शुक्रवार, 24 जून 2016

मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

  मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी (आलेख)


सुशील कुमार भारद्वाज

“खुशी कहां से मिलती है?” यह एक अहम सवाल बना हुआ है. जिसका जबाब भी मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना की तर्ज पर अलग –अलग स्वरूपों में मौजूद है. क्योंकि खुशी का मतलब हर इंसान के लिए अलग –अलग है. कोई इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखता है तो कोई भौतिक नज़रिए से. कोई पूजा –पाठ और कीर्तन में खुशी को महसूसता है तो कोई अपने बीबी –बच्चों को अच्छी सुख –सुविधा मुहैया कराकर. किसी के लिए खुशी का मतलब वृद्ध माता-पिता की सेवा है तो किसी के लिए समाजसेवा और देशसेवा. कोई परोपकार के काम में खुशी का अनुभव करता है तो कोई किसी को धोखा देने में. कोई जीव-जन्तुओं से प्रेम में आनंदित होता है तो कोई कला के क्षेत्र में अपनी ऊर्जा का उपयोग करके. कोई धनलिप्सा और वासना में खुश है तो कोई त्याग और संतुष्टि में. कोई जीवन की सार्थकता समझने में खुश है तो कोई धर्म के नाम पर पाखंड करके. लेकिन इतना सच है कि हर कोई खुशी की ही तलाश में मारा- मारा फिर रहा है. हर कोई खुशी पाने की चाह में ही बेतरतीब भागा जा रहा है या फिर भागने को आतुर है. परंतु दुर्भाग्यवश सभी लोग अपनी –अपनी खुशी तक चाहकर भी पहुंच नहीं पाते हैं. या यूं कह लें कि वे खुशी को पहचान ही नहीं पाते हैं और समय निकल जाने पर महसूस करते हैं कि उनके लिए खुशी के मायने इस विस्तृत जगत में क्या था? एक इंसान की खुशी दूसरे की भी खुशी हो, कोई जरूरी तो नहीं. जैसे इस दुनियां में सुंदरता और संतुष्टि का कोई निश्चित पैमाना नहीं है ठीक उसी प्रकार खुशी का कोई निश्चित स्वरूप या पारामीटर नहीं है. खुशी हमें हर उस क्षण से मिल सकती है जिस पल हम स्वयं को आनंदित करते है. परिवार, दोस्त, सहकर्मी या फिर जीवन में मिलने वाले हर प्राणी से निष्पक्ष एवं निष्कलुष भाव से मिलते हैं. जहां हम कुछ वापस पाने की आस लगाने की बजाय परोपकार या सहयोग की भावना से कार्य करते हैं. जब हम अपनी स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रकृति के हर जीव –जंतु के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते हैं. 
स्वर्ग की परिकल्पना खुशी की ही भूमि पर तैयार की जाती है जहां मनुष्य सारी चिंताओं और विध्न-बाधाओं से दूर हो सिर्फ भोग-विलास में खोया रहना चाहता है. जबकि सभी जानते हैं कि किसी चीज में हमारी आसक्ति ही हमारे खुशी के विनाश का कारण बनती है. कुछ लोग कहते हैं कि मनुष्य के पास होने से खुशी मिलती है तो कोई कहता है दूर रहने से. जबकि खुशी का सम्बन्ध नजदीकी और दूरी से नहीं है. इंसान स्वयं के अंदर कैसा महसूस करता है? उसके अंदर आत्म-संतुष्टि की भावना कितनी और कैसी है? इस पर काफी कुछ निर्भर करता है.
सबसे बड़ी बात कि यदि हम अपनी खुशी इस नश्वर एवं मायामोह से ग्रस्त संसार में दूसरे जीवों अथवा वस्तुओं में आरोपित कर दें तो शायद यह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी होगी. क्योंकि आकर्षण और जरूरत एक समय विशेष के बाद महत्वहीन हो जाते हैं. धन-दौलत, परिवार, दोस्त- दुश्मन, सुविधा–असुविधा या फिर कोई भौतिक आकर्षण आखिर क्या है? ये चीजें नश्वर दुनियां में कब तक स्थायी रह सकती हैं? एक उदाहरण दूँ तो, एक मनुष्य अपने दुश्मन के मरने या उसे किसी प्रकार का नुकसान होने पर जी भर ठठा कर हंसता है. जश्न मनाता है. लेकिन क्या इसे सच्ची खुशी कही जा सकती है? क्या होगा उनकी सच्ची खुशी का यदि जो जश्नी माहौल के बीच कोई अप्रिय घटना की खबर मिल जाए? सारा का सारा रंग वहीं बदरंग नज़र आने लगेगा. एक इंसान की सच्ची खुशी किसी के विनाश में या प्रतिशोध में नहीं बल्कि निर्माण में है. प्रतिशोध या बदले की भावना से मिलने वाली खुशी आपके विकृत चरित्र का ही परिचायक हो सकता है, जिसे शायद सामने वाला या आपके साथी भी पसंद न करें. खुशी तो क्षमा से मिलती है. क्या आप अपनी खुशी की तुलना उस खुशी से कर सकते हैं?- जब आपने किसी जरूरतमंद इंसान को महज एक रुपए से मदद किया? जब किसी घायल चिडियां या जीव को जीवन देने की कोशिश की? जब आपने अपने दुश्मन को संकट के समय में मदद की?
यदि आप सिर्फ दूसरों की नज़रों में प्रतिष्ठा या प्रशंसा पाने के लिए कुछ करते हैं तो शायद वो खुशी बनावटी लगे, उसमें उचित –अनुचित का भाव आए. भौतिक पैमाने पर लाभ –हानि के पचड़े में पड़ जाएँ लेकिन जिस काम को आपने दिल से किया, जिसके लिए आपके मन में कोई मलाल नहीं है. पश्चाताप नहीं है. शायद वह आपकी सच्ची खुशी है. फिल्म थ्री इडियट के बोल “आल इज वेल” और मुन्नाभाई एमबीबीएस के “प्यार की झप्पी” को आप किस रूप में देखते हैं?

भागम – भाग की इस जिंदगी में, जहां लोग मौके की ताक में रहते हैं. आपको हर पल कमतर दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. आपकी नाकामियों पर दांत निपोरने के लिए आतुर रहते हैं. हर सावधानी के बाबजूद कोई दुर्घटना या विश्वासघात हो जाने से इनकार नहीं किया जा सकता है, वैसी स्थिति में नॉस्टैल्जिक हो जाना गुनाह नहीं है. पुराने  दिनों को याद कर खुशी को पाने की कोशिश गलत नहीं है. लेकिन हम कब तक पीछे की ओर मुड़ते रहेंगें? क्या बार –बार पीछे मुड़ने की कोशिश में हम वर्तमान को खोते नहीं चले जा रहे हैं? हम जिन पुरानी बातों से खुद को खुश करने की कोशिश करते हैं, वह भी परिवर्तन का एक दौर था और आज भी समय का पहिया अपने साथ काफी कुछ नया लेकर उपस्थित हो रहा है और पुरानी चीजों को नीचे की ओर धकेलते जा रहा है. ऐसी विषम परिस्थिति में भी स्वयं को बदलते हुए बदले माहौल में चारों ओर बिखरी खुशी को समेटने की जरूरत है. खुशी को किसी खास दायरे में समेटने की बजाय इसके व्यापक स्वरूप को समझने की जरूरत है. खुशी की तलाश में भटकते इंसान को इंसान समझ, मदद का एक हाथ बढ़ा, मुस्कुराहट को बिखेरने की जरूरत है, जहां से मिलती है वास्तविक खुशी. खुशी को तलाशने के लिए पेड़ – पौधे, चांद –तारे, नदी –नाले, या प्रेमी –प्रेमिका के पास जाने से पहले खुद से पूछने की जरूरत है कि हमारे लिए खुशी के मायने क्या हैं? हमारी कौन-सी सफलता हमारी खुशी को दुगुनी कर सकती है? 

गुरुवार, 23 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ और सहायक पर निबंध

एक इंसान अकेले ही सारा काम नहीं कर सकता। काम को पूर्णता के साथ करने के लिए उसे एक सहायक" की जरूरत होती है। जबकि कार्य-निष्पादन की गति और स्थिति का सहायक की गति और स्थिति से क्या तालमेल है वह प्रतिष्ठित व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ की रचना "सहायक पर निबंध" में साफ-साफ परिलक्षित है। आप भी इसका आनंद लें।

सहायक पर निबंध
सुशील सिद्धार्थ

वह एक कामयाब सहायक है।कामयाब सहायक वही है जो अपने साहब के हर काम में सहायक हो।सुख में सब साथ रहते हैं।जो दुख में रहे वही साथी।इसी तरह जो अक्लमंदी में साथ रहे उसको क्या गिनना।न तीन में न तेरह में।जो बेवकूफी में वफादारी करे वही अच्छा सहायक माना जाता है।प्रायः अच्छा सहायक अपने साहब को बेवकूफ मानकर चलता है।अच्छा सहायक अपनी अच्छाई से साहब को बेवकूफ बनाकर छोड़ता है।सहायक अचानक इतना महान नहीं बना।वह झिड़की उपेक्षा लानत बेइज्जती प्रपंच की पंचाग्नि में तपा।व्यवस्था की ऐतिहासिक गुफा में घुसा।हमारी परंपरा है कि हम पुरानी बातों से सीखकर आगे या पीछे चलते हैं।इस सहायक ने एक पुराने दिलजले का कथन पढ़ा कि मनुष्य एक बार काल के गाल से तो बाहर निकल सकता है लेकिन अगर ईमानदारी मनुष्य को निगलने लगे तो उसकी रक्षा कोई मंत्र तंत्र यंत्र नहीं कर सकता।उसकी रक्षा केवल षड़यंत्र ही कर सकता है।रक्षा न हो पाए तो नाश निश्चित है। सहायक ने विचार किया कि अगर सब नाश ही हो गया तो हम क्या चटनी पीसेंगे।साहब लोग हैं तभी हम हैं।यह न रहा तो हमारा क्या होगा।सहायक का यह सोचना ठीक था।कुछ लोग सोचते बहुत हैं करते कुछ नहीं।वे धरती पर बोझ से अधिक हैं।उत्तम नर वे हैं जो सोचने के साथ करते भी हैं।सोचा घोटाला करना है कर दिया।हत्या तो सोचने से पहले कर दी।बलात्कार तो सोचातीत है और हर बालिग नाबालिग पुल्लिंग का समाजसिद्ध अधिकार है।सहायक भी सोचने के साथ करने वाला ऐसा ही महान भारतीय था।उसने सोचा कि बॉस हमेशा सही होता है।इस सोच पर मोच आए इससे पहले कर्मभूमि में कूद पड़ा।भागा।फिर उसने मुड़कर नहीं देखा इस मुहावरे को विकसित किया।यानी किसी ओर भी कहीं भी नहीं देखा।वह प्रवीण हो गया।साहब के हर समारोह में वींणा बजाने लगा।साहब निर्णय लें इससे पहले तारीफ करने लगा।साहब के पांव में रुखाई दिखे इससे पेशतर घानी का शुद्ध तेल लगाने लगा।घानी का तेल चुनने के दो राष्ट्रीय कारण हैं।पहला यह कि बॉस के चेहरे पर भले ही रुखाई दिखे पैरों पर नहीं दिखनी चाहिए।आचरण भले धुंधला हो चरण चमकने चाहिए।दूसरा यह कि अच्छा सहायक साहब को कोल्हू का बैल बनाए रखता है।आज वे कोल्हू तो न के बराबर दिखते हैं अलबत्ता कोल्हू के बैलों की संख्या बढ़ रही है।फिर सहायक ने व्यवस्था विभ्रम नामक सेमी आयातित ग्रंथ के पृष्ठ उलट पलट कर देखे।उसमें लिखा था कि वैसे तो हर साहब गलती करता है लेकिन साहब को गलती करने में मज़ा आने लगे यह बिना सहायक की मेहनत और क़िस्मत के नहीं होता।गलती करने वाले साहबों को आईएएस और पीसीएस लॉबी भी देवतातुल्य आदर देती है।सहायक ने यह बात भी गांठ बांध ली।इसके बाद वह दफ्तर में सब पर सवारी गांठने लगा।उसने कई कीर्तिमान बनाए हैं।मैं उससे मिलकर जीवन के कुछ और रहस्य जानना चाहता हूं।वह समय नहीं दे रहा।वह समय का सहायक है।जिसका समय निकल जाता है उसे विनम्रता से लात मारकर बाहर निकाल देता है।
संपर्क
किताबघर प्रकाशन,24अंसारी रोड,दरियागंज,नई दिल्ली 2
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08588015394

बुधवार, 22 जून 2016

सुशील कुमार की "दियारा में रेत होती जिंदगी"

तपती धरती और चिलचिलाती गर्मी में आई बारिश की बूंदों से धरा का आंगन ही नहीं खिलखिला रही है बल्कि आत्मा को भी अजीब खुशी मिल रही है. मनुष्य के साथ-साथ सृष्टि का हर जीव खुशी का गीत गुनगुनाए जा रहा है. सूखती नदियाँ अपनी जवानी को फिर से पाकर इठला रही है. लेकिन इन सबों के बीच भी याद आती है एक जिंदगी – दियारा के लोगों की जिंदगी. जी हां, नदियों के बालू में पलने वाली जिंदगी, उसके सुख और दुःख के पल, जिनकी जिंदगी बारिस की बूंदों से ही प्रभावित होती है. और याद आती है कवि सुशील कुमार की दियारा में रेत होती जिंदगी. खुद ही करीब से महसूसें सुशील कुमार की कविताओं में दियारा की जिंदगी को. 
दियारा में रेत होती ज़िन्दगी

दियारा - (एक) :

न शहर न गाँव है
न ठाँव है कहीं न छाँव है
रेत से पटा दयार है
दूर तलक पसरा सन्नाटा है
निस्पंद गंगा के कछार का
हाँ, यह दियारा इलाका है

ठौर-ठौर जल-जमाव है
छिछली नदी में एक – दो नाव हैं
नाव में चढ़ते-उतरते दियारा के लोग
और लोगों को टेरते मल्लाह
खेते जाते हैं अपनी पतवार,
मगन होकर गुनगुनाते जाते हैं
दु:ख से भींजे कोई गीत 

मौन दियारावासी खुले आसमान के नीचे
बीच कभी ठुठ्डियों पर
अपनी उंगलियाँ टिकाये,
कभी घुटनों के बल टिके
तो कोई निर्निमेष निहारता जाता
क्षितिज पर अनंत शून्य
तो कोई नाप रहा होता
जल राशि के अपार विस्तार के साथ
मन ही मन अपनी घनीभूत पीड़ा

समय मानों ठहर गया हो यहाँ !
न जाने किस दुश्चिंता में ऊब-डूब
कांतिम्लान इन चेहरों पर उछरी
कितनी-कितनी लकीरें
कहती हैं दियारा के दर्द की अनगिन गाथाएँ !

समय के प्रवाह में बहता जीवन की
नाव, फिर हिचकोलें खाती है
केवट का स्वर-लय टूटता है
नदी का मौन भंग हो जाता है
आ जाता है घाट
और पथ

उतारता है नाविक यात्रियों को
उस पार हौले-हौले
जहाँ मयस्सर है सिर्फ़
गंगोटी का बलुआही सफ़र --
रेत की सर्पिल पगडंडियाँ --
जहाँ देखता हूँ कुली-पिट्ठूओं का दल
जो घाट पर कब से उनकी बाट जोह रहे हैं !

मौसम के सिवा यहाँ कुछ भी खुशग़वार नहीं
रेत होती दियारावासियों की ज़िन्दगी में
खुशियाँ कम हैं ग़म ज़्यादा
विकास की आखिरी किरण से महरुम
जनपद-मुख्यालय से कटा
दियारा में सुविधाओं का नामोंनिशान नहीं ;
झोपड़पट्टियों में बेहाल लोग
न सड़कें  न बिजली  न पेयजल
न पक्के मकान  न दुकान
हाथ हज़ार पर रोजगार नहीं
अर्द्धनग्न या लंगोट पहने
थिगड़ों में लिपटे पुरुष
दीखते हैं दियारा में कहीं तो
स्त्रियाँ फटे बसन अपनी देह चुरातीं
बच्चे भी नंग-धड़ंग
जो स्कूल जाने के बजाय गृहस्थी में हाथ बटाते –
मछलियाँ-केकड़े-घोंघे की खोज में 
चहबच्चों में कमर तक कीचड़ गहडोरते,
कितना  हृदयविदारक है –
उन बाल-गोपालों के हाथ
कभी कलम नहीं गहे

ले-देकर बस एक खेती है गुजर-बसर को
और खेत भी ज्यादातर रेत-सने हैं !

फसल के साथ इलाके में
अपराध भी खूब फलते हैं
बोता कोई है, काटता कोई है
फसल-कटाई के दिनों कई बार
पसीने की जगह खू़न टपकते हैं खेतों में
हत्याएँ और लूट तो सरेआम है

दियारा - (दो) :

साँझ गहराते ही
बच्चों की आँख की तरह
बंद हो जाते हैं दियारा के रास्ते
दूर-दराज गाँवों में कहीं
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती हैं लालटेनें
बाकी सारा दियारा निमग्न होता है
घुप्प अँधेरे में,
झिंगुरों की आवाज़ में
टोडों की टर्राहट में
तेज हवाओं की सरसराहट में

लाचार हो या बीमार कोई
राशन - पानी का इंतजाम करना हो
या दवा - दारु का,
कोसों पैदल चलकर ही
तय होती है दियारा में
बाज़ार-अस्पताल की दूरियाँ

दियारा :(तीन)

आषाढ़ के आते - आते नदी फूलने लगती है
तब राई सी मुसीबत भी पहाड़ बन जाती है
दियारावासी लहरों पर अपनी आँख बिछाये
नदी-माँ से कोप बरजने की प्रार्थनाएँ करते
कोशी-बलान-कमला-गंडक भी उफनती
गंगा से गले मिलती हैं सावन में
पर सँभाल नहीं पाती गंगा अपनी बहनों की बाढ़
नेपाल का बैराज खुलते ही
बेतरह खौलने लगती है वह
और तटबंध भहराने लगते हैं

लोग घर-बार छोड़ भागने लगते हैं
लील जाती है कई बार हहराती गंगा
पूरा का पूरा दियारा
बह जाते हैं कई जानें-माल–मवेशी
किसानों के सालों सँजोये सपने भी

जो बच पाते हैं इस विभीषिका से
उनकी आँखों में होता है
दु:खों के अंतहीन जंगल
और सिर पर उनके खुला आसमान

दियारा-(चार) :

जब मेघ उतर आते है खाड़ी में
नई जलोढ़ मिट्ट्याँ पट जाती है समूचे दियारा पर
और मृण्मय श्मशानी चुप्पियां फैल जाती है दूर तक

फिर होती है कई सरकारी घोषणाएँ
और राहत के नाम पर एक बार फिर
लूट का बाज़ार गर्म होता है
कुछ सेर मोटे अनाज और कुछ रुपये
मुआवज़े के बतौर बाँटकर
दियारावासियों को फुसला लिया जाता है
हर बरसात में

घर-दुआर माल-मवेशी खेत-खलिहान
ओसारों में चहकते छोरे
खेतों में लहलहाते धानों की बालियाँ
चौपालों में गूँजते गीत
पागुर करती गायों के स्वर
यानि कि विस्थापन का पूरा स्मृतिचित्र ही
दिन-रात तैरता है बेबस आँखों में
और हरदम एक हूक-सी
उठती है दियारावासियों के दिल में।

कवि का परिचय-वृत
     सुशील कुमार
  • जन्म-13/09/1964. पटना सिटी (बिहार) में।
  • सम्प्रति मानव संसाधन विकास विभाग,रांची (झारखंड) में कार्यरत
  • संपर्क -  सहायक निदेशक/प्राथमिक शिक्षा निदेशालय/ स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग/एम डी आई भवन(प्रथम तल)/ पोस्ट-धुर्वा /रांची (झारखंड) – 834004
      ईमेल –   sk.dumka@gmail.com
      मोबाईल न. 0 9431310216 / 0 9006740311
§  प्रकाशित कृतियां – कविता-संग्रह  कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012)
  • कविताएं और आलेख साहित्य की मानक पत्रिकाओं व अंतर्जाल-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित।  


मंगलवार, 21 जून 2016

माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

सुभाष रूपेला
माँ शब्द जितना पवित्र एवं व्यापक है उतना ही अनमोल भी। एक माँ अपने बच्चों की खुशी के लिए क्या-क्या नहीं करती? हां, ये अलग बात है कि समय के साथ माँ के रहन-सहन में बदलाव आया है लेकिन इससे माँ के महत्व में कहीं कोई कमी नहीं आ जाती। आज पढते हैं माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

माँ
है होती नसीब माँ से दुनिया,
बिन माँ कोई जग में आया कहां?
पला कहां, जिया कहां?
इंसान तो क्या, भगवान भी,
क्या माँ की गोद में नहीं पला?
कौशल्या देवकी और यशोदा को
राम और कृष्ऩ क्यों भूलें भला?
त्याग नींद अपनी, लाल को वो सुलाती,
दुख की धूप को वो, ममता-छाया से हरती,
हरि तो जग में हैं दिखते किसको?
माँ तो मिलती है हर किसी को.
ऑक्सीजन है जीवन में माँ,
सूरज है अंधेरे में माँ,
जल है प्यास में माँ,
सहारा है संकट में माँ,
बहार है खिजां में मां,
है हँसती हुई हस्ती माँ.
लाल की दौलत-ए-जन्नत है माँ.
सबकी कामना यही है माँ,
कुछ भी बदले इस जहां में,
बदले न कभी प्यारी न्यारी माँ,
मदर डे क्या, हर दिन ही,
बेटा न भूले कभी माँ.

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क्यों रहे माँ बेचैन
करुऩा बन उमड़ पड़ी ममता उस माँ की,
सोते-जागते दिखने लगी, सूरत अपने लाल की.
पूछती फिरती नुस्खे प्रगति के, है कौन-सी गली वो है न भटकी?
रटती थी लाल का नाम यों, जपती हो मानो राम राम,
मन्नत दुआ सब करती, चाहे हो सुबह या हो फिर शाम.
तीर्थ-तीर्थ वो जाती, पीर बाबा सब वो मानती,
झाड़-फूँक सब वो करवाती, बाँवरी-सी सब कहीं फिरती.
फिरकी-सी थी वो फिरती, थकती नहीं, वस रहती सदा चलती.
नंबर वन बना बेटे को रहेगी, उसकी साँस है जब तक चलती.
चिंता के पानी में चीनी-सी थी वो घुलती,
धुन देख उसकी लोग समझते उसे सनकी.
आते-आते रैंक रह गया,
आई. आई. टी. का चांस रह गया,
जाते जाते प्राऩ बच गया,
दिमाग लेकिन गुम हो गया.
जीने का चैन उड़ गया,
मुर्दे-सा जिस्म हो गया.
आज भी दिखती वो माता,
कलेजा मुँह को आ जाता.
खुद की लगन से आता है रैंक, खोलो क्वालिटी टाइम बैंक
झाड़े से है सुधरा कभी, किसी के दिमाग का टैंक?
ऐसी सनक न किसी को चढ़ाए भगवान!
पास हो जाए लाल, बस इतना रहे अरमान.

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माँ का दर्द
माँ तो लुटा देती है सब,
पर बेटा लौटाता है कब?
“इससे तो बेहतर है बैंक, हे नाथ,
लौटाता है मूलधन ब्याज के साथ।“
श्रीमती की आपत्ति
लाखों कमाती हूँ,
गरीब श्रीमान के हाथ थमाती हूं,
उनके रिश्तेदार फिर भी मुझे भार ही समझते हैं –
तभी तो मुझे श्रीमती गरीब चंद नहीं, उनकी भार्या ही कहते हैं।
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मस्त लापरवाह माँ
गोलगप्पे खाती रही, गप्पें लगाती रही;
सखियों संग मस्त सदा, सुध घर की जाती रही।
किट्टी में जाती रही, क्लबों में छाती रही;
मॉल में डोलती रही, बच्चों ने ये सब सही।
बड़ा बेटा फ़ेल हुआ, रात घर से भाग गया;
चिंता क्या उसकी करे, धब्बा था जो धुल गया।
एक दर्पऩ टूट गया, रोशनी वो लूट गया;
आँखों में था वो लगा, मँझला नाबीना हुआ।
गली में ठग आ गया, छोटे को उठा ले गया;
माँ को थी फुरसत कहां? आज़ादी वो दे गया।
रग रग में ड्रग घुस गई, पुड़िया से गुड़िया गई;
मस्ती का नशा माँ पे, अपने में वो खोती गई।
ध्यान से जो न पालती, औलाद क्यों वो जनती?
लापरवाह माँ होती, बच्चे रुल जाते तभी।
बच्चे तो फूल-से हैं, माली-सी माँ सीँचती;
घर की फुलवारी सदा, रखवाली से खिलती।
बच्चों की कीमन पे, ऐश करना न तुम कभी;
गोदी के तारे हैं ये, हीरे जवाहर सभी।
मोमबत्ती-सी माँ हो, करुऩा को पिघलती हो;
रोशनी को जलती हो, लाल को दुलारती हो!
भगवान मेहर करना, हर घर पे नज़र रखना;
बच्चों में खोई रहे, ममता-सी माँ भेजना!!!
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सोमवार, 20 जून 2016

मानिक बच्छावत की 'सड़क पर ज़िंदगी' की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में

 मनुष्य-जीवन के संघर्ष-काल को कमाल का शब्द देती कविताएँ

मानिक बच्छावत ऐसे श्रमिकों को एक नई आवाज़, एक नई मशाल, एक नई सच्चाई, एक नई जद्दोजहद, एक नई डगर देना चाहते हैं, जो उनके नए सफ़र में काम आएँ। इसलिए कि मानिक बच्छावत की कविताएँ पराजित और हारे हुए आदमी की कविताएँ होने के साथ-साथ उन आदमियों की भी कविताएँ हैं, जो अपनी पराजय और हार को जीत में बदलते दिखाई देते हैं। पढते हैं संग्रह की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में।

यह सच है कि आदमी के जीवन का संघर्ष रहस्यों से भरा रहता है। ये संघर्ष-रहस्य आदमी के जीवन में चुपचाप चले नहीं आए हैं। मेरे ख़्याल से पूरी चालाकी से दुनिया भर के पूँजीवादियों ने और दुनिया भर की अमीर, क्रूर, दंभी सरकारों ने आदमी के जीवन में अभाव, बेरोज़गारी, बेक़रारी, दुर्भाग्य आदि सबकुछ चालाकी से भर दिए हैं ताकि यह जो आम आदमी है, वह अपनी निजी ज़िंदगी में आम ही बना रहे, ख़ास बने भी तो उनका अपना जोखिम से भरा जीवन बने, जिससे हर पूँजीवादी और अमीर सरकारें उनका मुँह चिढ़ा सकें। हम आम आदमी के जीवन की यही विडंबना है, यही उधेड़बुन है, यही आवाजाही है कि हम अपने हिस्से का जितना बढ़िया-बढ़िया इकट्ठा करें, सहेजें, संभाल कर रखें, फिर अंतत: उन्हीं अमीर लोगों, उन्हीं क्रूर सरकारों को वापस लौटा दें, जो अमीर लोग और अमीर सरकारें एक-दूसरे के सहोदर हैं सदियों-सदियों से। यही सच है कि आम आदमी का जीवन ऊहापोह, दुविधा, उलझन, असमंजस, चिंता की स्तिथि में पीसता आया है और आगे भी पीसता रहेगा। ऐसे ही आम आदमी के इस आजीवन संघर्ष की गाथा रही हैं समकालीन कविता के वरिष्ठ कवि मानिक बच्छावत की कविताएँ। इनके सद्य प्रकाशित कविता-संग्रह 'सड़क पर ज़िंदगी' की कविताएँ भी उन्हीं पीसते-घिसते आदमी की कविताएँ हैं :

          प्यारे मियाँ के पास
          दो घोड़ा गाड़ियाँ थीं
          जिन्हें वे हावड़ा स्टेशन पर रखते
          मुसाफ़िर इनमें बैठ जाते
          घोड़ा गाड़ियाँ बंद खिड़कियों वाली होती थीं
          कलकत्ता के रईसों की गाड़ी
          जिन्हें दो टट्टूनुमा घोड़े खींचते
          स्टेशन से हरिसन रोड, ताराचंद दत्त स्ट्रीट
          कॉलेज स्ट्रीट, गिरीश पार्क, श्याम बाज़ार तक
          लोग इनमें चले जाते
          पर जब से टैक्सियाँ और ऑटो चलने लगे
          लोगों ने घोड़ा गाड़ियों पर बैठना बंद कर दिया
          प्यारे मियाँ को भूखों मरने की नौबत आ गई('प्यारे मियाँ की बग्घियाँ'/पृ.13)।

   अब कोई साधारण जन रोज़ बदल रहे समय, रोज़ बदल रही तकनीक, रोज़ बदल रही जीवन-शैली में ख़ुद को कहाँ पर एडजस्ट करे, ख़ुद को कहाँ पर रखे, ख़ुद को कहाँ पर बैठाए, यही विवादास्पद है। अब इसे साज़िश कहें या अराजक परिस्थिति कि जो पूँजीहीन हैं, जो मूल्यांकनहीन हैं, जो अनुभवहीन हैं, वे इस रोज़ बदल रही दुनिया को कैसे अपना बनाएँ, कैसे अपनी प्रार्थना में शामिल करें, कैसे अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ें, उनके जीवन का सबसे बड़ा सवाल यही है। इन साधारण जन के जीवन में असाधारण इतना भरा-पूरा मुझे जब-तब दिखाई देता है कि उनका समय तराज़ू पर मेंढकों को तौलने के समान है। तराज़ू पर एक मेंढक को चढ़ाओ तो दूसरा तब तक क़ूदकर भाग निकलना चाहता है। ऐसे जीवन की सँख्या देश में अधिक है, जो अपने निजी जीवन में अकसर विफल है, पराजित है और सिर्फ़ प्रार्थनाओं के भरोसे जीवित है। आप ढोल पीटते रहिए कि आपका देश आगे बढ़ रहा है। मेरा देश तो वैसा का वैसा ही है, अभाव से भरा, ज़ुल्मो-सितम से हरा :

          राधिया के पास नहीं हैं
          ज़्यादा कपड़े
          सिर्फ़ एक जोड़ी बस
          एक वह पहनती है
          और दूसरे को धोती-निचोड़ती सूखाती है
          कार्नवालिस स्ट्रीट की सड़क की रेलिंग पर
          जो दो भागों में बाँटती है सड़क को('राधिया के कपड़े'/पृ.15)
   अथवा,
          ठेका मज़दूरिन है
          किसी को ज़रूरत होती है
          बुला लेता है
          बदले में खाना मिल जाता है
          चौधरीबाड़ी के बरामदे के नीचे
          पसरकर पड़ी रहती है
          वह अकेली नहीं है
          उसके साथ उससे भी कमउम्र की
          बहुत सारी औरतें हैं
          घर के काम से जातीं
          बहुरानियों की मालिश-चंपी से लेकर
          कई छोटे-मोटे काम करतीं
          इधर से उधर संदेशे ले जातीं(वही/पृ.15-16)।

   ग़ौरतलब यही है कि बहुत सारे संदेशवाहक की ज़िंदगी में बहुत-बहुत दिनों तक कोई अच्छी ख़बर कहाँ आती है। ग़ौरतलब यह भी है कि मानिक बच्छावत की वाजित चिंता यही है कि ऐसा कौन-सा जुगत भिड़ाया-किया जाए, जो प्यारे मियाँ और राधिया के घर भी अच्छे दिन सचमुच पहुँचें। इसलिए कि सरकारें तो हमेशा से भिखारी ही होती हैं या यूँ कहिए कि लुटेरी ही होती हैं। इसलिए कि सरकारें दस बहाने करके और हज़ार रास्ते निकाल करके हमारी जेबी से पैसे मार लेती हैं। सरकारों का लूटने का यह सिलसिला अंतहीन है :

          दो बीघा ज़मीन है
          हराधन चासी के पास
          बांग्ला नस्ल के दो छोटे-छोटे बैल भी हैं
          चास हल चलाता है
          धान उपजाता है
          उसका संसार ऐसे ही चलता है
          दो जून पेट भरने लायक़
          धान हो जाता है
          खेत महाजन के यहाँ गिरवी है
          उसको चार सयानी लड़कियाँ हैं
          हराधन को उनकी चिंता है
          क्या करे
          किस कुएँ में डाल दे
          बाक़ी सबकी हालत भी ऐसी ही है('हराधन चासी का दुःख'/पृ.27)।

   दरअसल मानिक बच्छावत की ये कविताएँ मनुष्य के दुःख की उस अंतहीन कविता-यात्रा की गूँज है, जिसमें मनुष्यता छटपटाती, कराहती, बिलखती दिखाई देती है। कवि का यह विराट अनुभव है। इसीलिए मानिक बच्छावत की ये कविताएँ मनुष्य की विवशता, विफलता, वीभत्सता की भी कविताएँ हैं। लेकिन इसे मानिक बच्छावत का कमाल कहिए कि इन्हीं विवशता, विफलता, वीभत्सता से मनुष्य की मुक्ति का रास्ता भी निकाल लाते दिखाई देते हैं। ये कविताएँ व्यवस्था के विरोध में पूरी मज़बूती से खड़ी भी दिखाई देती हैं। और सिर्फ़ दुःख नहीं गढ़तीं। यह जो पूँजीवादी संस्कृति का राक्षस रोज़ आम आदमी का लहू माँगता है, इस राक्षस के गहरे भीतर जाकर मानिक बच्छावत वार भी करते दिखाई देते हैं जोकि हर कवि का दायित्व है। संग्रह की 'फेलू दा और कॉफ़ी हाउस', 'सपना राय', 'शुभ्रा दास सड़क पर', 'लक्खी की रेज़गारी', 'बाउल गायक निमाई', 'बहूबाज़ार की रसूलन', 'ननीगोपाल कालीघाट का', 'पेशेवालियाँ', 'मोची', 'कविता लिखने का मौक़ा', 'पारोमिता की कथा', 'रोटी बेचती औरत', 'बंदर नाच', 'सैयदशाली लेन पर स्कूल', 'मरे हुए आदमी की माँ', 'भीड़ में रहना', 'रामधनी का ठेला', 'फुटबॉल', 'सड़क पर ज़िंदगी' आदि कविताएँ मानिक बच्छावत के जीवन को देखने-परखने के अनूठे अनुभव को प्रकट करती हैं। मानिक बच्छावत की जो बड़ी ख़ासियत है, यह है कि वे घर से जब बाहर निकलते हैं तो आपसे बातचीत करते हुए भी उनकी नज़रें उन आदमियों पर रहती हैं, जो लगातार जीवन-संघर्ष करते हुए सरकार के अच्छे दिनों का नक़ाब उतारने में लगे होते हैं। ये वे जनता-जनार्दन हैं, जो अपने श्रम से, अपने श्रमिक जीवन से सबको लाभांवित तो करते हैं, लेकिन ख़ुद अभाव की खाई तरफ़ हर पल बढ़ रहे होते हैं। मानिक बच्छावत ऐसे श्रमिकों को एक नई आवाज़, एक नई मशाल, एक नई सच्चाई, एक नई जद्दोजहद, एक नई डगर देना चाहते हैं, जो उनके नए सफ़र में काम आएँ। इसलिए कि मानिक बच्छावत की कविताएँ पराजित और हारे हुए आदमी की कविताएँ होने के साथ-साथ उन आदमियों की भी कविताएँ हैं, जो अपनी पराजय और हार को जीत में बदलते दिखाई देते हैं। इसलिए कि मानिक बच्छावत का मानना यही है कि जो सपनों को मरते देखते हैं, वे ही अपने मरे हुए सपनों को जीवित करने का हुनर भी रखते हैं :

          भोर होते ही खड़ा होता है निमाई
          नहा-धोकर अपनी मिरजई पहन
          चंदन के टीकों से लेपता है कपाल
          गले पर नाक पर बाँहों पर लगाता है टीके
          निकल पड़ता है अपना एकतारा ले('बाउल गायक निमाई'/पृ.38)।
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सड़क पर ज़िंदगी(कविता-संग्रह)/ कवि : मानिक बच्छावत/ प्रकाशक : समकालीन सृजन, 20, बालमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता-700 007/ मोबाइल संपर्क : 09830411118/ मूल्य : ₹150
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गुरुवार, 16 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य एक था राजा

आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं। इन पंक्तियों को लिखने वाले सुशील सिद्धार्थ समकालीन व्यंग्यकारों में एक प्रतिष्ठित नाम हैं. जिनके व्यंग्य की एक अलग शैली है. इन्होंने चार व्यंग्य संग्रह और दो कविता संग्रह के अलावे नौ पुस्तकों का संपादन किया है. जिन्हें आलोचना के लिए स्पंदन सम्मान से सम्मानित किया गया है. पढ़ते हैं सुशील सिद्धार्थ जी के व्यंग्य एक था राजा को.



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एक था राजा
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सुशील सिद्धार्थ
यह एक सरल,निष्कपट ,पारदर्शी और दयालु समय की कहानी है।एक दिन किसी देश का राजा चिंता में पड़ गया।उसे देखकर रानी भी पड़ गई।पड़कर रानी ने गुरुदेव को बुला भेजा।हरकारा रवाना हुआ।गुरुदेव बहुत दिनों से ताव खाए पड़े थे।गुरुदेव दरबार से बुलाए जाने के लंबे इंतज़ार में हर आने जाने वाले को शाप दे रहे थे।वे चिंतित थे कि कहीं राजा ने पत्नी, न्याय, नियम आदि की तरह गुरु भी तो नहीं बदल लिया!हरकारे को देखकर हवन कुंड की तरह गुरु का इच्छा कुंड भभक उठा।वे सोचने लगे कि अहा,वह चिंतक ही क्या जिसे सत्ता का सत्तू न मिल सके।हर दार्शनिक का लक्ष्य दरबार की दुंदुभि बनना ही तो है।ऐसे आदि आदि विचार उछालते हुए गुरुदेव ख़याली घोड़े पर सवार थे।हरकारे ने हांफते हुए उनको नीचे उतारा।जल्द पहुंचना था इसलिए हरकारे ने उन्हें जीवित घोड़े पर बिठाया।घोड़ा गधे की भांति चल पड़ा।वह एक सरकारी घोड़ा था।
महल में पहुंचते ही गुरुदेव ने रानी को आनंद के अंतिम छोर पर खड़े होकर आशीर्वाद दिया।वे और देते कि राजा आ गया।आते ही उसने कहा कि ,'गुरुदेव,आज हम चिंतित हैं और कुछ सोच रहे हैं।' गुरुदेव यह सुनते ही दुखी हो गए।अपने दुख को माहौल में स्थापित किया।फिर बोले,'राजन यह तो अनर्थ है।सोचना और चिंतित होना तो प्रजा का धर्म माना गया है।बल्कि उत्तम राजा वह माना जाता है जो प्रजा के लिए सोचने और चिंतित होने के नित नए सुनहरे अवसर मुहैया कराता रहे।यही राजपरंपरा है।ऐसे अवसरों से ही राज्य में चिंतक पैदा होते रहे हैं।फिर भी,आप राजा हैं।कुछ भी कर सकते हैं।बताएँ मुझे किसलिए बुलाया है।'राजा बोला',गुरुदेव प्रजा मुझको क्या समझती है।उसके मन में मेरी कैसी छवि है!क्या आप बता सकते हैं।'
गुरुदेव ज्ञानी तो बहुत थे।मगर यह जानते थे कि जिस ज्ञान से अपनी जान का संकट पैदा हो जाए वह अज्ञान है।बोले,'क्या क्या नहीं समझती है।आपका कहां तक बखान करूँ।' राजा मूर्ख तो बहुत था।मगर यह जानता था कि गुरुदेव हैं तो हमारे ही गुरुदेव।बोला, 'यह भी तो परंपरा रही है कि राजा लोग वेष बदलकर रात में किसी गांव वांव में जाकर सबके मन का हाल मालूम करते थे।क्या मेरा ऐसा करना सिंहासन को शोभा देगा?'गुरुदेव ने मन में अपशब्द निबद्ध अनेक शास्त्रीय बातें सोची।कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सनकी आदमी मुझे भी साथ चलने को कह दे।कुछ देर बाद मन के बाहर गद्गद होकर बोले,'अहा के बाद अहहा भी कि आपने यह कहा।वैसे आपको वेष बदलने की ज़रूरत नहीं है।आपको अनेक वर्षों से जनसमुदाय ने देखा ही नहीं है।फिर भी सावधानी बरत कर जाना ही उचित होगा।अब पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रजा का रवैया कैसा रहेगा।अजातशत्रु शब्द में भी शत्रु तो लगा ही है।प्रजा के रवैये के बारे में ग्लोबलम् उपनिषद में कहा गया है,' मीडिया न जानाति कुतो मनुष्य:।'
रानी ने तिलक लगाया।राजा निकल पड़ा।रानी ने बहुत दिन बाद ऐसी सांस ली जिसे चैन की सांस कहा जाता है।जिन पत्नियों के पति अधिकतर घर में ही रहते हैं वे इस सौभाग्य का अनुभव कर सकती हैं।दांम्पत्य दुर्दशा पुराण में ऐसी बातें विस्तार से लिखी गई हैं।बहरहाल,यह ताकीद कर दी गई कि किसी को कानोकान भी ख़बर न हो।आंखोआंख का तो सवाल ही नहीं उठता।
राजा ने अपने अत्यंत प्रिय वेषभूषाकार से अपना चेहरा मोहरा बदलवाया।चुपके से निकल पड़ा।राजा को ज़मीन पर पांव रखने में कष्ट तो हो रहा था,मगर उसे प्रजा की गर्दन पर पांव रखने का परंपरागत अभ्यास था।उसे ख़ास अटपटा भी नहीं लग रहा था।जब रात जैसी रात हो गई तब राजा एक गांव जैसे गांव में जा पहुंचा।वहाँ कुत्ते भौंक रहे थे।राजा यह जानकर ख़ुश हुआ कि हमने सबको अभिव्यक्ति की आजादी दे रखी है।महल में राजा को शिक्षा के दौरान प्रजा के जो पर्यायवाची रटाए गए थे उनमें कुत्ता और सुअर सबसे ऊपर थे।
राजा अब उस जगह की तलाश में था जहां भीड़ जैसे लोग मिलें।राजा उदार था।भीड़ और भेड़ जैसे शब्दों से उसे प्यार था।भेड़िया शब्द का तो वह आदर करता था।कुछ दूर पर सामने लोग दिखे।वह विनम्रता की मूर्ति बनकर आगे बढ़ा।राज्य में सर्वाधिक विनम्रता राजा की मूर्तियों पर ही दिखती थी।राज्य मूर्तियों के सहारे ही आगे बढ़ रहा था।राजा ने देखा।सामने एक चौपाल ।चौपाल में भीड़ जमा थी।वह निकट जाकर बोला,'भाइयो ,मैं राह भटक गया हूं।क्या आप सबसे बात करते हुए यहाँ रात बिता सकता हूं।'चौपाल के लोगों ने एक दूसरे को एक दूसरे की तरह देखा।राजा के लिए जगह बना दी गई।पानी वानी आया।उसने पिया।कुछ ताज़ा पानी अपनी आंखों में डाल लिया।ताज़ा पानी आंखों में मरने की प्रक्रिया में लग गया।कुछ हल्की फुल्की बातें शुरू हुईं।राजा आवाज़ बदलने में भी निपुण था।आवाज़ बदलकर पूछने लगा,'भाइयो,सुना है आप के गांव में कुछ किसानों ने आत्महत्या की है।ऐसा क्यों हुआ।क्या राज्य की व्यवस्था ठीक नहीं है?' एक बुजुर्ग कहने लगा,'ओ मेहमान भाई।आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं।वे इस लटकने के फल की इच्छा नहीं करते।वे जानते हैं कि इस अमर फल का बटवारा करनेवाले आते ही होंगे।और यह भी समझ लो ,जब मौत माता का बुलावा आ जाता है तब कौन रुक सका है।हम तो आभारी हैं राजा जी के कि दिन रात ऐसे बुलावों का शिलान्यास करने में व्यस्त रहते हैं।संतजन कह गए हैं कि चलो बुलावा आया है।'इतना सुनते ही सारी चौपाल ने हाथ जोड़ लिए और जयकारा भी लगाया।
राजा भक्ति भाव में डूब गया।खुश होकर बोला,'वाह।आप लोग कितने होशियार हैं।दार्शनिक हैं।फिर भी कुछ तबकों द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि देश का राजा सेठों महाजनों के पीछे पीछे चल रहा है।'राजा का वाक्य पूरा होते होते चौपाल में सबने अपने कानों पर हाथ रख लिए।कि उफ, हम ये बातें सुन भी नहीं सकते।एक युवक आवेश में कहने लगा,'ओ परदेसी भाई।ऐसे सवाल उठाने वालों को इस राज्य का कानून उठा क्यों नहीं लेता।इसीलिए राजधानी में बार बार भूकंप आता है।गैया के सींग पर टिकी धरती मैया भी ऐसा झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाती।तुम पहले बात को समझो।हर वक्त जो चालू है वही चलता है।कहा गया है--महाजनो येन गता स पंथा:।महाजन सेठ पूंजीधर व्यापारी जिस पथ पर चलें वही पथ है।बाकी सब लथपथ है।इसलिए हमारे राजाजी इनके पीछे चल रहे हैं।मैं तो कहता हूँ  यह लिख देना चाहिए जगह जगह कि विकास के वास्ते महाजन के रास्ते। समाज के हर रास्ते को किसी न किसी पूंजीधर के नाम कर देना चाहिए।दुख की बात है कि अभी भी राज्य के बहुत कम मार्गों पर ऐसा हो सका है।मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे राजाजी ने इस मामले में कोई कोताही की है।ना ना।ऐसा सोचना भी पाप है।वे तो चौबीस घंटे इस काम में लगे हैं।हमारे भीतर ही कोई खोट है जो इसकी गति धीमी है।'राजा ने मन ही मन तय किया कि वापस लौटते ही इस काम को गतिमान करना है।चुपके से इस युवक को बुलाकर दरबार में कोई ज़िम्मेदार पद देना है।ये प्रजा के मन की बातें हैं।प्रजा की भावनाओं को समझना ही राजा का पहला धर्म है।
राजा इतना प्रसन्न हुआ कि उसका मन किया असली भेस में आ जाए।मगर इच्छा को दबा लिया।कहने लगा ,'इसी कारण यह राज्य उन्नति कर रहा है प्रजा और राजा मिलकर एक जैसा ही  सोच रहे हैं।अब चलना चाहिए।बातों बातों में रात खत्म होने को आई।' एक अधेड़ ने हाथ जोड़ लिए 'साहेब क्या उम्दा बात कही।जब अंधेरा होता है तब हम अंधेरा दूर करने की बातें करने लगते हैं।'तभी एक अन्य ने अधेड़ को रोक कर कहा,' वो तो ठीक कहा ।मगर कुछ करना भी चाहिए।हमें मनुष्य जीवन मिला है। ओ मेहमान जी,अभी कुछ रौशनी कम है।रुकिए,हम निकट के गांव में आग लगवाने का इंतजाम करते हैं।ताकि कुछ तो उजाला हो सके।'
राजा ख़ुश हुआ।जाड़े में हाथ तापने और सरकारी गश्त के समय रौशनी करने का यह पुराना तरीका था।थोड़ी ही देर में रास्ते पर रौशनी दिखने लगी।राजा जलते गांव की रौशनी में अपना लिखा राज्यगीत गाता हुआ आगे बढ़ चला।
अब चौपाल पर सारे लोग अपना अपना मेकअप उतार रहे थे।एक बुजुर्ग दिखते आदमी ने कहा,' आप सब दरबारियों ने अच्छा अभिनय किया।ख़ैर हमको अभ्यास भी है।हम बरसों से यही करते चले आए हैं।ऐसा करो,अब असली गांव वालों को रिहा कर दो जो सुबह से बंधक पड़े हैं।' एक युवक बोला',चाचा आप जान कैसे गए थे कि राजासाहब यहीं आएंगे।'बुजुर्ग हंसा,' ऐसा है ,राजा की चाल से ही अंदाजा लग जाता है कि वह कहां जा रहा है।'


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