रविवार, 19 फ़रवरी 2017

पटना इतिहास की नजर में : अरूण सिंह


ईस्ट इंडिया कंपनी जब हिंदुस्तान में व्यापार करने आयी थी उस वक्त विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 23 फीसदी थी। और जब वे भारत छोड़कर गए तो यह घटकर चार फीसदी से भी कम रह गयी थी। उन्होंने यहां के उद्योगों को भरपूर क्षति पहुंचाई और यहां की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया।
पटना का समृद्ध बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। एक वक्त में ब्रिटिश, डच, डेन और फ्रांसीसियों का पसंदीदा यह शहर धीरे धीरे अपनी महत्ता खोने लगा। पटना और इसके आसपास के गांवों में जहां कभी घर घर में हथकरघे चल रहे थे, धीरे धीरे बंद होने लगे। ओ’ मैली जब 1907 में सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त तक यह सिमट कर रायपुरा (फतुहा) तक ही रह गया था। यहां के बुनकर अभी भी सिल्क से तसर का निर्माण कर रहे थे। इसके साथ ही बुनकर सिल्क और सूती को मिलाकर जिसे बाफ्टा कहते थे, का उत्पादन कर रहे थे। इसकी खपत स्थानीय बाजार में थी और साथ ही इसका निर्यात कलकत्ता तक हो रहा था। इसके सौ वर्ष पहले जब बुकानन यहां सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त यहां के सिल्क का निर्यात पर्शिया के बाजारों तक हो रहा था।
पटना सिटी में बने शीशे के उत्पादों का भी एक वक्त में बड़ा बाजार था। इसका निर्यात यूरोप तक हो रहा था। ओ’ मैली ने गज़ेटियर में पटना सिटी के लोदीकटरा मोहल्ले में शीशे से बने उत्पादों का उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इत्र रखने की शीशियां,बोतलें,लैम्पों और चुड़ियों का निर्माण सोन नदी के बालू और सोड़ा से किया जाता है। इससे शीशे का जो निर्माण होता है वह हरे रंग का और अशुद्ध होता है। लेकिन जो शीशा शुद्ध और सफ़ेद होता है उसका निर्माण रेलवे के टूटे लैम्पों के शीशे से होता है। उसने यूरोपियन शैली के फूलदानों के निर्माण का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि कारीगर फूलदानों के शीशों को रंगने के लिए नीले थोथे, नील के रंग और अन्य सामग्रियों का प्रयोग करते हैं। जबकि शीशे को नीला रंग देने के लिए टिन के ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। उसने इनके निर्माण के प्रक्रिया का भी जिक्र किया है।
पटना सिटी के मारूफगंज मोहल्ले के संगतराशों (पत्थर गढ़ने वाला) का भी उल्लेख ओ’ मैली ने किया है। उसने लिखा है कि जिस बलुआ पत्थर का उपयोग यहां के कारीगर करते हैं वह मिर्जापुरी पत्थर कहलाता है। इन पत्थरों के बड़ी बड़ी सिल्लियों को मिर्ज़ापुर जिले के चुनार और बिंध्याचल से नाव से गंगा नदी के मार्फ़त लाया जाता है। सासाराम और मुंगेर से ग्रेनाइट का भी आयात किया जाता है। इन पत्थरों से देवी देवताओं की मूर्तियां, आटा पीसने वाला जांता, मसाला पीसने वाला सिल-लोढा, कुम्हारों की चक्कियां, पत्थर के प्लेट और कपों का निर्माण होता है। इनकी खपत पटना और देश के दूसरे शहरों में होती है। इनकी मांग लगातार बनी रहती है।
ओ’ मैली ने पटना और दानापुर के बढ़इयों (लकड़ी का काम करने वाले) की दक्षता का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इन कारीगरों द्वारा बनाये गए लकड़ी के खूबसूरत छज्जे, जो दानापुर और पटना की इमारतों की खास पहचान है उनकी कारीगरी के नमूने हैं। इन कारीगरों द्वारा बनाये गए खूबसूरत मजबूत फर्नीचर और आलमारियों का निर्यात देश के दूसरे शहरों में होता है। कुत्ता गाड़ी और पालकियों का निर्माण भी पटना और दानापुर की विशेषता है।
पटना सिटी की सड़कों और गलियों से गुजरते हुए ठहर कर आप पुरानी इमारतों को देखें तो उनमे लगी लकड़ी के खूबसूरत छज्जे आपको अभी भी दिख जायेंगे।
साभार: प्रभात खबर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें