वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां
बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा,
सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफन तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर
लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 176 उपन्यास और इंटरनेशनल खिलाड़ी, सबसे बड़ा खिलाड़ी
समेत कई फिल्मों के लेखक वेद प्रकाश शर्मा आखिरकार 17 फरवरी 2017 को करीबन एक साल से कैंसर से जूझते
हुए अपने पाठकों को अपना अंतिम अलविदा कह गये. साल में दो-तीन नॉवेल लिखने वाले वेद
प्रकाश शर्मा का जन्म 6 जून, 1955 को मेरठ में हुआ जो कि मूलत: मुजफ्फरनगर जिले के बिहरा गांव के
रहने वाले थे.
लगातार आठ –आठ घंटे बिना किसी से मिले
–जुले और बगैर कुछ खाए –पिए लिखने वाले वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास
पढ़ने का शौक था. उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई. उनकी पहली कहानी 1971
में ‘पेनों की जेल’ स्कूल मैग्जीन में
प्रकाशित हुई. वे उस पत्रिका के छात्र संपादक बनाए गए थे. लेकिन उपन्यासकार बनने की कहानी यह
है कि 1972 में जब हाईस्कूल का पेपर देने के बाद गर्मी की छुट्टियों में वे अपने
पैतृक गांव बिहरा गए जहां वे अपने साथ कई उपन्यास भी ले गए. दोस्तों के अभाव में
उन्होंने सिर्फ पढ़ना और लिखना शुरू कर दिया. शुरू में तो जब पिता को मालूम पड़ी तो
खूब खिंचाई हुई लेकिन जब उन्होंने उसे पढ़ा तो अचंभित हो गए. फिर उनके पिता ही स्क्रिप्ट
लेकर प्रेस में कंपोजिंग सिखाने ले गए जहां नामी उपन्यासकारों के नकली उपन्यास
छापने वाले लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के मालिक जंग बहादुर वहां अपने किसी उपन्यास का
प्रूफ देखने आए थे. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद वह पास में रखी स्क्रिप्ट को
पढ़ने लगे. चंद पन्ने पढ़ने के बाद अपने साथ पूरा पढ़ने के लिए ले गए और तीन-चार
घंटे बाद लौटे. वेद प्रकाश के पिता से उन्होंने पूछा, लिखा किसने है? जब उन्हें हकीकत का
पता चला तो तो बोले, पहले बता देते. फिर जंग बहादुर ने उन्हें अपने ऑफिस बुलाया. टेबल
पर 100 रुपए रखते हुए कहा, और लिख, हर नॉवेल के 100 रुपए मिलेंगे. वेद
प्रकाश ने सोचा कि राइटर को और क्या चाहिए, उपन्यास छपेगा, नाम के साथ फोटो
छपेगी लेकिन जंग बहादुर ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया, फोटो तो बहुत दूर
की बात नाम तक छापने से मना कर दिया. उन्होंने टेबल से स्क्रिप्ट उठाई और घर चले
गए. दिसंबर, 1972 में वेद प्रकाश
शर्मा को लगा कि जंग बहादुर सही कह रहे थे. और सीक्रेट फाइल नामक उपन्यास वेद
प्रकाश कांबोज के नाम से छप गया. एक के बाद एक उपन्यास से नकली कांबोज की
लोकप्रियता बढ़ने लगी. माधुरी प्रकाशन ने नाम छापा लेकिन पूरा नहीं. जंग बहादुर ने
आग के बेटे (1973) के पहले पन्ने पर वेद प्रकाश शर्मा का पूरा नाम छापा लेकिन फोटो
फिर भी नहीं छपी. लेकिन उसी साल ज्योति प्रकाशन और माधुरी प्रकाशन दोनों ने नाम के
साथ इनका फोटो भी छापना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उनके उपन्यास 50,000 और फिर एक लाख छपने
लगी. उनके सौवें नॉवेल कैदी नं. 100
की 2,50,000 प्रतियां छपीं थी.
इसके बाद उन्होंने 1985 में खुद अपना प्रकाशन तुलसी पॉकेट बुक्स के नाम से शुरू कर लिया. उनके
कुल 176 उन्यासों में से 70
इसी ने छपे हैं. लेकिन उन्हें सबसे
ज्यादा लोकप्रियता 1993 में वर्दी वाला गुंडा से मिली जिसके बारे में उनका दावा है कि 15 लाख प्रतियां पहली
बार छापी गई थीं. मेरठ शहर के सभी बुक स्टॉल से नॉवेल घंटों में गायब थीं.
प्री-ऑर्डर और अडवांस बुकिंग वाले आज के 'बेस्टसेलर' जमाने से पहले लोग
पहले उनके नॉवेल अडवांस में बुक कराते थे. इनका आखिरी उपन्यास ‘छठी उंगुली’ था जो 6 महीने पहले ही आया
है.
वेदप्रकाश शर्मा ने करीब छह फिल्मों
में स्क्रिन प्ले राइटर भी रहे. तीन नवंबर वर्ष-1993 को रिलीज हुई फिल्म अनाम की पटकथा वेद
प्रकाश शर्मा ने लिखी थी. इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था. इसके बाद 9 जून वर्ष-1995 को रिलीज हुई फिल्म
सबसे बड़ा खिलाड़ी उनके उपन्यास लल्लू पर आधारित थी. इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने
किया था. इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी
थी, जो 26 मार्च 1999 को रिलीज हुई थी. इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास केशव पंडित पर
वर्ष-2010 में टीवी सीरियल भी बना.
उनके उपन्यास समाज से ही जुड़े हुए
होते थे. समाज से जुड़े मुद्दे उनके उपन्यास में अक्सर झलकते थे. यूं कहिए मानवीय
संवेदनाओं से उनके उपन्यास जुड़े रहते थे. 1985 में उन्होंने दहेज की समस्या को अपने
उपन्यास बहू मांगे इंसाफ से उठाया था. बाद में इसी उपन्यास पर शशिलाल नायर के निर्देशन
में बहू की आवाज फिल्म बनी. इसके अलावा दहेज में रिवाल्वर, विधवा का पति नामक
उपन्यास से भी उन्होंने सामाजिक समस्याएं उठाईं.
वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष-1992 व 1994 में मेरठ रत्न
अवार्ड, वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष-2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया. इसके
अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले.
भले ही गंभीर साहित्य वाले हिन्दी के इस लोकप्रिय लेखक
की रचना पर विशेष गौर नहीं फरमाते रहें हो लेकिन उनकी लोकप्रियता के सामने जरूर ही
नतमस्तक थे और शायद रहेंगें भी.

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