मुसहरों की जिंदगी है ‘दक्खिन टोला’ (समीक्षा)
सुशील कुमार भारद्वाज
रंगमंच और
पत्रकारिता की दुनिया से कथा-कहानी के क्षेत्र में आए कमलेश की पहली कहानी-संग्रह
‘दक्खिन टोला’ इन दिनों काफी चर्चा में है. यूँ तो बांध, मउगा, कठकरेजी, हत्यारा,
दक्खिन टोला, सपनों के पार, अंचरा पर लौंडा, दुश्मन, जमीन, अपने लोग, गड़हा, डफ बज
रहा है, जैसी बारह कहानियों का यह संग्रह पूर्ण रूप से मुसहरों की ही कहानी है. जिसे
कथाकार ने अपने शिल्पकला के साथ कुछ इस तरह शब्दबद्ध किया है कि आप शुरू से अंत तक
इसमें खोकर न सिर्फ पढ़ते रहते हैं बल्कि उठाए गए समस्याओं से भी रूबरू होते रहते
हैं. जहां ये कहानियां कई बार चौंकती हैं तो कई बार आपको निःशब्द भी कर देती हैं.
पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर केंद्रित ये कहानियां
न सिर्फ भोजपुर और बक्सर की पृष्ठभूमि में लिखी गई है बल्कि बेगूसराय के बसही में
आए बाढ़ के बहाने त्रस्त जिंदगी और उस त्रासदी के बीच भी फैले भ्रष्टाचार को
रेखांकित करने की कोशिश करती है. जो आपके मर्म को छूती हैं. जो आपको काफी कुछ
सोचने को मजबूर कर देती हैं. कमलेश बहुत ही सहजता के साथ कहानी का वातावरण बुनते
हुए विषय में प्रवेश करते हैं और जीवन की आम घटनाओं को खास नज़रिए से प्रस्तुत करते
हैं. जहां जीवन का नितांत सुख-दुःख, प्रेम-त्याग, धोखा-समर्पण आदि स्पष्ट रूप से
परिलक्षित होता है. वे लगभग अपनी हर कहानी में जहां लोक-संस्कृति और गीत-संगीत का
पुट भरते हैं वहीं बोलचाल की भाषा के साथ-साथ ‘इटैलियन सैलून’ जैसे शब्दों का
इस्तेमाल कर भाषा के साथ भी खेलने की भी कोशिश करते हैं. ‘जमीन’ जहां अतिकाल्पनिक जान
पड़ती है तो ‘अंचरा पर लौंडा’ जैसी कहानियां आपको निःशब्द भी कर देती हैं.
‘दक्खिन टोला’
आश्वस्त करती है कि कमलेश अपनी हर कहानी के साथ परिपक्व होते जा रहे हैं और आने
वाले वर्षों में हिंदी साहित्य में अपनी मुकमल पहचान बनाएंगें.
पुस्तक :- दक्खिन
टोला
कथाकार:- कमलेश
प्रकाशक :- वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य:- 195
पृष्ठ:- 197


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