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रविवार, 19 दिसंबर 2021

रेणु के पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते।


 *रेणु ने साधारण आदमी में विराट का चित्रण किया -अखिलेश ( संपादक, तद्भव पत्रिका)* 




( पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का दूसरा दिन  )

पटना, 19 दिसम्बर।  पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' के दूसरे दिन की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में  बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे। 


दूसरे दिन की संगोष्ठी का उद्घाटन रेणु के चित्र पर माल्यार्पण करने के साथ हुआ। इस चौथे सत्र का विषय था ‛हिंदी कहानी : परम्परा, प्रयोग और रेणु’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकर और तद्भव पत्रिका के संपादक श्री अखिलेश ने की। इस सत्र की चर्चा की शुरुआत करते हुए दिल्ली से आये चर्चित कथाकार संजय कुंदन ने कहा “ फणीश्वर नाथ रेणु ऐसे कथाकार थे जिन्होंने प्रेमचन्द के ग्रामीण जीवन के सम्पूर्ण वैभव को कथा के संसार में पुनर्स्थापित किया है। वे प्रेमचंद से भिन्न हैं और भिन्न इस मायने में हैं कि उन्होंने कथा लेखन की प्रेमचंदीय शैली को नहीं अपनाया। वे परिवर्तन के हिमायती कथाकार हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में साधारण आदमी के भीतर विराट का चित्रण किया है। "

पटना के चर्चित कथाकार संतोष दीक्षित के अनुसार  “ रेणु ने अपनी कथा में एक ऐसे इलाके के गाँवों के जन जीवन को उदभासित किया है जो बेहद पिछड़ा है। इस इलाके के सांस्कृतिक जीवन की संपूर्ण धड़कन को रेणु की कथाओं में सुना जा सकता है।” 

मुज़्ज़फ़रपुर से आये चर्चित कवि डॉ0 राकेश रंजन ने इस सत्र को संबोधित करते हुए कहा “ रेणु के पात्रों में अदम्य जिजीविषा देखा जा सकता है। उनके पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते। " 


अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री अखिलेश ने कहा “ रेणु देशज आधुनिकता के भाष्यकार थे। वे भी अपनी रचनाओं में अपने समाज की त्रासदी को चित्रित कर रहे थे। लेकिन अपने समकालीनों से भिन्न तरीके से वे इस त्रासदी को चित्रत कर रहे थे। उनकी आधुनिकता में अपने समकालीनों की टूटन और संत्रास की जगह समरसता की भावना थी। समाज के वंचित तबके के प्रति उनका समर्थन था। वे जीवन के उल्लास का जब चित्रित  करते हैं तो उनका मकसद कभी वंचित समूह की समस्याओं को तिरोहित करना नहीं होता। रेणु प्रेमचंद के यथार्थवादी ढाँचे के विरोधी नहीं थे बल्कि उनकी यथार्थवादी परंपरा को वे दुरुस्त करते हैं। " 


इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया। इस सत्र का संचालन पटना वीमेंस कॉलेज के सहाय प्राध्यापक धनंजय कुमार ने किया और कंचन कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।



संगोष्ठी के पाँचवें सत्र के की अध्यक्षता हिंदी के साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने की। इस सत्र के अंतर्गत विभाजित विषय ‛रेणु : विविध रंग’ की शुरुआत करते हुए चर्चित कथाकर अवधेश प्रीत ने कहा “ रेणु समाज के अत्यंत वंचित समूह की लोक संस्कृतियों को अपने रिपोर्ताज का विषय बनाकर राष्ट्रीय फलक पर उभारते हैं। उनके बाढ़ पर की गयी ‛ऋणजल धनजल’ जैसी रिपोर्टिंग की चर्चा खूब होती है। उनके द्वारा बिहार में चले किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग बहुत दिलचस्प है। रेणु को साहित्यिक विधा के रूप में रिपोर्ताज को प्रतिष्ठित करने का श्रेय है।” 


हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा “ रेणु ने लोक नृत्य के वैभव को अपनी कथाओं में बहुत सफलता से समेटा है जबकि लेखक के लिए यह काम बहुत मुश्किल है। उन्होंने कथा लोक को लोक संगीत की संवेदना से भर दिया है। उनका लिखा रिपोर्ताज बहुत सजीव है। वे मूलतः एक्टिविस्ट लेखक हैं।” 


इस सत्र के विभाजित विषय ‛ रेणु और हिंदी सिनेमा’ में फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा “ रेणु की कहानी ‛तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम’ पर बनी फ़िल्म ‛तीसरी कसम’ देखने लायक फ़िल्म है। इस फ़िल्म में रेणु की समस्त रचनात्मक विशेषताओं को शामिल किया गया है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‛मैला आँचल’ पर धारावाहिक भी बनी है।” 


इस सत्र के अध्यक्षीय भाषण में  रेणु के संस्मरण से अपनी बातों की शुरआत करते हुए अरुण कमल ने कहा “  रेणु ने अपने एक रिपोर्ताज में लिखा है कि अरे आलोक तुम ! ये आलोक कवि आलोकधन्वा हैं। हममें रेणु के सबसे करीबी रहे हैं कवि आलोकधन्वा और रामवचन राय। अरुण कमल ने आगे कहा कि रेणु के कथेतर गद्य अयस्क हैं। उनके पास काफी स्मृतियां थीं। उनकी स्मृतियां काल के अहंकार को ध्वस्त करती हैं। रेणु अकेले आँचलिक कथाकर नहीं हैं। दुनिया के समस्त कथाकर, कलाएँ, साहित्य आँचलिक हैं। रेणु की कहानियां जीवन के गहरे रागों से लैश हैं। ये मनुष्य को कभी मरने नहीं देतीं। रेणु इसलिए बड़े लेखक थे कि उनमें धन और सत्ता के प्रति हिकारत की भावना थी। रेणु की कहानियों पर फिल्में नहीं बनायी जा सकतीं क्योंकि ये कहानियां भाषा के लिए रची गयी थीं, फ़िल्म बनाने के लिए नहीं लिखी गयी थीं।” 


सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न भी किया गया। इस सत्र का संचालन शिप्रा प्रभा ने किया। अंत में वाणिज्य महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ0 चंदन कुमार ने किया।




संगोष्ठी के छठे सत्र का का विषय था ‛सुनो कहानी रेणु की।’ इस सत्र में रेणु की तीन कहानियों का अत्यंत रोचक पाठ किया गया। पटना के सुप्रसिद्ध  रंगकर्मी  एवं टीपीएस कॉलेज में  हिंदी के प्रोफ़ेसर डॉ0 जावेद अख्तर खां ने रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‛एक आदिम रात्रि की महक’, रंगकर्मी मोना झा ने ‛संवदिया’ तथा दिल्ली की प्रसिद्ध कथानटी सुमन केशरी ने ‛रसप्रिया’ कहानी का पाठ किया।  सुमन केशरी ने अद्भुत कहानी पाठ किया। कथानटी के कहानी पाठ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

आज के तीनों सत्रों में भी श्रोताओं की उत्साहवर्द्धक उपस्थिति रही।  इस सत्र का संचालन पटना विश्वविद्यालय हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो0 तरुण कुमार ने किया। अंत में प्रो0 कुमार ने वक्ताओं, अतिथियों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं को इस सार्थक आयोजन को सफल बनाने में अप्रतिम सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और संगोष्ठी के समापन की घोषणा की।

आज के कार्यक्रम में मौजूद लोगों में प्रमुख थे पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा, डॉ0 कुमारी विभा, सुप्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा, प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ0 विनय कुमार, गजेन्द्र कांत शर्मा, जयप्रकाश, राजकुमार शाही, ग़ालिब, सुनील सिंह, डॉ0 बेबी कुमारी, प्रो0 वीरेंद्र झा,गोपाल शर्मा, डॉ0 दिलीप राम, योगेश प्रताप शेखर, संजीश शर्मा, डॉ0 सुलोचना, डॉ0 चुन्नन कुमारी, उज्ज्वल कान्त, सुशांत कुमार, उचित कुमार यादव आदि।

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का आयोजन




 पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में   बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

उदघाटन सत्र में   माननीय शिक्षा मंत्री  विजय कुमार चौधरी , सुप्रसिद्ध साहित्यालोचक व लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पटना विश्वविद्यालय  के कुलपति गिरीशचन्द्र चौधरी ,  प्रख्यात कवि आलोकधन्वा,  विधानपार्षद व आलोचक रामवचन राय, पद्मश्री उषाकिरण  खान उपस्थित थे।  विषय प्रवर्तन   राष्टीय संगोष्ठी के परिकल्पक एवं पटना विश्विद्यालय हिंदी विभागध्यक्ष तरुण कुमार ने किया। पहले सत्र का विषय था ' रेणु होने का अर्थ'।

स्वागत भाषण करते हुए पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा ने कहा कि "पटना कॉलेज के छात्रों को अपने अतीत के साथ जुड़ाव रखना चाहिये क्योंकि बिहार में जो श्रेष्ठ उसके निर्माण में पटना कॉलेज की अहम भूमिका रही है।” 

 शिक्षा मंत्री श्री विजय कुमार चौधरी आने वक्तव्य की शुरुआत पटना कॉलेज के अपने छात्र जीवन की स्मृति से की और रेणु होने अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा "  रेणु होने का अर्थ अपनी जमीन से जुड़ाव होना है। वे अपने सामाजिक राजनीतिक अनुभवों को व्यवहार में सीखने के हिमायती थे। रेणु जी का ही कथन है कि जूता पहनकर देखना चाहिए कि जूता काटता कहाँ है। रेणु ने अपने इस कथन की आजमाइश की थी। वे लेखन से लेकर राजनीति तक में स्वयं अनुभव हासिल किया था। हम चले जायेंगे लेकिन रेणु का साहित्य बचा रहेगा। रेणु के साहित्य को बचाना हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है। हमारी पीढ़ी को रेणु का साहित्य बचायेगा।” 

विशिष्ट अतिथि के रूप में पटना विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष व निवर्तमान विधान पार्षद रामवचन राय ने रेणु होने के अर्थ को समझाते हुए कहा कि "रेणु ऐसे लेखक थे जो बोलते कम, लिखते ज्यादा थे। उनका मानना था कि लेखक के सामने अभिव्यक्ति का संकट कभी नहीं होता, लेखक अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाश लेता है। रेणु के पास कहानी की बड़ी दुनिया थी, इसलिए उन्होंने कहानी कहने के लिए सबसे पहले उपन्यास लिखना चुना। वे लोकतंत्र की तीन-तीन लड़ाइयां लड़ चुके थे।” रेणु होने का अर्थ है जोखिम लेना होता है। 

उषा किरण खान ने कहा कि " हमारी पीढ़ी की कथाभूमि रेणु की कहानी की ही कथाभूमि है। रेणु के लेखन ने परमपरागत बिम्बों और नायिकाओं की अवधारणाएं बदल कर रख दिया।” 

चर्चित कवि आलोकधन्वा ने कहा कि " रेणु जैसा बड़ा लेखक किसी समाज को विरले ही मिलता है। रेणु को हम ऐसे समय में याद कर रहे हैं जिस समय में संवेदनशील आदमी आंसुओं से भरा हुआ है और रो भी नहीं सकता। रेणु संसदीय लोकतंत्र के अग्रणी प्रहरी थे। उनका लेखन संसदीय लोकतंत्र की रक्षा और उनका जीवन लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में रहा है। रेणु का रूप परिवर्तनकारी रहा है।” 

प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा “ रेणु उन लेखकों में से हैं जो जिनकी कहानियां अपने घर लौटने का संदेश देती हैं।  वे जीवन भर लेखक रहते हुए एक्टिविस्ट भी रहे। वे चुनाव में भी हिस्सा लेने वाले लेखक थे और जुलूस में भी। आज रेणु होने का अर्थ है कि समाज और लेखन परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। रेणु महत्वपूर्ण और प्रभावी लेखक इसलिए हैं कि वे बिना किसी हो-हंगामा के संस्कृति का रेखांकन करते चलते हैं।

पटना विश्विद्यालय के कुलपति  गिरीशचन्द्र चौधरी ने कहा “ रेणु के जन्मशती पर एक बड़े आयोजन की जरूरत थी, हिंदी विभाग इसे पूरा किया। रेणु इतने बड़े लेखक थे कि उनकी कहानियों को आज की पीढ़ी भी बहुत चाव से पढ़ती है। 

 इस सत्र का संचालन  प्रोफ़ेसर दिलीप राम   ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन में पटना कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ0 कुमारी विभा ने किया।


उदघाटन सत्र के पश्चात दूसरे स्त्र का विषय था 'लोक-रंग और रेणु का कथाशिल्प '। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो0 जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की। 

 इस सत्र में रांची से आये उपन्यासकार रणेन्द्र ने कहा “ रेणु ने अपने कथा साहित्य में अपने समाज के विविध रूपों को चित्रित किया है। उन्होंने अपनी कथा में भारतीयता की खोज की है। निम्नवर्गीय समाज के जीवन संघर्षों को रचनात्मक रूप में लाया है। उनके समय के अपने ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जो उनसे छूट गये हैं जिसे समेटने की जवाबदेही हमारी है।” 

बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में हिंदी  के प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा “ रेणु के कथाशिल्प पर हिंदी के कथाकर प्रेमचंद के प्रभाव के साथ बाँग्ला के रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचन्द्र, बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय का प्रभाव भी देखा जाना चाहिये। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों की तरह सामाजिक और यथार्थवादी हैं। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों से आगे सांस्कृतिक है। रेणु की आंचलिकता का विमर्श बहुत भ्रामक है। इसी तरह उन्हें लोकरंग का कथाकर मान लेना भी भ्रामक है। रेणु के कथाशिल्प में गाँव अन्तरग्रथित है। "

जम्मू से आयी कथाकार  प्रत्यक्षा ने कहा “ रेणु राजनीतिक विषयों पर भी बहुत रोमैंटिक होकर लिखते हैं। जुलूस उनकी बहुत प्रिय किताब है।  इसमें अपने घर तलाशने की कहानी लिखते है।"

 इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया।  इस सत्र का संचालन पटना कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक मार्तण्ड प्रगल्भ ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो इन्द्रनारायण ने किया। 


तीसरे  सत्र विषय था '1950 का राष्ट्रीय परिदृश्य और रेणु के उपन्यास'


तीसरे सत्र के आरंभ में दिल्ली के आशुतोष कुमार ने कहा कि “ रेणु अंचल में बनने वाली कहानी को राष्ट्र की कहानी बनाना चाहते थे। वे अंचल की कहानी को राष्ट्रीय कहानी का विरोधी नहीं बताते बल्कि अंचल में प्रवेश करने वाली राष्ट्रीय कहानी को अंचल की कहानी बनाते हैं। रेणु यथार्थ के जिस रूप को अपनी कहानियों में कहना चाहते थे उस रूप को प्रेमचंद की शैली में नहीं कह सकते थे। 


चर्चित कथाकार गीताश्री ने कहा “ रेणु जिस दौर में लेखन कर रहे थे उसी दौर में महिलाओं को पहचान मिल रही थी। रेणु की रचनाओं में अपनी पहचान के लिए महिलाओं के उस तरह संघर्ष नहीं मिलता जिस तरह आज के स्त्रीवाद लेखन में मिलता है। लेकिन महिलाओं की पहचान को उन्होंने नज़रअंदाज़ नहीं किया है। रेणु की रचनाओं में अधिकांश महिला पात्र यौन शोषण का शिकार हैं पर रेणु इन महिला पात्रों के इन स्थितियों में अनुकूलन के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। "

मुज़्ज़फ़रपुर से आईं चर्चित कथाकार पूनम सिंह ने कहा " 50 का दशक पूर्णिया काला पानी की तरह था। रेणु यथार्थ वादी लेखक थे। मैला आँचल को किसान आंदोलन के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। किसान आंदोलन ने मैला आँचल के वैश्विक रूप के परचम को लहराता है। संथालों को जमीन से बेदखल कर दिए जाने के सवाल को भी रेणु उठाते हैं। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन भी होता है। सरकारें भूमिसुधार की बातें तो करती हैं लेकिन उसे लागू नहीं करती। दीर्घतपा उपन्यास का सवाल आज भी खड़ा है। शेल्टर होम में महिलाओं का शोषण आजभी जारी है। रेणु जुलूस में विस्थापन के प्रश्न को उठाते हैं। आज अपने देश सीएए और एनआरसी के द्वारा लोगों को विस्थापित किया जा रहा है।" 

इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए चर्चित कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर  ने इस दो दिवसीय आयोजन के लिए  बधाई देते हुए कहा " मैला आंचल पहली बार समता प्रकाशन पटना से छपा था। रेणु मैला आंचल में पोएटिक हो गए हैं। रेणु के उपन्यास में सिर्फ यथार्थ ही नहीं सपने भी हैं। रेणु भारतमाता के आंसू पोछना चाहते हैं लेकिन असमर्थ हैं। रेणु जी नेपाली क्रांति में सशत्र रूप से भाग लिया तथा 1950 में वहां से लौटे। रेणु जी से यह भूल हो गई कि उन्होंने 'मैला आँचल' को आंचलिक उपन्यास कह डाला। इस बात की स्वीकारोक्ति  लोठार लुतसे से इंटरव्यू में की थी।" 

 इस सत्र का  संचालन  डॉ पीयूष राज ने जबकि  धन्यवाद ज्ञापन मगध विश्विद्यालय हिंदी विभाग की  प्रो अरुणा ने किया।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को  रज़ा फाउंडेशन  नई दिल्ली तथा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का सहयोग प्राप्त हुआ था। 

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में शहर के प्रमुख बुद्धिजीवियों में शामिल थे  साहित्य अकादमी से समानित कवि अरुण कमल,    बिहार विरासत विकास समिति के विजय कुमार चौधरी, तद्भव के संपादक  अखिलेश,  सुमन केशरी,  पटना विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति रासबिहारी सिंह, कथाकारअवधेश प्रीत,  कथाकार सन्तोष दीक्षित,  कथाकार हृषीकेश सुलभ, कवि कुमार मुकुल, डॉ कंचन,   योगेश प्रताप शेखर,  निवेदिता झा,   सुनीता गुप्ता, वीरेंद्र झा,  सुनील सिंह,  राकेश रंजन,  बी.एन विश्वकर्मा, अनीश अंकुर, रँगकर्मी जयप्रकाश, गजेन्द्रकांत शर्मा,  गौतम गुलाल,   वेंकटेश, विद्याभूषण, श्रीधर करुणानिधि,  डॉ राकेश शर्मा,   गोपाल शर्मा,  सुनील झा,  कुणाल, अनीश,  संजय कुंदन, डॉ गुरुचरण, रामरतन, अनुज, सुनील, अशोक क्रांति, इंद्रजीत आदि।

शनिवार, 4 मार्च 2017

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी रसप्रिया

आँचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने 'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। 'बटबाबा' 'साप्ताहिक विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक विश्वमित्र' में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। 'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां', आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है।
अपनी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने आंचलिक जीवन के हर धुन, हर गंध, हर लय, हर ताल, हर सुर, हर सुंदरता और हर कुरूपता को शब्दों में बांधने की सफल कोशिश की है। उनकी भाषा-शैली में एक जादुई सा असर है जो पाठकों को अपने साथ बांध कर रखता है। रेणु एक अद्भुत किस्सागो थे और उनकी रचनाएँ पढते हुए लगता है मानों कोई कहानी सुना रहा हो. ग्राम्य जीवन के लोकगीतों का उन्होंने अपने कथा साहित्य में बड़ा ही सर्जनात्मक प्रयोग किया है।
आज पढ़ते हैं फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी "रसप्रिया"


धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख कर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई - अपरूप-रूप!

चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया की मुँह से निकल पड़ा - अपरुप-रुप!

...खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुंदरता!

मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गईं।

मोहना ने मुस्करा कर पूछा, 'तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई है, है न?'

'ऐ!' - बूढ़े मिरदंगिया ने चौंकते हुए कहा, 'रसपिरिया?

...हाँ ...नहीं। तुमने कैसे ...तुमने कहाँ सुना बे...?'

'बेटा' कहते-कहते रुक गया। ...परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से 'बेटा' कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेर कर मारपीट की तैयारी की थी - 'बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेर कर! ...मृदंग फोड़ दो।'

मिरदंगिया ने हँस कर कहा था, 'अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा!'

बच्चे खुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्‌डी पकड़ कर वह बोला था, 'क्यों, ठीक है न बाप जी?'
बच्चे ठठा कर हँस पड़े थे।

लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देख कर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है।

'रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? ...बोलो बेटा!'
दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। ...कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।

मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। ...आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ-साफ कह दिया - 'तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?'

हाँ, यह जीना भी कोई जीना है! निर्लज्जता है, और थेथरई की भी सीमा होती है। ...पंद्रह साल से वह गले में मृदंग लटका कर गाँव-गाँव घूमता है, भीख माँगता है। ...दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं है, मृदंग क्या बजाएगा! अब तो, 'धा तिंग धा तिंग' भी बड़ी मुश्किल से बजाता है। ...अतिरिक्त गाँजा-भाँग सेवन से गले की आवाज विकृत हो गई है। किंतु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की वह चेष्टा अवश्य करेगा। ...फूटी भाथी से जैसी आवाज निकलती है, वैसी ही आवाज-सों-य,सों-य!

पंद्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाम की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुंडन-छेदन आदि शुभ कार्यों में विदपतिया मंडली की बुलाहट होती थी। पँचकौड़ी मिरदंगिया की मंडली ने सहरसा और पूर्णिया जिले में काफी यश कमाया है। पँचकौड़ी मिरदंगिया को कौन नहीं जानता! सभी जानते हैं, वह अधपगला है! ...गाँव के बड़े-बूढ़े कहते हैं - 'अरे, पँचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक जमाना था!'
इस जमाने में मोहना-जैसा लड़का भी है - सुंदर, सलोना और सुरीला! ...रसप्रिया गाने का आग्रह करता है, 'एक रसपिरिया गाओ न मिरदंगिया!'

'रसपिरिया सुनोगे? ...अच्छा सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने...'

'हे-ए-ए-हे-ए... मोहना, बैल भागे...!' एक चरवाहा चिल्लाया, 'रे मोहना, पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू!'
'अरे बाप!' मोहना भागा।

कल ही करमू ने उसे बुरी तरह पीटा है। दोनों बैलों को हरे-हरे पाट के पौधों की महक खींच ले जाती है बार-बार। ...खटमिट्ठाल पाट!

पँचकौड़ी ने पुकार कर कहा, 'मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठता हूँ। तुम बैल हाँक कर लौटो। रसपिरिया नहीं सुनोगे?'
मोहना जा रहा था। उसने उलट कर देखा भी नहीं।
रसप्रिया!

विदापत नाचवाले रसप्रिया गाते थे। सहरसा के जोगेंदर झा ने एक बार विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी। मेले में खूब बिक्री हुई थी रसप्रिया पोथी की। विदापत नाचवालों ने गा-गा कर जनप्रिया बना दिया था रसप्रिया को।

खेत के 'आल' पर झरजामुन की छाया में पँचकौड़ी मिरदंगिया बैठा हुआ है, मोहना की राह देख रहा है। ...जेठ की चढ़ती दोपहरी में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। ...कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है! पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था। ...पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-हरे पौधों से एक खास किस्म की गंध निकलती है। तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी - रस की डाली। वे गाने लगते थे बिरहा, चाँचर, लगनी। खेतों में काम करते हुए गानेवाले गीत भी समय-असमय का खयाल करके गाए जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर और लगनी-
'हाँ... रे, हल जोते हलवाहा भैया रे...'

खुरपी रे चलावे... म-ज-दू-र!

एहि पंथे, धनी मोरा हे रुसलि...।

खेतों में काम करते हलवाहों और मजदूरों से कोई बिरही पूछ रहा है, कातर स्वर में - उसकी रुठी हुई धनी को इस राह से जाते देखा है किसी ने?...

अब तो दोपहरी नीरस कटती है, मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।

आसमान में चक्कर काटते हुए चील ने टिंहकारी भरी - टिं...ई...टिं-हि-क!

मिरदंगिया ने गाली दी - 'शैतान!'

उसको छोड़ कर मोहना दूर भाग गया है। वह आतुर होकर प्रतीक्षा कर रहा है। जी करता है, दौड़ कर उसके पास चला जाए। दूर चरते हुए मवेशियों के झुंडों की ओर बार-बार वह बेकार देखने की चेष्टा करता है। सब धुँधला!

उसने अपनी झोली टटोल कर देखा - आम हैं, मूढ़ी है। ...उसे भूख लगी। मोहन के सूखे मुँह की याद आई और भूख मिट गई।

मोहना-जैसे सुंदर, सुशील लड़कों की खोज में ही उसकी जिंदगी के अधिकांश दिन बीते हैं। ...विदापत नाच में नाचनेवाले 'नटुआ' का अनुसंधान खेल नहीं। ...सवर्णों के घर में नहीं, छोटी जाति के लोगों के यहाँ मोहना-जैसे लड़की-मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर जदा जदा हि...
मैथिल ब्राह्मणों, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापतवालों की बड़ी इज्जत होती थी। ...अपनी बोली - मिथिलाम - में नटुआ के मुँह से 'जनम अवधि हम रुप निहारल' सुन कर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मंडली का 'मूलगैन' नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था - ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजा कर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए।

'ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न?'

'मधुकांत ठाकुर की बेटी की तरह...।'

'नः! छोटी चंपा-जैसी सुरत है!'

पँचकौड़ी गुनी आदमी है। दूसरी-दूसरी मंडली में मूलगैन और मिरदंगिया की अपनी-अपनी जगह होती है। पँचकौड़ी मूलगैन भी था और मिरदंगिया भी। गले में मृदंग लटका कर बजाते हुए वह गाता था, नाचता था। एक सप्ताह में ही नया लड़का भाँवरी दे कर परवेश में उतरने योग्य नाच सीख लेता था।

नाच और गाना सिखाने में कभी कठिनाई नहीं हुई, मृदंग के स्पष्ट 'बोल' पर लड़कों के पाँव स्वयं ही थिरकने लगते थे। लड़कों के जिद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिली में और भी शहद लपेट कर वह फुसलाता...

'किसन कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है। ...अरे, जाचक कहो या दसदुआरी। चोरी डकैती और आवारागर्दी से अच्छा है। अपना-अपना 'गुन' दिखा कर लोगों को रिझा कर गुजारा करना।'

एक बार उसे लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी। ...बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि ...बहुत पुरानी बात है।

पुरानी ही सही, बात तो ठीक है।

'रसपिरिया बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न?'

मोहना न जाने कब लौट आया।

मिरदंगिया के चेहरे पर चमक लौट आई। वह मोहना की ओर एक टकटकी लगा कर देखने लगा ...यह गुणवान मर रहा है। धीरे-धीरे, तिल-तिल कर वह खो रहा है। लाल-लाल होठों पर बीड़ी की कालिख लग गई है। पेट में तिल्ली है जरुर!...
मिरदंगिया वैद्य भी है। एक झुंड बच्चों का बाप धीरे-धीरे एक पारिवारिक डॉक्टर की योग्यता हासिल कर लेता है। ...उत्सवों के बासीटटका भोज्यान्नों की प्रतिक्रिया कभी-कभी बहुत बुरी होती। मिरदंगिया अपने साथ नमक-सुलेमानी, चानमार-पाचन और कुनैन की गोली हमेशा रखता था। ...लड़कों को सदा गरम पानी के साथ हल्दी की बुकनी खिलाता। पीपल, काली मिर्च, अदरक वगैरह को घी में भून कर शहद के साथ सुबह-शाम चटाता। ...गरम पानी!
पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए मिरदंगिया बोला, 'हाँ, गरम पानी! तेरी तिल्ली बढ़ गई है, गरम पानी पियो।'
'यह तुमने कैसे जान लिया? फारबिसगंज के डागडरबाबू भी कह रहे थे, तिल्ली बढ़ गई है। दवा...।'

आगे कहने की जरूरत नहीं। मिरदंगिया जानता है, मोहना-जैसे लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है! क्या होगा पूछ कर, कि दवा क्यों नहीं करवाते!

'माँ, भी कहती है, हल्दी की बुकनी के साथ रोज गरम पानी। तिल्ली गल जाएगी।'

मिरदंगिया ने मुस्करा कर कहा, 'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ!'
केले के सूखे पतले पर मूढ़ी और आम रख कर उसने बड़े प्यार से कहा, 'आओ, एक मुट्ठी खा लो।'

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

किंतु मोहना की आँखों से रह-रह कर कोई झाँकता था, मूढ़ी और आम को एक साथ निगल जाना चाहता था। ...भूखा, बीमार, भगवान!

'आओ, खा लो बेटा! ...रसपिरिया नहीं सुनोगे?'

माँ के सिवा, आज तक किसी अन्य व्यक्ति ने मोहना को इस तरह प्यार से कभी परोसे भोजन पर नहीं बुलाया।

...लेकिन, दूसरे चरवाहे देख लें तो माँ से कह देगें। ...भीख का अन्न!

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

मिरदंगिया अप्रतिभ हो जाता है। उसकी आँखें फिर सजल हो जाती हैं। मिरदंगिया ने मोहना - जैसे दर्जनों सुकुमार बालकों की सेवा की है। अपने बच्चों को भी शायद वह इतना प्यार नहीं दे सकता। ...और अपना बच्चा! हूँ! ...अपना-पराया? अब तो सब अपने, सब पराए।...

'मोहना!'

'कोई देख लेगा तो?'

'तो क्या होगा?'

'माँ से कह देगा। तुम भीख माँगते हो न?'

'कौन भीख माँगता है?' मिरदंगिया के आत्म-सम्मान को इस भोले लड़के ने बेवजह ठेस लगा दी। उसके मन की झाँपी में कुडंलीकार सोया हुआ साँप फन फैला कर फुफकार उठा, 'ए-स्साला! मारेंगे वह तमाचा कि...

'ऐ! गाली क्यों देते हो!' मोहना ने डरते-डरते प्रतिवाद किया।
वह उठ खड़ा हुआ, पागलों का क्या विश्वास।

आसमान में उड़ती हुई चील ने फिर टिंहकारी भरी ...टिंही ...ई ...टिं-टिं-ग!

'मोहना!' मिरदंगिया की अवाज गंभीर हो गई।
मोहना जरा दूर जा कर खड़ा हो गया।

'किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ? मिरदंग बजा कर, पदावली गा कर, लोगों को रिझा कर पेट पालता हूँ। ...तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है यह। भीख का ही फल है यह। ...मै नहीं दूँगा। ...तुम बैठो, मैं रसपिरिया सुना दूँ।'

मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत हो रहा है। ...आसमान में उड़नेवाली चील अब पेड़ की डाली पर आ बैठी है। ...टिं-टिं-हिं टिंटिक!

मोहना डर गया। एक डग, दो डग ...दे दौड़। वह भागा।
एक बीघा दूर जा कर उसने चिल्लाकर कहा, 'डायन ने बान मार कर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर दी है। झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय...'

'ऐं! कौन है यह लड़का? कौन है यह मोहना? ...रमपतिया भी कहती थी, डायन ने बान मार दिया है।'

'मोहना!'

मोहना ने जाते-जाते चिल्ला कर कहा, 'करैला!' अच्छा, तो मोहना यह भी जानता है कि मिरदंगिया 'करैला' कहने से चिढ़ता है! ...कौन है यह मोहना?

मिरदंगिया आतंकित हो गया। उसके मन में एक अज्ञात भय समा गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसमें कमलपुर के बाबुओं के यहाँ जाने का उत्साह भी नहीं रहा। ...सुबह शोभा मिसर के लड़के ने ठीक ही कहा था।

उसकी आँखों में आँसू झरने लगे।

जाते-जाते मोहना डंक मार गया। उसके अधिकांश शिष्यों ने ऐसा ही व्यवहार किया है उसके साथ। नाच सीख कर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजनेवाले एक-एक लड़के की बातें उसे याद हैं।

सोनमा ने तो गाली ही दी थी - 'गुरुगिरी कहता है, चोट्टा!'
रमपतिया आकाश की ओर हाथ उठा कर बोली थी - 'हे दिनकर! साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसला कर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर नहीं था। हे सुरुज भगवान! इस दसदुआरी कुत्ते का अंग-अंग फूट कर...।'
मिरदंगिया ने अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लंबी साँस ली। ...रमपतिया? जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया! जिस दिन वह पहले-पहल जोधन की मंडली में शामिल हुआ था - रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी। ...बाल-विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वह गुनगुनाती - 'नव अनुरागिनी राधा, किछु नाँहि मानय बाधा।'...मिरदंगिया मूलगैनी सीखने गया था और गुरु जी ने उसे मृदंग थमा दिया था... आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरु जी ने स्वजात पँचकौड़ी से रमपतिया के चुमौना की बात चलाई तो मिरदंगिया सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरु जी से उसने अपनी जात छिपा रखी थी।

रमपतिया से उसने झूठा परेम किया था। गुरु जी की मंडली छोड़ कर वह रातों-रात भाग गया। उसने गाँव आ कर अपनी मंडली बनाई, लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा। ...लेकिन, वह मूलगैन नहीं हो सका कभी। मिरदंगिया ही रहा सब दिन। ...जोधन गुरु जी की मृत्यु के बाद, एक बार गुलाब-बाग मेले में रमपतिया से उसकी भेंट हुई थी। रमपतिया उसी से मिलने आई थी। पँचकौड़ी ने साफ जवाब दे दिया था - 'क्या झूठ-फरेब जोड़ने आई है? कमलपुर के नंदूबाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नंदूबाबू का घोड़ा बारह बजे रात को...।' चीख उठी थी रमपतिया - पाँचू! ...चुप रहो!'

उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उँगली टेढ़ी हो गई थी। मृदंग पर जमनिका दे कर वह परबेस का ताल बजाने लगा। नटुआ ने डेढ़ मात्रा बेताल हो कर प्रवेश किया तो उसका माथा ठनका। परबेस के बाद उसने नटुआ को झिड़की दी - 'एस्साला! थप्पड़ों से गाल लाल कर दूँगा।'...और रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट गई। मिरदंगिया ने ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा की। मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठी, दाहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगे और तल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो गई। झूठी टेढ़ी उँगली! ...हमेशा के लिए पँचकौड़ी की मंडली टूट गई। धीरे-धीरे इलाके से विद्यापति-नाच ही उठ गया। अब तो कोई भी विद्यापति की चर्चा भी नहीं करते हैं। ...धूप-पानी से परे, पँचकौड़ी का शरीर ठंडी महफिलों में ही पनपा था... बेकार जिंदगी में मृदंग ने बड़ा काम दिया। बेकारी का एकमात्र सहारा - मृदंग!
एक युग से वह गले में मृदंग लटका कर भीख माँग रहा है - धा-तिंग, धा-तिंग!

वह एक आम उठा कर चूसने लगा - लेकिन, लेकिन, ...लेकिन ...मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई?
उँगली टेढ़ी होने की खबर सुन कर रमपतिया दौड़ी आई थी, घंटों उँगली को पकड़ कर रोती रही थी - 'हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की? उसका बुरा हो। ...मेरी बात लौटा दो भगवान! गुस्से में कही हुई बातें। नहीं, नहीं। पाँचू, मैंने कुछ भी नहीं किया है। जरुर किसी डायन ने बान मार दिया है।'
मिरदंगिया ने आँखें पोंछते हुए सूरज की ओर देखा। ...इस मृदंग को कलेजे से सटा कर रमतपिया ने कितनी रातें काटी हैं! ...मिरदंग को उसने अपने छाती से लगा लिया।
पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील ने उड़ते हुए जोड़े से कहा - टिं-टिं-हिंक्‌!

'एस्साला!'उसने चील को गाली दी। तंबाकू चुनिया कर मुँह में डाल ली और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगा - धिरिनागि, धिरिनागि, धिरिनागि-धिनता!

पूरी जमनिका वह नहीं बजा सका। बीच में ही ताल टूट गया।
-अ‌‌‌-कि-हे-ए-ए-हा-आआ-ह-हा!

सामने झरबेरी के जंगल के उस पार किसी ने सुरीली आवाज में, बड़े समारोह के साथ रसप्रिया की पदावली उठाई -
'न-व-वृंदा-वन, न-व-न-व-तरु-ग-न, न-व-नव विकसित फूल...'

मिरदंगिया के सारे शरीर में एक लहर दौड़ गई उसकी उँगलियाँ स्वयं ही मृदंग के पूरे पर थिरकने लगीं। गाय-बैलों के झुंड दोपहर की उतरती छाया में आ कर जमा होने लगे।
खेतों में काम करनेवालों ने कहा, 'पागल है। जहाँ जी चाहा, बैठ कर बजाने लगता है।'

'बहुत दिन के बाद लौटा है।'

'हम तो समझते थे कि कहीं मर-खप गया।'
रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर आ कर कट गई। मिरदंगिया का पागलपन अचानक बढ़ गया। वह उठ कर दौड़ा। झरबेरी की झाड़ी के उस पार कौन है? कौन है यह शुद्ध रसप्रिया गानेवाला? इस जमाने में रसप्रिया का रसिक...? झाड़ी में छिप कर मिरदंगिया ने देखा, मोहना तन्मय होकर दूसरे पद की तैयारी कर रहा है। गुनगुनाहट बंद करके उसने गले को साफ किया। मोहना के गले में राधा आ कर बैठ गई है! ...क्या बंदिश है!

'न-वी-वह नयनक नी...र!

आहो...पललि बहए ताहि ती...र!'
मोहना बेसुध होकर गा रहा था। मृदंग के बोल पर वह झूम-झूम कर गा रहा था। मिरदंगिया की आँखें उसे एकटक निहार रही थीं और उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल हो रही थीं। ...चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगा। ...रह-रह कर वह अपनी विकृत आवाज में पदों की कड़ी धड़ता - फोंय-फोंय, सोंय-सोंय!

धिरिनागि-धिनता!

'दुहु रस...म...य तनु-गुने नहीं ओर।

लागल दुहुक न भाँगय जो-र।'
मोहना के आधे काले और आधे लाल होंठों पर नई मुस्कराहट दौड़ गई। पद समाप्त। करते हुए वह बोला, 'इस्स! टेढ़ी उँगली पर भी इतनी तेजी?'

मोहना हाँफने लगा। उसकी छाती की हड्डियाँ!
...उफ! मिरदंगिया धम्म से जमीन पर बैठ गया - 'कमाल! कमाल!...किससे सीखे? कहाँ सीखी तुमने पदावली? कौन है तुम्हारा गुरु?'

मोहना ने हँस कर जवाब दिया, 'सीखूँगा कहाँ? माँ तो रोज गाती है। ...प्रातकी मुझे बहुत याद है, लेकिन अभी तो उसका समय नहीं।'

'हाँ बेटा! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जाएगा। ...समय-कुसमय का भी खयाल रखना। लो,अब आम खालो।'

मोहना बेझिझक आम ले कर चूसने लगा।

'एक और लो।'

मोहना ने तीन आम खाए और मिरदंगिया के विशेष आग्रह पर दो मुट्ठी मूढ़ी भी फाँक गया।

'अच्छा, अब एक बात बताओगे मोहना! तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं?'

'बाप नहीं है, अकेली माँ है। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती है।'

'और तुम नौकरी करते हो! किसके यहाँ?'

'कमलपुर के नंदूबाबू के यहाँ।'

'नंदूबाबू के यहाँ?'

मोहना ने बताया उसका घर सहरसा में है। तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया। उसकी माँ उसे ले कर अपने ममहर आई है... कमलपुर।

'कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं?'

मिरदंगिया कुछ देर तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहा।

...नंदूबाबू - मोहना - मोहना की माँ!

'डायनवाली बात तुम्हारी माँ कह रही थी?'

'हाँ।'

'और एक बार सामदेव झा के यहाँ जनेऊ में तुमने गिरधर-पटटी मडंलीवालों का मिरदंग छीन लिया था।

...बेताला बजा रहा था। ठीक है न?'

मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफेद हो गई। उसने अपने को सम्हाल कर पूछा, 'तुम्हारे बाप का नाम क्या है?'

'अजोधादास!'

'अजोधादास?'

बूढ़ा अजोधादास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर। ...मंडली में गठरी ढोता था। बिना पैसा का नौकर बेचारा अजोधादास!

'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।' एक लंबी साँस ले कर मिरदंगिया ने अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकला। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोल कर कागज की एक पुड़िया निकाली उसने।

मोहना ने पहचान लिया - 'लोट? क्या है, लोट?'

'हाँ, नोट है।'

'कितने रुपएवाला है? पचटकिया। ऐं... दसटकिया? जरा छूने दोगे? कहाँ से लाए?' मोहना एक ही साँस में सब कुछ पूछ गया, 'सब दसटकिया हैं?'

'हाँ, सब मिला कर चालीस रुपए हैं।' मिरदंगिया ने एक बार इधर-उधर निगाहें दौड़ाई, फिर फुसफुसा कर बोला, 'मोहना बेटा! फारबिसगंज के डागडरबाबू को दे कर बढ़िया दवा लिखा लेना। ...खट्ट-मिट्ठा परहेज़ करना। ...गरम पानी जरुर पीना।'

'रुपए मुझे क्यों देते हो?'

'जल्दी रख ले, कोई देख लेगा।'

मोहना ने भी एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। उसके होंठों की कालिख और गहरी हो गई।

मिरदंगिया बोला, 'बीड़ी-तंबाकू भी पीते हो? खबरदार!'
वह उठ खड़ा हुआ।

मोहना ने रुपए ले लिए।

'अच्छी तरह गाँठ बाँध ले। माँ से कुछ मत कहना।'
'और हाँ, यह भीख का पैसा नहीं। बेटा, यह मेरी कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के...।'

मिरदंगिया ने जाने के लिए पाँव बढ़ाया।

'मेरी माँ खेत में घास काट रही है। चलो न!' मोहना ने आग्रह किया।

मिरदंगिया रुक गया। कुछ सोच कर बोला, 'नहीं मोहना! तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा पा कर तुम्हारी माँ 'महारानी' हैं, मैं महाभिखारी दसदुआरी हूँ। जाचक, फकीर...! दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना।'

मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नंदूबाबू की आँखों-जैसी हैं...।

'रे-मो-ह-ना-रे-हे! बैल कहाँ हैं रे?'

'तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद।'

'हाँ। तुमने कैसे जान लिया?'

'रे-मोहना-रे-हे!'

एक गाय ने सुर-में-सुर मिला कर अपने बछड़े को बुलाया।
गाय-बैलों के घर लौटने का समय हो गया। मोहना जानता है, माँ बैल हाँक कर ला रही होगी। झूठ-मूठ उसे बुला रही है। वह चुप रहा।

'जाओ।' मिरदंगिया ने कहा, 'माँ बुला रही है। जाओ।...अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल?...

'अरे, चलू मन, चलू मन- ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहिरा में अगिया लगायब रे-की...।'

खेतों की पगडंडी, झरबेरी के जंगल के बीच होकर जाती है। निरगुन गाता हुआ मिरदंगिया झरबेरी की झाड़ियों में छिप गया।

'ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है?' कौन बजा रहा था मृदंग रे?' घास का बोझा सिर पर ले कर मोहना की माँ खड़ी है।

'पँचकौड़ी मिरदंगिया।'

'ऐं, वह आया है? आया है वह?' उसकी माँ ने बोझ जमीन पर पटकते हुए पूछा।

'मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गाया है। कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल! ...उसकी उँगली अब ठीक हो जाएगी।

माँ ने बीमार मोहना को आह्लाद से अपनी छाती से सटा लिया।

'लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी-भर शिकायत करती थी - बेईमान है, गुरु-दरोही है, झूठा है!'

'है तो! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। खबरदार, जो उसके साथ फिर कभी गया! दसदुआरी जाचकों से हेलमेल करके अपना ही नुकसान होता है। ...चल, उठा बोझ!'

मोहना ने बोझ उठाते समय कहा, 'जो भी हो, गुनी आदमी के साथ रसपिरिया...।'

'चौप! रसपिरिया का नाम मत ले।'

अजीब है माँ! जब गुस्साएगी तो वाघिन की तरह और जब खुश होती है तो गाय की तरह हुँकारती आएगी और छाती से लगा लेगी। तुरत खुश, तुरत नाराज...

दूर से मृदंग की आवाज आई - धा-तिंग, धा-तिंग!
मोहना की माँ खेत की ऊबड़-खाबड़ मेड़ पर चल रही थी। ठोकर खा कर गिरते-गिरते बची। घास का बोझ गिर कर खुल गया। मोहना पीछे-पीछे मुँह लटका कर जा रहा था। बोला, 'क्या हुआ, माँ?'

'कुछ नहीं।'

-धा-तिंग, धा-तिंग!

मोहना की माँ खेत की मेड़ पर बैठ गई। जेठ की शाम से पहले जो पुरवैया चलती है, धीरे-धीरे तेज हो गई ...मिटटी की सुंगध हवा में धीरे-धीरे घुलने लगी।

-धा-तिंग, धा-तिंग!

'मिरदंगिया और कुछ बोलता था, बेटा?' मोहना की माँ आगे कुछ बोल न सकी।

'कहता था, तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा...'

'झूठा, बेईमान!' मोहना की माँ आँसू पोंछ कर बोली, 'ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।'

मोहना चुपचाप खड़ा रहा।