिढ़ाता मुँह/वे उसे न समझाते, न गुस्साते, चिढ़ाने लगते मुँह। लेकिन पेट की आग से बेफिक्र लोग भी वहाँ हैं जहां कविता गहरी व्यंग्यात्मक अभिव्यंजना के साथ व्यक्त होती है कि जो पेट से बेफिक्र हैं/घूम रहे झक्क-सफेद दिल्ली-पटना/ लगाने को आग। मनुष्य का दिपदिपाता हुआ मुखमंडल तब स्याहहो जाता है। लेकिन फिर भी कवि की प्रतिबद्धता बनी रहती है और रसूखदार आदमी के प्रश्न पर कवि कहता है किगनीमत है/कम से कम /एक कविता तो आप से छुट गई। कवि का यह प्रतिबद्ध संसार उस लोक का हिस्सा है जिसमें पृथ्वी के पेड़ उनके पुरखों की तरह हैं और खेतों की फसलें उनके सपनों की तरह। यह चिंतन कवि को अपनी जगह पर रहते हुएउसे वैश्विक बनाता है जिसमें पूरी पृथ्वी पर जीवन को किसी तरह बचाने की चिंता आत्मगत है। अपनी मिट्टी और भाषा से कवि का राग इतना गहरा और लोक-प्रसूत है कि दुःख के कठिन समय में भी वह उससे अलगना नहीं 'कोड़ते-सोहते, ढ़ेला फोड़ते/धान, सरसों, गन्ना रोपते जिस मिट्टी में/मिल गए दादा भी/इसी मिट्टी में जन्म लूँगा मैं/जहाँ गरीबी और लाचारी/जैसे धरती पर दूब-मिट्टी, देह पर/जैसे सूरज की धूप/ इसी मिट्टी में जन्म लूँगा मैंकविता की दुनियामें कवि-कर्म की यह प्रतिबद्धता और अधिक पारदर्शी हो जाती है- 'और मेरी कविताएं, ठीक मेरी तरह/न उनमें अलंकारिक भाषा, न चमत्कार/न कलात्मकता का वैभव,/न बौद्धिकों के लिए यथेष्ट खुराक/तो मैं क्या करूँ!'- एक बात यह भी यहाँ दीगर है कि कवि के नदी का जल सूख चुका है, नदी के विलाप में पूरी प्रकृति और लोकजीवन का विलाप है। (इधर पूरे देश में पानी का हाहाकार सुनाई दे रहा, किसान आत्महत्या तक कर रहे।) सूक्ष्मता से, संकेत में इस जलाभाव को लक्ष्य करते हुए कवि ने लोकजीवन के सर्वग्रासी त्रास का जो बिम्ब इस कविता में रचा है, वह परिवेश की तात्कालिकता का अर्थगर्भी चित्रण है , देखिए इसका एक अंश- कविता : नदी का विलाप, : चिरई-चुरूँग उड़ना भूल/जैसे ठिठके पडे़ हैं पेड़ों पर..होने को है साँझ/और गाँव के सिवान पर/सन्नाटे में बरस रही है उदासी/रात्रि के प्रथम प्रहर में, करती है नदी रोज/धरती से गुहार/आज भी उसके रूदन से फटेगी धरती/आँसू पोंछते कहेगी वह कितनी असहाय/न कुदाल, न टै्रक्टर, न मजदूर, न किसान/कोई नहीं सुनता उसकी बात/ सभी काट-कोड़ उसे बना रहे खेत/हर दिन सूर्यास्त के साथ/हो रहा उसका अस्तित्व समाप्त... तुम्हें भरोसा है किताबों पर /पर, नदी पर नहीं/उस दिन समझोगे/जब नदी की आँखें, हो जाएगी कोटरलीन।'कवि अब भी अच्छे दिनों की आश में है, उसमें जीवन के वसन्त की अदम्य लालसा है और अनवरत खोज भी, एक चीत्कार भी है, एक पुकार भी –हा! वसंत!/हो! वसंत!/जो वसंत!/तुम कहाँ, किस अरण्य में/गये खो वसंत।
     हमें यह कहने में सकुचाहट नहीं कि युवा कवि राजकिशोर राजन का काव्य-परिवेश प्रकृति और मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के यथार्थ के मध्य दुर्निवार दुःख-तंत्र और उसके अंत:संघर्ष की वह काव्य-कथा है जो सहज भाषा में लोकजीवन की संश्लिष्ट और अविकल अर्थ-छवियाँ रचती हैं। इनसे होकर गुजरना लोक के समकालीन स्पंदन के बीच से गुजरते हुए लोक से अपने को पुनर्नवा करने जैसा है।


          संपर्क :  सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,

     एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची – 834004 मोबाईल ( 0 90067 40311 और 0 94313 10216)