मंगलवार, 22 नवंबर 2022

प्रोफेसर योगेन्द्र की कुछ कविताएं

प्रोफेसर योगेन्द्र की कविताएं आपको ठहर कर कुछ विचार करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। मानवीय संवेदना और रिश्तों की गर्माहट को विविध रूप में प्रस्तुत करना इनकी एक उपलब्धि है। आइए पढ़ते हैं इनकी कुछ कविताओं को।



छूटते गए


एक


छोटा भाई आया था कल

आज चला गया।

एक इतिहास हम दोनों के पास है

वह कलेजे में दफ्न रह जायेगा।

ढलती उम्र में कहने को बहुत कुछ होता है

कह नहीं पाता।

कहां से शुरू हो, कहां खत्म

इसका पता नहीं होता।

हम तीन थे

दो रह गये हैं।

२०११ की बात है

बड़े भाई आये थे

मैं उन दिनों चुनाव लड़ रहा था

हाथ में बीस हजार रुपए दिए

हथेली दबायी

और चले गए।


दो


चले गए तो चले गए

परेशानियों में घिरते गये

और वहां की राह पकड़ ली

जहां से कोई वापस नहीं आता।

उसके पूर्व दादी, पिता और मां

अब दो भाई और दो बहन बचे हैं।

एक ही कोख का वृक्ष अलग अलग दिशा में

चलते चले गए।

फोन कभी कभी बज उठता है

उधर से आवाज आती है - कैसन छेंय?

' ठीक छिओ '

इसके बाद थम जाता है सिलसिला।


तीन

एक खूंटे में बंधे हम सब

निभाये चले जा रहे रस्म।

सबने विस्तार पा लिया है

अंकुर बड़े हो गए

हम सब छाड़न पर हैं।

विस्तीर्ण आकाश, तारों से भरा

उठती थमती जमती आंधियां

आंखें भर आईं हैं रेत से

नदियों में भी वह जान कहां रही

जिसके कारण नदी नदी होती है? 

हम सब तालाब बन गये हैं

कभी कभार कोई पक्षी उतर आता है।


चार


पिता मुखिया के चुनाव लड़े दो बार।

एक बार एक वोट से हार गये

दूसरी बार नामांकन कर लौट रहे थे ।

ट्रेक्टर पर सभी सवार थे कि 

दुर्घटना हो गई

पिता के सर्वप्रिय मित्र इस दुर्घटना में नहीं बचे।

इसके बाद पिता ने खुद को रोक लिया

हल चलाते,लाठा बराते, दमाही करते

सपने देखते वे चले गए।

हम सब में वे जीवित हैं

मां की अनुगूंज है

दादी कभी निशाभाग रात में

सपनों में आती हैं।


सारे रिश्तों में,हर सांस में

वे ही वे हैं।


पांच


दूर दूर तक सन्नाटा सा लगता है

मैं जहां हूं

बहुत कुछ है वहां

सैकड़ों संतानें हैं

जिनके साथ उम्र गुजार दी

मगर छूटते गए

छूटते गए

वे रिश्ते

जिनमें मैंने आकार लिया।


अंधेरे का गीत 


एक


ठक ठक ठक

कैसी आवाज है सुबह - सुबह? 

कोई है, कौन हो सकता है

कर्कश भरी आवाज है।

क्या आसमान में सूरज उल्टा लटक गया?

या पेड़ों से पक्षी गायब हो गये? 

वसंत तो नहीं है

कोयलें कुछ नहीं कर रही

यह समझ में आता है

लेकिन अन्य पक्षी को क्या हुआ?

क्या मौसम उतर गया है

जो ठक ठक ठक की आवाज आ रही है?

जरूर कोई अवांछित घटना घटी है।

' अबे साले,सोया पड़ा है बीबी के साथ

खोल दरवाजा,देख तेरा बाप खड़ा है!'

अंदर बजने लगा कुछ

बाप तो बहुत पहले मर गए

यह दूसरा बाप कौन है?


दो


' पहचाना नहीं मुझे।

मैं हूं जिसमें मनुष्य कैद रहता है।

मेरे होने से तुम हो।

मैं तुम्हारा वर्तमान हूं

तुम्हारा भविष्य नियंता।

मुझसे ही दुनिया शुरू होती है

मुझ पर ही खत्म।' 

तो मैं क्या हूं? 

केंचुआ हूं

कोई औकात नहीं है मेरी? 

मैं व्यवस्था का एक पूर्जा भी नहीं! 

मुझे कोई चलाता है

और मैं चलता हूं।

मैं क्या कोई सूचना हूं

जो आधार कार्ड में है

या बैंक में

या पैन कार्ड में

या पासपोर्ट में।

मैं इसके अलावे कुछ नहीं हूं? 


तीन


लगता है सीने पर रेल के चक्के हैं।

दुर्वह बोझ के तले दबता जा रहा हूं

देश आजाद हैं,मगर मेरा सीना क्यों कैद है?

दरवाजे पर दविश है

कल नुक्कड़ पर कह आया था

आजाद मुल्क और अपने आजाद जुबां के बारे में

आज ठक ठक की आवाज सुन रहा हूं।

कमरे की दीवारों पर यह कैसा दृश्य उभर रहा है? 

दीवारों के निचले भाग से खून की लकीरें

खींचती जा रही है ऊपर की ओर

बनती जा रही है एक चित्र

अरे,यह तो एक औरत है

दिमाग पर जोर देता हूं

कौन है यह? कहीं देखा है मैंने?

कहां?

पाठ्य पुस्तकों में।

अरे,यह तो भारत माता है।

खून में नहायी क्यों हो मां?


चार


दीवारों से घिरे वे सब 

जिनके हाथों में डंडे, बंदूक और तोपें हैं।।

ऊंची प्राचीरों में भविष्य संवारते हैं

कई शहरों में भव्य भवन हैं

दीवारों में चुने हैं करोड़ों

कोई आये, उन्हें देखे

कितना रुतबा है उनका

उनके रूतबे से प्रभावित हैं जन गण।

तिरंगे पर कब्जा जमा रखा है उन्होंने

संसद में वे दहकते हैं

न्यायालय में महकते हैं

सभी कुर्सियों पर वे जमे हैं।

मेरा घर भी कब्जे में हैं।

ठक ठक ठक ठक

सुन रहे हैं आप।


गांधी मैदान, पटना


एक


तुम्हारे एक चक्कर लगाते हुए हांफ गया।

हजारों लोग हैं

कोई क्रिकेट खेल रहा है

कोई साइकिल चला रहा है।

हाथ पैर झमकार सेहत बनाने वाले भी कम नहीं हैं।

तुम घिर गए हो चारों तरफ

सुंदर लगने के लिए घिरना पड़ता है।

बूढ़े पुराने तो हैं ही

जो युद्ध लड़ रहे हैं

ब्लडप्रेशर, डायबिटीज और अपनों के तिरस्कार से।

किसी कोने में ब्लडप्रेशर की मशीन लिए बैठा है

बीमारी से मुक्त होने वहां बूढ़े भी हैं और औरतें भी।

रेणु के गांव से आने वाले लोग भी हैं

सुबह सुबह मूढ़ी फांक रहे हैं।

तुम्हारे एक कोने में एक तस्वीर लिए बैठे हैं कुछ लोग

एक स्पीकर पर धार्मिक गाने चल रहे हैं

औरतें, पुरुष और बच्चे थपड़ी बजा रहे हैं।

उन्हें भरोसा है कि वे मुक्त हो जायेंगे।


दो


तुम अपनी छाती पर 

गांधी की मूर्ति लिए बैठे हो।

छोटे छोटे पार्क,सेहत बनाने के केंद्र, कराटे स्थल

भीख मांगती बूढ़ी माताएं

हस्तरेखा देखता ज्योतिषी

बेंचों पर सेवानिवृत्त लोग

नौकरी के लिए हांफते युवा

तुम्हारे चारों तरफ गाड़ियों का चिल्ल पों

ऊपर से वायुयान भी गुजर गया अभी।

किनारे किनारे पेड़ पौधे बहुत हैं

पक्षी में सिर्फ कौवे दिखे।

संभव है, अन्य अपने  नन्हों के लिए दाने चुनने गये होंगे।

कभी तुमने सोचा होगा कि

तुम्हारी छाती पर इतने लोग

अपने अपने सपने और उदासी लिए बिखरे पड़े होंगे!

मैं तो वर्षों बाद आया हूं तुम्हारे पास

लौट जाऊंगा संध्या होते होते।

मैं तो चलते चलते अपने दोस्तों को ढूंढ रहा था

जिनमें अब कुछ नहीं हैं धराधाम पर

कुछ शहर छोड़ गए

कुछ हैं भी इसी शहर में

मगर तड़प नहीं रही।


तीन


तुम्हारी छाती पर बहुत से लोग बैठे होंगे

भगतसिंह भी, अशफाक उल्ला भी

गांधी भी, विनोबा भी

सुभाष भी, पटेल भी।

और हां,गदर के सिपाहियों के इंक्लाबी स्वर भी

कहां पीछा छोड़ रहे।

जयप्रकाश की गूंजती वाणी

सनसनाती गोलियों से छिदा कलेजा

गर्म खून से लथपथ सीने।

तुम तो गवाह हो सबके।

यहीं से तो कई कई बार

क्रांति की आवाज बुलंद हुई थी।

तुम्हारे सिर पर गोलघर है

अवैज्ञानिकता की पराकाष्ठा।

तुम्हारे चारों ओर चक्कर मारते थक गया मैं।


( यह अधूरी कविता है)


कुछ बजता है अंदर


एक


ठहर गई जिंदगी जैसे

पूछ लिया अपनों से

जिंदगी कहीं है या अपहृत हो गई है?

सभी चुप थे।

अपने तो और भी

वे मुझे पहचान नहीं पा रहे थे।

कोफ्त हुई।


दो


बहुत अंधेरा नहीं था

लेकिन आंखें काम नहीं कर रही थीं

दिमाग सुन्न था

कुछ था जो अंदर से

रिस- रिस कर बह रहा था

मैंने अंदर झांका

क्या मैं बीमार हूं? 

शायद मन में तकलीफ़ है

कि जब 

मुट्ठियां भींचता हूं तो 

उनके दांत  चमकते हैं


तीन


महीने दो महीने में

अंदर हिस्रं भाव उदित होता है

दांत तोड़ दूं उनके

बेहाया

नाली का कीड़ा

गालियां इससे ज्यादा नहीं आतीं

गुस्से के चरम क्षणों में भी

अंदर कोई रोकता है

पशु जब सुगबुगाता है

तब धिक्कारने को उठ खड़ा होता है


चार


संघर्ष सागर है

लहरें निगलने को आतुर

जिंदगियां विद्रोह करती हैं

कितने आक्टोपस है यहां

दंश कितने तीखे हैं! 

जीते हुओं को 

हार क्यों गिरफ्त में ले रखी है?


- योगेन्द्र

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें