शनिवार, 4 मार्च 2017

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी रसप्रिया

आँचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने 'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। 'बटबाबा' 'साप्ताहिक विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक विश्वमित्र' में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। 'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां', आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है।
अपनी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने आंचलिक जीवन के हर धुन, हर गंध, हर लय, हर ताल, हर सुर, हर सुंदरता और हर कुरूपता को शब्दों में बांधने की सफल कोशिश की है। उनकी भाषा-शैली में एक जादुई सा असर है जो पाठकों को अपने साथ बांध कर रखता है। रेणु एक अद्भुत किस्सागो थे और उनकी रचनाएँ पढते हुए लगता है मानों कोई कहानी सुना रहा हो. ग्राम्य जीवन के लोकगीतों का उन्होंने अपने कथा साहित्य में बड़ा ही सर्जनात्मक प्रयोग किया है।
आज पढ़ते हैं फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी "रसप्रिया"


धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख कर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई - अपरूप-रूप!

चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया की मुँह से निकल पड़ा - अपरुप-रुप!

...खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुंदरता!

मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गईं।

मोहना ने मुस्करा कर पूछा, 'तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई है, है न?'

'ऐ!' - बूढ़े मिरदंगिया ने चौंकते हुए कहा, 'रसपिरिया?

...हाँ ...नहीं। तुमने कैसे ...तुमने कहाँ सुना बे...?'

'बेटा' कहते-कहते रुक गया। ...परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से 'बेटा' कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेर कर मारपीट की तैयारी की थी - 'बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेर कर! ...मृदंग फोड़ दो।'

मिरदंगिया ने हँस कर कहा था, 'अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा!'

बच्चे खुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्‌डी पकड़ कर वह बोला था, 'क्यों, ठीक है न बाप जी?'
बच्चे ठठा कर हँस पड़े थे।

लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देख कर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है।

'रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? ...बोलो बेटा!'
दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। ...कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।

मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। ...आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ-साफ कह दिया - 'तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?'

हाँ, यह जीना भी कोई जीना है! निर्लज्जता है, और थेथरई की भी सीमा होती है। ...पंद्रह साल से वह गले में मृदंग लटका कर गाँव-गाँव घूमता है, भीख माँगता है। ...दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं है, मृदंग क्या बजाएगा! अब तो, 'धा तिंग धा तिंग' भी बड़ी मुश्किल से बजाता है। ...अतिरिक्त गाँजा-भाँग सेवन से गले की आवाज विकृत हो गई है। किंतु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की वह चेष्टा अवश्य करेगा। ...फूटी भाथी से जैसी आवाज निकलती है, वैसी ही आवाज-सों-य,सों-य!

पंद्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाम की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुंडन-छेदन आदि शुभ कार्यों में विदपतिया मंडली की बुलाहट होती थी। पँचकौड़ी मिरदंगिया की मंडली ने सहरसा और पूर्णिया जिले में काफी यश कमाया है। पँचकौड़ी मिरदंगिया को कौन नहीं जानता! सभी जानते हैं, वह अधपगला है! ...गाँव के बड़े-बूढ़े कहते हैं - 'अरे, पँचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक जमाना था!'
इस जमाने में मोहना-जैसा लड़का भी है - सुंदर, सलोना और सुरीला! ...रसप्रिया गाने का आग्रह करता है, 'एक रसपिरिया गाओ न मिरदंगिया!'

'रसपिरिया सुनोगे? ...अच्छा सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने...'

'हे-ए-ए-हे-ए... मोहना, बैल भागे...!' एक चरवाहा चिल्लाया, 'रे मोहना, पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू!'
'अरे बाप!' मोहना भागा।

कल ही करमू ने उसे बुरी तरह पीटा है। दोनों बैलों को हरे-हरे पाट के पौधों की महक खींच ले जाती है बार-बार। ...खटमिट्ठाल पाट!

पँचकौड़ी ने पुकार कर कहा, 'मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठता हूँ। तुम बैल हाँक कर लौटो। रसपिरिया नहीं सुनोगे?'
मोहना जा रहा था। उसने उलट कर देखा भी नहीं।
रसप्रिया!

विदापत नाचवाले रसप्रिया गाते थे। सहरसा के जोगेंदर झा ने एक बार विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी। मेले में खूब बिक्री हुई थी रसप्रिया पोथी की। विदापत नाचवालों ने गा-गा कर जनप्रिया बना दिया था रसप्रिया को।

खेत के 'आल' पर झरजामुन की छाया में पँचकौड़ी मिरदंगिया बैठा हुआ है, मोहना की राह देख रहा है। ...जेठ की चढ़ती दोपहरी में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। ...कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है! पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था। ...पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-हरे पौधों से एक खास किस्म की गंध निकलती है। तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी - रस की डाली। वे गाने लगते थे बिरहा, चाँचर, लगनी। खेतों में काम करते हुए गानेवाले गीत भी समय-असमय का खयाल करके गाए जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर और लगनी-
'हाँ... रे, हल जोते हलवाहा भैया रे...'

खुरपी रे चलावे... म-ज-दू-र!

एहि पंथे, धनी मोरा हे रुसलि...।

खेतों में काम करते हलवाहों और मजदूरों से कोई बिरही पूछ रहा है, कातर स्वर में - उसकी रुठी हुई धनी को इस राह से जाते देखा है किसी ने?...

अब तो दोपहरी नीरस कटती है, मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।

आसमान में चक्कर काटते हुए चील ने टिंहकारी भरी - टिं...ई...टिं-हि-क!

मिरदंगिया ने गाली दी - 'शैतान!'

उसको छोड़ कर मोहना दूर भाग गया है। वह आतुर होकर प्रतीक्षा कर रहा है। जी करता है, दौड़ कर उसके पास चला जाए। दूर चरते हुए मवेशियों के झुंडों की ओर बार-बार वह बेकार देखने की चेष्टा करता है। सब धुँधला!

उसने अपनी झोली टटोल कर देखा - आम हैं, मूढ़ी है। ...उसे भूख लगी। मोहन के सूखे मुँह की याद आई और भूख मिट गई।

मोहना-जैसे सुंदर, सुशील लड़कों की खोज में ही उसकी जिंदगी के अधिकांश दिन बीते हैं। ...विदापत नाच में नाचनेवाले 'नटुआ' का अनुसंधान खेल नहीं। ...सवर्णों के घर में नहीं, छोटी जाति के लोगों के यहाँ मोहना-जैसे लड़की-मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर जदा जदा हि...
मैथिल ब्राह्मणों, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापतवालों की बड़ी इज्जत होती थी। ...अपनी बोली - मिथिलाम - में नटुआ के मुँह से 'जनम अवधि हम रुप निहारल' सुन कर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मंडली का 'मूलगैन' नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था - ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजा कर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए।

'ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न?'

'मधुकांत ठाकुर की बेटी की तरह...।'

'नः! छोटी चंपा-जैसी सुरत है!'

पँचकौड़ी गुनी आदमी है। दूसरी-दूसरी मंडली में मूलगैन और मिरदंगिया की अपनी-अपनी जगह होती है। पँचकौड़ी मूलगैन भी था और मिरदंगिया भी। गले में मृदंग लटका कर बजाते हुए वह गाता था, नाचता था। एक सप्ताह में ही नया लड़का भाँवरी दे कर परवेश में उतरने योग्य नाच सीख लेता था।

नाच और गाना सिखाने में कभी कठिनाई नहीं हुई, मृदंग के स्पष्ट 'बोल' पर लड़कों के पाँव स्वयं ही थिरकने लगते थे। लड़कों के जिद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिली में और भी शहद लपेट कर वह फुसलाता...

'किसन कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है। ...अरे, जाचक कहो या दसदुआरी। चोरी डकैती और आवारागर्दी से अच्छा है। अपना-अपना 'गुन' दिखा कर लोगों को रिझा कर गुजारा करना।'

एक बार उसे लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी। ...बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि ...बहुत पुरानी बात है।

पुरानी ही सही, बात तो ठीक है।

'रसपिरिया बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न?'

मोहना न जाने कब लौट आया।

मिरदंगिया के चेहरे पर चमक लौट आई। वह मोहना की ओर एक टकटकी लगा कर देखने लगा ...यह गुणवान मर रहा है। धीरे-धीरे, तिल-तिल कर वह खो रहा है। लाल-लाल होठों पर बीड़ी की कालिख लग गई है। पेट में तिल्ली है जरुर!...
मिरदंगिया वैद्य भी है। एक झुंड बच्चों का बाप धीरे-धीरे एक पारिवारिक डॉक्टर की योग्यता हासिल कर लेता है। ...उत्सवों के बासीटटका भोज्यान्नों की प्रतिक्रिया कभी-कभी बहुत बुरी होती। मिरदंगिया अपने साथ नमक-सुलेमानी, चानमार-पाचन और कुनैन की गोली हमेशा रखता था। ...लड़कों को सदा गरम पानी के साथ हल्दी की बुकनी खिलाता। पीपल, काली मिर्च, अदरक वगैरह को घी में भून कर शहद के साथ सुबह-शाम चटाता। ...गरम पानी!
पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए मिरदंगिया बोला, 'हाँ, गरम पानी! तेरी तिल्ली बढ़ गई है, गरम पानी पियो।'
'यह तुमने कैसे जान लिया? फारबिसगंज के डागडरबाबू भी कह रहे थे, तिल्ली बढ़ गई है। दवा...।'

आगे कहने की जरूरत नहीं। मिरदंगिया जानता है, मोहना-जैसे लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है! क्या होगा पूछ कर, कि दवा क्यों नहीं करवाते!

'माँ, भी कहती है, हल्दी की बुकनी के साथ रोज गरम पानी। तिल्ली गल जाएगी।'

मिरदंगिया ने मुस्करा कर कहा, 'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ!'
केले के सूखे पतले पर मूढ़ी और आम रख कर उसने बड़े प्यार से कहा, 'आओ, एक मुट्ठी खा लो।'

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

किंतु मोहना की आँखों से रह-रह कर कोई झाँकता था, मूढ़ी और आम को एक साथ निगल जाना चाहता था। ...भूखा, बीमार, भगवान!

'आओ, खा लो बेटा! ...रसपिरिया नहीं सुनोगे?'

माँ के सिवा, आज तक किसी अन्य व्यक्ति ने मोहना को इस तरह प्यार से कभी परोसे भोजन पर नहीं बुलाया।

...लेकिन, दूसरे चरवाहे देख लें तो माँ से कह देगें। ...भीख का अन्न!

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

मिरदंगिया अप्रतिभ हो जाता है। उसकी आँखें फिर सजल हो जाती हैं। मिरदंगिया ने मोहना - जैसे दर्जनों सुकुमार बालकों की सेवा की है। अपने बच्चों को भी शायद वह इतना प्यार नहीं दे सकता। ...और अपना बच्चा! हूँ! ...अपना-पराया? अब तो सब अपने, सब पराए।...

'मोहना!'

'कोई देख लेगा तो?'

'तो क्या होगा?'

'माँ से कह देगा। तुम भीख माँगते हो न?'

'कौन भीख माँगता है?' मिरदंगिया के आत्म-सम्मान को इस भोले लड़के ने बेवजह ठेस लगा दी। उसके मन की झाँपी में कुडंलीकार सोया हुआ साँप फन फैला कर फुफकार उठा, 'ए-स्साला! मारेंगे वह तमाचा कि...

'ऐ! गाली क्यों देते हो!' मोहना ने डरते-डरते प्रतिवाद किया।
वह उठ खड़ा हुआ, पागलों का क्या विश्वास।

आसमान में उड़ती हुई चील ने फिर टिंहकारी भरी ...टिंही ...ई ...टिं-टिं-ग!

'मोहना!' मिरदंगिया की अवाज गंभीर हो गई।
मोहना जरा दूर जा कर खड़ा हो गया।

'किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ? मिरदंग बजा कर, पदावली गा कर, लोगों को रिझा कर पेट पालता हूँ। ...तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है यह। भीख का ही फल है यह। ...मै नहीं दूँगा। ...तुम बैठो, मैं रसपिरिया सुना दूँ।'

मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत हो रहा है। ...आसमान में उड़नेवाली चील अब पेड़ की डाली पर आ बैठी है। ...टिं-टिं-हिं टिंटिक!

मोहना डर गया। एक डग, दो डग ...दे दौड़। वह भागा।
एक बीघा दूर जा कर उसने चिल्लाकर कहा, 'डायन ने बान मार कर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर दी है। झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय...'

'ऐं! कौन है यह लड़का? कौन है यह मोहना? ...रमपतिया भी कहती थी, डायन ने बान मार दिया है।'

'मोहना!'

मोहना ने जाते-जाते चिल्ला कर कहा, 'करैला!' अच्छा, तो मोहना यह भी जानता है कि मिरदंगिया 'करैला' कहने से चिढ़ता है! ...कौन है यह मोहना?

मिरदंगिया आतंकित हो गया। उसके मन में एक अज्ञात भय समा गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसमें कमलपुर के बाबुओं के यहाँ जाने का उत्साह भी नहीं रहा। ...सुबह शोभा मिसर के लड़के ने ठीक ही कहा था।

उसकी आँखों में आँसू झरने लगे।

जाते-जाते मोहना डंक मार गया। उसके अधिकांश शिष्यों ने ऐसा ही व्यवहार किया है उसके साथ। नाच सीख कर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजनेवाले एक-एक लड़के की बातें उसे याद हैं।

सोनमा ने तो गाली ही दी थी - 'गुरुगिरी कहता है, चोट्टा!'
रमपतिया आकाश की ओर हाथ उठा कर बोली थी - 'हे दिनकर! साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसला कर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर नहीं था। हे सुरुज भगवान! इस दसदुआरी कुत्ते का अंग-अंग फूट कर...।'
मिरदंगिया ने अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लंबी साँस ली। ...रमपतिया? जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया! जिस दिन वह पहले-पहल जोधन की मंडली में शामिल हुआ था - रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी। ...बाल-विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वह गुनगुनाती - 'नव अनुरागिनी राधा, किछु नाँहि मानय बाधा।'...मिरदंगिया मूलगैनी सीखने गया था और गुरु जी ने उसे मृदंग थमा दिया था... आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरु जी ने स्वजात पँचकौड़ी से रमपतिया के चुमौना की बात चलाई तो मिरदंगिया सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरु जी से उसने अपनी जात छिपा रखी थी।

रमपतिया से उसने झूठा परेम किया था। गुरु जी की मंडली छोड़ कर वह रातों-रात भाग गया। उसने गाँव आ कर अपनी मंडली बनाई, लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा। ...लेकिन, वह मूलगैन नहीं हो सका कभी। मिरदंगिया ही रहा सब दिन। ...जोधन गुरु जी की मृत्यु के बाद, एक बार गुलाब-बाग मेले में रमपतिया से उसकी भेंट हुई थी। रमपतिया उसी से मिलने आई थी। पँचकौड़ी ने साफ जवाब दे दिया था - 'क्या झूठ-फरेब जोड़ने आई है? कमलपुर के नंदूबाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नंदूबाबू का घोड़ा बारह बजे रात को...।' चीख उठी थी रमपतिया - पाँचू! ...चुप रहो!'

उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उँगली टेढ़ी हो गई थी। मृदंग पर जमनिका दे कर वह परबेस का ताल बजाने लगा। नटुआ ने डेढ़ मात्रा बेताल हो कर प्रवेश किया तो उसका माथा ठनका। परबेस के बाद उसने नटुआ को झिड़की दी - 'एस्साला! थप्पड़ों से गाल लाल कर दूँगा।'...और रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट गई। मिरदंगिया ने ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा की। मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठी, दाहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगे और तल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो गई। झूठी टेढ़ी उँगली! ...हमेशा के लिए पँचकौड़ी की मंडली टूट गई। धीरे-धीरे इलाके से विद्यापति-नाच ही उठ गया। अब तो कोई भी विद्यापति की चर्चा भी नहीं करते हैं। ...धूप-पानी से परे, पँचकौड़ी का शरीर ठंडी महफिलों में ही पनपा था... बेकार जिंदगी में मृदंग ने बड़ा काम दिया। बेकारी का एकमात्र सहारा - मृदंग!
एक युग से वह गले में मृदंग लटका कर भीख माँग रहा है - धा-तिंग, धा-तिंग!

वह एक आम उठा कर चूसने लगा - लेकिन, लेकिन, ...लेकिन ...मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई?
उँगली टेढ़ी होने की खबर सुन कर रमपतिया दौड़ी आई थी, घंटों उँगली को पकड़ कर रोती रही थी - 'हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की? उसका बुरा हो। ...मेरी बात लौटा दो भगवान! गुस्से में कही हुई बातें। नहीं, नहीं। पाँचू, मैंने कुछ भी नहीं किया है। जरुर किसी डायन ने बान मार दिया है।'
मिरदंगिया ने आँखें पोंछते हुए सूरज की ओर देखा। ...इस मृदंग को कलेजे से सटा कर रमतपिया ने कितनी रातें काटी हैं! ...मिरदंग को उसने अपने छाती से लगा लिया।
पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील ने उड़ते हुए जोड़े से कहा - टिं-टिं-हिंक्‌!

'एस्साला!'उसने चील को गाली दी। तंबाकू चुनिया कर मुँह में डाल ली और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगा - धिरिनागि, धिरिनागि, धिरिनागि-धिनता!

पूरी जमनिका वह नहीं बजा सका। बीच में ही ताल टूट गया।
-अ‌‌‌-कि-हे-ए-ए-हा-आआ-ह-हा!

सामने झरबेरी के जंगल के उस पार किसी ने सुरीली आवाज में, बड़े समारोह के साथ रसप्रिया की पदावली उठाई -
'न-व-वृंदा-वन, न-व-न-व-तरु-ग-न, न-व-नव विकसित फूल...'

मिरदंगिया के सारे शरीर में एक लहर दौड़ गई उसकी उँगलियाँ स्वयं ही मृदंग के पूरे पर थिरकने लगीं। गाय-बैलों के झुंड दोपहर की उतरती छाया में आ कर जमा होने लगे।
खेतों में काम करनेवालों ने कहा, 'पागल है। जहाँ जी चाहा, बैठ कर बजाने लगता है।'

'बहुत दिन के बाद लौटा है।'

'हम तो समझते थे कि कहीं मर-खप गया।'
रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर आ कर कट गई। मिरदंगिया का पागलपन अचानक बढ़ गया। वह उठ कर दौड़ा। झरबेरी की झाड़ी के उस पार कौन है? कौन है यह शुद्ध रसप्रिया गानेवाला? इस जमाने में रसप्रिया का रसिक...? झाड़ी में छिप कर मिरदंगिया ने देखा, मोहना तन्मय होकर दूसरे पद की तैयारी कर रहा है। गुनगुनाहट बंद करके उसने गले को साफ किया। मोहना के गले में राधा आ कर बैठ गई है! ...क्या बंदिश है!

'न-वी-वह नयनक नी...र!

आहो...पललि बहए ताहि ती...र!'
मोहना बेसुध होकर गा रहा था। मृदंग के बोल पर वह झूम-झूम कर गा रहा था। मिरदंगिया की आँखें उसे एकटक निहार रही थीं और उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल हो रही थीं। ...चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगा। ...रह-रह कर वह अपनी विकृत आवाज में पदों की कड़ी धड़ता - फोंय-फोंय, सोंय-सोंय!

धिरिनागि-धिनता!

'दुहु रस...म...य तनु-गुने नहीं ओर।

लागल दुहुक न भाँगय जो-र।'
मोहना के आधे काले और आधे लाल होंठों पर नई मुस्कराहट दौड़ गई। पद समाप्त। करते हुए वह बोला, 'इस्स! टेढ़ी उँगली पर भी इतनी तेजी?'

मोहना हाँफने लगा। उसकी छाती की हड्डियाँ!
...उफ! मिरदंगिया धम्म से जमीन पर बैठ गया - 'कमाल! कमाल!...किससे सीखे? कहाँ सीखी तुमने पदावली? कौन है तुम्हारा गुरु?'

मोहना ने हँस कर जवाब दिया, 'सीखूँगा कहाँ? माँ तो रोज गाती है। ...प्रातकी मुझे बहुत याद है, लेकिन अभी तो उसका समय नहीं।'

'हाँ बेटा! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जाएगा। ...समय-कुसमय का भी खयाल रखना। लो,अब आम खालो।'

मोहना बेझिझक आम ले कर चूसने लगा।

'एक और लो।'

मोहना ने तीन आम खाए और मिरदंगिया के विशेष आग्रह पर दो मुट्ठी मूढ़ी भी फाँक गया।

'अच्छा, अब एक बात बताओगे मोहना! तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं?'

'बाप नहीं है, अकेली माँ है। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती है।'

'और तुम नौकरी करते हो! किसके यहाँ?'

'कमलपुर के नंदूबाबू के यहाँ।'

'नंदूबाबू के यहाँ?'

मोहना ने बताया उसका घर सहरसा में है। तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया। उसकी माँ उसे ले कर अपने ममहर आई है... कमलपुर।

'कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं?'

मिरदंगिया कुछ देर तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहा।

...नंदूबाबू - मोहना - मोहना की माँ!

'डायनवाली बात तुम्हारी माँ कह रही थी?'

'हाँ।'

'और एक बार सामदेव झा के यहाँ जनेऊ में तुमने गिरधर-पटटी मडंलीवालों का मिरदंग छीन लिया था।

...बेताला बजा रहा था। ठीक है न?'

मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफेद हो गई। उसने अपने को सम्हाल कर पूछा, 'तुम्हारे बाप का नाम क्या है?'

'अजोधादास!'

'अजोधादास?'

बूढ़ा अजोधादास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर। ...मंडली में गठरी ढोता था। बिना पैसा का नौकर बेचारा अजोधादास!

'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।' एक लंबी साँस ले कर मिरदंगिया ने अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकला। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोल कर कागज की एक पुड़िया निकाली उसने।

मोहना ने पहचान लिया - 'लोट? क्या है, लोट?'

'हाँ, नोट है।'

'कितने रुपएवाला है? पचटकिया। ऐं... दसटकिया? जरा छूने दोगे? कहाँ से लाए?' मोहना एक ही साँस में सब कुछ पूछ गया, 'सब दसटकिया हैं?'

'हाँ, सब मिला कर चालीस रुपए हैं।' मिरदंगिया ने एक बार इधर-उधर निगाहें दौड़ाई, फिर फुसफुसा कर बोला, 'मोहना बेटा! फारबिसगंज के डागडरबाबू को दे कर बढ़िया दवा लिखा लेना। ...खट्ट-मिट्ठा परहेज़ करना। ...गरम पानी जरुर पीना।'

'रुपए मुझे क्यों देते हो?'

'जल्दी रख ले, कोई देख लेगा।'

मोहना ने भी एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। उसके होंठों की कालिख और गहरी हो गई।

मिरदंगिया बोला, 'बीड़ी-तंबाकू भी पीते हो? खबरदार!'
वह उठ खड़ा हुआ।

मोहना ने रुपए ले लिए।

'अच्छी तरह गाँठ बाँध ले। माँ से कुछ मत कहना।'
'और हाँ, यह भीख का पैसा नहीं। बेटा, यह मेरी कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के...।'

मिरदंगिया ने जाने के लिए पाँव बढ़ाया।

'मेरी माँ खेत में घास काट रही है। चलो न!' मोहना ने आग्रह किया।

मिरदंगिया रुक गया। कुछ सोच कर बोला, 'नहीं मोहना! तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा पा कर तुम्हारी माँ 'महारानी' हैं, मैं महाभिखारी दसदुआरी हूँ। जाचक, फकीर...! दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना।'

मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नंदूबाबू की आँखों-जैसी हैं...।

'रे-मो-ह-ना-रे-हे! बैल कहाँ हैं रे?'

'तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद।'

'हाँ। तुमने कैसे जान लिया?'

'रे-मोहना-रे-हे!'

एक गाय ने सुर-में-सुर मिला कर अपने बछड़े को बुलाया।
गाय-बैलों के घर लौटने का समय हो गया। मोहना जानता है, माँ बैल हाँक कर ला रही होगी। झूठ-मूठ उसे बुला रही है। वह चुप रहा।

'जाओ।' मिरदंगिया ने कहा, 'माँ बुला रही है। जाओ।...अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल?...

'अरे, चलू मन, चलू मन- ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहिरा में अगिया लगायब रे-की...।'

खेतों की पगडंडी, झरबेरी के जंगल के बीच होकर जाती है। निरगुन गाता हुआ मिरदंगिया झरबेरी की झाड़ियों में छिप गया।

'ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है?' कौन बजा रहा था मृदंग रे?' घास का बोझा सिर पर ले कर मोहना की माँ खड़ी है।

'पँचकौड़ी मिरदंगिया।'

'ऐं, वह आया है? आया है वह?' उसकी माँ ने बोझ जमीन पर पटकते हुए पूछा।

'मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गाया है। कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल! ...उसकी उँगली अब ठीक हो जाएगी।

माँ ने बीमार मोहना को आह्लाद से अपनी छाती से सटा लिया।

'लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी-भर शिकायत करती थी - बेईमान है, गुरु-दरोही है, झूठा है!'

'है तो! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। खबरदार, जो उसके साथ फिर कभी गया! दसदुआरी जाचकों से हेलमेल करके अपना ही नुकसान होता है। ...चल, उठा बोझ!'

मोहना ने बोझ उठाते समय कहा, 'जो भी हो, गुनी आदमी के साथ रसपिरिया...।'

'चौप! रसपिरिया का नाम मत ले।'

अजीब है माँ! जब गुस्साएगी तो वाघिन की तरह और जब खुश होती है तो गाय की तरह हुँकारती आएगी और छाती से लगा लेगी। तुरत खुश, तुरत नाराज...

दूर से मृदंग की आवाज आई - धा-तिंग, धा-तिंग!
मोहना की माँ खेत की ऊबड़-खाबड़ मेड़ पर चल रही थी। ठोकर खा कर गिरते-गिरते बची। घास का बोझ गिर कर खुल गया। मोहना पीछे-पीछे मुँह लटका कर जा रहा था। बोला, 'क्या हुआ, माँ?'

'कुछ नहीं।'

-धा-तिंग, धा-तिंग!

मोहना की माँ खेत की मेड़ पर बैठ गई। जेठ की शाम से पहले जो पुरवैया चलती है, धीरे-धीरे तेज हो गई ...मिटटी की सुंगध हवा में धीरे-धीरे घुलने लगी।

-धा-तिंग, धा-तिंग!

'मिरदंगिया और कुछ बोलता था, बेटा?' मोहना की माँ आगे कुछ बोल न सकी।

'कहता था, तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा...'

'झूठा, बेईमान!' मोहना की माँ आँसू पोंछ कर बोली, 'ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।'

मोहना चुपचाप खड़ा रहा।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

जासूसी उपन्यास पर प्रियदर्शन की टिप्पणी


हम जासूसी उपन्यास क्यों पढ़ते हैं?
प्रियदर्शन

मारियो पूजो के मशहूर उपन्यास 'गॉडफादर' में एक इंस्पेक्टर मैक्लुस्की गॉडफादर के बेटे माइकल कारलियोन को थप्पड़ मार कर उसका जबड़ा तोड़ देता है। इस इंस्पेक्टर को और उसके पीछे खड़े लोगों को सजा दी जानी है।
माइकल तय करता है कि वह इंस्पेक्टर को गोली मार देगा। उसका बड़ा भाई सोनी कारलियोन उसे यह समझाना चाहता है कि इंस्पेक्टर की उससे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी- इसे वह एक पेशेवर प्रतिद्वंद्विता की तरह ले, निजी हमले की तरह नहीं। कुछ देर बाद यही बात उसका सलाहकार टॉम हेगान उससे कहता है। 'प्रोफेशनल' और 'पर्सनल' के इस फ़र्क को माइकल बड़ी शिद्दत से ख़ारिज करता हुआ कहता है- ‘टॉम, मूर्ख मत बनो। सबकुछ पर्सनल है, कारोबार का एक-एक रेशा। हर आदमी हर रोज़ जो टुकड़ा भकोसता है, वह बस पर्सनल है। वे इसी को कारोबार कहते हैं। लेकिन यह पूरी तरह निजी है। तुम्हें मालूम है, ये मैंने किससे सीखा? डॉन से, गॉडफादर से। अगर उसके किसी दोस्त को बिजली का झटका लग जाए तो वह उसे निजी तौर पर लेता था। मेरा मेरीन में जाना उसके लिए निजी था। यही चीज़ उसको बड़ा बनाती है। वह सबकुछ निजी तौर पर लेता है।‘
यहां पहुंचते-पहुंचते मैं अटक जाता हूं। मैं कोई अपराध कथा पढ़ रहा हूं या जीवन को समझने वाली कोई किताब? मारियो पूजो के इस उपन्यास की ताकत क्या यह है कि उसमें इटली के माफिया गिरोहों की आपसी लड़ाई का बड़ा जीवंत वर्णन है? या उसकी ताकत इस बात में निहित है कि इस अपराध कथा के भीतर भी जीवन के स्पंदन को, रिश्तों के द्वंद्व को अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है?
दूसरों की नहीं जानता, लेकिन मेरी साहित्यिक मनोरचना और अभिरुचि के विकास में जासूसी और अपराध कथाओं का भी अच्छा ख़ासा हाथ रहा है। बचपन से ही जासूसी उपन्यास मेरे साथ रहे। राजन इकबाल सीरीज़ वाले एससी बेदी के बाल पॉकेट बुक्स सबसे प्रिय रहे। मिलने पर रायजादा की राम रहीम सीरीज़ भी पढ़ लेता था। लेकिन जल्द ही इन बाल जासूसी उपन्यासों का साथ छूट गया। कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास चले आए। इनके साथ कुशवाहा कांत, कुमार कश्यप, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास पढ़ता रहा। सच तो यह है कि ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति की मेरी पहली समझ बनाई। इस राजनीति में भारत और रूस के जासूस एक तरफ़ हुआ करते थे और पाकिस्तान-चीन-अमेरिका और इंग्लैंड के दूसरी तरफ। सीआईए और केजीबी जैसी ख़ौफ़नाक संस्थाओं के नाम पहली बार इन्हीं उपन्यासों में मिले। उगांडा, ईदी अमीन, लीबिया,  कर्नल गद्दाफ़ी- इन सबसे पहला परिचय उन्हीं दिनों हुआ। कर्नल विनोद, कैप्टन, हमीद, राजेश, विक्रांत, विशाल, जगन जैसे जासूस तरह-तरह से कातिलों को पकड़ते रहे, देश के दुश्मनों से हमें बचाते रहे, अपनों के बीच छुपे परायों की पहचान करते रहे और उन अपराधी चेहरों को सामने लाते रहे और हमारा मन बहलाते रहे।
तब भी जानता था- अब कुछ और ज़्यादा जानता हूं- ये उपन्यास ज़िंदगी के, जासूसी के, जांच-पड़ताल और खोजबीन के बहुत सतही और उथले संस्करण थे। सेक्स, हिंसा और रहस्य-रोमांच की उस चाशनी को अपने-अपने ब्रांड के हिसाब से मिलाने वाले जो दरअसल पश्चिम के जासूसी उपन्यासों से बनी थी। लेकिन अगर जीवन और अध्ययन की वे प्राथमिक सीढ़ियां नहीं आई होतीं तो कुछ और ऊपर उठकर न गंभीर साहित्य को सहजता से पढ़ पाता और न ही जासूसी उपन्यासों और अपराध कथाओं की उस दुनिया में डूब पाता जो अब भी खींचती है। मैंने बहुत सारे तो नहीं, फिर भी सतही और गंभीर कई तरह की वे कहानियां पढ़ी हैं जिन्हें जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें जेम्स हेडली चेज़ और शिडनी शेल्डन से लेकर अगाथा क्रिस्टी, रॉबिन कुक, जेफ़री आर्चर और कई दूसरे भूले-भटके नामों तक की रचनाएं शामिल हैं।
लेकिन इन अपराध कथाओं में ऐसा क्या है जो हमें खींचता है? अपराध कोई अच्छी चीज़ नहीं, कत्ल, अपहरण या लूटपाट की खबरें हमें अख़बारों में रोज़ मिलती हैं जिनसे हम त्रस्त रहते हैं। या हमारे अवचेतन में अपराध को लेकर एक कौतूहल रहता है जो अचानक किसी कहानी के बीच सक्रिय हो जाता है और हमें एक तरह की तृप्ति देता है? यह बहुत आजमाया हुआ और अब तो सर्वेक्षणों से भी प्रमाणित निष्कर्ष है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा अपराध कथाएं बिकती हैं- चाहे वे साहित्य के रूप में हो या फिल्मों में या फिर टीवी सीरियल में। हो सकता है कि इसका कुछ वास्ता हमारे भीतर की उस आदिम अतृप्ति से हो जिनके बीच कोई अपराध घटित होता है- या फिर यह समझने से कि आखिर वह कौन सा मनोविज्ञान है जिसमें इंसान अपराध करता है।
लेकिन अपराध कथाओं या जासूसी उपन्यासों के हिट होने की सबसे बड़ी वजह उस कौतूहल में है जो इंसानी सभ्यता को आगे ले जाने वाले मूल तत्वों में है। यह कौतूहल न होता तो शायद हम अपने भीतर और बाहर की बहुत सारी छुपी हुई दुनियाओं की तलाश न कर पाते। वैसे तो पूरा साहित्य ही एक तरह से बाहर-भीतर के दृश्य-अदृश्य संसार की तलाश है, और कई बार बहुत शास्त्रीय मानी जाने वाली किताबें अपनी दुरूहता के बावजूद बेहद दिलचस्प अपराध और जासूसी कथाएं साबित हुई हैं। उंबेर्तो इको का उपन्यास 'नेम आॅफ द रोज़' कहीं से जासूसी उपन्यास नहीं है लेकिन लंबे दार्शनिक आख्यानों और संदर्भों से भरी यह पूरी किताब अंततः एक मठ में लगातार हो रही मौतों और उसकी जांच करने आए एक संन्यासी और उसके शिष्य की कहानी के बीच ही आगे बढ़ती है। ओरहान पामुक के उपन्यास माई नेम इज़ रेड की शुरुआत भी एक क़त्ल से ही होती है।
बहरहाल, यहां विषयांतर का ख़तरा है। हम एक विधा के रूप में जिन अपराध कथाओं की बात कर रहे हैं, वहां की दुनिया भी उत्सुकता के मूल रेशों से ही बनी है- बस इस फर्क के साथ कि उनमें बड़ी सघन तीव्रता को साधने की कोशिश होती है- उसके अपने फॉर्मूले भी होते हैं। हर अपराध या जासूसी कथा में कुछ कोशिशों को बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। मसलन एक शिल्प इस तरह का होता है जिसमें हत्यारा या अपराधी बिल्कुल सामने न आए। बिल्कुल अंत में यह राज खुलता है कि अपराधी कौन है? इसी शैली में यह कोशिश शामिल रहती है कि अपराधी वह निकले जिस पर पूरे उपन्यास में सबसे कम संदेह हो। हत्या करने में उसका हाथ सामने आए जो मृतक के सबसे करीब हो। अगाथा क्रिस्टी के कई उपन्यासों में यह प्रविधि दिखाई पड़ती है। ‘मर्डर इन मेसोपोटामिया’ में एक चौकोर घर के अलग-अलग कमरों में 12 लोग हैं और एक हत्या हुई है। हत्या का संदेह हर किसी पर है- लेकिन अंत में कातिल वह निकलता है जो सबसे पाक-साफ़ मालूम होता है, जिसने मक़तूल की सेवा के लिए एक नर्स और क़त्ल की जांच के लिए एक जासूस को बुलाया है।
दूसरी प्रविधि यह है कि हत्यारा या अपराधी एक के बाद एक जुर्म करता जाता है और जासूस उसके पीछे लगा रहता है। यहां सारी उत्सुकता इस बात को लेकर होती है कि अगला जुर्म कैसे होना है और चूहे-बिल्ली का यह खेल ख़त्म कब होना है।
चूहे बिल्ली के इस खेल की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि इसके अपने नायक हैं- कुछ तो इतने बड़े कि अपने लेखक से आगे निकल कर किंवदंतियों और मुहावरों में बदल गए हैं। आर्थर कानन डायल को कम लोग जानते हैं, उस शर्लक होम्स को सब जानते हैं जो पलक झपकते एक साथ कई चीज़ें विश्लेषित कर लेता है। ज़रूरत पड़ने पर वह बहादुरी भी दिखा सकता है लेकिन उसका नायकत्व दरअसल उस अंतर्दृष्टि में छुपा है जिसके सहारे वह अपराध की जगह देख अपराधी का मन पढ़ लेता है। हिंदी में मेजर बलवंत और कर्नल विनोद जैसे कई जासूस रहे हैं जिनके आने से अचानक पाठक कोई नया राज़ खुलने की उम्मीद पाल लेता है।
बहरहाल, यह सिर्फ ‘कौन’ और ‘कैसे’ का मामला होता तो जासूसी उपन्यास कब की अपनी उम्र खो चुके होते। इसके साथ बहुत सारी और भी चाशनियां हैं जो फेंटी जाती हैं। राष्ट्रवाद या देशभक्ति की चाशनी इसमें सबसे अहम है। जासूसी कथाओं का संसार वैश्विक राजनीतिक घटनाओं से भी खूब बनता रहा है। बीसवीं सदी के विश्वयुद्धों को पृष्ठभूमि में रखकर कुछ बेहतरीन जासूसी उपन्यास लिखे गए हैं। अगाथा क्रिस्टी के ‘सीक्रेट ऐडवर्सरीज’ की शुरुआत ही पहले विश्वयुद्ध में डुबो दिए गए एक जहाज़ से होती है जिसमें एक शख्स एक अनजान लड़की को कुछ बेहद गोपनीय दस्तावेज दे देता है ताकि वह उसे सुरक्षित पहुंचा सके। इसके बाद वह लड़की गायब हो जाती है। इसके बाद का उपन्यास उसकी तलाश के बीच दो बेखबर युवाओं के रोमांच से बनता है। इत्तिफाकन इस उपन्यास में अगाथा क्रिस्टी दो और प्रविधियों का इस्तेमाल करती हैं जो आगे चल कर जासूसी उपन्यासों में कई बार इस्तेमाल किए गए। उसकी गुम किरदार स्मृतिलोप की शिकार होती है जिसके चलते बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके अलावा इस उपन्यास में दो बेरोज़गार युवा- टॉमी और ट्यूपेंस- जो कहीं से जासूस होने के लिए प्रशिक्षित या तैयार नहीं हैं, और जिन्हें बस अपनी ज़रूरत के लिए एक खतरनाक मिशन में लगना पड़ता है- सबसे बड़े नायक सिद्ध होते हैं। इसके बाद कई ऐसे उपन्यास आए जिनमें ऐसे शौकिया या मामूली लोग बड़ी-बड़ी साज़िशों का पर्दाफाश करते देखे गए।
जेफरी आर्चर के ‘ऑनर अमंग थीव्स’ में सद्दाम हुसैन के लोग अमेरिका का डिक्लियरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस चुरा लेने की योजना बनाते हैं। एक बार लगता है कि उन्होंने उसे चुरा भी लिया। 90 के दशक के बाद खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के तनाव की पृष्ठभूमि में यह एक दिलचस्प उपन्यास है। इसी तरह जेफरी आर्चर का ही एक और उपन्यास ‘फॉल्स इंप्रेशंस’ हालांकि एक पेंटिंग को लेकर है, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में 9/11 का हमला भी है। इस कहानी में पुराने रईसों को उधार देने वाले एक बैंक की सलाहकार ऐसी ही एक रईस महिला के घर उसकी संपत्ति का मूल्यांकन करने पहुंचती है। महिला उधार चुकाने में अक्षम है और उसकी जायदाद बेचकर रकम वसूली की बात है। ये सलाहकार देखती है कि उसके विशाल मकान में वॉन गॉ का एक सेल्फ पोर्ट्रेट लगा हुआ है। वह उस महिला को बताती है कि बस यह पोर्ट्रेट बेच कर वह अपना पूरा कर्ज़ ही नहीं अदा कर सकती है, आने वाली ज़िंदगी की ज़रूरतों के लिए भी पैसा जुटा सकती है। यह बात वह न्यूयॉर्क में बैठे अपने बॉस को भी बता देती है जो उस लड़की पर बहुत बुरी तरह नाराज होता है। वह उसे फौरन वापस लौटने का आदेश देता है। उसी रात एजिलाबेथ नाम की उस महिला की हत्या हो जाती है और संदेह वहां से चली इस लड़की पर जाता है जो इन सबसे बेख़बर है। वह सुबह वर्ल्ड ट्रेड टावर की ऊपरी मंज़िलों में कहीं स्थित अपने दफ्तर पहुंचती है और एक-एक दो विमानों को इमारत से टकराता हुआ देखती है। अगले कई पन्नों में इस बात का वर्णन है कि वह कैसे वहां से उतरती है। यह पूरा उपन्यास आने वाले पन्नों में पेंटिंग की दुनिया में मूल और नकली की बहस को रखता है, चित्रकला की परंपरा को रखता है और एक बहुत रोचक पाठ बनाता है। 
दरअसल जासूसी उपन्यासों का यह संसार अब तो- खासकर अंग्रेज़ी में- कई हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ शुद्ध अपराध कथाएं हैं जिनमें बहुत वीभत्स तरीके से की जा रही हत्याओं की जांच पड़ताल है, दूसरी तरफ राजनीतिक टकराव के ताने-बाने से बने जासूसी उपन्यास हैं जिनमें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साजिशें करने और उन्हें नाकाम करने का खेल चलता रहता है। तीसरी तरफ़ कुछ ‘लाइट डिटेक्टिव’ उपन्यास हैं जिनमें न वीभत्स हत्याएं हैं और न ब़ड़ी साजिशें, बल्कि छोटे-छोटे तनावों के बीच छोटे-छोटे अपराधों और चूकों से बनने वाला रहस्य रोमांच है। इन सबके बीच ‘मेडिकल थ्रिलर’ भी हैं जिनके लिए रोबिन कुक मशहूर है। चिकित्सकीय गुत्थियों पर केंद्रित उसके उपन्यास अपनी तरह से बेहद रोमांचक हुआ करते हैं। ‘हार्मफुल इंटेंट’ नाम के उपन्यास में एक डॉक्टर एक महिला को एनीस्थीसिया देता है और उसकी जान चली जाती है। डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है, उसे जेल की सज़ा होती है। इसके बाद डॉक्टर कैसे अपने-आप को बेगुनाह साबित करता है और कैसे इस कोशिश में नकली इंजेक्शनों दवाओं का एक कार्टल पकड़ा जाता है, इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी मिलती है।
तो मेरे लिए जासूसी उपन्यासों का यह संसार जितना दिलचस्प रहा है उतना ही आंख खोलने वाला भी। मामूली लोगों के विकट साहस, गैरमामूली लगने वाले लोगों की साधारणता, अपराधियों के भीतर दबी इंसानियत, सफ़ेदपोश लोगों के भीतर बसे जुर्म, जीवन के सहज ब्योरों के बीच छुपी रहने वाली कहानियां, एक-दूसरे की वास्तविक शिनाख्त का सवाल- यह सब यह संसार हमारे सामने लाता रहा है।
फिर दुहराना होगा- इन जासूसी उपन्यासों को पढ़ना जीवन या पठन-पाठन की प्राथमिक सीढ़ियों पर ही चढ़ना है। ये लेखक हमारे टॉल्स्टॉय, शेक्सपियर, पामुक या मारख़ेज़ नहीं हैं जो हमारे लिए जीवन की बहुत सारी सूक्ष्मताओं का संधान करते हैं। लेकिन ये वे लोग हैं जो याद दिलाते हैं कि जीवन बहुत सारी अनिश्चितताओं और संभावनाओं से भरा है। इनसे गुज़र कर हम जब वास्तविक लेखकों तक पहुंचते हैं तो उस लेखन का भी कहीं ज़्यादा आनंद ले पाते हैं। जासूसी उपन्यासों ने मेरे लिए यह काम किया है, कुछ सीढ़ियां आसान बनाई हैं, कुछ चीज़ों को समझने की एक पृष्ठभूमि तैयार की है।
हंस से साभार।

आलोक धन्वा की लोकप्रिय कविता -भागी हुई लड़कियां


बिहार की धरती मुंगेर में 1948 ई० को जन्म लेने वाले आलोक धन्वा अब अपनी कविताओं की वजह से नहीं बल्कि सभा-समारोह में शिरकत एवं अन्य कारणों से चर्चा में रहते हैं, लेकिन वे हिंदी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने 70 के दशक में कविता को एक नई पहचान दी। उनका पहला संग्रह है- दुनिया रोज बनती है। ’जनता का आदमी’, ’गोली दागो पोस्टर’, ’कपड़े के जूते’ और ’ब्रूनों की बेटियाँ’ हिन्दी की प्रसिद्ध कविताएँ हैं। अंग्रेज़ी और रूसी में कविताओं के अनुवाद हुए हैं। उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया है। आइए पढते हैं उनकी बहुत ही लोकप्रिय कविता - "भागी हुई लड़कियां"

एक 

घर की जंजीरें 
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं 
जब घर से कोई लड़की भागती है 

क्या उस रात की याद आ रही है 
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी 
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी? 
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट 
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी? 

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के 
आज अपने ही घर में सच निकले! 

क्या तुम यह सोचते थे 
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए 
रचे गए? 
और वह खतरनाक अभिनय 
लैला के ध्वंस का 
जो मंच से अटूट उठता हुआ 
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था? 

दो 

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं 
कभी वह खत 
जिसे भागने से पहले 
वह अपनी मेज पर रख गई 
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से 
उसका संवाद 
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा 
उसका आबनूस 
उसकी सात पालों वाली नाव 
लेकिन कैसे चुराओगे 
एक भागी हुई लड़की की उम्र 
जो अभी काफी बची हो सकती है 
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में? 

उसकी बची-खुची चीजों को 
जला डालोगे? 
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे? 
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से 
बहुत अधिक 
सन्तूर की तरह 
केश में 

तीन 

उसे मिटाओगे 
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे 
उसके ही घर की हवा से 
उसे वहां से भी मिटाओगे 
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर 
वहां से भी 
मैं जानता हूं 
कुलीनता की हिंसा ! 

लेकिन उसके भागने की बात 
याद से नहीं जाएगी 
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह 

वह कोई पहली लड़की नहीं है 
जो भागी है 
और न वह अन्तिम लड़की होगी 
अभी और भी लड़के होंगे 
और भी लड़कियां होंगी 
जो भागेंगे मार्च के महीने में 

लड़की भागती है 
जैसे फूलों गुम होती हुई 
तारों में गुम होती हुई 
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई 
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में 

चार 

अगर एक लड़की भागती है 
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है 
कि कोई लड़का भी भागा होगा 

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं 
जिनके साथ वह जा सकती है 
कुछ भी कर सकती है 
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है 

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत 
घर से बाहर 
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं 
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा 
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो 

वह कहीं भी हो सकती है 
गिर सकती है 
बिखर सकती है 
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में 
गलतियां भी खुद ही करेगी 
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक 
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी 
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी 

पांच 

लड़की भागती है 
जैसे सफेद घोड़े पर सवार 
लालच और जुए के आरपार 
जर्जर दूल्हों से 
कितनी धूल उठती है 

तुम 
जो 
पत्नियों को अलग रखते हो 
वेश्याओं से 
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो 
पत्नियों से 
कितना आतंकित होते हो 
जब स्त्री बेखौफ भटकती है 
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व 
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों 
और प्रमिकाओं में ! 

अब तो वह कहीं भी हो सकती है 
उन आगामी देशों में 
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा 

छह 

कितनी-कितनी लड़कियां 
भागती हैं मन ही मन 
अपने रतजगे अपनी डायरी में 
सचमुच की भागी लड़कियों से 
उनकी आबादी बहुत बड़ी है 

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी? 

क्या तुम्हारी रातों में 
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं? 

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया? 
क्या तुम उसे उठा लाए 
अपनी हैसियत अपनी ताकत से? 
तुम उठा लाए एक ही बार में 
एक स्त्री की तमाम रातें 
उसके निधन के बाद की भी रातें ! 

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी 
किसी स्त्री के सीने से लगकर 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने 
सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में 
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
और दुनिया जब तक रहेगी 
सिर्फ आज की रात भी रहेगी

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

वेद प्रकाश शर्मा और उनकी लोकप्रियता

वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा, सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफन तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 176 उपन्यास और इंटरनेशनल खिलाड़ी, सबसे बड़ा खिलाड़ी समेत कई फिल्मों के लेखक वेद प्रकाश शर्मा आखिरकार 17 फरवरी 2017 को करीबन एक साल से कैंसर से जूझते हुए अपने पाठकों को अपना अंतिम अलविदा कह गये. साल में दो-तीन नॉवेल लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा का जन्म 6 जून, 1955 को मेरठ में हुआ जो कि मूलत: मुजफ्फरनगर जिले के बिहरा गांव के रहने वाले थे.

लगातार आठ –आठ घंटे बिना किसी से मिले –जुले और बगैर कुछ खाए –पिए लिखने वाले वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का शौक था. उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई. उनकी पहली कहानी 1971 में पेनों की जेलस्कूल मैग्जीन में प्रकाशित हुई. वे उस पत्रिका के छात्र संपादक बनाए गए थे. लेकिन उपन्यासकार बनने की कहानी यह है कि 1972 में जब हाईस्कूल का पेपर देने के बाद गर्मी की छुट्टियों में वे अपने पैतृक गांव बिहरा गए जहां वे अपने साथ कई उपन्यास भी ले गए. दोस्तों के अभाव में उन्होंने सिर्फ पढ़ना और लिखना शुरू कर दिया. शुरू में तो जब पिता को मालूम पड़ी तो खूब खिंचाई हुई लेकिन जब उन्होंने उसे पढ़ा तो अचंभित हो गए. फिर उनके पिता ही स्क्रिप्‍ट लेकर प्रेस में कंपोजिंग सिखाने ले गए जहां नामी उपन्यासकारों के नकली उपन्यास छापने वाले लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के मालिक जंग बहादुर वहां अपने किसी उपन्यास का प्रूफ देखने आए थे. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद वह पास में रखी स्क्रिप्‍ट को पढ़ने लगे. चंद पन्ने पढ़ने के बाद अपने साथ पूरा पढ़ने के लिए ले गए और तीन-चार घंटे बाद लौटे. वेद प्रकाश के पिता से उन्होंने पूछा, लिखा किसने है? जब उन्हें हकीकत का पता चला तो तो बोले, पहले बता देते. फिर जंग बहादुर ने उन्हें अपने ऑफिस बुलाया. टेबल पर 100 रुपए रखते हुए कहा, और लिख, हर नॉवेल के 100 रुपए मिलेंगे. वेद प्रकाश ने सोचा कि राइटर को और क्या चाहिए, उपन्यास छपेगा, नाम के साथ फोटो छपेगी लेकिन जंग बहादुर ने उनकी उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया, फोटो तो बहुत दूर की बात नाम तक छापने से मना कर दिया. उन्होंने टेबल से स्क्रिप्‍ट उठाई और घर चले गए. दिसंबर, 1972 में वेद प्रकाश शर्मा को लगा कि जंग बहादुर सही कह रहे थे. और सीक्रेट फाइल नामक उपन्यास वेद प्रकाश कांबोज के नाम से छप गया. एक के बाद एक उपन्यास से नकली कांबोज की लोकप्रियता बढ़ने लगी. माधुरी प्रकाशन ने नाम छापा लेकिन पूरा नहीं. जंग बहादुर ने आग के बेटे (1973) के पहले पन्ने पर वेद प्रकाश शर्मा का पूरा नाम छापा लेकिन फोटो फिर भी नहीं छपी. लेकिन उसी साल ज्योति प्रकाशन और माधुरी प्रकाशन दोनों ने नाम के साथ इनका फोटो भी छापना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उनके उपन्यास 50,000 और फिर एक लाख छपने लगी. उनके सौवें नॉवेल कैदी नं. 100 की 2,50,000 प्रतियां छपीं थी. इसके बाद उन्होंने 1985 में खुद अपना प्रकाशन तुलसी पॉकेट बुक्स के नाम से शुरू कर लिया. उनके कुल 176 उन्यासों में से 70 इसी ने छपे हैं. लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता 1993 में वर्दी वाला गुंडा से मिली जिसके बारे में उनका दावा है कि 15 लाख प्रतियां पहली बार छापी गई थीं. मेरठ शहर के सभी बुक स्टॉल से नॉवेल घंटों में गायब थीं. प्री-ऑर्डर और अडवांस बुकिंग वाले आज के 'बेस्टसेलर' जमाने से पहले लोग पहले उनके नॉवेल अडवांस में बुक कराते थे. इनका आखिरी उपन्यास छठी उंगुली’  था जो 6 महीने पहले ही आया है.

वेदप्रकाश शर्मा ने करीब छह फिल्मों में स्क्रिन प्ले राइटर भी रहे. तीन नवंबर वर्ष-1993 को रिलीज हुई फिल्म अनाम की पटकथा वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी. इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था. इसके बाद 9 जून वर्ष-1995 को रिलीज हुई फिल्म सबसे बड़ा खिलाड़ी उनके उपन्यास लल्लू पर आधारित थी. इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था. इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी, जो 26 मार्च 1999 को रिलीज हुई थी. इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास केशव पंडित पर वर्ष-2010 में टीवी सीरियल भी बना.
उनके उपन्यास समाज से ही जुड़े हुए होते थे. समाज से जुड़े मुद्दे उनके उपन्यास में अक्सर झलकते थे. यूं कहिए मानवीय संवेदनाओं से उनके उपन्यास जुड़े रहते थे. 1985 में उन्होंने दहेज की समस्या को अपने उपन्यास बहू मांगे इंसाफ से उठाया था. बाद में इसी उपन्यास पर शशिलाल नायर के निर्देशन में बहू की आवाज फिल्म बनी. इसके अलावा दहेज में रिवाल्वर, विधवा का पति नामक उपन्यास से भी उन्होंने सामाजिक समस्याएं उठाईं. 

वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष-1992 1994 में मेरठ रत्न अवार्ड,  वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष-2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया. इसके अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले.
भले ही गंभीर साहित्य वाले हिन्दी के इस लोकप्रिय लेखक की रचना पर विशेष गौर नहीं फरमाते रहें हो लेकिन उनकी लोकप्रियता के सामने जरूर ही नतमस्तक थे और शायद रहेंगें भी.




पटना इतिहास की नजर में : अरूण सिंह


ईस्ट इंडिया कंपनी जब हिंदुस्तान में व्यापार करने आयी थी उस वक्त विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 23 फीसदी थी। और जब वे भारत छोड़कर गए तो यह घटकर चार फीसदी से भी कम रह गयी थी। उन्होंने यहां के उद्योगों को भरपूर क्षति पहुंचाई और यहां की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया।
पटना का समृद्ध बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। एक वक्त में ब्रिटिश, डच, डेन और फ्रांसीसियों का पसंदीदा यह शहर धीरे धीरे अपनी महत्ता खोने लगा। पटना और इसके आसपास के गांवों में जहां कभी घर घर में हथकरघे चल रहे थे, धीरे धीरे बंद होने लगे। ओ’ मैली जब 1907 में सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त तक यह सिमट कर रायपुरा (फतुहा) तक ही रह गया था। यहां के बुनकर अभी भी सिल्क से तसर का निर्माण कर रहे थे। इसके साथ ही बुनकर सिल्क और सूती को मिलाकर जिसे बाफ्टा कहते थे, का उत्पादन कर रहे थे। इसकी खपत स्थानीय बाजार में थी और साथ ही इसका निर्यात कलकत्ता तक हो रहा था। इसके सौ वर्ष पहले जब बुकानन यहां सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त यहां के सिल्क का निर्यात पर्शिया के बाजारों तक हो रहा था।
पटना सिटी में बने शीशे के उत्पादों का भी एक वक्त में बड़ा बाजार था। इसका निर्यात यूरोप तक हो रहा था। ओ’ मैली ने गज़ेटियर में पटना सिटी के लोदीकटरा मोहल्ले में शीशे से बने उत्पादों का उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इत्र रखने की शीशियां,बोतलें,लैम्पों और चुड़ियों का निर्माण सोन नदी के बालू और सोड़ा से किया जाता है। इससे शीशे का जो निर्माण होता है वह हरे रंग का और अशुद्ध होता है। लेकिन जो शीशा शुद्ध और सफ़ेद होता है उसका निर्माण रेलवे के टूटे लैम्पों के शीशे से होता है। उसने यूरोपियन शैली के फूलदानों के निर्माण का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि कारीगर फूलदानों के शीशों को रंगने के लिए नीले थोथे, नील के रंग और अन्य सामग्रियों का प्रयोग करते हैं। जबकि शीशे को नीला रंग देने के लिए टिन के ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। उसने इनके निर्माण के प्रक्रिया का भी जिक्र किया है।
पटना सिटी के मारूफगंज मोहल्ले के संगतराशों (पत्थर गढ़ने वाला) का भी उल्लेख ओ’ मैली ने किया है। उसने लिखा है कि जिस बलुआ पत्थर का उपयोग यहां के कारीगर करते हैं वह मिर्जापुरी पत्थर कहलाता है। इन पत्थरों के बड़ी बड़ी सिल्लियों को मिर्ज़ापुर जिले के चुनार और बिंध्याचल से नाव से गंगा नदी के मार्फ़त लाया जाता है। सासाराम और मुंगेर से ग्रेनाइट का भी आयात किया जाता है। इन पत्थरों से देवी देवताओं की मूर्तियां, आटा पीसने वाला जांता, मसाला पीसने वाला सिल-लोढा, कुम्हारों की चक्कियां, पत्थर के प्लेट और कपों का निर्माण होता है। इनकी खपत पटना और देश के दूसरे शहरों में होती है। इनकी मांग लगातार बनी रहती है।
ओ’ मैली ने पटना और दानापुर के बढ़इयों (लकड़ी का काम करने वाले) की दक्षता का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इन कारीगरों द्वारा बनाये गए लकड़ी के खूबसूरत छज्जे, जो दानापुर और पटना की इमारतों की खास पहचान है उनकी कारीगरी के नमूने हैं। इन कारीगरों द्वारा बनाये गए खूबसूरत मजबूत फर्नीचर और आलमारियों का निर्यात देश के दूसरे शहरों में होता है। कुत्ता गाड़ी और पालकियों का निर्माण भी पटना और दानापुर की विशेषता है।
पटना सिटी की सड़कों और गलियों से गुजरते हुए ठहर कर आप पुरानी इमारतों को देखें तो उनमे लगी लकड़ी के खूबसूरत छज्जे आपको अभी भी दिख जायेंगे।
साभार: प्रभात खबर

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हुआ पटना पुस्तक मेला 2017

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हुआ पटना पुस्तक मेला
-सुशील कुमार भारद्वाज

पटना पुस्तक मेला में “साहिर समग्र” पर चर्चा के दौरान जब प्रेम भारद्वाज, मदन कश्यप और अवधेश प्रीत जैसे लोगों ने कहना शुरू किया कि “पार्टनर तुम्हारा पॉलिटिक्स क्या है?” तो उनलोगों ने शायद उस परिचर्चा को वहीं भूला दिया होगा लेकिन अब पटना पुस्तक मेला पटनावासियों, अपने आयोजकों, एवं आगंतुकों से पूछ रहा है कि “पटना पुस्तक मेला का पालिटिक्स क्या है?” मेले में जहां सूबे के मुख्यमंत्री आए, स्वास्थ्य मंत्री आए, वित्त मंत्री आए तो आख़िरकार राज्यपाल भी आए.  सूबे के प्रशासनिक पदाधिकारी, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद आदि आए तो देश के चर्चित साहित्यकार भी आए और गुमनाम रचनाकार एवं आम पाठक भी. मुख्यमंत्री ने जहां मेले को अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनाने की सलाह दी वहीं मेले में ही नोवेल्टी प्रकाशन की ओर से “ब्लू बर्ड” नाम से अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन की ही घोषणा नहीं की गई बल्कि ढाई लाख का चेक पटना पुस्तक मेला के अध्यक्ष एवं लेखक रत्नेश्वर सिंह को देते हुए ग्लोबल वार्मिंग पर केंद्रित उपन्यास “रेखना मेरी जान” के लिए लगभग पौने दो करोड का अनुबंध भी किया जो कि शायद हिन्दी लेखकों के लिए एक बहुत बड़ी रकम है.

4 फरवरी को अहले सुबह कुहरे और कनकनी का जो आलम था उसमें पुस्तक मेले जैसे किसी आयोजन में शरीक होने से पहले शायद लोग किसी जरूरी काम में व्यस्त होने के बहाने तलाशते लेकिन मौसम की मेहरबानी रही कि चढ़ते दिन के साथ वसंत अपने खिले धूप में मुस्कान बिखेड़ने चली आई. फिर भी शुरू शुरू में मेला धूप और धूल के बीच हो रहे नुक्कड़ नाटक, संवाद –परिसंवाद, कविता –पाठ, कहानी –पाठ एवं अन्य सांस्कृतिक आयोजनों के लिए ही नहीं बल्कि पुस्तक और लिट्टी –गोलगप्पे के लिए भी दर्शकों और खरीददारों को ढूंढते रहा.



पुस्तक मेला जब 23 वी बार पटनावासियों को पुस्तकों की दुनियां में सैर कराने की तैयारी में था उसी समय पहला झटका लगा जब प्रशासन ने 350 वें प्रकाश-पर्व की तैयारी और गाँधी मैदान में टेंट-सिटी बनाने के नाम पर जगह उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया. प्रकाश-पर्व की खुमारी पूरी तरह से उतरती उससे पहले ही गणतंत्र दिवस की तैयारी शुरू हो गई. प्रशासन गाँधी मैदान में जगह की उपलब्धता की जो बात रखी उसमें आयोजकों ने वसंत ऋतु की वसंती वयार के बीच 4 -14 फरवरी 2017 का समय तय किया. समय तय करते वक्त 8 नवम्बर  2016  को प्रधानमंत्री की घोषणा से हुई नोट्बंदी का विचार मन में था या नहीं यह तो कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इतना तय है कि वे इस समय से आगे बढ़ने को बिल्कुल ही तैयार नहीं थे क्योंकि कुछ वर्ष पहले भी मार्च में मेला को आयोजित किया गया था जिसमें गर्मी एवं बिक्री के मामले में मेले की भत्स पिट गई थी.
इसे भी संयोग ही कहा जाय कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर गाड़े गए बांस –बल्ले पूरी तरह से उखर पाते उससे पहले ही पुस्तक मेले की तैयारी शुरू करनी पड़ गई वह भी आयोजकों के इच्छा के प्रतिकूल अन्य वर्ष की तुलना में कम जगह पर. लेकिन आयोजकों की ही यह अथक लगन थी कि मेले की लगभग 25-30% की तैयारी के बाबजूद महज कुछ लोगों की मौजूदगी में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से न सिर्फ मेले का उद्घाटन करवा लिया बल्कि मुख्यमंत्री ने आने वाले वर्षों में मेले को अन्तराष्ट्रीय स्तर का बनाने और उसमें सरकारी सहयोग देने की बात कहकर सबका दिल जीत लेने की कोशिश की.
मसि के द्वारा आयोजित कविता –कहानी कार्यशाला में स्कूली बच्चों ने जरूर अपनी सक्रिय भागीदारी निभाकर मेले की उपयोगिता को साबित करने की कोशिश की. बच्चों ने मेले में जहां गणित के कुछ खास नुस्खे सीखें वहीं नृत्य एवं संगीत से धमाल भी मचाए. आयोजकों ने भोजपुरी मुक्ताकाश मंच पर एक प्रमुख कार्यक्रम एवं अन्य औसतन पांच –छः कार्यक्रम प्रतिदिन प्रस्तुत किए जिसमें लोगों की भीड़ इतनी रही कि कुर्सी कम पड़ने लगी. आयोजक की सबसे बड़ी खासियत रही कि पाठकों के बीच न सिर्फ गौरतलब एवं समकालीन विषयों एवं पुस्तकों पर बहस एवं बातचीत के लिए शमी जमां, भगवान दास मोरवाल, यतीन्द्र मिश्र, उदय प्रकाश, शशि शेखर, अनंत विजय एवं संजीव जैसे लोगों को आमंत्रित किया बल्कि बिहार के रचनाकार उषाकिरण खान, हृषिकेश सुलभ, अवधेश प्रीत, मदन कश्यप एवं प्रेम भारद्वाज आदि जैसों को भी यथोचित सम्मान देते हुए नई एवं युवा पीढ़ी को भी मंच पर सहृदयता के साथ स्थान देने की सफल कोशिश की. यूं तो कई रचनाकार अपनी निजी व्यस्तता के कारण इस आयोजन में सशरीर शरीक नहीं हो सके लेकिन सोशल मीडिया के बहाने न सिर्फ इससे जुड़े रहे बल्कि होने वाली हर गतिविधि पर नजर गडाये रहे एवं शुभकामनाएँ भेजते रहे. साथ ही शहर में मौजूद अनेक रचनाकार मेले में अपनी सहभागिता भी दिखाते रहे.
ग्यारह दिवसीय इस आयोजन में लगभग तीन –चार दिन ही ऐसे रहे जिसमें औसत से कुछ अधिक भीड़ रही जिसने मेले को न सिर्फ सफल बनाने की कोशिश की बल्कि प्रकाशकों के चेहरे पर भी खुशी लाने की कोशिश की. बाबजूद इसके लगभग सभी प्रकाशक एक मत दिखे कि पिछली बार की तुलना में भीड़ कम जुटी है और बिक्री पर इसका स्पष्ट असर दिख रहा है. एक खास बात जो देखने को मिली वह यह थी कि अधिकांश खरीददार भी नवरचनाकार ही थे जो कुछ किताबें अपने वरिष्ठ लेखकों की सलाह पर खरीद रहे थे वर्ना प्रेमचंद, शरतचंद्र, बच्चन, बाबा नागार्जुन, रेणु, निर्मल वर्मा, एवं धर्मवीर भारती की ही किताबें चर्चा में रहीं.
मेले में पुस्तक –लोकार्पण के वक्त दर्शकों के होठ तब मुस्कुराने को बाध्य हो जाते थे जब लोकार्पण करने आए शहर के नामचीन शिक्षाविद एवं राजनेता बगैर किताब की सामग्री को पढ़े ही शीर्षक एवं लेखक के नाम पर ही पुस्तक को श्रेष्ठ एवं उपयोगी होने की बात कहने लगते थे. दूसरी बात नज़र आई कि हर लेखक सामने वाले को अपने पुस्तक के ग्राहक के रूप में देखता और हर मिलने वाला इंसान मुफ्त में इक किताब पा जाने की आस में घूमता रहता.
1993 से पटना पुस्तक मेला अपने सांस्कृतिक पहल में निखार लाते हुए न सिर्फ साहित्यकारों एवं पाठकों को नजदीक लाकर एक दूसरे के संपर्क में लाने की कोशिश में लगा है बल्कि यह प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वालों, अपनी जिंदगी संवारने वालों को भी एक दूसरे से मिलाने की कोशिश करता है. साथ ही साथ विभिन्न राज्यों की हस्तशिल्प कला को भी प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा है. जबकि इस बार भवनों, प्रवेश द्वारों एवं सभागारों के नाम भाषा के आधार पर रखे गए थे.
पटना पुस्तक मेला में आमंत्रित गणमान्य अतिथियों का स्वागत कॉफी, स्मृति –चिह्न एवं पटना पुस्तक मेला मुद्रित झोले से किया गया. जबकि मुक्ताकाश मंच के बगल में सभी आगंतुक अपनी इच्छा एवं अपनी जेब के हिसाब से बिहारी लिट्टी, गोलगप्पे समेत अन्य फास्ट –फ़ूड का मजा लेते रहे.

यूं तो जब नोट्बंदी ने सबके हाथ बांध रखे हों, आयकर के खर्च –ब्योरे के समय भी समापन की ओर हो, परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला हो वैसी स्थिति में भी पुस्तक –मेला का आयोजन अपने आप में ही अहम है. और किस आयोजन में कमी बेसी नहीं होती है.अब चाहे मैथिली वाले कहें कि किसी मैथिली प्रकाशक को जगह क्यों नहीं या पंकज दूबे की परिचर्चा को कुछ कहें, लेकिन पटना पुस्तक मेला इस वादे के समाप्त हो गया कि नवम्बर –दिसम्बर में फिर मिलेंगें.   

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं: हृषिकेश सुलभ

15 फरवरी 1955 को बिहार के सीवान जिले के लहेजी ग्राम में स्वतंत्रता सेनानी रमाशंकर श्रीवास्तव के आंगन में एक बच्चे का जन्म हुआ जो अपनी प्रारंभिक पढाई के साथ –साथ वहां के सांस्कृतिक परिवेश में भी घुलने लगा. 1968 में जब वह बालक बिहार की राजधानी पटना आया तो यहां की उर्वर भूमि ने पढाई के साथ –साथ उसे साहित्य और रंगमंच की दुनियां की ओर भी खींचना शुरू कर दिया. उसने बाल कथा लिखते लिखते 1976 ई० में मुख्यधारा के साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की. जो कि  आज न सिर्फ एक लब्ध –प्रतिष्ठित एवं देश के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार हैं बल्कि उनके साहित्यिक खाते में लगभग आधा दर्जन नाटक, आधा दर्जन कहानी संग्रह और रंगमंच आधारित किताब एवं लेखों के अलावे लगभग आधा दर्जन से अधिक क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी हैं. जी हां, हम बात कर रहे हाल के वर्ष में आकाशवाणी पटना से सेवानिवृत हुए साहित्यकार हृषिकेश सुलभ की. आइए पढ़ते हैं सुशील कुमार भारद्वाज से हुई उनकी बातचीत के एक अंश को .

अपने साहित्यिक सफर के बारे में बताएं.

यूं तो लिखना विद्यालय स्तर पर ही शुरू कर दिया था लेकिन 1976 ई० में श्रीपत राय जी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका “कहानियां” और वसंत जी की पत्रिका  “समझ” में प्रकाशित अपनी कहानियों को ही अपनी शुरुआत मानता हुआ. उसके बाद 1977 ई० में सारिका के नव लेखन अंक में छपने के बाद से यह सफर अब तक जारी है. समय के साथ जीवन और साहित्य में परिपक्वता आई, नये नये जीवनानुभव मिले. दृष्टि में विकास एवं बदलाव हुए. कहानी कहने का अंदाज और भाषा पहले की तुलना में काफी बदल गया है.

कभी कहानी, नाटक के अलावे कविता या उपन्यास लिखने की इच्छा हुई?

मैंने अभी तक कविता नहीं लिखी है लेकिन सिर्फ कविता ही साहित्य तो नहीं है. अरुण कमल ने महत्वपूर्ण गद्य भी लिखे हैं. मुक्तिबोध की कहानी या अज्ञेय की शेखर एक जीवनी को भी देखा जा सकता है. मैं मानता हूं कि किसी रचनाकार को किसी खास विधा में बांधकर उसका मूल्यांकन नहीं करना चाहिए. यह महज सम्प्रेषण में सहजता का मामला है. वैसे नाटकों में गीत लिखें हैं. हो सकता है कि भविष्य में कभी कविता भी लिखूं. वैसे एक उपन्यास पर काम जारी है.

आपकी रचना प्रक्रिया क्या है?

मैं जो कुछ भी अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बोलूँगा वह बिल्कुल झूठ बोलूँगा. मेरे लिखने का कोई खास तौर- तरीका नहीं है. मैंने कोई भी कहानी एक बैठक में पूरी नहीं की है. कहानियां लंबे समय तक चलती रहती हैं. कहानी और पात्र के साथ संघर्ष चलते रहता है. कहानी लेखक के नियंत्रण –अनियन्त्रण के द्वन्द से आगे बढती है. दरअसल में लेखन एक जटिल प्रक्रिया है. लेखक की रचना प्रक्रिया को समझने में लोगों की उम्र निकल जाती है. किसी लेखक ने सच ही कहा है कि लेखक का निजी जीवन फूहर औरत का वार्डरोब होता है इसलिए इसमें कभी हाथ नहीं डालना चाहिए. कब क्या निकल आए और लेखक की बनी छवि टूट जाय, कहना मुश्किल है. रचनाकार का मूल्यांकन सिर्फ उसकी रचना से ही करना उचित है.

आपको किस साहित्यकार ने सर्वाधिक प्रभावित किया?

जिस तरह एक बालक के विकास में उसके माता –पिता, नाते –रिश्तेदार और उसके परिवेश का अहम योगदान होता है उसी प्रकार एक लेखक के निर्माण में भी उसके सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश के साथ –साथ अपने पूर्ववर्ती एवं अन्य का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है. किसी के प्रभाव को कम या अधिक नहीं बताया जा सकता. लेकिन किसी के प्रभाव में आकर उसी का अनुकरण करते हुए लिखकर कोई बेहतर भी नहीं कर सकता. वैसे यह एक आलोचक की जिम्मेवारी है कि वह पता करे कि किसी रचना पर किसका प्रभाव दिखता है?

लोकप्रिय साहित्य एवं गंभीर साहित्य के बहस को आप किस रूप में देखते हैं?

साहित्य में इस तरह का बंटवारा बहुत पहले से होता रहा है लेकिन अंततः इसका कोई अर्थ नहीं है. जो लोकप्रिय है वह श्रेष्ठ या दीर्घजीवी हो कोई जरूरी नहीं और जो लोकप्रिय हो वह कूड़ा या क्षणभंगुर ही हो यह भी जरूरी नहीं. महत्वपूर्ण उदाहरण हैं भिखारी ठाकुर. वे अपने समय में भी लोकप्रिय थे और आज भी उनकी रचनाओं पर विमर्श चल रहा है, मंचन हो रहा है और उनकी लोकप्रियता बरकरार है. साहित्य का परिवेश सबसे मिलकर बनता है. अभी जो लोकप्रिय साहित्य प्रकाशित होता है उसको लेकर किसी प्रकार से भयभीत या चिंतित होने की जरूरत नहीं है. अगर उस साहित्य में जीवन होगा, हमारे समय का सुख –दुःख और अंतर्द्वंद्व होगा तो वह जीवित रहेगा नहीं तो नष्ट हो जाएगा. बाज़ार को लेकर बहुत भय व्यक्त किया जा रहा है लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि बाज़ार की जो खरीद –बिक्री के आंकड़े हैं वे साहित्य का मूल्य नहीं तय करते हैं और ना ही साहित्य को दीर्घ जीवन दे पाते हैं. अंग्रेजी में साहित्य को प्रचारित –प्रसारित करने की और बाज़ार में बेचने की पद्धति कुछ ऐसी है कि पाठकों तक पुस्तकों के पहुंचने में सुविधा होती है. हिन्दी में यह परम्परा ही नहीं रही है. अब कुछ प्रकाशक अपनी सीमाओं के बीच ही सही, ऐसा प्रयास कर रहे हैं और यह एक अच्छी बात है.

साहित्य के दलित साहित्य, स्त्री साहित्य आदि में वर्गीकृत होने को आप किस तरह से देखते हैं?

ये सारे बंटवारे साहित्य की दुनियां में तात्कालिक प्रभाव भले ही डाल लें लेकिन अंततः बचता वही साहित्य है जो मनुष्य की गरिमा की रक्षा कर सके.

लिखना आपके जीने की एक जरूरी शर्त है. थोड़ा स्पष्ट करें.

मेरे लिए लिखना जीने की शर्त है इन अर्थों में कि वह मेरे जीवन के लिए जरूरी है. अंदर की व्याकुलता, छटपटाहट को अभिव्यक्त करने की जरूरत है, जिसे मैं अपनी कहानियों एवं नाटकों में अभिव्यक्त करता हूं.

एक लेखक के लिए सम्मान और पुरस्कार के क्या मायने हैं?

यदि कोई सम्मान और पुरस्कार दे रहा हो और अगर आपको यह महसूस होता है कि यह सही मायने में सही भाव के साथ दे रहा है तो स्वीकार करना चाहिए नहीं तो छोड़ देना चाहिए. एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं. लेखक को सिर्फ लिखना चाहिए.

भागमभाग वाली डिजिटल एज में लंबी कहानियों के बारे में आप क्या सोचते हैं?

जो पढता है वह लम्बी कहानियों को पढ़ेगा ही. जिसके पास समय नहीं है वह लम्बी क्या छोटी रचना को भी नहीं पढ़ेगा. मोबाइल, ई –पत्रिका आदि नये माध्यम हैं. मैं इसे बुरा नहीं मानता. लेकिन यह कहना निरर्थक है कि भागमभाग वाली डिजिटल एज में लोग चार पंक्ति की ही चीजों को पढ़ना चाहते हैं.

अभी के साहित्य और रंगमंच के बारे में क्या महसूस करते हैं?


समय के साथ चीजें तेजी से बदल रही हैं, माहौल से तालमेल के साथ आगे बढ़ रहीं हैं. एक ही जगह टिके रहने से नष्ट होने का खतरा रहता है. रंगमंच हो या साहित्य हर जगह बदलाव आता है और आते रहना चाहिए. परिवर्तन ही संसार का नियम है.

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

सुषमा सिंहा की बहुत दिनों के बाद पर शहंशाह आलम की टिप्पणी

समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं। पेश है समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणीः-


'बहुत दिनों के बाद' ( सुषमा सिन्हा ) : घर लौटने के सुख का ख़्वाब बुनने की एक अप्रत्याशित दुनिया
● शहंशाह आलम

आज जब आदमी से उम्मीदें, सपने, घर, रोशनियाँ, स्मृतियाँ सब छीनी जा रही हैं, बदले में नाउम्मीदी, ख़ौफ़, फुटपाथ, अँधेरा और भीषण उदासी से लबालब भरी दुनिया हमें दी जा रही है, कोई अपना है, जो हमारे घर लौटने का ख़्वाब अब भी बुन रहा है : हमने ही तो चाहा था जाना घर से दूर / ताकि बचा रहे घर लौटने का सुख / आज बहुत दिनों के बाद / लौटी हूँ अपने घर / एक सुकून के साथ / दरवाज़े ने हँस कर मेरा स्वागत किया / खिड़कियों ने खुलते-खुलते / आख़िर पूछ ही लिया / उस दुनिया के बारे / जो खिड़की से दिखती ही नहीं / रोशनदानों ने हुलस कर कहा- हमने बचा रखी है / तुम्हारे लिए उम्मीद की कई किरणें / तन्हाइयों ने मुस्कुरा कर देखा मुझे / और गले लगा कर रोईं बहुत / बहुत दिनों के बाद / घर के कमरे, दीवारें, छत, बालकनी / ख़ामोश हसरत भरी नज़रों से देख रहे हैं / मेरे छूते ही सिसकियों की आवाज़ / तेज़ हो आई है / देखा कि ज़ख़्म अब भी हरे हैं / और दर्द आज भी / हर जगह बिखरा पड़ा है / हिम्मत कर के फिर से / समेटने लगी हूँ उन्हें / कि हरकत हुई है घर में / घर जो ख़त्म हो रहा था / मैंने उसे बचाना चाहा / बहुत दिनों के बाद ( 'बहुत दिनों के बाद', पृ. 13-14 )। यह सच है कि 'घर' शब्द उस लोकशब्द की तरह है, जिसमें आदमी का अपना पूरा लोक झलकता है, आदमी की अपनी  गंध फैली मिलती है। समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं : देखती हूँ / जिस घर में नहीं होतीं / माँ, बहन, बेटियाँ / तरसते हैं उस घर के लोग / इन ख़ूबसूरत रिश्तों के लिए / फिर सोचती हूँ / जिस घर में होती हैं / माँ, बहन, बेटियाँ / कैसे हो सकते हैं / उस घर के लोग बलात्कारी / माफ़ी माँगना चाहती हूँ / उन तमाम बेटियों से / जिन्हें जन्म देने के बाद / हम उनकी हिफ़ाज़त नहीं कर पाए / अफ़सोस करना चाहती हूँ / दुनिया की उन तमाम औरतों के लिए / जिनकी कोख से / इंसान की शक्ल में हैवान पैदा हुए / रोना चाहती हूँ / उन तमाम बहनों की क़िस्मत पर / जिनके भाइयों द्वारा / किसी माँ, बहन, बेटी के साथ / किया गया ऐसा घृणित कार्य / और पूछना चाहती हूँ / दुनिया के तमाम लोगों से / क्यों हो रहा किसी माँ का / दामन तार-तार / क्यों लुटी-पीटी-मारी जा रही हैं / हमारी जन्मी-अजन्मी बेटियाँ / क्या माँ होना गुनाह है / या फिर / माँ बनने लायक़ इंसान होना गुनाह है ( ' पूछना चाहती हूँ', पृ. 24-25 )।

     सुषमा सिन्हा का पहला कविता-संग्रह 'मिट्टी का घर' नाम से 2004 में शिल्पायन, दिल्ली से आया था। एक दशक से थोड़ा अधिक समय के बाद उनका यह दूसरा कविता-संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' प्रकाशन संस्थान, दिल्ली से छप कर आना किसी घटना से कम नहीं है। पहले संग्रह से दूसरे संग्रह के बीच इस अंतराल का अर्थ यही है कि सुषमा सिन्हा ने इस अंतराल के बीच कविता के बोलने-बतियाने वाले बिम्बों को, कविता के सच्चे अभिप्रायों को काफ़ी हद तक पकड़ने-साधने का काम बख़ूबी किया है। इस बीच उन्होंने यह भी तय किया है कि कविता का जो सच्चा पक्ष है, उसे स्थगित नहीं किया जाए। इस दूसरे कविता-संग्रह की कविताओं की जीवनानुभूतियाँ इस प्रमाण हैं। इस नए संग्रह की कविताओं में कविता को पूरी महीनी से पकड़े रहने का गुण भी उन्होंने सीख लिया है और यह क़ाबिले-तारीफ़ है। ऐसा कविता के प्रति उनके भीतर आए गहरे आत्मविश्वास की वजह से भी होता दिखाई देता है। कविता का यह संतुलन समकालीन स्त्री-कविता का संतुलन कहा जाना यहाँ पर ज़्यादा उचित होगा। सुषमा सिन्हा का कविता-स्वर आधी आबादी का अपना स्वर है, जो पुरुष-समाज की चालाकी, धोखेबाज़ी, काइयाँगिरी के विरुद्ध ग़ुस्से, आक्रोश के साथ-साथ टूटन और घुटन को परदे से बाहर लाता है। इसका यह अर्थ नहीं निकाल जाना चाहिए कि ये कविताएँ किसी टूटी और घुटी हुई स्त्री के पक्ष का स्वर मात्र हैं बल्कि ये कविताएँ उन स्त्रियों की कविताएँ हैं, जिनमें लोहा लेने का हुनर आ गया है : जिस डर की आशंका से / काँप जाते हैं हम हमेशा / वक़्त बुरा हो तो / गुज़र जाता है वह हम पर / लेकिन बर्दाश्त करने की हमारी / ज़बर्दस्त है क्षमता / झेल कर वैसे लम्हों को भी / रह जाते हैं हम ज़िंदा / यूँ ही नहीं हम चलते हैं / नंगे पाँव जलते हुए अंगारों पर / नाचते हैं शीशे के टुकड़ों पर / गिर पड़ने की हद तक / चलते हैं पतली रस्सियों पर / मारते हैं कोड़े अपने बदन पर / दिखाते हैं अजीबो-ग़रीब करतब / जान पर खेल जाने का / ना जाने कितनी बार गुज़रते हैं हम / डर की हद से / कि डरते नहीं अब किसी भी बात से / दर्द की हद भी जानते हैं हम / और यह भी जानते हैं / कि मृत्यु से भी ज़्यादा / भयावह होती है भूख / यह भूख जब वक़्त बुरा हो तो / करवा ही लेती है हमसे / सभी तरह के काम / फिर भी नहीं होती है ख़त्म ( 'भूख', पृ. 15-16 )। दरअसल सुषमा सिन्हा की कविताएँ किसी ढोल की तरह डिन-डिन-डिन डिडिक-डिडिक की या ढम-ढम-ढम की आवाज़ ना भी निकाल पाती हैं तब भी ये कविताएँ उस नदी की तरह ज़रूर हैं, जो जब तक शांत है, तभी तक ख़ामोश दिखाई देती है, लेकिन तेज़ हवाओं के मौसम में वबाल मचा देने का दमखम रखती है। मैं सुषमा सिन्हा की कविताओं की इन्हीं अदाओं पर मोहित हूँ। ये कविताएँ क्रांतिकारी नहीं भी हैं तब भी इन कविताओं में एक स्त्री की आग दबी हुई ज़रूर है : छोटी-सी मुनियाँ / खेला करती / लड़कों के ही सारे खेल / गोली, कंचे, गिल्ली-डंडे / पतंगें भी उड़ाती ख़ूब ऊँचे / ढेर सारे सपनों के साथ / पड़ोस की चाचियाँ / शिकायत करतीं अम्माँ से / बिगड़ रही है तुम्हारी बेटी / दिन-दुपहरिया घूमती रहती है / मुहल्ला भर के छोकरों के साथ / समझातीं ऊँच-नीच / किसे पता वही मुनिया / लड़कों से ही कर-कर के मुक़ाबला / जीत लेगी अपने हिस्से के सारे कंचे / गिल्ली-डंडे से मारते हुए / पा लेगी एक मुकाम / और पतंगों के साथ-साथ / पहुँच जाएगी एक ऊँचाई पर ( 'मुनियाँ', पृ. 32-33 )।

     सुषमा सिन्हा की कविताएँ अपने आसपास के जीवन के लिए दुष्कर कुछ भी नहीं रचतीं बल्कि अपने शांत मिज़ाज के हिसाब से जीवन की कठिनाइयाँ दूर करने का भरसक प्रयास करती हैं। यहाँ ऐसा करते हुए सुषमा सिन्हा समकालीन कविता को शैली की कोई नवीनता अथवा प्रतीकों का कोई अनूठापन ना भी दे सकी हैं, लेकिन समकालीन कविता को नई गहराई और व्यापकता ज़रूर देने में सक्षम हुई हैं। एक स्त्री, जिसका जीवन सिर्फ़ अपना जीवन नहीं है, अगर रात के अपने एकांत से कविता के विश्व के लिए करवटें बदल-बदल कर कुम्हार के चाक-सा कुछ-कुछ बढ़िया रच रही हैं तो विश्व-कविता के लिए असंभव में संभव जैसा मैं मानता हूँ। सुषमा सिन्हा के इन्हीं प्रयासों को सराहते हुए समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल लिखते हैं, 'तमाम धूल-धक्कड़ और साहित्य लोक के आंतरिक प्रपंचों से दूर, सुषमा जी ने अपने कौटुम्बिक तथा प्रशासकीय दायित्वों का सफल निर्वाह हुए अपने ही आस-पड़ोस, घर-बार और चतुर्दिक जीवन को उत्तम कविता में बदला है। यहाँ कवि का निजी संसार तो है ही, साथ ही वह कठोर प्रस्तर-जीवन भी है जो झारखंड के आदिवासी-लोक का प्रतिनिधित्व करता है।' यह सच है कि सुषमा सिन्हा की आवाज़ एक नए मौसम के आने की आवाज़ है। यह आवाज़ ऐसी है जो बिना किसी अवरोध के हम तक पहुँचती है : हर रोज़ हम / ना जाने कितनी सीढ़ियाँ चढ़ते हैं / और ना जाने कहाँ-कितनी / उतर जाते हैं, अपने-आप / हर रोज़ हम / ना जाने कितने सपने बुनते हैं / और ना जाने कब कितने सपने / उधड़ जाते हैं, चुपचाप / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी बातें तुमसे करते हैं / और ना जाने कितनी चाहतें / छुपा जाते हैं, ख़ामोशी में / हर रोज़ हम / वक़्त की उँगली थाम / शुरू करते हैं चलना / और वक़्त अपनी उँगली छुड़ा / निकल जाता है हमसे बहुत आगे / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी कोशिशें / करते हैं जीने की / सहेजते रहते हैं जीवन को / सपनों को, तुमको और वक़्त को / जबकि यह जानते हैं हम / कि ख़त्म हो रहा है / धीरे-धीरे सब कुछ / बहुत ही ख़ामोशी से ( 'हर रोज़', पृ. 81-82 )।
शहंशाह आलम


     सुषमा सिन्हा का लहज़ा यानी बोलने का, बातचीत करने का ढंग अपना है, ख़ास है, सलीके वाला है। यही तमीज़, यही शऊर उनकी कविताओं ने उन्हीं से सीख रखा है। एक ख़ास बात यह भी नोट करने वाली है कि सुषमा सिन्हा की आत्मा जितनी पाक-साफ़ है, उनकी कविताएँ उन्हीं की आत्मा जैसी हैं। इसलिए कि सुषमा सिन्हा जिस लफ़्ज़ को छू भर देती हैं, वह नया हो जाता है। इसीलिए मैंने यहाँ लिखा कि सुषमा सिन्हा की आत्मा उनके एक-एक शब्द में छुपी दिखाई मुझे देती है। इसीलिए उनकी कविताएँ अपने पाठ किए जाते समय किसी को तोड़ती नहीं, जोड़ती हुई चलती हैं : अपने घर को, अपने प्रेम को, अपने आस-पड़ोस को, अपने संघर्ष को, अपने अतीत-वर्तमान को और हमारे जीवन के खंडहर को भी। ये कविताएँ बारिश के बाद धुल कर साफ़ हुए मकान की तरह हैं। संग्रह की 'अच्छे दिनों को याद करते हुए', 'रेस', 'एहसास', 'विनाश', 'तुम्हारा सपना', 'संभावनाएँ', 'चौराहा', 'इच्छा', 'सपने', 'माँ' ( दो कविताएँ ), 'घर', 'यादें', 'पानी', 'रास्ता', 'मदद', 'चूल्हा-रोटी-औरत', 'हिम्मत', 'अँधेरा', 'चाहत', 'भीड़', 'सच', 'शक', 'प्रेम का अर्थ', 'डर तो होता है', 'बदलाव', 'ख़बरें', 'आख़िर कब तक', 'रोक', 'असंभव', 'ख़ुशियाँ', 'मृत्यु' आदि कविताएँ हमारे समय को बग़ैर किसी संशय के प्रकट करती हैं और प्रेरित भी। सुषमा सिन्हा अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन का पुनर्संयोजन जिस तरह करती हैं, यह उनके कविता-समय का भी पुनर्संयोजन है। ऐसा इसलिए भी है कि कविता मनुष्य को उसके कठिन दिनों से मुक्ति दिलाने का माध्यम भी है : रेगिस्तान में ओस की बूँद / आँधियों में थरथराता दीया / काली-अँधेरी रात का ध्रुवतारा / हिम्मत देता हुआ / अनजानी-अनचाही / आवाज़ों के बीच / ठहरी-सी एक आवाज़ / घने जंगल से गुज़रती हुई / पतली-सी एक राह / भागते-दौड़ते रास्ते पर / मील का एक पत्थर / एक सुकून देता हुआ / 'जीवन में प्रेम' / बस ऐसा ही तो है ( 'जीवन में प्रेम', पृ. 116 )।
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बहुत दिनों के बाद ( कविता-संग्रह ) / कवि : सुषमा सिन्हा / प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान / 4268/B-3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 / मूल्य ₹ 250
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