बुधवार, 15 जून 2016

ध्रुव गुप्त की "मुझमें कुछ है जो आईना-सा है" की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हों अथवा कविताएँ, दोनों ही में हम पाते हैं कि वे परदे में छिपी हुई आवाज़ को मुखर करते हैं, अपनी आवाज़ की ताक़त भर देते हैं, जिससे मांसहीन आदमी भी अपनी आवाज़ में एक नई तरह की ऊर्जा महसूस करता है माननीयों के विरुद्ध खड़ा होते हुए, अपने कठिन दिनों के विरुद्ध खड़ा होते हुए। ध्रुव गुप्त ग़ज़ल सिंफ़ (विधा) को एक अलग तरह की ऊँचाई प्रदान करते हैं। इनकी ग़ज़ल-प्रतिभा की संपन्नता हमें चकित करती है। इनकी ग़ज़लों में अभिव्यक्त यथार्थ भी थोड़ा अलग है। पढते हैं ध्रुव गुप्त की "मुझमें कुछ है जो आईना-सा है" की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में।


भारतीय हिंदी ग़ज़लकारों में ध्रुव गुप्त बहुत ही इज़्ज़त और मुहब्बत से लिया जानेवाला नाम है। इसका मुख्य कारण ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हैं, जो पाठ के समय कुछ ऐसा अद्भुत समा बाँधती हैं, जैसे किसी बहती हुई नदी को आप बारिश के वक़्त देखते हैं। बारिश के वक़्त नदी की जो असली ख़ूबसूरती उभरकर सामने आती है, उसके तसव्वुर मात्र से मन में जो रागात्मकता जन्म लेती है, ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें कुछ वैसा ही आभास दिलाती हैं। मेरी मान्यता है कि ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें ग़ज़ल के बारे में एक नई समझ विकसित करती हैं। नई गहराई और नई समझदारी भी। हिंदी के बहुत सारे शायरों की तरह ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें अधोलोक से आई हुई ग़ज़लें नहीं होतीं बल्कि इनकी ग़ज़लें बिना किसी लाग-लपेट के सीधे इनके दिल से निकली हुई होती हैं :
     सबने दो-चार हर्फ़ लिख डाले,
     मेरे चेहरे में अब मेरा क्या है।
या,
     घर मेरे दिल में भी रहा न कभी,
     घर में मैं भी ज़रा- सा रहता हूँ।
या,
     सारी नज़रों से दरकिनार हुआ,
     मैं गए वक़्त का अख़बार हुआ।

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हमें एक नए घर में प्रवेश कराती हैं, एक ऐसे नए घर में, जहाँ से आपको वापस लौटने की इच्छा नहीं होती। इसलिए कि ध्रुव गुप्त का जो ग़ज़ल-संसार है, उसकी आभा जीवन के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। जबकि जीवन को हमारे वक़्त के माननीय जटिलताओं से भर दे रहे हैं। आदमी को मांसहीन बना रहे हैं। इस पर बार-बार विचार किया जाना चाहिए कि मनुष्य को जो कुछ अच्छा और बढ़िया चाहिए, वह किस समय-काल में मिलेगा :
     पाँव में अपने छाले हैं, या,
     टुकड़ा-टुकड़ा आसमान है।

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हों अथवा कविताएँ, दोनों ही में हम पाते हैं कि वे परदे में छिपी हुई आवाज़ को मुखर करते हैं, अपनी आवाज़ की ताक़त भर देते हैं, जिससे मांसहीन आदमी भी अपनी आवाज़ में एक नई तरह की ऊर्जा महसूस करता है माननीयों के विरुद्ध खड़ा होते हुए, अपने कठिन दिनों के विरुद्ध खड़ा होते हुए। इस तरह ध्रुव गुप्त ग़ज़ल सिंफ़ (विधा) को एक अलग तरह की ऊँचाई प्रदान करते हैं। इनकी ग़ज़ल-प्रतिभा की संपन्नता हमें चकित करती है। इनकी ग़ज़लों में अभिव्यक्त यथार्थ भी थोड़ा अलग है। थोड़ा भिन्न है :
     अख़बार देखकर अभी अफ़सोस है जिन्हें,
     वो अपने घर में बंद थे जब हादसा हुआ।

ध्रुव गुप्त मानवीय मूल्यों के प्रति सिर्फ़ अपनी रचनाओं में ही नहीं, अपने निजी जीवन में भी सचेत रहे हैं। यहाँ मैं ज़्यादा इस बात पर ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि ध्रुव गुप्त अपने रचना-कर्म से अधिक जीवन-कर्म में मानवीय मूल्यों को स्थापित करते रहे हैं। यही कारण है कि जिस तरह इनके निजी जीवन में किसी तरह का झोल-झाल नहीं रहा, उसी तरह इनकी रचनाओं में किसी तरह का झोल-झाल दिखाई नहीं देता। और न किसी तरह का जाल दिखाई देता है। मेरा यह कथन इनकी सद्य: प्रकाशित ग़ज़लों और नज़्मों की किताब 'मुझमें कुछ है जो आईना-सा है' में छापी गईं सारी ही ग़ज़लों और नज़्मों में हम किसी आईने की तरह साफ़-साफ़ देख सकते हैं। जबकि आज दिलों के आईने गर्द-गुबार से भरे पड़े हैं :
     काश, ऐसा हो कि हम
     लौट चलें दश्त में फिर
     न कोई फ़िक्र हो कल की
     न उलझनें, न सितम
     भूख भर रोटी हो
     और आँख भरके हरियाली।
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मुझमें कुछ है जो आईना-सा है(ग़ज़लें और नज़्में)
शायर : ध्रुव गुप्त
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन,7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002
मूल्य : 250₹
आवरण : के रविन्द्र।
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सोमवार, 13 जून 2016

'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ

सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। आज पढते हैं सुशील कुमार की कविता संग्रह "जनपद झूठ नहीं बोलता" की पुस्तक-समीक्षा, समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में, जो कि लहक पत्रिका के ताजा अंक में भी प्रकाशित हुई है।साभार।


'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ
● शहंशाह आलम

मैं अकसर सोचता हूँ कि जिस तरह मनुष्य के पास एक जीवन होता है, क्या वैसा ही जीवन कविता के पास भी है? अगर ऐसा नहीं है तो कोई कविता मनुष्य की भावनाओं को कैसे व्यक्त कर लेती है। इसका उत्तर पाने के लिए मुझे कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। एक कवि होने के नाते मैं इतना तो समझ ही सकता हूँ कि किसी कवि में जब जीवन है, तो उसकी कविताओं में जीवन की झलक दिखाई देगी ही देगी। सुशील कुमार वैसे ही कवियों में हैं, जिनकी कविताओं में मनुष्य का जीवन पूरी तरह मुखर होता दिखाई देता है, बिलकुल जनोन्मुख। सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताएँ मनुष्य-जीवन के लोक और मनुष्य-जीवन के जनपद का ही वृत्तांत हैं। इसलिए कि सुशील कुमार का लोक और जनपद जनाकीर्ण है, मनुष्यों से भरा हुआ है, प्रकृति को इस जनाश्रय में समेटता हुआ :
     दिन समेटकर उतरता है थकामाँदा बूढ़ा सूरज
     पहाड़ के पीछे
     अपने वन-प्रांतर की निःशेष होती गाथाएँ लिए
     उसकी तमतमाई आँखों की ललाई पसर आती है
     जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
     दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
     विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक('पहाड़िया'/पृ.15)।

सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। इस तरह उनकी कविताओं का पाठक भी उनके एकदम क़रीब महसूस करता है। इसलिए भी कि सुशील कुमार की कविताओं में फैशन की तरह कोई चीज़ न आकर किसी आंदोलन की तरह आती है। यह सुखद है। वरना आज अधिकतर कवि के एजेंडे में मनुष्य-जीवन न होकर उनका अपना निजी जीवन होता है, जिसमें किसी परिवर्तन की कामना नहीं होती, बल्कि वे बार-बार अपने जीवन के काले-घने अँधेरे में संशयग्रस्त लौटते दिखाई देते हैं। इसलिए कि ऐसे कवियों का न तो विचार स्पष्ट होता है, न प्रतिबद्धता, न जनपक्षधरता। और न यहाँ जन-आदेश का सम्मान ही दिखाई देता है। सुशील कुमार उन कवियों में हैं, जिनका विचार, जिनकी प्रतिबद्धता और जन-आदेश का सम्मान किसी आईने की तरह साफ़ और सूक्ष्म दिखाई पड़ता है :
     कितनी भोली
     और अनजान हो तुम फूलमनी
     इस धरती पर कि
     वायुयान को
     एक चील समझती हो
     और रेलगाड़ी पर
     कभी बैठने के सपने देखती हो('फूलमनी'/पृ. 26)।

इन दिनों अच्छे दिनों का हो-हल्ला और चिल्ल-पों इस तरह फैलाया गया है कि जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं, उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है। ऐसे लोगों के अच्छे जीवन के बारे में न सोचकर आज बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि सच्चाई यही है कि फूलमनी जैसी कितनी ही ज़िंदगियाँ अपने भीतर कोई एक अच्छा दिन तक नहीं पा सकी हैं, उस अच्छे दिन के लिए आज भी तरस रही हैं। यह भी कठोर सत्य है कि न इनकी आधारभूत संरचना में कोई परिवर्तन दिखाई देता है, न संवेदनागत कोई वैशिष्ट्य ही दिखाई देता है :
     जब पूरा गाँव निढाल होता है नींद में
     बहुत भोर में
     मुर्ग़ा-बाँग से पहले ही
     उठ-पुठ कर
     जंगल चल देती हो
     महुआ बिनती हो
     लकड़ी चुनती हो
     घास का बोझा बनाती हो
     मन ही मन मगन हो
     कोई प्रेमगीत गुनगुनाती हो
     और वंदना-माधे परब के आने की
     प्रतीक्षा करती हो(वही/पृ. 27-28)।
शहंशाह आलम

सुशील कुमार जिस लोक, जिस जनपद की बातें अपनी कविताओं में पूरी तरह मुखर कहते-रचते रहे हैं, उनका वह लोक, वह जनपद पूरी तरह देखा-भाला हुआ है। उनकी सारी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं। चर्चित कवि दिनेश कुशवाह उनकी कविताओं के बहाने सही ही कहते हैं, 'सुशील कुमार ने अपने जनपद के पहाड़, नदी, पेड़, जंगल, पशु, फूल, फल, विरह, संयोग, संघर्ष, आदिवासी, उनकी अंत:क्रियाएँ, परंपराएँ और अपरिमित दुःख को इस तरह आत्मसात् किया और रचा है, जैसे उनकी कविताएँ भीतर ही भीतर सुलगती अँगीठी का निर्धूम ताप हों।' सुशील कुमार की 'बाँसलोय में बहत्तर ऋतु', 'पहाड़ी नदी के बारे में', 'कब लौटोगे सुकल परदेस से', 'बंदगाँव की घाटियाँ', 'महुआ फूलने के मौसम में', 'असम से लौटकर हरिया सोरेन', 'ढीली पड़ती मुट्ठियाँ', 'दियारा में रेत होती ज़िन्दगी', 'यहाँ कभी बसंत नहीं आता', 'तुम्हारे स्त्री होने का मतलब', 'कोसी- शोक में डूबी एक नदी का नाम है', 'पेड़ प्रथम नागरिक हैं पृथ्वी पर', 'वे शहनाई के कबीर थे', 'माँ' आदि कविताएँ आपको कविता-काल के बहुत सारे रंग दिखाती हैं, परन्तु इन रंगों में आदिवासी जीवन का जो रंग दृश्यपटल पर उभर कर सामने आता है, वह रंग एकदम टटका है। वही एक रंग है जिसमें मानव-मुक्ति की सच्ची कामना छिपी हुई है। वही एक रंग है जिसमें हमारे समय का नवीन उन्मेष दिखाई देता है। यही वह रंग भी है, जो कवि को सार्थक संगति तक पहुँचाता है।
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जनपद झूठ नहीं बोलता(कविता-संग्रह)/कवि : सुशील कुमार/प्रकाशक : हिन्द-युग्म, 1, जिया सराय, हौज़ ख़ास, नई दिल्ली-110016/मूल्य : 250₹/कवि-संपर्क : 09006740311/आवरण : गौतम साव, वाज़दा ख़ान।
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संपर्क:-

~शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015/मोबाइल : 09835417537


   











रविवार, 12 जून 2016

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने): सुशील कुमार भारद्वाज

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने)
सुशील कुमार भारद्वाज

मैं 1990 में पहली बार पटना आया था और तब से अब तक में काफी परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। उस समय मेरे गांव से हार्डिंग पार्क पटना बस पङाव का किराया महज बीस रूपया था जबकि आज वह 125 रूपया हो गया है। पटना में सुबह 5:45 बजे की बस में बैठता था तो 9:30 बजे तक हर हाल में अपने गांव के लिए निर्धारित पङाव पर उतर जाता था लेकिन अब उसी बस से 2:00-2:30 बजे दोपहर से पहले पहुंचना नामुमकिन है। उसी दिन वापसी की बात तो शायद दु:स्वप्न बन चुका है। खैर, विकास के दौर में कुछ चीजों का आगे-पीछे हो जाना बङी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादे दु:ख और आश्चर्य होता है बाईपास या एन एच 30 को देख कर। जीरोमाइल से अनिसाबाद तक में कुछ जगहों को छोङ दिया जाय तो सङक के दोनों ओर पानी ही पानी नजर आता था खासकर सङक के दक्षिणी हिस्से में।हालात ऐसे थे कि जिन थोङे लोगों ने उधर घर बनाया था उन्हें बङे-बडे ट्यूबों का ही सहारा था जिससे वे सडक तक पहुंच पाते थे। सडक के दोनों किनारे पर इतने घने जंगल लगे थे कि दिन में भी डर लगने लगता था। डर सिर्फ़ तेज चलती गाङियों का ही नहीं था बल्कि लूटपाट का भी था। मरे जानवरों के दूर्गंध बीच किसी अपराध का शिकार हो इंसान का पङा होना भी बङी बात नहीं थी। लेकिन आज आप वहां एक पेङ के लिए भी तरस जाएंगे। जबकि एक समय था जब गर्दनीबाग का इलाका पेङों से इस कदर पटा पङा हुआ था कि कुछ हिस्सा आमबगीचा और अमरूदी बगीचा के रूप में जाना जाता था। वैसे तो गर्दनीबाग में सरकारी आवास होने की वजह से भी पेङों को फलने फूलने का मौका मिलता रहा लेकिन इन आवासों में जिस तरीके का अवैध कब्जा है या खुलेआम कहीं गाय बंधी तो कहीं भूसे के ढेर से इन आवासों की दयनीय स्थिति बनी हुई है वहां पेङ - पौधों की क्या बात की जाए? हाल में एक मॉल बनने की बात चली, फिर चुप्पी लद गई। एक बार फिर जजेज कोठी बनने की बात आई है, लेकिन वो भी भविष्य की ही बात लगती है। हां, इस इलाके के प्रसिद्ध दुमहला को नस्तेनाबूत कर दिया गया है जो गर्दनीबाग अस्पताल के पास से शुरू होता था लेकिन यहां अब कचरा डम्पिंग यार्ड बन गया है। विकास के इस दौर में काफी कुछ बदला।यह इलाका पूर्णतः कंक्रीट का जंगल बन चुका है। जबकि इंडियन अॉयल का डिप्पो तैयार होने से पहले बाईपास के दक्षिणी तरफ जिस जमीन को कोई दस हजार रूपये कठ्ठा लेने को तैयार नहीं था आज वहां की जमीन 45 लाख रूपये कट्ठा मिलना मुश्किल है। इन वर्षों में सबसे ज्यादे बाईपास किनारे गाङियों के शो रूम और अस्पताल खुले हैं, शेष चीजों की तो बात ही कुछ और है। विकास और घनी आबादी के बीच बेऊर का इलाका काफी विकसित हुआ है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि 1997 के आस-पास आदर्श कारा बेऊर और मैला -सफाई संयंत्र के आस-पास दूर दूर में एक दो घर नजर आता था बाजार और दुकान की तो बात ही बेमानी है लेकिन आज इस इलाके के विकसित रूप को देखकर विश्वास भी नहीं कर पाएंगे कि किस तरह इन इलाकों में नहर के पानी से चारों ओर बाढ का नजारा दिखता था। हां, अब तो इस इलाके में दैनिक भास्कर जैसे अखबार का दफ्तर भी खुल गया है।

शनिवार, 11 जून 2016

शहंशाह आलम की कविताएं

शहंशाह आलम साहित्य में एक परिचित नाम है जिनकी रचनाएं जीवन की दुश्वारियों से होकर गुजरती हैं जो आपके मर्मस्थान को छूती ही नहीं है बल्कि आपको सोचने पर भी विवश करती है कि हम कैसे समय में जी रहे हैं? हम कहां से कहां पहुंच गए हैं? आप स्वयं शहंशाह आलम की इन कविताओं को देखें और महसूस करें।

     एक बेघर की कविता
 
   
जिनके अपने घर नहीं होते वे नींद में चलते हुए अकसर
पहुँच जाते हैं किसी के भी घर का दरवाज़ा खटखटाने

उन्हें लगता है उनके सपनों से चुराकर बनाया गया है वह घर
जिसकी कुंडी पीट रहे होते हैं वे अपने हाथ से पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से
जैसे कि यह घर उसी का था और चुरा लिया गया था
उस घर के मालिक के द्वारा उसके समय के किसी हिस्से से

यह भी सच है हमारी कठिनाइयों हमारी परेशानियों के बीच
हमारी पसलियों से एक औरत तो बनाई गई ज़रूर
परन्तु हमारे माँस-मज्जे से एक घर नहीं बनाया गया
जोकि हमारे जीवन का पूरा यथार्थ था स्वार्थ से परे
इस पृथ्वी पर रहने-सहने के लिए बिंदास

यह भी सच है कि एक औरत भाग भी जाए
किसी प्रेमी के साथ
किसी दूसरे की घरवाले के साथ
या किसी औरत भगानेवाले के साथ
उनके बहकावे में आकर तो उस औरत को
वापस लाया जा सकता है समझा-बुझाकर

लेकिन कोई घर आपके जीवन से छूट जाए अचानक
अथवा लूट जाए तो उसे वापस लाना बेहद मुश्किल होता है

फिर किसी के पास सुंदर से सुंदर औरत हो
और आपके पास कम सुंदर औरत हो
तो उस अधिक सुंदर औरत का मरद आपको डाँटेगा नहीं
इस बात के लिए कि आपके पास कम सुंदर औरत क्यों है

लेकिन आपके पास आपका अपना घर नहीं है
तो वही औरत आपको डाँट पिलाएगी
या वही मरद आपको धिक्कारेगा इसके लिए
कि आपने उनके घर की तरफ़ देख भी कैसे लिया
जब आपके पास अपना घर नहीं है दिखाने के लिए

इसलिए कि आप दुर्बल हैं अगर आपके पास अपना घर नहीं है
और उनके लिए आप किसी भिखारी जैसे ही हैं
जो उनके घर को मैला करते रहते हैं बराबर आ-आकर।
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     कुश्तीबाज़
   

अपने रहने के ठिकाने से दूर कुश्तीबाज़ कुश्ती लड़ता है

अकसर अखाड़े में पूरे मुहल्ले के सामने कुश्ती लड़ी जाती रही है
अखाड़ा जो कुश्ती लड़ने कसरत करने के लिए बनाया जाता रहा है

लेकिन क्या बड़े-बड़े अखाड़ों में अपना कौशल दिखाने वाला
कोई अखाड़िया दिखाई देता है इन दिनों आपके शहर में कहीं

आप कहेंगे नहीं, लेकिन आपका कहा झूठ साबित होगा मेरे विचार से
इसलिए कि कुश्ती लड़ने का अखाड़ा न भी दिखाई दे तब भी
मैं रोज़ कुश्ती लड़ रहा हूँ अपने इस कुश्तीबाज़ समय से हतप्रभ

यही कुश्ती ऐतिहासिक कुश्ती बनकर रह गई है मेरे जीवन में
आपके जीवन में शायद जीत लेते हों अपने समय की सारी कुश्तियाँ
परन्तु मैं तो हारता रहा हूँ बार-बार अपने जीवन की कुश्ती सच में

इसलिए कि मैं नया मनुष्य हूँ जिसे बहुत कमज़ोर सिद्ध किया जा चुका है
जिसे बहुत बूढ़ा प्रसिद्ध किया जा चुका है, जो सत्ताधीश हैं, उनके द्वारा
इसलिए कि सारी कुश्तियाँ अब सत्ताधीश ही लड़ते दिखाई देते हैं
अगर आप राज्य हैं तो केन्द्र से आप केन्द्र हैं तो राज्य से
जिसे नूराकुश्ती मैं कहता हूँ जिसमें यह तय किया जा चुका होता है
कि एक दूसरे को चित नहीं करना है किसी भी क़ीमत पर
चित किसी को करना भी है तो जनता को करना है हमेशा की तरह

सच यही है कि जनता के जीवन की सारी माननीय-सम्माननीय स्थितियाँ
सारे सत्ताधीश ही क़ब्ज़ा किए चले आ रहे हैं सदियों से पूरी तरह अखाड़िया।
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     छलाँग
   

एक घर मिला था टूटा-फूटा रास्ते में
सफ़र से लौटा तो वहाँ पर घर नहीं था
मकान था भव्य आलीशान अद्भुत
और यह छलाँग थी उस उस घर के मालिक की

उसी तरह एक युग का दूसरे युग में प्रवेश
कुछ इस तरह हुआ इस महाद्वीप पर इस चेतन में
जो चमत्कृत कर रहा था विस्मित कर रहा था सबको
कि अभी तो आज में थे हम सब जी रहे
और वही आज कल में बदल चुका इतनी जल्दी

अभी वह मनुष्य बच्चा पैदा हुआ था
अब था गबरू जवान बिलकुल

वह लड़की अभी थी पहाड़ के नीचे
अब थी पहाड़ की चोटी पर खड़ी मुस्करा रही
अपने छोटे गठीले स्तनों के साथ

वैसे ही वह लड़का था बैठा हँस रहा इस नदी के किनारे
उसने मार दी थी छलाँग अचानक नदी की छाती पर
अब था वह उस हरी भूमि पर उस हरी पृथ्वी पर
जो बची रह गई थी नदी के बीच में अनंत मैदान की तरह।
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     अज्ञातवास
   

इस टूटी हुई नाव में रहता हूँ मैं इन दिनों
अकेला जहाँ कोई नहीं है पानियों के सिवा
न कोई मनुष्य न कोई खंडहर न कोई कायरता

सुना था सच्चरित्र और त्यागी तपस्वी ऐसे ही किसी एकांत में
ऐसे ही स्थानों पर तपस्या किया करते थे सबकी दृष्टि से छिपकर
देवता तक किसी पेड़ की ओट से देख भर लिया करते थे
कि तपस्या का फल पाकर वे उनके समकक्ष खड़े नहीं हो जाएँ

लेकिन मेरे इस एकांतवास में न कोई तपस्वी मिला न कोई देवता
न वे स्त्रियाँ मिलीं जो भादों महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को
व्रत रखती थीं और देवताओं से डरते हुए उन्हीं का शरणगृह चाहती थीं

मैंने अपनी इच्छा से लिया था यह एकांतवास नदी के बीचोबीच
एकांत को स्मरणीय-वरणीय मानकर अपने एकांत को सज्जित करने
जहाँ न आदिम भय हो न आदिम कोई धर्म जो डँसता रहता था

एकांत बस एकांत का जाप करने के बावजूद कोई था ज़रूर कोई था
जो मेरे इस नावघर को मेरे इस एकांतवास को मेरे इस कमलासन को
ढहाना चाहता था मटियामेट करना चाहता था मेरे भीतर जन्म ले रहे
नए शब्द से नए छंद से नए वृक्ष से नए पुरुष से नए विरोध से भयातुर।
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     बाघ
   

बचपन में बाघ झाँकता था
पेड़ों की ओट से झुरमुटों की ओट से
हमारे सपने में हमारी नींद में
कपास वाले दिनों में वापस ले जाने के लिए
जीवन वाले दिनों में घूमा-फिरा ले आने के लिए

लोहा पानी आग आम्रवृक्ष पहाड़ जंगल
सबकुछ लौटाने के लिए तत्पर
सबकुछ हस्तांतरित करने के लिए उत्सुक
हमें ही जैसे रहता था बाघ

मगर बाघ से भयभीत हम छिपते फिरते थे कमरे में
नींद का कमरा सुरक्षित-रक्षित होता था हमारे लिए
बाघ से बचपन वाले दिनों में

जबकि हत्यारे सदियों से झाँकते आ रहे थे हमारी नींद में
हमारे सपने में शातिर बिलकुल बेकल-बेचैन होकर

हमारे पास कोई कमरा नहीं होता था बचने के लिए
हत्यारे से हत्यारे के हथियार से
न बचपन के दिनों में न अब के दिवसों में

बाघ तो बस गुर्राता था शोर मचाता था नींद में हमारी
जंगली हवाओं के साथ अपनी उपस्तिथि दर्ज कराता
ज़्यादा से ज़्यादा चेतावनी देकर चला जाता था नींद से

नींद से उठने पर सारा कुछ यथावत् मिलता था
जो कुछ जैसा नींद में जाते वक़्त छोड़ते थे हम

हम अपने डर के कारण डर जाते थे बाघ से
नींद में और नींद से बाहर बुरी तरह
बाघ के विरुद्ध कई अर्थ-अनर्थ निकालकर

जब ठठ्ठा मार हँसता था हत्यारा अँधेरे में
रोटियों के टुकड़े उछाल हमारी तरफ़
बाघ उस समय अपनी बाघिन से
प्रेम-क्रीड़ा कर रहा होता था
या अपने शावकों को दौड़ना-भागना सिखा रहा होता था

अब आप पूछेंगे प्रश्न करेंगे कि
बाघ से भी बड़ा बर्बर शिकारी हुआ है भला
आप पूछेंगे पूछते ही जाएँगे एकदम कुशल प्रश्नकर्ता बन

मेरा उत्तर होगा मेरा आग्रह होगा कि
बाघ ने कितनी दफ़ा शिकार किया आपका
आप ज़रूर कहेंगे : एक बार भी नहीं

मैं फिर कहूँगा आपको याद दिलाऊँगा
आप तो रोज़ शिकार किए जा रहे होते हैं
किसी अमात्य के द्वारा किसी महामात्य के द्वारा
किसी पुलिसवाले किसी दुकानदार के द्वारा
किसी बैंक मैनेजर किसी सूदख़ोर के द्वारा
किसी स्त्री किसी पुरुष के द्वारा
किसी आतंकी झंडे किसी पार्टी के प्रवक्ता द्वारा
एकदम अभ्यस्त एकदम शिकार कर लिए जाने को तैयार

सच यही था अब भी अंतर्राष्ट्रीय
बाघ का संरक्षण-संवर्द्धन हम करें न करें
उनका संरक्षण-संवर्द्धन ज़रूर करते आ रहे हैं
जो हमारे असल हत्यारे थे जो हमारे असल शिकारी थे
जोकि असल में बर्बर थे दमघोंटू थे

उन्हीं हत्यारे की शैली उन्हीं के विचार
उन्हीं की भोगवृत्ति उन्हीं के भाव उन्हीं के उच्चारण
उन्हीं के अन्तर्विरोध को अपनाते हुए
हम पार करना चाहते थे ध्वनि और प्रकाश और अन्तरिक्ष
अपने-अपने जीवन का सारा कुछ भूल-भुलाकर
इसलिए कि हर हत्यारा भुखमरा होता है आदिकालीन

आप भी तो भुखमरी के शिकार हुए जा रहे हैं इन दिनों

जबकि आपके जीवन में किसी हत्यारे की नहीं
एक बाघ की ज़रूरत थी जो आपकी रक्षा कर सके

आपके जीवन में पत्थर की लकड़ी की लोहे की तांबे-पीतल की ज़रूरत थी
जिनसे आप अपने हत्यारे को अपने बलात्कारी को
अपने शोषक को मार भगा सकें
उनके विरुद्ध पूरी व्याघ्रता से

आपके अन्तःकरण के भय का निवारण वहाँ कहाँ है बंधु
जहाँ आप ढूँढ़ते रहे हैं शताब्दियों से सच में
और मारते रहे हैं बेचारे बाघ को सपने तक में

आप इतने समझदार इतने नेक होने के बाद भी
अपने अन्दर भरे भय का अन्वेषण कहाँ कर पा रहे हैं
उन पुलिसवालों उन सूदख़ोरों उन हत्यारों उन चोरों
उन अमात्य-महामात्य उन जटिल परिस्थितियों
उन दरिद्रताओं उन क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को
मार भगाने के लिए आज भी अब भी।
                         ( मुंगेर / 21 जुलाई 2015 )




कवि का परिचय


      शहंशाह आलम

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार

शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)

प्रकाशन : 'गर दादी की कोई ख़बर आए', 'अभी शेष है पृथ्वी-राग', 'अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस', 'वितान', 'इस समय की पटकथा' पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'मैंने साधा बाघ को' कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। 'बारिश मेरी खिड़की है' बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। 'स्वर-एकादश' कविता-संकलन में कविताएं संकलित। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।
हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान' के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।

संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com





शुक्रवार, 10 जून 2016

सुशील कुमार की ‘जनपद झूठ नहीं बोलता’ की कुछ कविताएं

जिंदगी आसान नहीं होती और पहाड़ों में तो बिल्कुल ही नहीं. भले ही कुछ समय के लिए उन पहाड़ों के बीच मौज –मस्ती कर वापस आ जाते हों लेकिन उन पहाड़ों के बीच की जीवनशैली को शायद ही कभी हम देख पाते हैं. और चूक जाते हैं एक पूरी संस्कृति से. जबकि कवि सुशील कुमार ने वर्षों से दुमका में रहते हुए पहाड़ों की जिंदगी को करीब से महसूसा है, उसकी मिट्टी से खुद को जोड़ा है और उसे शब्दबद्ध कर अपने कविता संग्रह “जनपद झूठ नहीं बोलता” में प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है संग्रह की पहाड़ों पर आधारित कुछ कविताएं.




    पहाड़िया



( साहेबगंज-पाकुड़ की पहाड़ी जिन्दगी से रु-ब-रु होकर )

दिन समेटकर उतरता है थका-माँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने साथ वन-प्रांतरों की निःशेष होती गाथाएँ लिये
तमतमायी उसकी आँखों की ललाई पसर आती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक

उँची-नीची पगडंडियों पर कुलेलती
लौटती है घर पहाड़न
टोकनी-भर महुआ
दिन की थकान
होठों पर वीरानियों से सनी कोई विदागीत लिये

उबड़-खाबड़ जंगल-झाड़ के रस्ते लौट आते हैं
बैल-बकरी, सुअर, कुत्ते, गायें भी दालान में
साँझ की उबासी लिये
साथ लौटता है पहाड़िया बगाल
निठल्ला अपने सिर पर ढेर-सा आसमान
और झोलीभर सपने लिये

-2-
घिर जाती है साँझ और गहरी
अंधरे के दस्तक के साथ ही
घर-ओसारे में उतर आते हैं महाजन
खटिया पर बैठ देर तक
गोल-गोल बतियाते हैं पहाड़िया से
हँसी-ठिठोली करते घूरते हैं पहाड़न को
फिर खोलते हैं भूतैल खाते-बहियाँ अपनी
और भुखमरी भरे जेठ में लिये गये उधार पर
बेतहाशा बढ़ रहे सूद का हिसाब पढ़ते हैं
दूध, महुआ, धान, बरबट्टी और बूटियों के दाम से
लेकर पिछली जंगल-कटनी तक की मजूरी घटाकर भी
कई माल-मवेशी बेच-बीकन कर भी
जब उरिन नहीं हो पाता पहाड़िया तो
गिरवी रख लते हैं महाजन
पहाड़न के चांदी के जेवर, हंसुली, कर्णफूल, बाले वगैरह..
तेज उसाँसें भरता अपने कलेजे में पहाड़िया
टिका देता है अपना माथा महाजन के पैर पर
तब महाजन देते हैं भरोसा
कोसते हैं निर्मोही समय को
वनदेवता से करते हैं कोप बरजने की दिखावटी प्रार्थनाएँ
अपनेपन का कराते हैं बोध पहाड़िया को
गलबहियाँ डाल महाजन साथ मिलकर दुःख बांटने का
और संग-संग पीते हैं 'हंडिया-दारू' भी
भात के हंडियों में सीझने तक,

फिर देते हैं, एक जरूरी सुझाव जल्दी उरिन होने का,
जंगल कटाई का -
फफक-फफककर असहमति में सिर हिलाता रो पड़ता है पहाड़िया
पहाड़न गुस्से से लाल हो बिफरती है
गरियाती है निगोड़े महाजन को
करमजले अपने मरद को भी
पर बेबस पहाड़िया
निकल पड़ता है माँझी-थान में खायी कसमें तोड़
हाथ में टांगी, आरा लिये निविड़ रात्रि में
भोजन-भात कर, गिदरा-गिदरी को सोता छोड़
पहाड़न से झगड़ कर
महाजन के साथ बीहड़ जंगल

-3-
रातभर दुःख में कसमसाती
अपने भीतर सपने टूटते देखती है पहाड़न
रात गिनती
मन की परत-परत गाँठें खोल पढती है पहाड़न
नशे में धुत्त पहाड़िया रातभर
पेड़ों के सीने पर चलाता है आरा, टांगी
और काटता रहता है अपने दुःखों के जंगल
बनमुरगे की कुट्टियाँ नोंचते
रहरह कर दारू, बीड़ी पीते
जगे रहते हैं संग-संग धींगड़े महाजन भी रातभर

-4-
शीशम, सागवान, साल की सिल्लियाँ लादे
जंगल से तराई की ओर बैलगाड़ियाँ पार कराते महाजन,
बिन दातुन-पानी किये, बासी भात और अपनी गिदरे
पीठ पर गठियाये महुआ बीनने पहाड़न,
मवेशियों को हाँक लगाता बगाल पहाड़िया
कब के उतर चुके होते हैं पहाड़ी ढलान !
बहुत सुबह, सूरज के उठान के काफी पेश्तर ही !!

खाली रहती है बहुधा पहाड़ी बस्तियाँ दिनभर
बचे रहते हैं पहाड़ पर सिर्फ़
सुनसान माँझी-थान में पहाड़ अगोरते वनदेवता
उधर पूरब में जलता-भुनता सूरज
और गेहों में लाचार कई वृद्ध-वृद्धाएँ ।

 बाँसलोय में बहत्तर ऋतु
(पाकुड़ और दुमका को विभक्त करती संथाल परगना की एक पहाड़ी नदी की व्यथा – कथा)

 एक -

संथाल परगना के जंगल
पहाड़ और बियावानों में
भटकती हुई
एक रजस्वला नदी हो तुम
नाम तुम्हारा बाँसलोय है
बाँस के झाड़-जंगलों से निकली हो
रेत ही रेत है तुम्हारे गर्भ में
काईदार शैलों से सजी हो

तुम्हारे उरोज पर
रितु किलकती है केवल
बरसात में
तब अपने कुल्हे थिरकाती
पहाड़ी बालाओं के संग
गीत गाती
अहरह बहती हो

पहाड़ी बच्चे तुम्हारी गोद में खेलते,
टहनियों की ढेर चुनते हैं तब,
भोजन –भात पकता है
पहाड़ियों के गेहों में
उनके उपलों से

कलकल निनाद का निमंत्रण पा
दक्षिणी छोर से
क्रीड़ा करती हुई
मछलियाँ भी आ जाती हैं
और पत्थरों की चोट से
अधमरी हो
रेत के खोहों में समा जाती हैं
या फिर, मछुआरों के जाल में फँस जाती हैं

इतनी चंचला, आवेगमयी होती हो
आषाढ़ में तुम कि,
कोई नौकायन नहीं कर सकता

ठूँठ जंगलों से रूठकर
कठकरेज मेघमालाएँ पहाड़ से उतरकर
फिर जाने कहाँ बिला जाती हैं
और तुम अबला सी मंद पड़ जाती हो
क्षितिज तक गमन करती पतली
रेत की वक्र रेखा भर रह जाती हो
तब लगता है तुम्हारे तट पर
ट्रक – ट्रैक्टरों का मेला
आदिवासी औरतें अपने स्वेद –कणों से
सींचती हुई तुम्हें
कठौती सिर पर लिये
उमस में बालू ढोती जाती हैं

सूर्य की तपिश में हो जाती हो
तवे की तरह गर्म
उनके पैर सीझ जाते हैं
तुम्हारे अंचल में चलचलकर तब

 -2-

नदी माँ, तुम्हारी ममता में
बहत्तर ऋतुओं को जिया है मैंने

देखता हूँ तिल-तिल जलती हो
दिन-दिन सूखती हो
क्षण–क्षण कुढ़ती हो
मन ही मन कोसती हो जंगल के सौदागरों को
रेत के घूँघट में मुँह ढाँप
रात–रात भर रोती हो

तुम्हारी जिन्दगी दुःख का पहाड़ है
सचमुच पहाड़ की छंदानुगामिनी हो तुम !
बूढ़े पहाड़ की तरह तुम्हें भी
शहर लीलता है हर साल थोड़ा-थोड़ा
इसीलिए इतनी बीहड़, उदास, कृशा हो तुम !

तुम्हारा जन्म
किसी हिमालय की गंगोत्री में नहीं,
पहाड़ी ढलानों में अनचाहे उग आये
बाँस की झुरमुटों से हुआ है
मुझे डर है,
आदिम सभ्यता की आखिरी निशानी
जोग रही हो
पर बचा नहीं पा रही अपनी अस्मिता

सारे पत्ते गिराकर जंगल नंगे हो रहे हैं
पेड़ दम तोड़ रहे हैं
पंछी नीड़ छोड़ रहे हैं
नित तुम्हारा सर्वांग हरण हो रहा है
और मानवीय पशुता के बीच
गहरी उसांसें भरती नित
मैली हो रही हो तुम

मुझे दुःख है ,
अपनी छायाओं में फली-फूली
आदिम सभ्यता के मनोहर चित्र
रेत के वबंडरों से पाटती हुई
लोक-कथाओं में
तुम स्वयं एक दिन
किवदन्ती बनकर दर्ज हो जाओगी।

    मैं पहाड़ की बेटी

झरना ......
ओ झर... ना ! 
कल-कल तेरे जल में
खूब नहाऊँगी 

नदी माँ ........  
रेत के घूँघट में 
मुँह ढाँप तू मत रोना 
तेरी बेटी हूँ
तू बह माँ ! 
तू बह ना !!...

जल से तेरे 
आचमन करूँगी । 
लाल, पीले, बैगनी 
अपनी आँचल में फूल 
खिला माँ ! 
खिला ना ......

खोपा में खोसूँगी, 
करधनी बनाऊँगी, 
माँग सजाऊँगी, 
ओ पतझड़ के 
निदर्य बयार ....!
वन-उपवन के पत्ते   
सब मत गिरा, 
हरित –लोहित वर्ण से
घर-ओसारे में
भित्ति-चित्र बनाऊँगी  



ओ बसंत, लौट आ......
लौट आ ना...!
माँदल की थाप पर 
पहाड़नों के दल बना 
खूब नाचूँगी, ठुमकूँगी, 
परब मनाऊँगी। 


वनवासी ...
ओ वनवासी ...
बेल, बूटे 
शीशम  महुआ
केंदू-पत्ते
बुरी नजर से बचा......,
वह अपनी थाती है !
खोह हैं
हे पहाड़ जोगते वनदेवता !
बापू की तरह 
बूढ़ा पहाड़ 
बहुत बीमार है 
बड़े –बड़े घाव हैं
बड़े-बड़े

उसकी देह में

उसे ढाढ़स देना, 
मेघ देना, पानी देना, 
खेत में अन्न उगाना, 
जंगल बचाना
वनदेवता जंगल बचाना 
दिक्कुओं के पाप
मत सहना 

हे वनदेवी 
पुकार मेरी सुनना!
महाजन से मेरी 
देह बचाना 
नदी-माँ की लाज बचाना ! 
पहाड़ की बेटी हूँ,
मेरी आर्त-विनती  
सुन माँ ! 
... सुन ना......


   गुम्मा पहाड़ पर बसंत

पूरी आत्मीयता से खड़े हैं
गुम्मा पहाड़
और तराई में
कोस-भर फैली
जगह-जगह डबरे में
जल भरी बाँसलोय नदी
वक्र गड़ारी-सी
फागुन के लौट आने की इच्छा से भरी हुई
अपने भीतर तरुण भाव लिये
किसी उत्सव के आगमन की प्रतीक्षा में

बँसवाड़ी में
गुल्म-लताएँ-झाड़ियाँ हिलग रहे-हुलस रहे
पूरवैया के मादक झोंकों से

पलाश-पत्र सब झड़ गये
शिखाओं पर उनके लाल फूल दहक रहे
करंज-कचनार-शाल सब
दुधिया धवल पुष्प-गुच्छों से लद रहे
डहु, अमलतास और कुसुम के पीले फूल
तरी से शिखर तक पहाड़ पर
लाल-सफ़ेद खिले फूलों के बीच
पूरे अंचल में खिल रहे

पूरा पहाड़ जाग रहा धीरे-धीरे
नये रंग और उमंग में
फागुन की आहट सुन
बसंतोत्सव की तैयारी में

जंगल में पंछी गा रहे
ढेचुआ कर रहा ढेचुँ-चुँ, ढेचुँ-चु
फिकरो फिक-क फिक-क
पेडुकी करे घु-घु-चुघु-घु-चु
तीतर सुना रहा खु-टी-च-र, खु-टी-च-र
कोयल कूक रही बेतरह
पियो बुला रहा पि-उ, पि-उ
हरिला फुनगी पर फल कुतर-कुतर खा रहा

बीते मौसम की दुस्सह यादें भूल
पहाड़ी बस्तियाँ
माँदल की थाप और नगाड़े की आवाज से
गूँज रही , लोग गा रहे, थिरक रहे
बाँसूरी बजा रहे
फसल-गीत गा रहे-ठुमक रहे
अपने पैरों में नेवर बाँध
महुआ-रस के खुमारी में
खलिहान को भरा-पूरा देख
फूलों और फसलों का पर्व बाहा-टुसू मना रहे

वनदेवता पहाड़ी थानों में
फूल-पत्र और नैवेद्य स्वीकार रहे
जंगल और पहाड़ के दु:ख
निस्तार के वास्ते

पर बसंत के प्रस्थान के बाद
जेठ के आते-आते
वनदेवता मौन हो जाते हैं
पूजा-स्थलों पर आवाजाही न्यून हो जाती है
पहाड़ी नदी-नाले-झरने निर्जल हो जाते हैं
पहाड़ के अन्न ओरा जाते है
पहाड़ी बस्तियाँ खाली हो जाती हैं
पहाड़ी युवक और यौवनाएँ
कूच कर जाते हैं पहाड़ को छोड़
शहरों की ओर काम की तलाश में
अन्न-जल और जीवन की टोह में

देखता आया हूँ हर बार
गुम्मा पहाड़ के इलाके में
सन्नाटा-सा पसरा होता है
ऋतु के बाकी दिन ,
नजर आते  हैं तब यहाँ
बचे हुए पहाड़ी बच्चे
और लाचार वृद्धाएँ ही सिर्फ़
अपनी पहाड़-सा जिंदगी ढोते हुए |    





    पहाड़ पर भोर


सुबह घर से निकला तो
पगडंडियों के बाजू
पलाश के फूलों पर चटक देखी
चमकती ओस की मोतियों पर आब
लाल-गुच्छ फूलों के नोंक से लिपटी
बूँदों को टघरते
पहाड़ की देह पर 
टप-टप गिरते-सूखते,
सूरज की मद्धिम धूप में
सुबह को अलसाते
दिन को पहाड़ पर
धीरे-धीरे उठते और अनमने जंगल-झाड़ों को
को झपकियाँ लगाते, हिलते-डुलते देखा

आदिवासी कलूटों की झोंपड़पट्टियों से
निकलते बच्चे अपना बस्ता बगोचे
पाँच मील पर स्कूल की पहली घंटी
पकड़ने भागते हुए तो कोई
हाथ में पतली छोकनी लिये
अपनी गैया-बकरियाँ हँकाते

पहाड़ी छोरों के चेहरों पर
तंग होती मुस्कुराहटों के बीच
अधखिले बचपन के उड़ते रंग  ,
उसकी मंद पड़ती चहक देखी

सड़क पर हल्की धूप में गरमाते
सुकोमल बदनों पर
समय की उघरती खराँचे भी देखी

फिर पहाड़ी यौवनाओं के सिर पर
दतुवन-घास का बोझा
हिलते उसके माथ 
सुर्ख होंठों की कँपकपाहटें
खिलते यौवन में गुम होते वन-श्रृंगार
के बीच
उनकी कातर आँखों की भाषा पढ़ी
और तब अपनी आँखें भी
नम हो गयीं

कोसों साइकिलों के आगे-पीछे
लौह-पत्थरों के मन-मन भारी बोझे बाँधे
हाँफते-धकेलते पैदल चल रहे पहाड़ियों
के फटे बिवाईयों के घाव
से बहता मवाद देखा तो
कलेजा मुँह को आ गया और फिर
गुस्सा भी कि ...
पूरे पहाड़ को जब धीरे-धीरे बिला ही
जाना है तो पलाश की चटक
और महुआ की खुमारी
का मतलब क्या है यहाँ ? फिर भी..

उन चेहरों पर अनगिन नरम झुर्रियों में
घर-संसार-पेट की फँसी चिंतायें
खुली आँखों से पढ़ता रहा
और ऊब और तमक़ से
अपने हाथ मलता रहा

फिर...पहाड़ पर लड़ते साँढ़ों को देख
आँखों में काँटे-सी चुभन होने लगी
किशोर चेहरों पर छाँह-सी काली चतें
और खुश्क होंठों पर पड़ती पपड़ियों ने
जगंल के मेरे सँजोये सपनों के रंग सब
बदरंग कर दिये।

आप मानें या न मानें,
इतनी गरमी पड़ रही है
इस भोरउवा पहर में भी
मेरे अंदर
और इस पहाड़ पर भी कि
कि ओस ठहरती ही नहीं कहीं-
न फूल पर न पत्थर पर न जंगल में

हृदय में बजता है सिर्फ़ पहाड़ का बंजर सुनापन
जो टूटता है लौह-पत्थरों से भरी
मालगाड़ियों के घर्घराहटों से

बाहर की उदासी मन को
चीरती हुई धँसी जाती है
भीतर के खोह में और
दु:ख के चौरस
पठार-सा नज़र आता है
पूरा पहाड़ इस भोर में ।


   पहाड़ का दु:ख

पहाड़ की नग्न काया पर
पतझड़ का संगीत
बज रहा है
पहाड़ी लड़कियाँ
कोई विरह-गीत गुनगुना रही हैं
गीत में पहाड़ का दुःख
समा रहा है
लाज से सिकुड़ी नदी
सिसक रही है
पहाड़ी जंगल तोड़ रहे हैं
पहाड़ का मौन
अपने आर्त्तनाद से 


पहाड़ियों की आँखें
और पसर गयी हैं
मुँह और फट गये हैं
पीठ उनके और
उकडूँ हो गये हैं
कंधे और झुक गये हैं


गाड़ी भर-भर पहाड़ी लड़कियाँ
परदेस जा रही हैं
पहाड़ी लड़के भी संग जा रहे हैं
उनके गीतों का कोरस
घाटियों में गूँज रहा है
कूच कर रही है रातभर
जंगलों से लदी गाड़ियाँ
पहाड़ से शहर की ओर


हाँफ रहे हैं दिनभर
खड्ढ-मड्ड पहाड़ी रस्ते
पत्थर और बालू ढोते
बड़े-बड़े डम्फरों के पहियों तले 


क्रशरमशीनों और मालवाहक यानों की
कर्कश घड़घड़ाहटों में
गीतों के स्वर टूटकर
बिखर रहे हैं पहाड़ पर
और जम रहे हैं धीरे-धीरे
धूल के नये, भूरे पहाड़
वीरान हो रहे पहाड़ पर

पहाड़ के हिस्से में इस तरह
नित आ रहे हैं नये
दुःख के पहाड़ |
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