गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

रश्मि भारद्वाज की कविता आपके मर्म को छूती हैं। यथार्थ को बयां करने के लिए कवयित्री जिन बिम्बों का प्रयोग करती हैं वो सिर्फ शब्दों एवं अर्थों को ही सिर्फ गहरे तक खोलती नहीं हैं बल्कि आपको भावशून्य कर कुछ सोचने को विवश कर देती हैं। इनकी कविता ही इनकी पहचान भविष्य में होगी, इस बात की आश्वस्ति इन कविताओं से मिलती है।





 -विसर्जन-


त्याग दी गयी वस्तुओं से अंटा हुआ है संसार

वे जो ह्रदय से निर्वासित हैं

 घरों में नहीं शेष है उनका स्थान

व्यर्थ ही कितनी जगह घेरे हैं इस पृथ्वी की

उनकी भला अब किसे आवश्यकता है


वृक्षों तले औंधे पड़े हैं असंख्य ईश्वर

 कभी आह्वान किए गए थे

राह रोक लेती हैं याचक आँखें 

भूख से व्याकुल मवेशियों की 

सुनते हैं जिनके लिए रक्त बहाया जा सकता है,

छोड़ दिए गए रातोंरात चाव से ख़रीदे गए श्वान 

 हर वाहन को देखकर सोचते हैं

स्वामी का दिल पसीझा है,

छोड़ तो वे भी दी गयीं अचानक एक दिन

 बड़े ही ताम झाम के साथ

जिन्हें घरों में ला रखा गया था,

ताल -तलैयों में भी उनके लिए शरण नहीं 

देवालयों के बंद हैं कपाट 

वे देवियाँ

 जो मन से विसर्जित कर दी गयी हैं


इस परिपक्व संसार में 

जहाँ वस्तुएँ ही नहीं

बेतरह धड़कते दिल त्याग दिए जाते हैं

अपनी अनुपयोगिता के कारण, 

मैं त्याग देती हूँ अपना अहंकार

त्यागती हूँ अपनी ईर्ष्या 

लेकिन उसका एक चित्र तक नहीं तज पाती 

जिसे कभी भी जीवन में शामिल किया है


मेरा कमरा ही नहीं, मेरा मन भी 

इस साफ़ सुथरी दुनिया के लिए एक कबाड़ घर होगा

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रश्मि भारद्वाज


मैं ऐसे लिख रही हूँ

जैसे मेरे पास एक और जीवन हो

मैं ऐसे प्रेम कर रही हूँ

जैसे मेरे पास कल का दिन नहीं होगा


मैं यह नहीं चाहती 

अंत क्षणों में

अधूरी पंक्तियों के दुःख के साथ

यह कष्ट भी साथ जाए 

मेरे पास देने के लिए कितना कम प्रेम था


#rashmibhardwaj

-इच्छा कपास का फूल है-


वे ही क्षण असाधारण हुए

जो बहुत साधारण बातों से बने थे 


संसार भर का वैभव

भांति भांति के वस्त्र पकवान

भव्य अट्टालिकाएँ

और कितने संतप्त मन

लेकिन रस पाया मैंने उस मोची दम्पत्ति के छप्पर तले

जो दुनिया भर के फटे जूते सिलने के बाद

सुकून से दोपहर की रोटी खा रहे थे


बहुत मामूली चीज़ें मैंने भी जीवन से चाही हैं 

रत्न माणिक 

बहुमूल्य इत्र, परिधान

काम की चौंसठ कलाएँ 

उम्र पार का संग

सुख यहाँ नहीं है

सुख है जब तुम बैठो मेरे सिरहाने

पढो किसी प्रिय कवि की कोई कविता

जो उस क्षण के बाद संसार की 

सबसे सुंदर कविता होगी 


लोग कहते हैं प्रेम से जटिल कुछ नहीं 

यह भी प्रेम में ही सम्भव है

आप इतने सहज हो जाएं

इतने भार हीन

किसी इच्छा से घिरे होकर भी

उतने ही इच्छा मुक्त

जैसे कपास का फूल


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रश्मि भारद्वाज


धिया जनम 


पहली बार कब मरी थी तुम 

आषाढ़ के उस कीच और जल में

जब एक तरफ़ मण्डप सजता था 

दूसरी ओर था उखाड़-पछाड़ पानी

पुरखिन ने गड़वाया था 

जल में काठ का दुल्हा- दुल्हन

टोटका था यह नहीं तो

सब दहा ले जाएगा पानी 

दहा ही ले गया 

सिर्फ़ तुम्हें


पहली बार कब मरी थी तुम

जब परदेस पढ़ के आए दूल्हे ने

कहा था तुम्हें गँवार

बारात लेकर लौट जाना चाहता था

गिटपिट अंग्रेज़ी नहीं बोल सकी तुम तब भी

 ब्रह्मांड- सोसायटी के दो कमरों में सिमटी

 परकटी गौरैया सी छटपटाती रही


पहली बार कब मरी थी तुम 

जब लौटने को बंद थे सब दरवाज़े 

वहीं रहना है हर हाल में

वहीं रहकर 

ढलती गयी किसी और साँचे में इतना

अपनी ही देह में न रही


या पहली बार तब ही मरी थी तुम

जब रोई थी पहली बार 

संसार हुलसा नहीं था 

मृत्यु मुस्कुरा उठी थी


अब जब तुम वाक़ई नहीं हो 

सोचती हूँ

पहली बार कब मरी थी तुम,

स्टोव फटने से मर गयी एक जवान औरत

किसी ने विष चाट लिया

कोई झूलती मिली भरी दुपहरी

किसी की चमकती आत्मा यूँ ही घुन खा गयी,

बीते दिनों सपनों से भरी एक देह 

छत से कूद गयी 

 उस रोज़ तुम कौन-सी बार मरी थी 


(यह कविता नहीं, तुम्हारी आवाज़ नहीं बन सकी, तुमपर कविता कैसे लिख सकूँगी! तुम, मेरी माँ-सी जो मेरी हर किताब पढ़कर कहती थी- कभी मेरी कथा कहना!

मैंने कितनी बार कहा फिर भी अकथ रही तुम्हारी कहानी)


फेसबुक से साभार।

अरुण कमल ने कहा कि दुनिया का सारा साहित्य एक ही है भले ही वह अलग-अलग भाषाओं में लिखा जाता है।


पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए बिहार के प्रख्यात साहित्यकार/ कवि अरूण कमल।



पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में गुरूवार को हिंदी कविता के लिए साहित्य अकादमी से सम्मानित बिहार के पहले हिंदी कवि अरुण कमल के काव्य-पाठ के साथ उनसे संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया । 


कार्यक्रम की शुरुआत में विभाग के वरिष्ठ अध्यापक डॉ. दिलीप राम ने अंग वस्त्रम और पुष्प-गुच्छ देकर अरुण कमल का सम्मान किया और उनकी कविताओं पर आलोचनात्मक टिप्पणी भी की।


हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. तरुण कुमार ने स्वागत संभाषण में अरुण कमल की कविता को साधारणता का उत्सव मनाने वाली कविता बताते हुए उनकी कुछ पसंदीदा कविताओं का पाठ भी किया।


विभाग के विद्यार्थियों में समीर ने अरुण की कमल की 'धार' शीर्षक कविता, नंदिनी ने 'मुक्ति' , पूजा ने 'घोषणा', रूपम ने 'बुढ़ापा' , गौरव ने 'उत्तम', आफ़ताब ने 'उधर के चोर', संतोष ने 'सूचकांक', वसुधा ने 'पूंजी', नेहा ने 'निगेटिव फोटो' का पाठ किया।


अंत में कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए अरुण कमल ने कहा कि दुनिया का सारा साहित्य एक ही है भले ही वह अलग-अलग भाषाओं में लिखा जाता है।


पटना विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे अरुण जी ने कहा कि हिंदी विभाग, पटना विश्वविद्यालय ने मुझे साहित्यिक रूप से पोषित किया। इस क्रम में उन्होंने पंडित रामावतार शर्मा, केसरी कुमार, देवेंद्रनाथ शर्मा, नंदकिशोर नवल, रामवचन राय इत्यादि विद्वानों को याद किया।


उन्होंने एक कवि के तौर पर एक ऐसे समाज की रुपरेखा रखी जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति भी सुरक्षित रह सके। किसी तरह की गैर बराबरी न हो। उन्होंने हिंदी के विद्यार्थियों को खास तौर पर संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी के साहित्य को पढ़ने का सुझाव दिया l

बाद में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि कविता में गुटबंदी जैसी कोई चीज नहीं होती है। कविता में सब अपनी दौड़ दौड़ते हैं। इसमें कोई हार-जीत नहीं होती।


धर्म से संवाद सम्बंधित एक अन्य सवाल सम्बन्ध में उनका कहना था कि असल सवाल मनुष्यता का है, धर्म का नहीं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई धर्म मानता है या नहीं।


उन्होंने स्त्री लेखिकाओं और युवा कवियों की नयी पीढ़ी की तारीफ करते हुए कहा कि इतने सम्भावनाशील पीढ़ी हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य में नयी घटना है।


उन्होंने कार्यक्रम के अंत में अपनी कविता 'घोषणा', 'योगफल', 'मेख', 'कॉलेज का अंतिम दिन' का पाठ किया। कविता पाठ करते-करते वे भावुक भी हो गए।


इस अवसर पर हिंदी विभाग,पटना कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. मार्तण्ड प्रगल्भ, डॉ. कंचन कुमारी, डॉ. राकेश शर्मा, डॉ. जैनेन्द्र कुमार, डॉ. सूर्यनाथ सिंह, डॉ. पीयूष राज, डॉ. सुधांशु सहित विभाग के शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।


कार्यक्रम का संचालन डॉ. सितारे हिन्द ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रेणु चौधरी ने किया l

रविवार, 11 दिसंबर 2022

कुछ बातें रवीश के बहाने: अपूर्वा

 रवीश कुमार ने जब से एनडीटीवी से इस्तीफा दिया है तब से पक्ष-विपक्ष में बहुत सी बातें आईं। एक तर्क़ अपूर्वा जी का भी जानते हैं। मीडिया महज पत्रकारिता ही नहीं बल्कि एक व्यवसाय भी है। अतः तर्क के इस आयाम को भी नकारा नहीं जा सकता है।



कुछ बातें रवीश कुमार के बहाने


प्रणव रॉय और राधिका रॉय के स्वामित्व वाले समाचार चैनल एनडीटीवी का प्रबंधन अडानी समूह के हाथों में जाने को लेकर इन दिनों मीडिया, सोशल मीडिया और आमजन के मध्य कोहराम मचा हुआ है। हिंदी भाषियों के लिए खासकर एनडीटीवी हिंदी से जुड़े ख्याति प्राप्त पत्रकार रवीश कुमार का चैनल से इस्तीफा किसी सदमे से कम नहीं है। रवीश कुमार का स्तुतिगान इन दिनों अपने चरम पर है। रवीश के प्रशंसकों को लग रहा है कि यह ‘सौदा’ अडानी समूह ने रवीश कुमार की बुलंद आवाज को खामोश करने की नीयत से किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों से नाइत्तेफाकी रखने वालों का मानना है कि ऐसा उनके ही इशारे पर, उनकी रजामंदी चलते हुआ है। ऐसा लगने के, ऐसा माने जाने के वाजिब कारण भी हैं। रवीश कुमार उन चुनिंदा टीवी पत्रकारों में से एक हैं जो बेहद विपरीत और विषम परिस्थितियों में भी सच्चाई के पक्ष में खड़े रहे हैं। मैं हिंदी पट्टी के कई ऐसे टीवी पत्रकारों का नाम गिना सकता हूं जिन्हें सच के पक्ष में खड़ा रहने के अपने जुनून चलते सत्ता के कोप का शिकार होना पड़ा। ऐसे बहुत सारे हैं जिन्होंने बड़े मीडिया संस्थानों की अपनी नौकरी को इसी जुनून चलते या तो स्वयं लात मार दी या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम, अभिषार शर्मा का नाम ऐसों में शामिल है। अब रवीश कुमार भी इस सूची में दर्ज हो गए हैं। यह सभी सोशल मीडिया के जरिए अपने जुनून को जिंदा रखे हुए हैं। बगैर किसी खौफ से आज भी सच को जिंदा रखने की अपनी मुहिम को चला रहे हैं। सोशल मीडिया में इन प्रशंसकों की तादात से स्पष्ट होता है, तसल्ली भी मिलती है कि अंधभक्ति के काल में सच को सुनने और समझने वालां की कमी इस देश में नहीं है। अब रवीश कुमार भी इन जुनूनियों के बगलगीर हो चुके हैं। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा महज चंद दिनों में ही उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के फॉर्लोवर्स की तादात का लाखों में पहुंच जाने से लगाया जा सकता है। एनडीटीवी को लेकिन केवल और केवल रवीश कुमार के चलते, केवल और केवल रवीश कुमार की आवाज को बंद करने की नीयत चलते अडानी समूह ने नहीं खरीदा है। बहुत संभव है कि रवीश कुमार भी एक कारण हों लेकिन वे मुख्य कारण मेरी समझ से नहीं हो सकते हैं। यदि रवीश ही एकमात्र कारण होते तो उन्हें चैनल से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान के पास विकल्प मौजूद था। एनडीटीवी का स्वामित्व अपरोक्ष रूप से रिलायंस समूह के हाथों में लंबे अर्से से था। वर्ष 2009 में एनडीटीवी के संस्थापक रॉय दंपति द्वारा मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह से 403 करोड़ रुपए बतौर कर्ज लिए गए थे। इस कर्ज की शर्तों के अनुसार ही समय पर कर्ज न अदायगी के चलते रिलायंस समूह इस कर्ज के बदले एनडीटीवी के 29 प्रतिशत का मालिक बन गया। रिलायंस समूह ने एनडीटीवी को यह कर्जा अपनी एक कंपनी विश्वप्रधान कर्मिशयल 

प्राइवेट लिमिटेड (वीसीपीएल) के जरिए दिया था। अडानी समूह ने इस कंपनी वीसीपीएल को रिलायंस से इस वर्ष (2022) में खरीद लिया और इस तरह से वह एनडीटीवी की 29 प्रतिशत भागीदार हो गया। रिलायंस समूह ने कर्ज देते समय एनडीटीवी के संस्थापकों संग एक बेहद कड़ा समझौता किया था जिस चलते रॉय दंपति का कर्ज अदायगी न कर पाने के चलते अंततः अपनी कंपनी से मालिकाना हक गंवा देना वक्ती बात थी। ठीक ऐसा ही हुआ भी। इस पूरे ‘खेला’ में एक बड़ा पेंच लेकिन है जिससे इस आशंका को बल मिलता है कि इस पूरे ‘खेला’ में कहीं न कहीं वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की भूमिका रही है। गौतम अडानी के रिश्ते केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व संग बेहद मधुर हैं। यह ऐसा सच है जो प्रत्यक्ष है, जिसे प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कस्तूरी की गंध बाबत संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है- ‘यदि सन्ति गुणाः पुंसां विकसन्त्येव ते स्वयं, म्नहि कस्तूरिकामोदः शपथेन विभाव्यते।’    


अर्थात कस्तूरी की गंध को सिद्ध नहीं करना पड़ता, वह तो स्वयं फैलकर अपनी सुबंध से वातावरण का सुवालित कर देती है। इसी प्रकार गुणवान और प्रतिभावान मनुष्य के गुण अपने आप फैल जाते हैं, उनका प्रचार नहीं करना पड़ता। यह कलयुग है। इसमें ‘गुणवान’ और ‘प्रतिभावान’ की परिभाषा सत्युग वाली नहीं रही है। आज के दौर में गौतम अडानी ‘गुणवान’ और ‘प्रतिभावान’, दोनों हैं और वर्तमान सत्ता संग उनके रिश्तों को किसी प्रमाण अथवा प्रचार की जरूरत नहीं है। कस्तूरी गंध समान इन रिश्तों को भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस समूह ने एनडीटीवी का मालिकाना हक अपने पास क्यों नहीं रखा? क्यों उसने अपनी कंपनी अडानी समूह को बेच दी? वह भी तब, जब स्वयं रिलायंस समूह बड़ी तेजी से समाचार जगत में अपने पैर पसार रहा है। देश का सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क ‘नेटवर्क-18’ का स्वामित्व रिलायंस समूह के पास ही है। ‘सीएनबीसी’ चैनलस् भी रिलायंस के ही हैं। ‘फोर्ब्स इंडिया’ और ‘ओवर ड्राइव’ पत्रिकाएं भी रिलायंस समूह की ही हैं। ‘फर्स्ट पोस्ट’ (www.firstpost.com) तथा मनी कंट्रोल (www.moneycontrol.com) भी रिलायंस की ही हैं। ऐसे में एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित न्यूज चैनल को अपने कर्ज की एवज में रिलायंस बड़ी आसानी से अपने अधिकार में ले सकता था। वह बड़ी आसानी से रवीश कुमार को चैनल से बाहर किए जाने का निर्देश रॉय दंपत्ति को दे सकता था। अपने चैनल को बचाने के लिए रॉय दंपत्ति रिलायंस के इस निर्देश को मेरी समझ से तत्काल स्वीकार भी लेते। आखिरकार प्रणय रॉय-राधिका रॉय के लिए भी एनडीटीवी मिशनरी सोच वाली पत्रकारिता का माध्यम तो था नहीं। जिन्हें मेरी बात से इत्तेफाक न हो, वे प्रणय-राधिका के अतीत का पोस्टमार्टम करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें स्वयं ही सत्य से परिचय हो जाएगा। भारत में पत्रकारिता का इतिहास देख लीजिए। आजादी बाद से ही बड़ी पत्रिकाएं, समाचार पत्र और बाद में न्यूज चैनल का स्वामित्व ‘पवित्र पत्रकारीय’ मूल्यों की रक्षा करने वालों और प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानने वालों के हाथों कभी नहीं रहा है। फिर चाहे वह अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ समूह हो, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह हो या फिर ‘इंडिया टूडे’ समूह, सभी के मालिकान बड़े औद्योगिक घराने से रहे हैं जिनको प्रेस की ताकत से व्यापारिक लाभ और सत्ता के साथ गठजोड़ का अवसर मिलता रहा है। ईमानदारी से, निष्पक्षता के साथ आकलन यदि करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इन बड़े मीडिया घरानों का सत्ता संग रिश्ता समन्वयवाद और साहचर्य का रहता आया है। यही कारण है कि सरकार चाहे किसी की भी हो, कोई भी विचारधारा वालों की हो, इन बड़े प्रेस (मीडिया) घरानों ने हमेशा से ही ‘तटस्थता’ की नीति का अनुसरण ही किया है। कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान एक छद्म संपादकीय स्वतंत्रता का आभाष जरूर महसूस होता था, लेकिन वह था छद्म ही। वर्तमान समय में उस छद्मता को भी पूरी तरह से नकार दिए जाने चलते चौथे स्तंभ की कथित निष्पक्षता को निर्ममतापूर्वक दबाए-कुचले जाने की बात तेजी से उठने लगी है। कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान एकतरफा कथन (नैरेटिव) जरूर नहीं था। सत्ता की धारा के विपरीत जाने वालों को साधने की कांग्रेसी कला अलग थी, वर्तमान सत्ताधीशों की अलग है। यहां यह भी समझा जाना जरूरी है कि ऐसा अकेले हमारे देश में नहीं हो रहा है। जो थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता लोकतांत्रिक देशों में प्रेस (मीडिया) के पास है भी, वामपंथी सत्ता वाले देशों में तो वह भी नहीं है। सत्य को, विपरीत विचारधारा को ऐसे मुल्कों में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपना पूरी तरह से कुचल दिया जाता है। वहां सत्ता बंदूक की नाल के बल पर ऐसा करती है। लोकतांत्रिक मुल्कों में पूंजी के बल पर ऐसा किया जाता है। अमेरिका में 1983 तक पचास कंपनियां देश के नब्बे प्रतिशत मीडिया को संचालित करती थीं। 2011 आते-आते यह स्वामित्व मात्र 6 बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों में चला गया है। हमारे यहां भी यही कुछ हो रहा है। रिलायंस समूह की ताकत अपरम्पार है। उससे टकराने या चुनौती देने का काम कोई अकेला अखबार या चैनल कर ही नहीं सकता। रिलायंस जिओ नेटवर्क आम भारतीय के जीवन पर पूरी तरह काबिज हो चुका है जिसके जरिए आमजन को वही परोसा जा रहा है जो यह समूह चाहता है, आज की सत्ता चाहती है। रिलायंस की इस ताकत को सत्ता भी बखूबी समझती है। यही कारण है कि 2014 के बाद मुकेश अंबानी की बरअक्स गौतम अडानी को खड़ा करने का खेला शुरू किया गया। भले ही गौतम अडानी विश्व के सबसे धनी व्यक्ति बन गए हों, उनका समूह कर्ज के दलदल में गहरे धंसा हुआ है। दूसरी तरफ रिलायंस समूह धीरे-धीरे कर्ज मुक्त होते जा रहा है। ऐसे में उसे कोई आवश्यकता नहीं थी कि वह एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल का स्वामित्व अपने हाथों ले जाने देता। वह भी अपने प्रतिद्वंद्वी के हाथों में।


बहरहाल कारण भले ही कुछ भी क्यों न हों, यह तय है कि काफी हद तक स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का एक और माध्यम पूंजी और सत्ता की शक्ति के हाथों परास्त हो गया है इससे लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया जब तक सरकारी अंकुश से बाहर है, निष्पक्ष, बुलंद और मिशनरी सोच जिंदा रहेगी। यह प्रकृति का नियम है कि सत्य भले ही तात्कालिक तौर पर हारा हुआ प्रतीत हो, अंततः जीत उसी की होती है। ‘सत्यमेव जयते’ पर विश्वास बनाए रखने के सिवा हाल-फिलहाल हमारे पास कोई चारा है भी नहीं। इसलिए इसे अपने विश्वास में जिंदा रखिए और इसके सहारे ‘अच्छे दिन’ आने की उम्मीद जिलाए रखिए।


फेसबुक से साभार।


सोमवार, 5 दिसंबर 2022

अपना डेथ सर्टिफिकेट - अशोक मिश्र

 अपना डेथ सर्टिफिकेट

 -अशोक मिश्र




नगर निगम के जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के कार्यालय में पहुंचकर उस्ताद मुजरिम ने एक बाबू से पूछा, ‘सर, क्या आप बता सकेंगे कि यह मृत्यु प्रमाण पत्र कहां बनता है?’ बाबू ने बिना सिर उठाये जबाब दिया,‘कामता बाबू से जाकर मिलो। ऐसे घटिया काम वही देखते हैं। उनकी पैदाइश ही ऐसे घटिया कामों के लिए हुई है।’


मुजरिम ने मासूम सा सवाल किया ,‘सर जी! ये आपके कामता बाबू कहां मिलेंगे? यह आप मुझे बताने की कृपा करेंगे।’मुजरिम ने यह सवाल क्या किया मानो उस बाबू की कुर्सी के नीचे हाईड्रोजन बम रख दिया हो। उस बाबू ने पहली बार अपना सिर झटके से उठाया और झल्लाकर कहा,‘मेरे सिर पर! आपको कामता बाबू के बैठने का स्थान बताने के लिए सरकार ने मुझे यहां नहीं बैठा रखा है। जिस तरह से आपने मुझे ढूंढ़ लिया, उसी तरह कामता बाबू को भी खोज लीजिए। और अब आप जाइए, मेरा भेजा मत खाइए। पता नहीं कहां से चले आते हैं, लोग मेरा सिर चाटने। भगवान की फैक्ट्री में अब भी ऐसे लोग बनाये जाते हैं, यह तो मुझे पता ही नहीं था। भगवान जाने...इस देश का क्या होगा?’


क्लर्क के जवाब से आहत मुजरिम ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और एक चपरासीनुमा जीव को किनारे बैठा देखकर उनकी आंखों में चमक आ गयी। वे उसकी ओर उसी तरह लपके, जैसे कभी सुदामा को देखकर श्रीकृष्ण लपके होंगे। उन्होंने चपरासी के पास जाकर पचास का पत्ता उसे थमाया, तो उसने उन्हें ले जाकर कामता बाबू के पास खड़ा कर दिया। वैसे भी हिंदुस्तान में गांधीवादी दर्शन की कोई उपयोगिता हो या न हो, लेकिन गांधी छाप रुपये की उपयोगिता सर्वसिद्ध है। यह कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक समान रूप से पहचाना और अपनाया जाता है। पचास का पत्ता देखते ही चपरासी की आंखों में जो चमक उभरी थी, वह इसी बात का प्रमाण है।


मुजरिम को देखकर कामता बाबू ने अपने दायें हाथ की अंगुलियां चटकाई और बोले ,‘हां बताइए , आपका क्या काम है?’ इसके बाद इस तरह जमुहाई लेने लगे मानो रात भर जागने के बाद सीधे दफ्तर चले आये हों। उन्होंने पास बैठे सीनियर क्लर्क विशंभर नाथ से कहा, ‘बड़े बाबू, कुछ सुर्ती-वुर्ती खिलाएंगे या नहीं। बड़ी सुस्ती सी आ रही है।’ इसके बाद उनका ‘सुर्ती पुराण’ चालू हो गया। वे बताने लगे कि उनके गांव में तंबाकू खूब बोया जाता है। उस तंबाकू को एक बार खाने के बाद व्यक्ति जिंदगी भर वही खोजता फिरता है। वे बड़े गर्व से बता रहे थे कि उनके गांव की सुर्ती को को खरीदने कांधार से व्यापारी आते हैं। उनके खेत में उपजी तंबाकू के दीवाने तो रूस के पूर्व राष्ट्रपति रहे ब्रेझनेव तक रहे। उनके पिता जी जब तक जिंदा रहे, पूर्व राष्ट्रपति ब्रेझनेव को तंबाकू उपहार में भेजते रहे।


मुजरिम ने अपने आने का मकसद बताया, तो कामता बाबू ने एक फार्म निकाला और बोले,‘यह फार्म भर लाइए। चालीस रुपये के साथ ‘सेवा पानी’ जमा कर दीजिए। दो दिन में आपका काम हो जाएगा।’ इसके बाद वे फिर बड़े बाबू से बात करने लगे। कामता बाबू की बातों पर बड़े बाबू सिर्फ ‘हूं-हां’ करते जा रहे थे, लेकिन उनका ध्यान कहीं और था। वे अपने चश्मे से सामने बैठी मिस कविता को प्यार भरी नजरों से घूर रहे थे। मिस कविता भी तिरछी नजरों से पहले बड़े बाबू को देखतीं और मुस्कुराकर अपने सामने बैठे अभी कुछ ही दिन पहले भर्ती हुए जूनियर क्लर्क को देखने लगतीं। कामता बाबू इस नैन व्यापार से अप्रभावित अपने ‘सुर्ती पुराण’ में लगे हुए थे। उन्हें अपनी बात कहने के सिवा न बड़े बाबू से कुछ लेना-देना था, न ही मिस कविता या जूनियर क्लर्क से।


थोड़ी देर बाद फार्म भरकर मुजरिम कामता बाबू के हुजूर में पेश हुए। कामता के ‘सुर्ती पुराण’ में बाधा पड़ी, तो वे तिलमिला उठे। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपने क्रोध को काबू में किया और नाक पर चश्मा चढ़ाते हुए कहा, ‘मुजरिम आपके क्या लगते थे? उनकी कब मौत हुई थी? ग्राम प्रधान या सरकारी अस्पताल के डॉक्टर का प्रमाण-पत्र लाए हैं? अगर न लाए हो, तो अभी मौका है, घर जाकर ले आओ। आज न ला सको, तो कल-परसों ले आना। लेकिन फार्म जमा करने के साथ यह सब कुछ जरूरी है। इसके बिना फार्म रिजेक्ट हो जाएगा, तो मुझे दोष देते फिरोगे।’


मुजरिम ने घिघियाते हुए कहा, ‘बड़े बाबू...मुजरिम मेरा ही नाम है और खुदा के फजल से मैं अभी तक जिंदा हूं।’मुजरिम की बात सुनकर कामताबाबू इस कदर चौंक पड़े कि उनका चश्मा टेबल पर गिर पड़ा। उन्होंने चश्मा उठाकर नाक पर टिकाते हुए कहा, ‘क्या....आप अपना मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाने आए हैं? शर्म नहीं आती आपको सरकारी कर्मचारियों से आन ड्यूटी मजाक करते हुए। अगर मैं शिकायत कर दूँ, तो आप गए बिना भाव के। सरकारी मुलाजिमों से मजाक करना क्या इतना आसान है? आपको अंदाज नहीं है कि ऐसा करने पर क्या सजा हो सकती है।’


मुजरिम ने बेचारगी अख्तियार करते हुए कहा, ‘वो क्या है कि बड़े बाबू! सरकारी कामकाज कितना फास्ट होता है, मैं जानता हूं। इसलिए सोचा कि मैं अपनी मृत्यु प्रमाण-पत्र के लिए अभी से अप्लीकेशन दे दूँ । बहुत जल्दी काम हुआ, तो दस-पांच साल में बन ही जाएगा। तब तक मैं भी खुदा के फजल से टपक ही जाऊंगा। पैसठ साल की उम्र हो गयी है। बाद में अगर मृत्यु प्रमाण पत्र बन गया, तो मेरे बच्चे आकर ले जाएंगे।’ मुजरिम का जबाब सुनकर कामता बाबू उन्हें ताकते ही रह गये। (व्यंग्य संग्रह ‘हाय राम!...लोकतंत्र मर गया’ से)

साभार


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति

 रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति: सुशील कुमार भारद्वाज 



मेरी बात कुछ लोगों को बुरी लग सकती है लेकिन सच्चाई से आप भाग नहीं सकते। जब से #रवीशकुमार ने #एनडीटीवी छोड़ी, तब से उनके पक्ष में लिखने-बोलने वाले बढ़-चढ़ कर पोस्ट पर पोस्ट किये जा रहे हैं। लेकिन मेरी समझ से मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति हैं। जब तक एनडीटीवी के मालिक राय दम्पत्ति रहे तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता का राग अलापते रहे और उनके इस्तीफा के अगले दिन कुमार साहब ने इस्तीफा दे दिया। आखिर क्यों? क्या यह मान लिया जाय कि आपके तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारिता का रहस्य राय दम्पत्ति ही थे? आप उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे थे?

राय दम्पत्ति को भी चैनल की जिम्मेदारी की पेशकश की गई थी लेकिन संभव है कि चैनल को जिस प्रक्रिया के तहत बेचा गया उसमें उनसे कोई राय नहीं ली गई थी इसलिए वे आहत हों, और चैनल से उन्होंने खुद को अलग कर लिया।

अब बात आती है रवीश बाबू की। वे चैनल के मालिक नहीं बल्कि महज एक कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे थे। उनकी रोजी रोटी का सवाल वहां से जुड़ा हुआ था। उन्हें नये मालिक ने न तो पद छोड़ने को कहा न ही उनके कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न लगाया, फिर क्यों भयाक्रांत होकर समय से पहले ही निकल लिये? ये तो हो गया कि पानी में डूब जाने के डर से तैरने की कोशिश ही नहीं करना। आप चैनल में बने रहते जब तक की चैनल आपको हटने को नहीं कहता या फिर जब तक की आपकी रपट या बहस पर रोक नहीं लगाई जाती। यदि नया चैनल मालिक आर्थिक, मानसिक या किसी भी रूप में आपके समक्ष व्यवधान उत्पन्न करता, आप आवाज उठाते तो जनता आपके साथ खड़ी नजर आती। आपकी समस्या लोगों को समझ में आती। लेकिन आप तो निहायत ही कमजोर और डरपोक, पलायनवादी नायक साबित हुए। आप सरकार के फ़ैसलों पर सवाल उठाकर नायक बन सकते हैं जैसे कि विपक्ष का एक मात्र चेहरा आप ही हों, लेकिन चैनल मालिक से आप एक सवाल पूछने की भी हिम्मत नहीं रखते हैं? सारी क्रांति समाप्त? अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त? नहीं रवीश बाबू नहीं। कम से कम आपसे ऐसे पलायनवादी कदम की उम्मीद तो कतई नहीं थी। आपसे पहले भी दर्जनों पत्रकारों ने चैनल और अखबार छोड़ें। स्वतंत्र पत्रकारिता की। दूसरे जगह नौकरी की। अपना स्वतंत्र चैनल, अखबार या यूट्यूब चैनल शुरू किया। लेकिन सबकुछ बहुत ही शांति से। लेकिन आपने तो ढ़ोल पीट-पीट कर सबकुछ किया। भले ही आपके भक्त आपको इतिहास में दर्ज करने की बात कर रहे हों लेकिन आप एक पलायनवादी के रूप में ही याद किये जाएंगे जिसने भविष्य के डर से ही सबकुछ छोड़ दिया।

#रवीश #रवीश_कुमार #NDTV #RavishKumar

सोमवार, 28 नवंबर 2022

ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना - प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना के कथायात्रा पर प्रियदर्शन का यह आलेख गौरतलब है।


 ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना

प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना ने 70 के दशक में लिखना शुरू किया। यह वह समय है जब नई कहानी का आंदोलन अपने शिखर पर पहुंच चुका था और उसके कई नायक आधुनिक हिंदी साहित्य में इतिहास पुरुष जैसे हो चुके थे। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की लगभग कुख्यात हो चुकी त्रयी के अलावा निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती की कहानियां अलग-अलग ढंग से इसी आंदोलन की कड़ियों की तरह हमारे सामने थीं। ज्ञानरंजन, अमरकांत, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, मार्कंडेय, रवींद्र कालिया और धीरेंद्र अस्थाना इसी परंपरा का हिस्सा रहे। इनके लगभग समानांतर या तत्काल बाद उदय प्रकाश, संजीव और शिवमूर्ति जैसे विलक्षण कथाकार हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उभरे।

धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों को इस परंपरा के हिस्से के तौर पर पढ़ने का एक मकसद और है। नई कहानी का आंदोलन किसी शून्य से पैदा नहीं हुआ था, वह अपने देशकाल, अपनी परिस्थितियों की निहायत उपज था। आज़ादी के बाद का मोहभंग, गांव से कटकर पहली बार शहरों में बस रहे मध्यवर्ग का मुश्किल होता जीवन, युवाओं के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी और हताशा, प्रेम और दांपत्य के नए बनते तनाव- यह सब एक नया यथार्थ बना रहे थे जिसे शायद पुराने शिल्प में देखना और रचना संभव नहीं था। यह एक शुष्क यथार्थ था जिसके हिस्से के पुराने स्वप्न धीरे-धीरे तिरोहित हो रहे थे, जिसके भीतर देश को नए सिरे से गढ़ने और एक बराबरी वाला समाज बनाने की कल्पना लगभग रोज चोट खाती हुई मर रही थी और जिसके भीतर इन सबसे पैदा हुई एक गहरी बेचैनी थी।

अभाव, अनिश्चय, हताशा और बेचैनी के लगभग इसी चौराहे पर हमें धीरेंद्र अस्थाना की कई कहानियां मिलती हैं। लेकिन वे जीवन की छायाप्रति की तरह नहीं मिलतीं। धीरेंद्र अस्थाना इस मायने में अपने समय के कई कथाकारों से भिन्न हैं कि वह किन्ही दी हुई जीवन स्थितियों को, किसी अर्जित अनुभव को जस का तस नहीं रखते, बल्कि उनका लेखकीय हस्तक्षेप उनमें से अपनी कहानी चुनता है। ऐसा लगता है, पूरा जीवन उनके सामने चल रही एक कहानी जैसा है। वे उसमें शामिल भी हैं और उससे विलग भी हैं। ऐसी कहानी लिखना आसान काम नहीं होता। इसमें दो तरह के खतरे बहुत प्रत्यक्ष होते हैं। या तो कहानी बिखर जाती है या फिर वह जीवन की नकली, स्पंदनविहीन प्रति होकर रह जाती है।

लेकिन धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां दोनों खतरों के पार जाती हैं- शायद इसलिए कि उन्हें मालूम है कि अंततः उन्हें कहना या बताना क्या है। कई तरह की जटिल स्थितियां रचते हुए वे अंततः कहानी अर्जित कर लेते हैं जो उन्हें कहनी होती है। उनकी पहली ही कहानी 'लोग हाशिए पर' एक जटिल कहानी है। कहानी कम से कम तीन स्तरों पर चलती है। पहले स्तर पर एक प्रेस है जिसमें काम कर रहे कई लेखक बहुत कम पैसे पर- लगभग- शोषण की स्थिति में नौकरी करने को मजबूर हैं। दूसरा स्तर आर्थिक तौर पर कमज़ोर इन लेखकों के परिवारों का है जिनकी ज़िम्मेदारियां पूरी करते या उनके दबाव से भागते-बचते ये लोग शराब के ठेकों की शरण लेते हैं और एक-दूसरे को किसी फुरसत में अपनी परेशानियां, कुंठाएं, कहानियां-कविताएं सब सुनाते हैं। एक अन्य स्तर पर यह कहानी उन मज़दूरों की है जो एक दिन हड़ताल करते हैं और अपना हक़ हासिल करने की कोशिश करते हैं। लगभग कामयाब दिखती इस हड़ताल के खात्मे के बाद मालिक साज़िश करते हैं और हड़ताल का नायक एक क़त्ल के जुर्म में सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। 

पहली नज़र में यह कुछ अतिरिक्त नाटकीय कहानी लग सकती है- जिसे लेखक ने अपनी कल्पना से बुना ही नहीं है, बल्कि अपने स्व को अलग-अलग चरित्रों में बिखेर दिया है। लेकिन कहानी की सफलता इस बात में है कि कथाकार इन तमाम प्रतिकूलताओं के बीच बनने वाले हालात को बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ता है, किसी नक़ली आशावाद की गिरफ़्त में आने की जगह कहानी को उसके यथार्थ तक जाने देता है और उसमें नाटकीयता मिलाते हुए भी उसके पाठ की प्रामाणिकता बनाए रखता है। दरअसल इस काम में धीरेंद्र अस्थाना की मददगार उनकी बहुत जीवंत भाषा भी है- ऐसी भाषा जो बहुत कम शब्दों में स्थितियों और चरित्रों को रच सकने में सक्षम है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसी भाषा किसी कौशल या अभ्यास का नतीजा नहीं होती, उस जीवन से जुड़ाव से पैदा होती है जिसको लेखक अपनी कथा में रचने की कोशिश कर रहा होता है। यह जुड़ाव इस कहानी में बना रहता है और इसलिए कहानी अपने पाठकों से जुड़ पाती है। 

धीरेंद्र अस्थाना दरअसल जीवन के समानांतर अपनी कहानियों में एक और जीवन रच रहे होते हैं। क़ायदे से लगभग हर लेखक यही काम करता है, लेकिन सबकी अपनी प्रविधि होती है। कुछ लोग बस जो घटित होता है, उसमें कुछ कल्पना का रसायन मिलाकर, अपने-आप को अदृश्य रखते हुए ऐसी यथार्थवादी कहानियां लिखते हैं जिन्हें पढ़ते हुए लेखक का- या कहानी पढ़ने का- ध्यान नहीं आता। 

मगर धीरेंद्र अस्थाना की प्रविधि दूसरी है। वे एक साथ अपनी कहानियों में इतनी सारी चीज़ें ले आते हैं कि उन्हें जोड़ने के लिए कोई लेखक चाहिए। वे पाठक को यह भूलने नहीं देते कि वह कहानी ही पढ़ रहा है, लेकिन कहानी के तमाम सूत्र अंततः उस जीवन की ओर ले जाते हैं जिसमें उल्लास हो या उदासी, वह अपने पूरे गाढ़े रंग में प्रगट होती है। 

ऐसी ही एक कहानी है ‘भूत।‘ लेखक का एक वर्तमान है जिसमें एक स्त्री भी है जिससे वह प्रेम करता है। लेकिन उसे लगता रहता है कि उसका भूत उसके वर्तमान को खा रहा है। वह चाहता है कि वह अपनी प्रेमिका से यह सब साझा कर सके, लेकिन कर नहीं पाता। दूसरी तरफ़ प्रेमिका लगातार महसूस करती है कि वह एक अजनबी शख़्स के साथ है। वह बार-बार उसे कुरेदने की कोशिश करती है, लेकिन वह अपने खोल से बाहर नहीं आता। यह स्थिति उसे दफ़्तर में भी अजनबी और अकेला करती जाती है। जब वह पीछे मुड़कर और पलट कर देखता है तो पाठक के सामने एक सिहरा देने वाला यथार्थ सामने आता है। बरसों पहले वह पिता की मौत के बाद अपनी मां की उम्मीद की तरह घर से निकला था- लेकिन कहां और क्यों रास्ते में छूट गया और इस अधूरी रह गई वापसी ने कैसे उसे वर्तमान का प्रेत बना डाला है, इसकी लगभग स्तब्ध कर देने वाली कहानी हमारे सामने आती है। 

ध्यान से देखें तो धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां जीवन के कई आयामों के बीच आवाजाही करती हैं। एक तरफ़ वह समाज और व्यवस्था है जिससे उनके मध्यवर्गीय चरित्र टकराते रहते हैं- कभी हारते और कभी जीतते भी हैं, लेकिन अंततः उनकी कहानी इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था और इसे बदलने की ज़रूरत को कुछ रेखांकित करती हुई किसी अंत तक पहुंचती है। एक आयाम उस परिवार का है जिसमें बेबस पिता हैं, कातर मां हैं, भाई और बहनें हैं। कहीं पिता से टकराता, कहीं उनसे पिटता और कहीं उनको याद करता नायक है, कहीं मां की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की कचोट का मारा कथावाचक हैं, कहीं भाई को तलाश रहा एक स्तब्ध शख़्स है जिसे पता है कि बहुत सारी मजबूरियों को मिलाकर बने यथार्थ ने उसे लगभग पीस डाला है। एक आयाम प्रेम और घर से जुड़ा है जहां रिश्ते दरकते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और फिर एक-दूसरे को नए सिरे से पहचानने की कोशिश करते हैं। 

इन्हीं कहानियों के बीच एक स्तब्ध कर देने वाली कहानी ‘चीख’ है। कथावाचक का मानसिक तौर पर दुर्बल भाई घर से चला गया है, घर उसकी तलाश में जुटा है, पच्चीस दिन बाद अचानक वह लौट आता है। लेकिन वह यह बता पाने में असमर्थ है कि इन पच्चीस दिनों में वह कहां रहा, किनके आसरे रहा। बस एक दिन बता पाता है कि उसे मां की चीख सुनाई पड़ी थी और वह लौट आया था। 

ऐसी ही एक बहुत जटिल कहानी ‘जन्मभूमि’ है। लेखक कहानी के शुरू में ही यह ‘डिस्क्लेमर’ डाल देता है कि यह सुसंगत घटनाक्रमों के बीच बनी कहानी नहीं है- इसे वह ‘ऐंटी स्टोरी’- प्रति कहानी- कहता है। यह कहानी भी बहुत नाटकीय ढंग से शुरू होती है- लेखक का इसरार है कि पाठक किसी मंच की कल्पना करें जिसमें एक दृश्य घटित हो रहा है। इस दृश्य में अरसे बाद बेटे के सामने आया पिता उसे गद्दार कहता है। आने वाले दिनों में पार्टी के कॉमरेड उसे डरपोक कहते हैं क्योंकि वह कहता है कि वह राजनीतिक मोर्चे से ज़्यादा साहित्यिक मोर्चे पर उपयुक्त है। वह शराब के ठेके पर अपने दोस्त के साथ बैठता है, वहां से पिट कर दोस्त के साथ ही किसी अनजान लड़की के घर पहुंचता है। उसे अपनी पत्नी याद आती है और उसका दुख याद आता है कि वह उसे समझने की कोशिश नहीं करता। 

दरअसल यह कई दृश्यों को मिलाकर बुनी गई कहानी है। किसी फिल्म की तरह ये सारे दृश्य साथ चल रहे होते हैं। एक दृश्य पत्नी का है, एक दृश्य कथावाचक की रंगकर्मी दोस्त अनुराधा कुलकर्णी का है और एक दृश्य उसके अकेलेपन का भी है। ये सारे दृश्य मिलकर एक बड़ा दृश्य बनाते हैं- अभाव और संकट की मारी दुनिया में एक संवेदनशील-चरित्र के लगातार पिटने, रोने और पलायनोन्मुख होने का। लेकिन यह इस निरे अर्थ में पलायन नहीं है कि इसमें सोचने का तत्व बाक़ी है, प्रतिरोध और गुस्सा बाक़ी है और यह खयाल और सवाल बाक़ी है कि ‘एक अकेला आदमी बावजूद सकारात्मक सोच और तमन्नाओं के अंततः ग़लत क्यों साबित होता है, होता चला जाता है?’

यहीं यह खयाल आता है कि क्या धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां विफल कथानायकों की कहानियां हैं? उनके हिस्से का प्रेम अधूरा रहता है, उनका परिवार उनसे असंतुष्ट रहता है, ज़िंदगी उनसे सधती नहीं, क्रांति उनसे होती नहीं। वे अकेले पड़ जाने को अभिशप्त चरित्र हैं। लेकिन क्या यह विफलता उनके भीतर मौजूद किसी ‘फेटल फ्लॉ’- किसी सांघातिक कमज़ोरी की है- शेक्सपियर के महान चरित्रों की तरह जो एक मोड़ पर जानलेवा साबित होती है? या इसका वास्ता उस दुर्निवार और दुर्विराट होती व्यवस्था से है जिसमें किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए या तो यांत्रिक बन कर जीना संभव है या फिर घुट-घुट कर मरना संभव है? दरअसल यह सवाल धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों का मर्म समझने की एक कुंजी दे सकता है। धीरेंद्र अस्थाना की ये कहानियां अच्छी क्यों लगती हैं? क्योंकि वे अपनी अंतर्वेदना में सिर्फ़ निजी छटपटाहट की कहानियां नहीं हैं, वे एक सार्वजनिक विडंबना की भी कहानियां हैं जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया है। 

‘नींद के बाहर’ वह कहानी है जिसमें धीरेंद्र अस्थाना का कथा-वैभव अपने पूरे निखार के साथ दिखाई पड़ता है। एक बड़े कंपनी के बड़े अधिकारी की नौकरी छूटने के बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। लेकिन यह नौकरी छूटने के साथ लोगों की नज़र बदल जाने की सपाट कहानी नहीं है। उल्टे उस अधिकारी को लगता है कि वह जब तक नौकरी में था तब तक एक गहरी नींद में था जिसमें दुनिया और उसका सच उसके सामने से ओझल थे। नौकरी छूटने के साथ वह नींद से बाहर आ गया है। बेशक, इसमें बदली हुई निगाहें भी हैं, दोस्तों द्वारा उसका फोन न उठाने की दास्तानें भी हैं, पास-पड़ोस से उसका नया बनता संबंध भी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह निजी दुख या पीड़ा की कहानी नहीं है। यह इस नए बनते चमकदार भारत में लगातार असुरक्षित होते जाते लोगों और उनकी ज़िंदगियों में फैलते अंधेरे की भी कहानी है- जो बहुत बारीक़ी से लिखी गई है और जिसके बहुत सारे स्तर हमें बांधे रखते हैं। 

इसी तरह एक और कहानी है- ‘पिता’। यहां पिता और पुत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं और कटे हुए भी- उनमें एक आत्मीय पारस्परिकता है, लेकिन वैसी भावुक निर्भरता नहीं जो पुराने पिताओं-पुत्रों में उनकी संवादहीनता के बावजूद देखी जाती है- एक-दूसरे पर दबाव बनाने या एक दूसरे के दबाव से मुक्त होने की कोशिश तो कतई नहीं। कोई हठी आलोचक पढ़ना चाहे तो इसमें टूटती-बिखरती

पारिवारिकता के सूत्र भी पढ़ सकता है। बेशक, वे सूत्र यहां हैं, लेकिन इन चरित्रों या इस कहानी की वजह से नहीं, बल्कि उस सहज माहौल की वजह से जो वक़्त बदलने के साथ बदल गया है। हां, इस बदले हुए माहौल में, एक निष्ठुर अकेलापन है जो सिर्फ इस वजह से नहीं है कि मां-पिता कहीं दूर हैं और बेटा अकेले है, बल्कि इस वजह से भी है कि अपनी स्वतंत्रता की कामना की, जीवन को अपने ढंग से जीने की ज़िद की, एक क़ीमत यह अकेलापन भी है। इसी अकेलेपन ने राहुल को भी बनाया है और मनचाही शादी और परिवार के बावजूद अंततः अकेला छोड़ दिया और यही अकेलापन विकास को भी बना रहा है।

कहानी का अंत काफी महत्वपूर्ण है। धीरेंद्र अस्थाना चाहते तो इसे आसानी से पिता की मर्जी की कहानी

बना सकते थे। बेटे की छूटी हुई नौकरी दुबारा लग गई है, वह कलाकार के रूप में स्थापित है, अब एक

घर है जहां से वह जुड़ा रहे तो पिता और परिवार से बंधा रहेगा। लेकिन अपने बेटे की उपलब्धि पर खुश

पिता फिर भी उसे यह आश्रय नहीं देता। राहुल दिल्ली की फ्लाइट वापस पकड़ने के लिए निकलने से पहले विकास से पूछता है, वह रहेगा कहां। विकास के जवाब में एक बेफिक्री है और राहुल उसे अपने हिस्से का आसमान या अपने हिस्से की छत बनाने के लिए (बिना यह कहे) छोड़ जाता है। यह एक जटिल अंत है- एक हूक भी पैदा करता है जो देर तक बनी रहती है। लेकिन शायद यही तार्किक है।

विकास को बांधे रखना होता तो राहुल शुरू से बांधे रखता- इस आख़िरी मोड़ पर वह उसे क्यों बांधे।

इस कहानी की कई ख़ासियतें हैं। यह अपने समय से बंधी- उसकी ताल में निबद्ध- कहानी है। यहां

छूटते हुए घर हैं, छूटती हुई नौकरियां हैं, नौजवान बेफ़िक्री है, बहुत हल्के से दीखता, लेकिन बदलता हुआ हिंदुस्तान है- और खालिस इक्कीसवीं सदी का वह द्वंद्व है जो अपने रिश्तों को लेकर हमारे भीतर

मौजूद है।

धीरेंद्र अस्थाना का लेखन संसार बहुत बड़ा और विपुल है। लेकिन उसकी खासियत यह है कि वह अपने बहुत क़रीब लगता है। शायद इसलिए कि वह बहुत दूर तक निजी प्रसंगों और अनुभवों से बनता है। यही वजह है कि उसमें बहुत गहरी तपिश दिखाई पड़ती है, उससे बहुत ऊष्मा मिलती है। उनके उपन्यास ‘गुज़र क्यों नहीं जाता’ में भी ये आत्मकथात्मक प्रसंग मिलते हैं। यह एक निजी कहानी जैसा है, लेकिन इसमें निहित सार्वजनिकता अदृश्य नहीं रहती और न ही इसके दंश अलक्षित रह जाते हैं।

लेकिन इतना राग-विराग-खटराग-अनुराग धीरेंद्र अस्थाना लाते कहां से हैं? उनका निजी वितान इतना बड़ा कैसे होता जाता है कि उसमें सार्वजनिकता भी समाई मिलती है? इसका जवाब उनकी आत्मकथा ‘ज़िंदगी का क्या किया’ देती है। इस किताब से गुज़रते हुए अनायास यह खयाल आता है कि धीरेंद्र जीवन की ऊष्मा को, उसके ताप को, जिस तीव्रता के साथ महसूस करते हैं, उसे अपने लेखन में लगभग ज्यों का त्यों उतार लेते हैं। धीरेंद्र बहुत बेबाकी और धीरज से अपने बचपन का, उस बचपन के संघर्ष का, अपने रिश्तों का, अपनी मां-अपने पिता. अपने चाचा का उल्लेख करते हैं। इस उल्लेख में संवेदनशीलता भी है, ज़रूरी दूरी भी, तटस्थता भी और कभी-कभी बिल्कुल निष्कवच यथार्थ को दिखा देने वाला साहस और स्वीकार भी। धीरेंद्र के कोख में रहते आत्महत्या की कोशिश में अपाहिज हो गई मां, फक्कड़पने के अलग-अलग ध्रुवांतों को जीते और परिवार के लिए किसी मुसीबत की तरह मिलते पिता, परिवार के आर्थिक अभावों को अनदेखा कर अपनी संपन्न जीवनशैली में खोए रिश्तेदार, और छोटे-बड़े अभावों का जैसे अंतहीन सिलसिला- मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फरनगर और देहरादून के बीच पले-बढ़े इस जीवन की झलक हमें य़ह भी बताती है कि लेखक कैसे बनते हैं या धीरेंद्र अस्थाना नाम का लेखक कैसे बना। 

जिसे ज़िंदगी इस दुर्धर्ष अनुभव की तरह मिली हो, वह या तो बिल्कुल संवेदनहीन होकर उसे मशीन या पशु की तरह काट देता है, या फिर अतिरिक्त संवेदनशील होकर आत्महत्य़ा के रास्ते की ओर बढ़ चलती है और अगर यह भी नहीं तो लेखक बन जाता है। दरअसल यह लिखना है जिसने धीरेंद्र अस्थाना का जीना संभव किया। यही वजह है कि जीवन भी उनके लिए कहानी जैसा है। इस कहानी में अपनी राहतें भी हैं और इससे निकलती राहें भी। यह उनकी सीमा भी है और उनकी शक्ति भी। और इन सबसे निकलता अंतिम सच यह है कि धीरेंद्र अस्थाना हिंदी के एक मूल्यवान लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने पाठकों को समृद्ध किया है और हिंदी कथा की परंपरा में अपने स्तर पर कुछ जोड़ा भी है।

प्रियदर्शन 




आलेख साभार।

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

 


युवा कवि रश्मि भारद्वाज की कविताएं यथार्थ को जितना बयां करती हैं उतना ही आपके मर्म को सहलाते हुए आगे बढ़ती है। जितनी कविता जिन्दगी में घूमती है उतनी ही आपकी आंखों को खोलते चलती है। आइए पढ़ते हैं रश्मि भारद्वाज की कुछ कविताएं:-



1

******************

कातिक चढ़े पहली बार छिदे थे कान

सुनार ने तांबे की सुई दन्न से आर पार कर दी थी 

 इससे पहले कि चीख निकलती

हाथों में थमा दी थी नानी ने गुड़ की धेली

मीठा मीठा गप्प, सब दर्द छू 

ओस लगा लेना भोर में पत्तों पर पड़ी 

सब घाव भर जाएगा 


बाद में जाना

दुनिया में होना है 

तो कान छिदवाने के दर्द से बार-बार गुज़रना होगा 

बहुत अनावश्यक , बहुत व्यर्थ 

लेकिन कुछ सुंदर की उम्मीद में 

घटती जा रही एक प्रक्रिया

गुड़ की धेली जीभ पर घुलती है

आंखें मींच क़ैद कर दिया जाता है सब पानी 

ओस पर नंगे पाँव चलते हुए

सोचती हूँ 

सब घाव ऐसे ही भरे जा सकते 

तो कितना अच्छा होता 

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रश्मि

2.

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अपने पहाड़ से पृथक हो आए सभी पत्थर

देव नहीं बने

वे जीवन में घुले हुए थे

 किसी अश्रव्य राग की तरह 

उन्होंने चुनी मृत्यु की नीरवता

एक भीड़ के गुज़र जाने के बाद भी

हाथ बांधे, नत रहे

वे मूक साक्षी हैं अपने समक्ष घटित 

 भव्यता और क्षुद्रता के 

मनुष्य की दैन्यता, 

ईश्वर की कातरता के


वे गवाह हैं ऐसे ही किसी बेहद मामूली दिन के भी

जब एक स्त्री और एक पुरूष

जिन्हें दुनिया एकांत खोजते प्रेमियों की तरह देख रही थी

अपने वर्तमान की असंख्य निर्रथक ध्वनियों के मध्य 

भविष्य से उतने ही निर्लिप्त

जितना अतीत से

सूदूर प्रदेश की यात्रा कर

अपना मौन सुन सकने चले आए थे


नवम्बर के मंद पड़ते प्रकाश में

मैं ऐसे ही समाधिस्थ पत्थरों का स्वप्न देखती हूँ

जिनकी तप्त छाती पर सिर टिकाए

एक बार मैं उनके ह्रदय के कोलाहल को सुनना चाहूंगी 

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रश्मि भारद्वाज

3.

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बीती रात, बहुत देर रात

जब उसे अपने नर्म बिछौने में होना चाहिए था

बड़े मीठे कण्ठ से वह गाती जा रही थी

मैंने कल्पना की उसके थपकते पैरों की

एक उष्ण हथेली पकड़े वह झूलती जाती होगी 

उमगती वह

गाती थी रोशनी के किसी देश की बात

शायद चाँद के बारे में

वहाँ से लाए जाने वाले धानी सपनों के बारे में

पिता ही होंगे शायद 

जो घर चलकर सो जाने की हिदायत दे रहे थे


बीती रात, बहुत देर रात

नींद हम दोनों की ही गुम थी 

बस कारण अलग थे

वह जिस झूठ को गुनगुनाती जागती जा रही थी 

मैंने अपना वह सच कहीं खो दिया था 


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रश्मि

4.

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सब अबूझ चीज़ें औचक ही मिलती हैं

मृत्यु, प्रेम और जीवन


एक मृत्यु नींद के बाद मिला है जीवन

एक दीर्घ प्रतीक्षा के बाद मिला है प्रेम 

कल कुछ भी शेष नहीं रहा

तब भी

तुम रहोगी 


जीवन संतुलन साधते रहने का व्यापार नहीं है 

कई बार नहीं हो अंगुल भर आधार

फिर भी छोड़ देना होता है स्वयं को 

एक अज्ञात विश्वास के सहारे 

किसी तरह टिके रहना जीना नहीं है

जीने के लिए उतारने होते हैं

भय और संशय के सारे कवच 

मोह और क्षोभ के अधिकांश केंचुल


बार- बार मरती रहोगी इसी एक जीवन में

तो मृत्यु के लिए क्या शेष छोड़ जाओगी


रश्मि!



रविवार, 27 नवंबर 2022

लेखक जी, लेखक से मिलिए!- शंभुनाथ

साहित्यिक आयोजन गैर-साहित्यिक होता जा रहा है। आयोजन चर्चा में आती जरूर है लेकिन साहित्यिक वजह से नहीं बल्कि आयोजक की वजह से। साहित्य समाप्त होता जा रहा है और रोज रोज मेला और उत्सव मनाया जा रहा है। ऐसे समय में शंभुनाथ का यह ग़ौरतलब आलेख विचारणीय है।


 लेखक जी, लेखक से मिलिए!

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साहित्य-उत्सवों में 'लेखक से मिलिए' किनसे कहा जाता है, क्या लेखकों से? इसपर लेखकों को लिखना चाहिए कि उन्हें उत्सव में  कैसे पाठक मिले, कितने पाठक मिले और जब वे अपरिचित लोगों से मिले तो उन्हें कैसा लगा और पाठक से क्या बात हुई -- उनकी क्या जिज्ञासा थी। या वे 'लेखक से मिलिए' में सिर्फ अपने मित्र लेखकों से घिरे रहे --- 'अहो रूपम -- अहो ध्वनि ' करते हुए! लेखक से लेखक ही पूछते रहे और लेखक लेखक को ही जवाब देते रहे!!


हमारे पाठक हमारे लिए एक विस्मय की तरह हैं। बहुत कुछ अदृश्य और समाज में खोए हुए, बिखरे हुए! वे हैं जरूर और हमें अच्छा लगता है, जब उनका फोन आता है। हम भौंचक उस अजनबी के बारे में सोचते हैं, जबकि वह हमें बहुत कुछ जान रहा होता है। हम उन्हें नहीं जानते, यह सोचकर थोड़ी बेचैनी होती है कि हम अपने पाठकों को कैसे जानें, उनसे रिश्ता कैसे बने! उत्सव ऐसे मौके होते हैं, जब हम सोचते हैं कि पाठक हमें खोजते हुए आएंगे। क्या वे आते हैं, क्या ऐसे पाठक हैं जो लेखक नहीं हों?


 अज्ञेय से सांगली ( महाराष्ट्र) में 1981 मैंने एक बार पूछा, 'आप किन पाठकों को संबोधित करके लिखते हैं?' वे थोड़ी देर रुके। फिर जवाब दिया, 'मैं अज्ञात समाज के लिए लिखता हूं।' उन्हें लगता रहा है कि वे भविष्य में समझे जाएंगे। लोग उनका महत्व भविष्य में समझेंगे, ऐसा आज भी कई लेखक सोचते हैं!


एकबार कोलकाता में मैं, केदारनाथ सिंह और नवारुण भट्टाचार्य टैक्सी में कहीं से लौट रहे थे। नवारुण ने एक घटना सुनाई-- कवि शक्ति चट्टोपाध्याय एक दिन शराबटोला से ज्यादा पीकर हिलते -डुलते घर जा रहे थे, रात काफी हो चुकी थी। सवारी खोज रहे थे, पर सड़क पर सन्नाटा था। डिपो लौट रही एक खाली डबल डेकर बस के ड्राइवर ने उन्हें पहचान लिया। वह बस रोककर सड़क पर उतरा और कवि को बस में बैठाकर पहले उनके घर पहुंचाकर तब डिपो गया। यह है कवि और पाठक का संबंध!


पहले कई लेखक सामाजिक नहीं थे या संकोची थे तो अब ज्यादातर लेखक घरघुसरे हैं। पहले के पाठक व्यक्तित्व-संपन्न होते थे, वे पुस्तकों के बिना जी नहीं सकते थे। इन दिनों  हिंदी लेखकों के ज्यादातर पाठक लेखक ही होते हैं । गनीमत है कि इस समय हिंदी में कवियों- लेखकों की संख्या बहुत बड़ी है! 


अंग्रेजी लेखकों ने हिंदी, मराठी, मलयालम आदि भाषाओं के पाठकों को छीना है। यह दुर्भाग्यजनक है कि हिंदी में ज्यादातर साहित्य प्रेमी ऐसे हैं जिनके लिए कुमार विश्वास ही सबसे बड़े साहित्यकार हैं। वे हुनरमंद हैं। निराला, प्रसाद की कविताएं सुनाते - सुनाते रामकथा के बाजार में आ गए। यही उनकी स्वाभाविक मंजिल है! साहित्य उत्सव में वे साहित्यिक कवियों के सामने चुनौती हैं। देखा जाए, हमारे कवि बंधु कैसे उनका सामना करते हैं !!


लेखक में आकर्षण विवादास्पद होने से पैदा होता है, इसलिए लिखने से अधिक विवादास्पद होना जरूरी है। हिंदी लेखक की मुश्किल है कि वह सच बोलने में लगा रहता है, कैसे विवादास्पद होगा! 


हिंदी लेखक से आखिर कौन मिलेगा, जो आह्वान है -- लेखक से मिलिए!  लोग मुरारी बापू से मिलेंगे और मुंबई के नाच देखेंगे!


आमतौर पर हिंदी लेखक खुद पढ़ने की जगह दूसरों को अपना पढ़ाने में लगा रहता है। सोशल मीडिया ने भी पुस्तकों की दुनिया से विरत करके लोगों को अपने भीतर कैद कर रखा है। 50 करोड़ की आबादी वाले हिंदी समाज में अच्छी किताबों की भी कितनी प्रतियां छपती हैं, इसे लेकर किसी को भ्रम नहीं होगा। 


आखिरकार पढ़ने की संस्कृति बनी रहे और इसका विस्तार हो, इसके लिए खुद लेखकों ने अपने प्रयत्न से क्या किया? हमारे पाठक कहां हैं?


--- शंभुनाथ

शनिवार, 26 नवंबर 2022

अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, गोवा में बिहार की उपस्थिति पर विनोद अनुपम का विचार

 खुशी की बात है कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, गोवा में इस वर्ष बिहार का भी पेवेलियन देखा गया। पेवेलियन का उद्घाटन Pankaj Tripathi ने किया।इस पेवेलियन के साथ बिहार को शोकेस करने पहुंचे अधिकारियों और मंत्री के फिल्मकारों और अभिनेताओं के साथ मुलाकातें बैठकों की तस्वीरें भी दिखी। वास्तव में ऐसी कोशिशें कोई पहली नहीं थी।2015 में भी प्रधान सचिव Vivek Singhके नेतृत्व में कला संस्कृति विभाग के एक दल ने इफ्फी में शिरकत किया था,यह भागीदारी मूलतः पटना फिल्म महोत्सव की तैयारी के सिलसिले में थी ।जब  Ganga Kumar  फिल्म निगम के प्रबंध निदेशक थे,तब भी इफ्फी से पेवेलियन के लिए आमंत्रण आया था, लेकिन सवाल उठा कि लेकर क्या जायें, फिल्म पालिसी ही नहीं बन सकी है। कमाल यह कि पालिसी आज भी नहीं बनी है, फिर इस वर्ष पेवेलियन में हमने क्या बातें रखीं?और जो रखीं, क्या बगैर पालिसी के उसका कोई महत्व है?

बिहार के फिल्म पालिसी की भी अलग ही कथा है।यदि यह कभी लागू हो भी गई तो शायद सबसे लंबे समय में तैयार होने वाली पालिसी के रूप में इसका नाम गिनीज बुक में जा सकता है।इस पालिसी पर फिल्मकारों से राय के लिए तो तीन बार मुंबई में बैठकें हुई।एक बैठक में तो मंत्री शिवचंद्र राम और तत्कालीन विकास आयुक्त Shishir Sinha भी शामिल रहे। 

सवाल है क्या वाकई बिहार सरकार की प्राथमिकता में कहीं सिनेमा है, नहीं तो फिर बेवजह की मशक्कत क्यों।यह इससे भी समझ सकते हैं इस वर्ष इफ्फी के दौरान बिहार पेवेलियन में बैठे किसी मंत्री और अधिकारी ने उस फिल्म को ,और उसके फिल्मकार को याद करने की जहमत भी नहीं उठाई जो इंडियन पनोरमा में मैथिली फ़िल्म #LotusBloom के रुप में बिहार की एकमात्र भागीदारी थी,जबकि कुछ ही कदमों पर उसका प्रदर्शन भी चल रहा था।फिल्म के एक अभिनेता Akhilendra Mishra से रहा नहीं गया,तो बिना बुलाए उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की, लेकिन किसी मंत्री या अधिकारी से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी।कैसे सरकार से हौसले की उम्मीद रखें बिहार के फिल्मकार...





मंगलवार, 22 नवंबर 2022

प्रोफेसर योगेन्द्र की कुछ कविताएं

प्रोफेसर योगेन्द्र की कविताएं आपको ठहर कर कुछ विचार करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। मानवीय संवेदना और रिश्तों की गर्माहट को विविध रूप में प्रस्तुत करना इनकी एक उपलब्धि है। आइए पढ़ते हैं इनकी कुछ कविताओं को।



छूटते गए


एक


छोटा भाई आया था कल

आज चला गया।

एक इतिहास हम दोनों के पास है

वह कलेजे में दफ्न रह जायेगा।

ढलती उम्र में कहने को बहुत कुछ होता है

कह नहीं पाता।

कहां से शुरू हो, कहां खत्म

इसका पता नहीं होता।

हम तीन थे

दो रह गये हैं।

२०११ की बात है

बड़े भाई आये थे

मैं उन दिनों चुनाव लड़ रहा था

हाथ में बीस हजार रुपए दिए

हथेली दबायी

और चले गए।


दो


चले गए तो चले गए

परेशानियों में घिरते गये

और वहां की राह पकड़ ली

जहां से कोई वापस नहीं आता।

उसके पूर्व दादी, पिता और मां

अब दो भाई और दो बहन बचे हैं।

एक ही कोख का वृक्ष अलग अलग दिशा में

चलते चले गए।

फोन कभी कभी बज उठता है

उधर से आवाज आती है - कैसन छेंय?

' ठीक छिओ '

इसके बाद थम जाता है सिलसिला।


तीन

एक खूंटे में बंधे हम सब

निभाये चले जा रहे रस्म।

सबने विस्तार पा लिया है

अंकुर बड़े हो गए

हम सब छाड़न पर हैं।

विस्तीर्ण आकाश, तारों से भरा

उठती थमती जमती आंधियां

आंखें भर आईं हैं रेत से

नदियों में भी वह जान कहां रही

जिसके कारण नदी नदी होती है? 

हम सब तालाब बन गये हैं

कभी कभार कोई पक्षी उतर आता है।


चार


पिता मुखिया के चुनाव लड़े दो बार।

एक बार एक वोट से हार गये

दूसरी बार नामांकन कर लौट रहे थे ।

ट्रेक्टर पर सभी सवार थे कि 

दुर्घटना हो गई

पिता के सर्वप्रिय मित्र इस दुर्घटना में नहीं बचे।

इसके बाद पिता ने खुद को रोक लिया

हल चलाते,लाठा बराते, दमाही करते

सपने देखते वे चले गए।

हम सब में वे जीवित हैं

मां की अनुगूंज है

दादी कभी निशाभाग रात में

सपनों में आती हैं।


सारे रिश्तों में,हर सांस में

वे ही वे हैं।


पांच


दूर दूर तक सन्नाटा सा लगता है

मैं जहां हूं

बहुत कुछ है वहां

सैकड़ों संतानें हैं

जिनके साथ उम्र गुजार दी

मगर छूटते गए

छूटते गए

वे रिश्ते

जिनमें मैंने आकार लिया।


अंधेरे का गीत 


एक


ठक ठक ठक

कैसी आवाज है सुबह - सुबह? 

कोई है, कौन हो सकता है

कर्कश भरी आवाज है।

क्या आसमान में सूरज उल्टा लटक गया?

या पेड़ों से पक्षी गायब हो गये? 

वसंत तो नहीं है

कोयलें कुछ नहीं कर रही

यह समझ में आता है

लेकिन अन्य पक्षी को क्या हुआ?

क्या मौसम उतर गया है

जो ठक ठक ठक की आवाज आ रही है?

जरूर कोई अवांछित घटना घटी है।

' अबे साले,सोया पड़ा है बीबी के साथ

खोल दरवाजा,देख तेरा बाप खड़ा है!'

अंदर बजने लगा कुछ

बाप तो बहुत पहले मर गए

यह दूसरा बाप कौन है?


दो


' पहचाना नहीं मुझे।

मैं हूं जिसमें मनुष्य कैद रहता है।

मेरे होने से तुम हो।

मैं तुम्हारा वर्तमान हूं

तुम्हारा भविष्य नियंता।

मुझसे ही दुनिया शुरू होती है

मुझ पर ही खत्म।' 

तो मैं क्या हूं? 

केंचुआ हूं

कोई औकात नहीं है मेरी? 

मैं व्यवस्था का एक पूर्जा भी नहीं! 

मुझे कोई चलाता है

और मैं चलता हूं।

मैं क्या कोई सूचना हूं

जो आधार कार्ड में है

या बैंक में

या पैन कार्ड में

या पासपोर्ट में।

मैं इसके अलावे कुछ नहीं हूं? 


तीन


लगता है सीने पर रेल के चक्के हैं।

दुर्वह बोझ के तले दबता जा रहा हूं

देश आजाद हैं,मगर मेरा सीना क्यों कैद है?

दरवाजे पर दविश है

कल नुक्कड़ पर कह आया था

आजाद मुल्क और अपने आजाद जुबां के बारे में

आज ठक ठक की आवाज सुन रहा हूं।

कमरे की दीवारों पर यह कैसा दृश्य उभर रहा है? 

दीवारों के निचले भाग से खून की लकीरें

खींचती जा रही है ऊपर की ओर

बनती जा रही है एक चित्र

अरे,यह तो एक औरत है

दिमाग पर जोर देता हूं

कौन है यह? कहीं देखा है मैंने?

कहां?

पाठ्य पुस्तकों में।

अरे,यह तो भारत माता है।

खून में नहायी क्यों हो मां?


चार


दीवारों से घिरे वे सब 

जिनके हाथों में डंडे, बंदूक और तोपें हैं।।

ऊंची प्राचीरों में भविष्य संवारते हैं

कई शहरों में भव्य भवन हैं

दीवारों में चुने हैं करोड़ों

कोई आये, उन्हें देखे

कितना रुतबा है उनका

उनके रूतबे से प्रभावित हैं जन गण।

तिरंगे पर कब्जा जमा रखा है उन्होंने

संसद में वे दहकते हैं

न्यायालय में महकते हैं

सभी कुर्सियों पर वे जमे हैं।

मेरा घर भी कब्जे में हैं।

ठक ठक ठक ठक

सुन रहे हैं आप।


गांधी मैदान, पटना


एक


तुम्हारे एक चक्कर लगाते हुए हांफ गया।

हजारों लोग हैं

कोई क्रिकेट खेल रहा है

कोई साइकिल चला रहा है।

हाथ पैर झमकार सेहत बनाने वाले भी कम नहीं हैं।

तुम घिर गए हो चारों तरफ

सुंदर लगने के लिए घिरना पड़ता है।

बूढ़े पुराने तो हैं ही

जो युद्ध लड़ रहे हैं

ब्लडप्रेशर, डायबिटीज और अपनों के तिरस्कार से।

किसी कोने में ब्लडप्रेशर की मशीन लिए बैठा है

बीमारी से मुक्त होने वहां बूढ़े भी हैं और औरतें भी।

रेणु के गांव से आने वाले लोग भी हैं

सुबह सुबह मूढ़ी फांक रहे हैं।

तुम्हारे एक कोने में एक तस्वीर लिए बैठे हैं कुछ लोग

एक स्पीकर पर धार्मिक गाने चल रहे हैं

औरतें, पुरुष और बच्चे थपड़ी बजा रहे हैं।

उन्हें भरोसा है कि वे मुक्त हो जायेंगे।


दो


तुम अपनी छाती पर 

गांधी की मूर्ति लिए बैठे हो।

छोटे छोटे पार्क,सेहत बनाने के केंद्र, कराटे स्थल

भीख मांगती बूढ़ी माताएं

हस्तरेखा देखता ज्योतिषी

बेंचों पर सेवानिवृत्त लोग

नौकरी के लिए हांफते युवा

तुम्हारे चारों तरफ गाड़ियों का चिल्ल पों

ऊपर से वायुयान भी गुजर गया अभी।

किनारे किनारे पेड़ पौधे बहुत हैं

पक्षी में सिर्फ कौवे दिखे।

संभव है, अन्य अपने  नन्हों के लिए दाने चुनने गये होंगे।

कभी तुमने सोचा होगा कि

तुम्हारी छाती पर इतने लोग

अपने अपने सपने और उदासी लिए बिखरे पड़े होंगे!

मैं तो वर्षों बाद आया हूं तुम्हारे पास

लौट जाऊंगा संध्या होते होते।

मैं तो चलते चलते अपने दोस्तों को ढूंढ रहा था

जिनमें अब कुछ नहीं हैं धराधाम पर

कुछ शहर छोड़ गए

कुछ हैं भी इसी शहर में

मगर तड़प नहीं रही।


तीन


तुम्हारी छाती पर बहुत से लोग बैठे होंगे

भगतसिंह भी, अशफाक उल्ला भी

गांधी भी, विनोबा भी

सुभाष भी, पटेल भी।

और हां,गदर के सिपाहियों के इंक्लाबी स्वर भी

कहां पीछा छोड़ रहे।

जयप्रकाश की गूंजती वाणी

सनसनाती गोलियों से छिदा कलेजा

गर्म खून से लथपथ सीने।

तुम तो गवाह हो सबके।

यहीं से तो कई कई बार

क्रांति की आवाज बुलंद हुई थी।

तुम्हारे सिर पर गोलघर है

अवैज्ञानिकता की पराकाष्ठा।

तुम्हारे चारों ओर चक्कर मारते थक गया मैं।


( यह अधूरी कविता है)


कुछ बजता है अंदर


एक


ठहर गई जिंदगी जैसे

पूछ लिया अपनों से

जिंदगी कहीं है या अपहृत हो गई है?

सभी चुप थे।

अपने तो और भी

वे मुझे पहचान नहीं पा रहे थे।

कोफ्त हुई।


दो


बहुत अंधेरा नहीं था

लेकिन आंखें काम नहीं कर रही थीं

दिमाग सुन्न था

कुछ था जो अंदर से

रिस- रिस कर बह रहा था

मैंने अंदर झांका

क्या मैं बीमार हूं? 

शायद मन में तकलीफ़ है

कि जब 

मुट्ठियां भींचता हूं तो 

उनके दांत  चमकते हैं


तीन


महीने दो महीने में

अंदर हिस्रं भाव उदित होता है

दांत तोड़ दूं उनके

बेहाया

नाली का कीड़ा

गालियां इससे ज्यादा नहीं आतीं

गुस्से के चरम क्षणों में भी

अंदर कोई रोकता है

पशु जब सुगबुगाता है

तब धिक्कारने को उठ खड़ा होता है


चार


संघर्ष सागर है

लहरें निगलने को आतुर

जिंदगियां विद्रोह करती हैं

कितने आक्टोपस है यहां

दंश कितने तीखे हैं! 

जीते हुओं को 

हार क्यों गिरफ्त में ले रखी है?


- योगेन्द्र