मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अनश्वर तोहफा : सुशील कुमार भारद्वाज (कहानी)

अनश्वर तोहफा
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चित्र साभार

गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है।
खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।
लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।
अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?
प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।
इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?
 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ।
अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!
बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।
सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"
-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "
वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा तो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी।
वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।
सुशील कुमार भारद्वाज

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

बालदिवस और घटिया राजनीति ( आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

कल कुछ लोग #बालदिवस पर बतकही टीप रहे थे। राजनीतिक रंग में रँगने की यूँ कोशिश कर रहे थे जैसे इससे पहले देश में पक्ष-विपक्ष का मामला ही ना रहा हो। भाई, ये सच है कि बाल दिवस, चाचा नेहरू यानि पं० नेहरू के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

लेकिन बच्चों के लिए बालदिवस का कुछ और ही मतलब होता है। खेल-कूद, नाटक आदि में शरीक हो मस्ती में डूबा दिन और मिठाई-टॉफी में गुलजार होता मुँह का स्वाद। इसके अलावे बच्चे नेहरूजी के जीवन में कितनी रूचि लेते हैं? उनके जीवन-दर्शन आदि के बारे में अपने बालमन में कितना और क्या सोचते हैं? - ये बातें उन बच्चों से बेहतर कोई नहीं जानता है। और विद्यालय से बाहर के बच्चों के लिए बाल दिवस कोई मायने भी रखता है।- ये भी किसी शोध से कम का विषय नहीं है।

और बदलते समय, परिवेश और तकनीक के युग में जहाँ हर होश सँभालता बच्चा सोशल मीडिया, सेल्फी, टेलीविजन चैनल या यूट्यूब या अन्य में अपने जीवन के स्वर्णिम पलों को खोता जा रहा है उस युग में बालदिवस और इतिहास के पन्नों का उनके जीवन में क्या और कितना महत्व शेष रह गया है- यह एक विचारणीय प्रश्न है।

जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मैं समझ और देख पा रहा हूँ वहाँ शिक्षक दिवस और बाल दिवस दोनों ही अपना महत्व समय के साथ खोता जा रहा है। अन्य दिवसों की तरह इसका भी निर्वाह कर दिया जा रहा है। यह पूँजीवादी व्यवस्था का परिणाम है या शिक्षक-विद्यार्थी के बीच बदलते भावनात्मक और पेशेवर रिश्ते का परिणाम? कारण जो भी हो, लेकिन मूल भावना और आस्था दोनों ही विलुप्त होते जा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में नेहरूजी या किसी भी पुराने स्वतंत्रता सेनानी को लोग कब तक और कितना याद रख पाएंगे - कह पाना मुश्किल है। उसमें भी वैसे युग में जब बच्चे परनाना-परदादा तक का भी नाम मुश्किल से याद रख पाते हैं।

और इस बुते पर राजनीति करना कितना उचित है?- ये शायद राजनीति करनेवाले ही बेहतर ढ़ंग से बता सकते हैं।

चर्चा में बने रहने के लिए और भी मुद्दे रखे हुए हैं। कुछ सार्थक बात हो तो कोई बात हों। बेबजह का क्या बाबेला मचाना?

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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

मतलब : सुशील कुमार भारद्वाज

मतलब
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"तुम चादर तान के सो क्यों नहीं जाते?" -उसने अपनी बात बेबाकी से कह दी।
तुरंत तपाक से सामने वाला बोला- "सो जाऊँ?... कैसे सो जाऊँ? किसके लिए सो जाऊँ? कब -कब सो जाऊँ? कहाँ-कहाँ सो जाऊँ?"
"तो ठीक है तुम जिंदगी भर जगे ही रहो। जब, जहाँ ,जैसे इच्छा हो जगे रहो। अपनी आँखों को नींद से दूर ही रखना। देखता हूँ तुम जग कर ही इस भ्रष्ट दुनियां में कब , क्या और कितना कुछ बचा पाते हो? .... और जो कुछ  बचाने में भी सफल हो गए तो देखूँगा कि तुम क्या-क्या अपने साथ ऊपर ले जाओगे?"
"तो तुम्हारे कहने का मतलब है कि ईमानदारी..."
"छोड़ो भी यार! मेरे कहने का कुछ भी मतलब नहीं है। जो बुझाय करो। यहाँ तो हर कोई सिर्फ अपने ही स्वार्थ में डूबा है। यहाँ तो दुनियां का हर इंसान भ्रष्ट है सिवाय खुद को छोड़ के।"
"मेरे कहने का मतलब..."
"अब बस करो। बहुत सुन लिए तुम्हारा मतलब। मतलबी दुनियां में हर किसी का मतलब भी मतलब के अनुसार बदलते और परिभाषित होते रहता है।"
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#सुकुभा

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

दुर्गापूजा और वामपंथी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

दुर्गापूजा और वामपंथी
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हर साल की तरह इस साल भी दुर्गापूजा की शुरूआत आज कलश स्थापन के साथ शुरू हो रही है। लेकिन शक्ति की प्रतीक दुर्गा अपने ही अनुयायियों के द्वारा कितनी छलनी शब्दवाणों से की जा रही हैं। ये किसी से छिपा नहीं है। और यह करदानी पिछले कुछ वर्षों में कुछ ज्यादे ही हो गया है क्योंकि वामपंथियों की आँखें इन दिनों कुछ ज्यादे ही प्रगतिशील हो गई है। मजेदार बात तो ये है कि ये वामपंथी अपने-अपने घरों में बैठकर एकांत में घंटों माला जपेंगें और बाह्याडंबर वाले कर्मकांडों को प्रोत्साहित करेंगें और बाहर निकल कर उसी आवेग और त्वरा में देवी-देवताओं और ब्राह्मणों को गरियाते नजर आएंगें। और कभी कर्मकांडी के रूप में पकड़े जाएंगे तो पत्नी, बच्चे आदि पारिवारिक लोगों के इच्छा के सम्मान की बात करने लगते हैं। सच तो कभी बोलते ही नहीं।अरे भाई! जो इंसान प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी सभ्यता-संस्कृति पर थूके। जो करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करने से गुरेज न करे वो इंसान किसी व्यक्ति विशेष के अरमानों के आगे घुटना टेक देगा? इससे बड़ा सफेद झूठ क्या हो सकता है? छी: छी: इनकी इस दोगली नीति का कोई अंत नहीं है।

कभी-कभी ये समझ में नहीं आता है कि वे ब्राह्मण रूपी रावण का बचाव करते हैं या महिषासुर आदि का या फिर असत्य और दुर्गुण के प्रतीक इन महानुभावों का? ब्राह्मण को गाली देते हो तो रावण को क्यों बचाते हो? क्या आप रावण के दुर्गुणों से अपरिचित हैं? जबकि रावण इस बात का प्रतीक है कि कोई भी इंसान किसी भी उच्च या निम्न वंश में क्यों न जन्म ले? उसकी आखिरी गति उसके कर्मों से ही निर्धारित होती है। खैर, इसमें मैं क्यों उलझूँ? क्योंकि आपकी सोच ही आपकी स्थिति को स्पष्ट कर देती है।

आज से जब पूजन विधि की शुरूआत विधिवत होगी। मंत्रों और श्लोकों की गूंज माहौल को उत्सव में ढ़ाल रही होगी तो आपके कानों में दर्द शुरू हो जाएगा। आप ध्वनि प्रदूषण और पता नहीं क्या-क्या बकैती करते नजर आएंगे। मेले-ठेले से आपको परेशानी शुरू हो जाएगी क्योंकि आपके जीवन में उत्सव जैसा कोई चीज है ही नहीं। है तो सिर्फ एकांत और कुंठाग्रस्त पक्षपाती मानसिकता। सुविधा की राजनीति। बहुत ही अजीब लगता है आपका ये व्यवहार। लेकिन आप तो स्वतंत्रता के सबसे बड़े पोषक हैं। सभ्यता-संस्कृति और विरासत को भी तिलांजलि देकर भी आपको स्वतंत्रता चाहिए। शायद आप स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और उच्छश्रृंखलता के बीच के महीन अंतर को ही भूल गए हैं। जबकि आपको याद रखना चाहिए कि अनुशासन भी कोई चीज है। जो कि जीवन के लिए सबसे उपयोगी है।

इन दिनों मैंनें एक और चीज गौर की है। संभव है कि मेरा अवलोकन गलत हो लेकिन तथ्य यही है कि आप अपराधियों के बचाव में अक्सर सामने झंडे लिए नजर आते हो मानवता के नाम पर। लेकिन भूल जाते हैं उस निर्दोष की मानवता जो शिकार बन जिंदगी भर उस नासूर को अपने अंदर सहेजे रह जाता/जाती है। कभी आपकी अंतरात्मा आपको धिक्कारती नहीं? क्यों भूल जाते हैं कि दुर्गा भी एक स्त्री ही हैं। उन्हें भी अपने मान-मर्यादा को सुरक्षित रखने का अधिकार है। और जब आप दुर्गा रूपी स्त्री, जो कि महज एक आस्था है, मिट्टी का पुतला है, को ही पल -पल अपने शब्दों से आहत करते रहते हैं तो वास्तविक जीवन में आपसे क्या अपेक्षाएं शेष रह जाती हैं? महज राजनीति के लिए घिनौना खेल खेलकर भले ही आपको मजा आता हो लेकिन आप तो पूरी सभ्यता-संस्कृति को ही तहस-नहस किए हुए हैं।
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सुशील कुमार भारद्वाज
★★★★★★    ★★★★★★★

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

हिन्दी का झगड़ा

कुछ लोग आज हिन्दी हिन्दी की रट यूँ लगाए हुए हैं कि उनके बिना हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं। और कुछ प्रगतिशील लोग हिन्दी के विरोध में यूँ खंभा लेकर खड़े हैं कि पहले से हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं। लेकिन दोनों के दोनों हैं नकली।

फर्क बस इतना है कि कुछ लोग अँग्रेजी की गुलामी सहते हुए भी हिन्दी को छोड़ते नहीं और कुछ हैं जो हिन्दी की टाँग -हाथ तोड़ते हुए भी अँग्रेजी को मजबूरी में अपनाते रहते हैं।

लेकिन विशेष प्रगतिशील लोग, जो हमेशा स्वतंत्रता स्वतंत्रता की रट लगाए रहते हैं उन्हें शायद इस बात का इल्म ही तब नहीं रहता कि इस सृष्टि में कुछ भी स्वतंत्र नहीं है। दुनियां में उपलब्ध सारी चीजें किसी न किसी अदृश्य बंधन से बँधी है। जिसे शायद सभ्य समाज में अनुशासन के नाम से जाना जाता है।

और यदि जो हिन्दी को सम्मानित करने के लिहाज से राष्ट्रभाषा की माँग की जाती है तो बुराई क्या है? हिन्दी कम-से-कम अँग्रेजी की तरह विदेशी भाषा तो नहीं? संबंध और सम्पर्क भाषा के रूप में अँग्रेजी की जगह हिन्दी क्यों नहीं? ये कैसी समझ है कि ईर्ष्या-द्वेष और राजनीतिक विचारधारा की खातिर वर्षों तक उन्हें गुलामी पसंद है जबकि वे दिन-रात स्वतंत्रता की बात करते रहते हैं। क्या उनकी विचारधारा भी वैसी ही खोखली है?

अब वर्षों पुरानी बात दुहराना भी ठीक नहीं लगता कि नेहरूजी भारत को जैसे जम्मूकश्मीर जैसी समस्या दे गए वैसे ही भाषाई झगड़ा का भी बीज बो गए जबकि लोहिया जी ने इस भाषाई समस्या को दूर करने की भरसक कोशिश की लेकिन इंदिरा गांधी भी तो अपने पिता के ही पदचिन्हों पर चली!

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सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 19 अगस्त 2018

लेखक बनने की शर्त: सुशील कुमार भारद्वाज






वे कहते हैं कि लेखक बनना है तो वामपंथी बनना होगा और चरमपंथी तो आप अपनेआप बन जाएंगे। दोहरे चरित्र को जीने की आदत डालिए। सुविधानुसार विरोध-प्रदर्शन में शरीक रहिए। दिनभर खुद को गाली देते रहिए मने गाली देने का नाटक करते रहिए। दलित-महादलित और अन्य उत्पीड़न के नाम पर आठ-आठ आँसू बहाते रहिए।

और जातिगत भावना को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखने के लिए आरक्षण का माला जपते रहिए। आरक्षण में भी आरक्षण की संभावना को तलाशते रहिए। और फिर सामने वाले को मनुवादी-मनुवादी कह कर गरियाते रहिए। और स्वयं न सिर्फ सामंतवादी व्यवहार में समायोजित होते रहिए बल्कि जमकर पूजा-पाठ भी करते रहिए। कभी कोई तस्वीर पूजा करते हुए वायरल हो जाए तो पत्नी या घरवालों की इच्छा का सम्मान कहकर चुपके से निकल लीजिए और दूसरे पर ताना मारते रहिए।

भाई, इतना आसान नहीं है लेखक बनना! आपको सिर्फ गुटबाजी करना ही नहीं आना चाहिए बल्कि गुट के लेखकों की घटिया-से-घटिया रचना पर भी वाह -वाह करते रहना आना चाहिए। और गुट के सच्चे सिपाही की ही तरह प्रचार प्रसार में ही महारत हासिल मत कीजिए बल्कि गालीगलौज करने के लिए भी तैयार रहिए।

कविता-कहानी के लिए विषयों को कौन पूछता है? कुछ भी लिख डालो। बस ख्याल सिर्फ इतना रहे कि उसमें उत्पीड़न की भावना दिखनी चाहिए। और यदि आप इसमें सफल रहे तो आप सबसे चर्चित और सबसे अच्छे साहित्यकार के रूप में जल्द ही स्थापित हो जाएंगे।

हाँ, कुछ लोगों को जाति-धर्म, समाज और सुंदरता का तड़का भी चाहिए। और भी बहुत कुछ लेकिन शेष बातें फिर कभी......

★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

शुक्रवार, 22 जून 2018

अज्ञेय की कहानी मुस्लिम मुस्लिम भाई भाई


मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई/अज्ञेय
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छूत की बीमारियाँ यों कई हैं;पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक,कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? -और मारती है तो स्वयं नहीं,दूसरी बीमारियों के ज़रिये।कह लीजिए कि वह बला नहीं,बलाओं की माँ है...

नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है,वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष,और कमीनापन आ घुसते हैं,और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!

घृणा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा।छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है;सरदारपुरे में इस छूत को लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक -रोज़ाना अखबार!

यों अखबार में मार-काट,दंगे-फ़साद,और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं,और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे - दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे।पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।

उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाटों और मुसलमानों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं - ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। केवल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’

इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।

सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या... फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो भी लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं...

गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े।दरवाजों से, खिड़कियों से,जो जैसे घुस सका,भीतर घुसा।जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये,छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये।जाना ही तो है,जैसे भी हुआ,और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो...

गाड़ी चली गयी।कैसे चली और कैसे गयी,यह न जाने,पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!
और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल,जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े,कुछ रोगी,कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली,जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।

सकीना ने कहा,“या अल्लाह,क्या जाने क्या होगा।”
अमिना बोली,“सुना है एक ट्रेन आने वाली है - स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी - उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न?उसी में क्यों न बैठे?”

“कब जाएगी?”
“अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..”
जमीला ने कहा,“उसमें हमें बैठने देंगे?अफ़सर होंगे सब...”
“आखिर तो मुसलमान होंगे - बैठने क्यों न देंगे?”
“हाँ,आखिर तो अपने भाई हैं।”

धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर।अमिना,जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं।उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी...

तीनों के स्वामी बाहर थे- दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे - उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा!

सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी,उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी।अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे;जमीला का खाविन्द शादी के बाद ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये चार बरस हो गये थे।

अब... तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं,और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक... न जाने कब क्या हो - और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है,अभी उन्होंने देखा ही क्या है?

सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी,सो अब वह भी नहीं,न जाने कब क्या हो...अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही...

स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई,और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।

अमिना,सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था,एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली।जो कुछ गहना-छल्ला था,वह ट्रंक में अँट ही सकता था,और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे।और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।

ज़मीला ने कहा, “वह उधर ज़नाना है!” - और तीनों उसी ओर लपकीं।
ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं,दो की गोद में बच्चे थे।एक ने डपटकर कहा, “हटो, यहाँ जगह नहीं है।”

अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, “बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे - मुसीबत में हैं...”

“मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ,आगे देखो...”
जमीला ने कहा, “इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।”

“जाना है तो जाओ,थर्ड में जगह देखो।बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!”और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर,उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।

जमीला को बुरा लगा।बोली, “इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं...”

इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया।उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं,पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे,नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।

सकीना ने कहा,“तो बुला लो न गार्ड को।आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।”

“जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न!कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल,ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है,पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि...” एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, “भैया!ओ अमजद भैया!देखो ज़रा,इन लोगों ने परेशान कर रखा है...”

‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये।चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले,“क्या है?”

“देखो न,इनने तंग कर रखा है।कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं।कहा कि स्पेशल है,सेकंड है,पर सुनें तब न।और यह अगली तो...”

“क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-”

जमीला ने कहा, “क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के लोग ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं,पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और...”

“और टिकट?”

“और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?”

अमिना ने कहा, “मुसीबत के वक्त मदद न करे,तो कम से कम और तो न सताएँ!हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? -

हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर - या अल्लाह!”

“अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?”

किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाकलर चिकटनी खोले,दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें।

जिधर जमीला थी,उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।

भीतर से आवाज़ आयी, “खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को...

सकीना ने तड़पकर कहा, “कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया...”

“बड़ी पाक़दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच भागकर जा रही हो, आखिर कैसे?

उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने...”

जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, “छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!”

सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, “या अल्लाह!”

गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।

जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, “थूः!” और क्षण-भर बाद फिर, “थूः!”

आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, “गयी पाकिस्तान स्पेशल।या परवरदिगार!”
                                    (इलाहाबाद,1947)

गुरुवार, 21 जून 2018

गीताश्री का उपन्यास हसीनाबाद और शहंशाह आलम की टिप्पणी



स्त्री-जीवन के धुएँ और धुँध को हटाकर उम्मीदों वाले रंग का वैविध्य दिखाता कथा-समय
     संदर्भ : गीताश्री का उपन्यास 'हसीनाबाद'
     ● शहंशाह आलम



एक औरत की ज़िंदगी के जो सपने होते हैं, वे सपने अकसर धोखों से, परेशानियों से, बेचैनियों से भरे होते हैं। इनको सीढ़ियाँ भी अकसर चक्करदार ही मिला करती हैं चढ़ने के लिए। इनकी ज़िंदगी में अकसर जो मर्द आते हैं, वे कोई जादूगर नहीं होते, जो इनको सिर से पाँव तक ख़ुशरंग रोशनियों से नहलाएँ। वे अकसर-अकसर डरावने चेहरे और डरावनी आँखों वाले होते हैं। ज़िंदगी की चक्करदार सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते ये बेचारियाँ भी कहाँ रोशनी बिखेरने वाली रह जाती हैं। इनके होंठों पर हँसी भी आती है तो बस आकर रेंगती हुई-सी गुज़र जाती है। इन औरतों की रूहें बस इसी तरह आती और जाती रहती हैं। रूहें, जो गवाह भर होती हैं इनके धोखों से भरे हुए सपनों की। आज की राजनीति भी औरतों के आजू-बाजू कुछ-कुछ डरावने सपने की तरह आवाजाही करती रहती है। मगर 'हसीनाबाद' की गोलमी जो है, वह बिजली वाली लड़की है। यह लड़की डर पैदा करने वाले चेहरों से, उन चेहरों पर टँगी आँखों की ऊपर-नीचे करतीं पुतलियों से घबराती कहाँ है :
          चौदह साल की गोलमी नाच रही थी, जैसे वह हरदम नाचा करती थी, सुधबुध गँवाई के।
          उसके साथ पूरी पृथ्वी नाच रही थी। नाचते-नाचते वह देवलोक और पृथ्वीलोक की दूरियाँ पाट दिया करती थी। सब हतप्रभ होकर देख रहे थे कि ये हुनर इसने सीखा कहाँ से? न नृत्य की तालीम और न सुरों की पहचान! नाचते-नाचते बेसुध-सी जब दोनों हाथ ऊपर उठाती थी तो मानो आकाश थोड़ा और नीचे झुक जाता था और धरती थोड़ी और ऊपर उठ जाती थी ( पृ. 13 )।

     स्त्री-जीवन का क्रम कितना उलट-पुलट है। हैरत तब होती है, जब उसका जीवन उलट-पुलट रहते हुए भी वे अपने समय को कितना सहेजकर, सजाकर, संभालकर रखती हैं। यह सहेजना, सजाना, संभालना एक स्त्री ही तो कर सकती है। गीताश्री ने भी यह काम बख़ूबी किया है। यह उपन्यास लिखने से पहले गीताश्री ने अपनी किरदार गोलमी के जीवन-चक्र ख़ुद के भीतर आत्मसात किया होगा। तब इसे एक पूर्ण उपन्यास के एक पूर्ण पात्र के रूप में स्थापित कर पाई होंगी। तभी एक उपन्यास की बहती हुई नदी जैसी भाषा का ईजाद कर पाई होंगी। 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इसकी भाषा की रवानी को देखकर आप भी महसूस करेंगे। इसकी भाषा मीठी है और खट्टी भी। जिस तरह गोलमी की पूरी ज़िंदगी मीठी और खट्टी रही है। गोलमी की माँ तक जब गीताश्री पहुँचती हैं गोलमी की ज़िंदगी और दमदार हो जाती है। गोलमी के पाँव में जिस तरह बिजली दौड़ती है और वह नाचते हुए कितनों को हतप्रभ कर जाती है, ख़ुद इसका और इसकी माँ की ज़िंदगी का सारा कुछ किसी नाच की तरह अथवा किसी झूमर गाने की तरह कहाँ था कि ख़ुश होकर दोनों माँ-बेटी ख़ुशी वाली तालियाँ बजा सकें। गोलमी की माँ सुन्दरी का जीवन ठाकुर-परंपरा से उबाऊ हो चला था :
          उस दिन सुन्दरी धम्म से आकाश से गिरी थी ज़मीन पर। लहूलुहान हो गई थी जैसे आत्मा और देह, दोनों। मालती ने आकर बताया कि बस्ती को सड़क-मार्ग से जोड़ा जा रहा था। और हसीनाबाद में स्कूल और डाकघर खुलेंगे। साथ ही चुनाव में वोटर बनेंगे यहाँ के लोग। जनगणना के लिए जल्दी ही लोग आएँगे। मालती ख़ुश थी, बहुत ख़ुश। ऐसा परिवर्तन वह सोच भी नहीं सकती थी। बस्ती थोड़ी बड़ी हो रही थी। बदल रही थी। उसे बदला जा रहा था।
          सुन्दरी को बस्ती के विकास से समस्या नहीं हुई। वह तो चीत्कार कर उठी, जब उसे मालती ने यह भी बताया कि बच्चों के पिता के नाम के आगे ठाकुरों के नहीं, उनके कारिंदों के होंगे ( पृ. 39 )।

     गीताश्री को पढ़ते हुए अकसर सोचता रहा हूँ कि इनके गद्य की पंक्तियाँ ऐसी हैं कि आप इनके लिखे को पढ़ते चले जाते हैं। बिना किसी रुकावट। बहुत सारे कथाकार की तरह इनके यहाँ जड़ शब्द नहीं आते। इनके शब्दों की ताज़गी आपको दूर और देर तक इनके लिक्खे को पढ़ा जाती है। आप गीताश्री को पढ़ते हुए थक नहीं जाते। इनकी कथावस्तु और इनका कथाशिल्प ज़्यादा दाँव-पेच नहीं जानते। 'हसीनाबाद' उपन्यास के पाठ के समय मैंने यही महसूस किया। आप इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करते हैं और पढ़ते हुए कहीं ठहरते हैं तो यही सोचकर कि जो पढ़ा है, उस पढ़े हुए का रंग-रोग़न अपने ज़ेहन में बचाकर रख लिया जाए। मन बेचैन हो तो इस रंग-रोग़न से बेचैनी दूर की जा सके। गीताश्री का रंग-रोग़न उम्मीदों से भरा जो है। यही वजह है कि कइयों के मुक़ाबले इनके उपन्यास का कथातत्व मुझे ज़्यादा प्रभावकारी लगा। गीताश्री के कथातत्व से धपाधप की आवाज़ से साबक़ा न पड़कर एक ऐसी महीन आवाज़ से आपका साबक़ा पड़ता है, जो आपकी रूह तक को कई जीवन-चित्र दिखाती है और यह महीन आवाज़ आपके भीतर पैबस्त हो जाती है ताकि गीताश्री के कथा-समय से आप किसी तरह का अजनबीपन महसूस न कर सकें। इसी तरह आपको 'हसीनाबाद' के हर पात्र की हर अदा भी अपने क़ब्ज़े में कर लेती है। चूँकि 'हसीनाबाद' के सारे पात्र ज़िंदा पात्र हैं। सभी पात्र अपना पक्ष जीतने को तत्पर भी दिखाई देते हैं :
          ठाकुर सजावल सिंह के यहाँ आज रौनक़ थी। उनके बेटे रमेश का जन्मदिन था। रमेश को उन्होंने अपने मन से अपना लिया था, नाम दिया था, पहचान दी थी। बदनाम गली से ले आए थे अपनी कोठी पर ही। रमेश का नाम भी लिखवा दिया था स्कूल में। इस साल सब कुछ ठीक रहता तो इण्टर पास कर लेता। मगर रमेश का मन ही नहीं होता था बहुत कुछ करने का! रमेश को हर समय अपनी माँ का ध्यान आता। उसे हर समय लगता कि आख़िर ऐसा हुआ क्या था कि वह उसे छोड़कर चली गई? क्या उसके बाबा ने माँ को परेशान किया था? मगर बाबा की भी तो अपनी एक और बीवी है, जो दिल्ली में है और बाबा के बच्चे भी दिल्ली में पढ़ते हैं। तो वह उनका बेटा कैसे है? हसीनाबाद की गलियों में रहते-रहते वह हसीनाबाद के इतिहास से परिचित हो गया था ( पृ. 86 )।

     'हसीनाबाद' जैसी बदनाम बस्ती दुनिया भर में पहले भी थी। अब भी है। मेरे पैदायशी शहर मुंगेर में तो इस बदनाम बस्ती को मैंने बहुत क़रीब से देखा है। जाना भी है। इसी बदनाम बस्ती में मेरे जानने वाले एक कॉमरेड एक हसीना को दिल से बैठे। बाद में बाज़ाब्ता शादी कर ली। घर बसाया। बच्चों को ईमानदारी से अपना नाम दिया, किरदार दिया, ठिकाना दिया। गीताश्री के 'हसीनाबाद' के पात्र भी ऐसा करते हैं तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नहीं है। आश्चर्य राजनीति के घातकपन से होता है। यह नया दौर है। इस नए दौर में राजनीति का चेहरा-मोहरा, रंग-ढंग, चाल-चलन सब जनता को परेशान करने को तत्पर रहता है। इस तत्परता का पर्दाफ़ाश भी इस उपन्यास में बख़ूबी किया गया है। पिंजरे के परिंदे जैसी हालत आज आज की राजनीति के कारण है। इसमें कोई शक नहीं। मगर गीताश्री इस बुरे अनुभवों के बारे में सबकुछ जानती हैं। समझती भी हैं। लेखिका की सार्थकता इसी में है।
     एक सच्चाई यह भी है कि इसको पढ़ते हुए जो नया समा बंधना चाहिए, नहीं बँधता। ऐसी बदनाम बस्ती पर और ऐसी तथाकथित राजनीति पर हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। इस वजह से भी किसी नए तत्व की चाह इस उपन्यास को पढ़कर रह ही जाती है। मगर इसका अर्थ यह क़तई नहीं कि गीताश्री का यह उपन्यास कम दिलचस्प है। क़िस्सागोई का तरीक़ा गीताश्री के पास है। अपने इस उपन्यास के बहाने इसके कथा-समय को छीलने में गीताश्री पूरी तरह सफल दिखाई देती हैं। यह उपन्यास एक गुमनाम और बदनाम बस्ती से होते हुए राजनीति के गलियारे तक जाता है। यही वजह है कि 'हसीनाबाद' हिंदी की उपन्यास-परंपरा के साँचे में पूरी तरह ढला लगता है। यह साँचा रचनात्मक है। यह उपन्यास आपको अपने आसपास बाँधे रखता है। प्रकाशक की तरफ़ से उपन्यास के बारे में दी हुई यह सफ़ाई सही है कि 'हसीबाबाद' के नाम से ये भ्रम हो सकता है कि यह उपन्यास स्त्रियों की दशा-दुर्दशा पर केंद्रित है लेकिन नहीं, 'हसीनाबाद' ख़ालिस राजनीतिक उपन्यास है जिसमें इसकी लेखिका औसत को केंद्र में लाने के उपक्रम में विशिष्ट को व्यापक से संबद्ध करती चलती है।' प्रकाशक का यह कथन सच है, तब भी यह उपन्यास स्त्रियों के बहाने ही अपने लोकजीवन को प्राप्त करता है। गीताश्री के इस 'हसीनाबाद' से गुज़रते हुए हम अपने दाँत निपोरकर रह नहीं जाते बल्कि राजनीति के विरुद्ध हमारा जो लोकस्वर होना चाहिए, वही अंत तक बचा रहता है। हम इस 'हसीनाबाद' को पढ़कर एक अच्छा गद्य लिखने का तरीका सीख सकते हैं।
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हसीनाबाद ( उपन्यास ) / लेखिका : गीताश्री / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002 / मूल्य : ₹ 250 / मोबाइल संपर्क : 09818246059
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गुरुवार, 10 मई 2018

बौद्धों के प्रभाव को कम करने वाले उदयनाचार्य :सुशील कुमार भारद्वाज


बौद्धों के प्रभाव को कम करने वाले उदयनाचार्य  
सुशील कुमार भारद्वाज


बिहार के समस्तीपुर जिला अंतर्गत शिवाजीनगर प्रखंड के करियन ग्राम में जन्में उदयनाचार्य अर्थात आचार्य उदयन प्राचीन न्याय वैशेषिक परम्परा के आखिरी महत्त्वपूर्ण दार्शनिक माने जाते हैं. सच तो ये है कि नव्यन्याय के संस्थापक उदयनाचार्य ने ‘न्याय वैशेषिक’ के दर्शन को ही नए रूप में ‘नव्यन्याय’ में परिणत कर दिया. दरअसल उदयनाचार्य के लेखन में न्याय और वैशेषिक दर्शन जिस रूप में मिलता है और प्रणाली विज्ञान के प्रति उनकी जो अति सूक्ष्म निष्ठा पाई जाती है, वह ‘नव्यन्याय’ की विचार प्रणाली के बहुत ही करीब है.
महामहिषी कुमारिलभट्ट के शिष्य उदयनाचार्य ने बढ़ते बौद्ध प्रभाव को रोकने के लिए न सिर्फ पुरजोर कोशिश की बल्कि वेद की सत्ता को स्थापित करने के लिए ईश्वर के अस्तित्त्व को भी स्थापित करने की कोशिश की. नास्तिकता को नकारते हुए आस्तिकता को मजबूती प्रदान करने की कोशिश की. भविष्य पुराण में एक उदाहरण पढ़ने को मिलता है कि ‘जब एक बौद्ध पंडित ने राजा को बौद्ध विचारधारा से जोड़ने के लिए चुनौती दी कि यदि आपके पास वेदों के विद्वान हैं तो मुझसे शास्त्रार्थ करने के लिए भेजें. तब राजा ने उदयनाचार्य को कुछ पंडितों के साथ भेजा. जहां बौद्ध पंडित ने अपने मायिक प्रयोग से एक शिलाखंड को पानी बना दिया और उदयनाचार्य को उस पानी को पुनः शिलाखंड में तब्दील करने की चुनौती दे डाली और बिना समय गवाए उदयनाचार्य ने सफलतापूर्वक पानी को पुनः शिलाखंड बना दिया.’
इसी घटना से एक किंवदंती भी जुड़ी हुई है कि जब उदयनाचार्य ने उसी बौद्ध पंडित के सामने यह चुनौती रखी कि ‘वे दोनों दो बड़े तालवृक्ष पर चढ़कर कूदेंगे और जो जिएगा वो जीतेगा, तो बौद्ध पंडित ने चुनौती स्वीकार कर ली और ‘वेद अप्रमाण है’ कहकर कूद गया और मर गया जबकि ‘वेद प्रमाण है’ कहकर कूदने वाले उदयनाचार्य जीवित रहकर जीत गए. और राजा ने वेदशास्त्र का प्रमाण्य नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया और उन्हें राजगुरू बना दिया. साथ ही राजा ने नास्तिकों के सारे शास्त्र पानी में फिंकवा दिए और सारे नास्तिकों को सजा देकर सख्ती से आस्तिक बना दिया.
लेकिन यह भी जगजाहिर है कि श्रीहर्ष ने अपने पिता की हार का बदला चुकाने के लिए उदयनाचार्य को चुनौती दी और खंडन खंडवाद में उदयन के मत का खंडन भी किया.
इस तरह के पौराणिक कथा में सत्य और दंतकथा का घालमेल हो सकता है लेकिन इतना तो तय है कि उदयनाचार्य ने बौद्ध दार्शनिकों से शास्त्रार्थ करके न्याय दर्शन को प्रतिष्ठापित किया. महान नैयायिक उदयनाचार्य भारत में बौद्ध दर्शन का खंडन करते हुए उसके वैचारिक प्रभाव को कम करने वाले पंडितों में से एक प्रभावशाली पंडित थे. उनके ग्रन्थ विशेषकर आत्मतत्व विवेक में बौद्ध दर्शन की बहुत ही तीखी आलोचना हुई है. उनका बौद्ध दर्शन का खंडन सूक्ष्म बुद्धि और वाद कौशल का एक बेहतरीन नमूना है.
दसवीं सदी के चरम पाद या ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्में सनातनी परम्परा के उदयनाचार्य के सात ग्रंथों में “आत्मतत्व विवेक” और “न्यायाकुसुमांजलि” स्वतंत्र ग्रन्थ हैं जबकि “लक्षणावली” और “लक्षणमाला” संग्राहक प्रकरण ग्रन्थ हैं और शेष ग्रन्थ अन्य की टीका. जहां ‘किरणावली’ प्रशस्तपादभाष्य की टीका है वहीं ‘तात्पर्यपरिशुद्धि’ वाचस्पति मिश्र रचित ‘न्यायवार्तिक’ की प्रौढ़ व्याख्या है जिसे ‘न्यायनिबंध’ भी कहा जाता है. ‘लक्षणावली’ जहां वैशेषिक दर्शन का सार संग्रह है तो ‘बोधसिद्धि’ न्यायसूत्र की वृत्ति है. ‘आत्मतत्व विवेक’ में बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद के सिद्धांतों का विस्तृत खंडन ईश्वर की सिद्धि नैयायिक पद्धति से की गई है. और विशेष परिपक्व और तार्किकतापूर्ण यह ग्रन्थ उदयनाचार्य की सर्वश्रेष्ठ कृति भी है. जबकि न्यायकुसुमांजलि में ईश्वर की सिद्धि विभिन्न तार्किक तथ्यों से की गई है. ऐसा माना जाता है कि ईश्वरसिद्धि विषयक ग्रंथों में यह संस्कृत के दार्शनिक साहित्य में एक महत्वपूर्ण दखल रखती है. कुसुमांजलि में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि के लिये निम्नलिखित नौ 'प्रमाण' दिए गए  हैं-

कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः।
वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः॥ 


श्लोक को ऐसे देखा जा सकता है-

1.  कार्यात्- यह जगत् कार्य है अतः इसका निमित्त कारण अवश्य होना चाहिए. जगत् में सामंजस्य एवं समन्वय इसके चेतन कर्ता से आता है. अतः सर्वज्ञ चेतन ईश्वर इस जगत् के निमित्त कारण एवं प्रायोजक कर्ता है.
2.  आयोजनात् - जड़ होने से परमाणुओं में आद्य स्पन्दन नहीं हो सकता और बिना स्पंदन के परमाणु द्वयणुक आदि नहीं बना सकते. जड़ होने से अदृष्ट भी स्वयं परमाणुओं में गतिसंचार नहीं कर सकता. अतः परमाणुओं में आद्यस्पन्दन का संचार करने के लिए तथा उन्हें द्वयणुकादि बनाने के लिए चेतन ईश्वर की आवश्यकता है.
3.  धृत्यादेः – जिस प्रकार इस जगत् की सृष्टि के लिए चेतन सृष्टिकर्ता आवश्यक है, उसी प्रकार इस जगत् को धारण करने के लिए एवं इसका प्रलय में संहार करने के लिए चेतन धर्ता एवं संहर्ता की आवश्यकता है. और यह कर्ता-धर्ता-संहर्ता ईश्वर है.
4.  पदात्- पदों में अपने अर्थों को अभिव्यक्त करने की शक्ति ईश्वर से आती है. इस पद से यह अर्थ बोद्धव्य है”, यह ईश्वर-संकेत पद-शक्ति है.
5.   प्रत्यतः
6.  श्रुतेः
7.  वाक्यात्
8.  संख्याविशेषात्- नैयायिकों के अनुसार द्वयणुक का परिणाम उसके घटक दो अणुओं के परिमाण्डल्य से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि दो अणुओं की संख्या से उत्पन्न होता है. संख्या का प्रत्यय चेतन द्रष्टा से सम्बद्ध है, सृष्टि के समय जीवात्मायें जड़ द्रव्य रूप में स्थित हैं एवं अदृष्ट, परमाणु, काल, दिक्, मन आदि सब जड़ हैं. अतः दो की संख्या के प्रत्यय के लिए चेतन ईश्वर की सत्ता आवश्यक है.
9.   अदृष्टात्- अदृष्ट जीवों के शुभाशुभ कर्मसंस्कारों का आगार है. ये संचित संस्कार फलोन्मुख होकर जीवों को कर्मफल भोग कराने के प्रयोजन से सृष्टि के हेतु बनते हैं. किन्तु अदृष्ट जड़ है, अतः उसे सर्वज्ञ ईश्वर के निर्देशन तथा संचालन की आवश्यकता है. अतः अदृष्ट के संचालक के रूप में सर्वज्ञ ईश्वर की सत्ता सिद्ध होती है.

दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायमत में जगत् के कर्तव्य से ईश्वर की सिद्धि मानी जाती है और बौद्ध नितांत निरीश्वरवादी हैं. षड्दर्शनों में भी ईश्वरसिद्धि के विविध प्रकार हैं. उदयनाचार्य ने इन सबका सम्यक अध्ययन करने के पश्चात ही अपने मत की प्रतिस्थापना की.
उदयनाचार्य के विषय में यह किंवदन्ति भी प्रसिद्ध है कि जब ये असमय पुरी में जगन्नाथ मंदिर पहुँचे तो दरवाजा बंद मिला. तब इन्होंने भगवान को ललकार कर कहा था कि ऐश्वर्य के मद में मत्त आप मेरी अवज्ञा कर रहे हैं, किन्तु (निरीश्वरवादी) बौद्धों के उपस्थित होने पर आपका अस्तित्व मेरे अधीन हो जाता है. और उदयनाचार्य के ऐसा बोलते ही बंद दरवाजे खुल गए. और थोड़े दिन के बाद खुद जगन्नाथ ने वहां पुजारियों को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि मेरी मूर्ति पर जो पीताम्बर है, वह उदयनाचार्य को दीजिए, क्योंकि वह मेरा ही अंश है. उसने मेरी स्थापना की है. मेरा अस्तित्व सिद्ध किया है जब बौद्ध मेरा तिरस्कार कर रहा था.
 गौरतलब है कि प्रौढ़ नैयायिक उदयनाचार्य ने 'न्यायकुसुमांजलि' को पूरा करके उपसंहार में लिखा है कि वे साफ-सच्चे और ईमानदार नास्तिकों के लिए भी वही स्थान चाहते हैं जो सच्चे आस्तिकों को मिले. उन्होंने अपनी बात इस तरह से कही है-  
“इत्येवं श्रुतिनीति संप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते
येषां नास्पदमादधासि हृदये ते शैलसाराशया:।
किन्तु प्रस्तुतविप्रतीप विधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तका:
काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नरा:”

‘जातिबाधक’, ‘अनवस्था’ आदि सिद्धांत को विकसित करने वाले मिथिलावासी उदयनाचार्य पुरी से लौटने के बाद पुनः मिथिला आए और वर्षों तक शास्त्र का अध्ययन करते रहे. और वृद्धावस्था में काशी में आकर अपने प्राण त्याग दिए. 
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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

मुसहरों की जिंदगी है ‘दक्खिन टोला’ (समीक्षा)


मुसहरों की जिंदगी है ‘दक्खिन टोला’ (समीक्षा)






सुशील कुमार भारद्वाज
रंगमंच और पत्रकारिता की दुनिया से कथा-कहानी के क्षेत्र में आए कमलेश की पहली कहानी-संग्रह ‘दक्खिन टोला’ इन दिनों काफी चर्चा में है. यूँ तो बांध, मउगा, कठकरेजी, हत्यारा, दक्खिन टोला, सपनों के पार, अंचरा पर लौंडा, दुश्मन, जमीन, अपने लोग, गड़हा, डफ बज रहा है, जैसी बारह कहानियों का यह संग्रह पूर्ण रूप से मुसहरों की ही कहानी है. जिसे कथाकार ने अपने शिल्पकला के साथ कुछ इस तरह शब्दबद्ध किया है कि आप शुरू से अंत तक इसमें खोकर न सिर्फ पढ़ते रहते हैं बल्कि उठाए गए समस्याओं से भी रूबरू होते रहते हैं. जहां ये कहानियां कई बार चौंकती हैं तो कई बार आपको निःशब्द भी कर देती हैं. पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर केंद्रित ये कहानियां न सिर्फ भोजपुर और बक्सर की पृष्ठभूमि में लिखी गई है बल्कि बेगूसराय के बसही में आए बाढ़ के बहाने त्रस्त जिंदगी और उस त्रासदी के बीच भी फैले भ्रष्टाचार को रेखांकित करने की कोशिश करती है. जो आपके मर्म को छूती हैं. जो आपको काफी कुछ सोचने को मजबूर कर देती हैं. कमलेश बहुत ही सहजता के साथ कहानी का वातावरण बुनते हुए विषय में प्रवेश करते हैं और जीवन की आम घटनाओं को खास नज़रिए से प्रस्तुत करते हैं. जहां जीवन का नितांत सुख-दुःख, प्रेम-त्याग, धोखा-समर्पण आदि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है. वे लगभग अपनी हर कहानी में जहां लोक-संस्कृति और गीत-संगीत का पुट भरते हैं वहीं बोलचाल की भाषा के साथ-साथ ‘इटैलियन सैलून’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर भाषा के साथ भी खेलने की भी कोशिश करते हैं. ‘जमीन’ जहां अतिकाल्पनिक जान पड़ती है तो ‘अंचरा पर लौंडा’ जैसी कहानियां आपको निःशब्द भी कर देती हैं.

‘दक्खिन टोला’ आश्वस्त करती है कि कमलेश अपनी हर कहानी के साथ परिपक्व होते जा रहे हैं और आने वाले वर्षों में हिंदी साहित्य में अपनी मुकमल पहचान बनाएंगें.
पुस्तक :- दक्खिन टोला
कथाकार:- कमलेश
प्रकाशक :- वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य:- 195
पृष्ठ:- 197