साहित्यिक आयोजन गैर-साहित्यिक होता जा रहा है। आयोजन चर्चा में आती जरूर है लेकिन साहित्यिक वजह से नहीं बल्कि आयोजक की वजह से। साहित्य समाप्त होता जा रहा है और रोज रोज मेला और उत्सव मनाया जा रहा है। ऐसे समय में शंभुनाथ का यह ग़ौरतलब आलेख विचारणीय है।
लेखक जी, लेखक से मिलिए!
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साहित्य-उत्सवों में 'लेखक से मिलिए' किनसे कहा जाता है, क्या लेखकों से? इसपर लेखकों को लिखना चाहिए कि उन्हें उत्सव में कैसे पाठक मिले, कितने पाठक मिले और जब वे अपरिचित लोगों से मिले तो उन्हें कैसा लगा और पाठक से क्या बात हुई -- उनकी क्या जिज्ञासा थी। या वे 'लेखक से मिलिए' में सिर्फ अपने मित्र लेखकों से घिरे रहे --- 'अहो रूपम -- अहो ध्वनि ' करते हुए! लेखक से लेखक ही पूछते रहे और लेखक लेखक को ही जवाब देते रहे!!
हमारे पाठक हमारे लिए एक विस्मय की तरह हैं। बहुत कुछ अदृश्य और समाज में खोए हुए, बिखरे हुए! वे हैं जरूर और हमें अच्छा लगता है, जब उनका फोन आता है। हम भौंचक उस अजनबी के बारे में सोचते हैं, जबकि वह हमें बहुत कुछ जान रहा होता है। हम उन्हें नहीं जानते, यह सोचकर थोड़ी बेचैनी होती है कि हम अपने पाठकों को कैसे जानें, उनसे रिश्ता कैसे बने! उत्सव ऐसे मौके होते हैं, जब हम सोचते हैं कि पाठक हमें खोजते हुए आएंगे। क्या वे आते हैं, क्या ऐसे पाठक हैं जो लेखक नहीं हों?
अज्ञेय से सांगली ( महाराष्ट्र) में 1981 मैंने एक बार पूछा, 'आप किन पाठकों को संबोधित करके लिखते हैं?' वे थोड़ी देर रुके। फिर जवाब दिया, 'मैं अज्ञात समाज के लिए लिखता हूं।' उन्हें लगता रहा है कि वे भविष्य में समझे जाएंगे। लोग उनका महत्व भविष्य में समझेंगे, ऐसा आज भी कई लेखक सोचते हैं!
एकबार कोलकाता में मैं, केदारनाथ सिंह और नवारुण भट्टाचार्य टैक्सी में कहीं से लौट रहे थे। नवारुण ने एक घटना सुनाई-- कवि शक्ति चट्टोपाध्याय एक दिन शराबटोला से ज्यादा पीकर हिलते -डुलते घर जा रहे थे, रात काफी हो चुकी थी। सवारी खोज रहे थे, पर सड़क पर सन्नाटा था। डिपो लौट रही एक खाली डबल डेकर बस के ड्राइवर ने उन्हें पहचान लिया। वह बस रोककर सड़क पर उतरा और कवि को बस में बैठाकर पहले उनके घर पहुंचाकर तब डिपो गया। यह है कवि और पाठक का संबंध!
पहले कई लेखक सामाजिक नहीं थे या संकोची थे तो अब ज्यादातर लेखक घरघुसरे हैं। पहले के पाठक व्यक्तित्व-संपन्न होते थे, वे पुस्तकों के बिना जी नहीं सकते थे। इन दिनों हिंदी लेखकों के ज्यादातर पाठक लेखक ही होते हैं । गनीमत है कि इस समय हिंदी में कवियों- लेखकों की संख्या बहुत बड़ी है!
अंग्रेजी लेखकों ने हिंदी, मराठी, मलयालम आदि भाषाओं के पाठकों को छीना है। यह दुर्भाग्यजनक है कि हिंदी में ज्यादातर साहित्य प्रेमी ऐसे हैं जिनके लिए कुमार विश्वास ही सबसे बड़े साहित्यकार हैं। वे हुनरमंद हैं। निराला, प्रसाद की कविताएं सुनाते - सुनाते रामकथा के बाजार में आ गए। यही उनकी स्वाभाविक मंजिल है! साहित्य उत्सव में वे साहित्यिक कवियों के सामने चुनौती हैं। देखा जाए, हमारे कवि बंधु कैसे उनका सामना करते हैं !!
लेखक में आकर्षण विवादास्पद होने से पैदा होता है, इसलिए लिखने से अधिक विवादास्पद होना जरूरी है। हिंदी लेखक की मुश्किल है कि वह सच बोलने में लगा रहता है, कैसे विवादास्पद होगा!
हिंदी लेखक से आखिर कौन मिलेगा, जो आह्वान है -- लेखक से मिलिए! लोग मुरारी बापू से मिलेंगे और मुंबई के नाच देखेंगे!
आमतौर पर हिंदी लेखक खुद पढ़ने की जगह दूसरों को अपना पढ़ाने में लगा रहता है। सोशल मीडिया ने भी पुस्तकों की दुनिया से विरत करके लोगों को अपने भीतर कैद कर रखा है। 50 करोड़ की आबादी वाले हिंदी समाज में अच्छी किताबों की भी कितनी प्रतियां छपती हैं, इसे लेकर किसी को भ्रम नहीं होगा।
आखिरकार पढ़ने की संस्कृति बनी रहे और इसका विस्तार हो, इसके लिए खुद लेखकों ने अपने प्रयत्न से क्या किया? हमारे पाठक कहां हैं?
--- शंभुनाथ

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