एक इंसान अकेले ही सारा काम नहीं कर सकता। काम को पूर्णता के साथ करने के लिए उसे एक सहायक" की जरूरत होती है। जबकि कार्य-निष्पादन की गति और स्थिति का सहायक की गति और स्थिति से क्या तालमेल है वह प्रतिष्ठित व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ की रचना "सहायक पर निबंध" में साफ-साफ परिलक्षित है। आप भी इसका आनंद लें।
सहायक पर निबंध
सुशील सिद्धार्थ
वह एक कामयाब सहायक है।कामयाब सहायक वही है जो अपने साहब के हर काम में सहायक हो।सुख में सब साथ रहते हैं।जो दुख में रहे वही साथी।इसी तरह जो अक्लमंदी में साथ रहे उसको क्या गिनना।न तीन में न तेरह में।जो बेवकूफी में वफादारी करे वही अच्छा सहायक माना जाता है।प्रायः अच्छा सहायक अपने साहब को बेवकूफ मानकर चलता है।अच्छा सहायक अपनी अच्छाई से साहब को बेवकूफ बनाकर छोड़ता है।सहायक अचानक इतना महान नहीं बना।वह झिड़की उपेक्षा लानत बेइज्जती प्रपंच की पंचाग्नि में तपा।व्यवस्था की ऐतिहासिक गुफा में घुसा।हमारी परंपरा है कि हम पुरानी बातों से सीखकर आगे या पीछे चलते हैं।इस सहायक ने एक पुराने दिलजले का कथन पढ़ा कि मनुष्य एक बार काल के गाल से तो बाहर निकल सकता है लेकिन अगर ईमानदारी मनुष्य को निगलने लगे तो उसकी रक्षा कोई मंत्र तंत्र यंत्र नहीं कर सकता।उसकी रक्षा केवल षड़यंत्र ही कर सकता है।रक्षा न हो पाए तो नाश निश्चित है। सहायक ने विचार किया कि अगर सब नाश ही हो गया तो हम क्या चटनी पीसेंगे।साहब लोग हैं तभी हम हैं।यह न रहा तो हमारा क्या होगा।सहायक का यह सोचना ठीक था।कुछ लोग सोचते बहुत हैं करते कुछ नहीं।वे धरती पर बोझ से अधिक हैं।उत्तम नर वे हैं जो सोचने के साथ करते भी हैं।सोचा घोटाला करना है कर दिया।हत्या तो सोचने से पहले कर दी।बलात्कार तो सोचातीत है और हर बालिग नाबालिग पुल्लिंग का समाजसिद्ध अधिकार है।सहायक भी सोचने के साथ करने वाला ऐसा ही महान भारतीय था।उसने सोचा कि बॉस हमेशा सही होता है।इस सोच पर मोच आए इससे पहले कर्मभूमि में कूद पड़ा।भागा।फिर उसने मुड़कर नहीं देखा इस मुहावरे को विकसित किया।यानी किसी ओर भी कहीं भी नहीं देखा।वह प्रवीण हो गया।साहब के हर समारोह में वींणा बजाने लगा।साहब निर्णय लें इससे पहले तारीफ करने लगा।साहब के पांव में रुखाई दिखे इससे पेशतर घानी का शुद्ध तेल लगाने लगा।घानी का तेल चुनने के दो राष्ट्रीय कारण हैं।पहला यह कि बॉस के चेहरे पर भले ही रुखाई दिखे पैरों पर नहीं दिखनी चाहिए।आचरण भले धुंधला हो चरण चमकने चाहिए।दूसरा यह कि अच्छा सहायक साहब को कोल्हू का बैल बनाए रखता है।आज वे कोल्हू तो न के बराबर दिखते हैं अलबत्ता कोल्हू के बैलों की संख्या बढ़ रही है।फिर सहायक ने व्यवस्था विभ्रम नामक सेमी आयातित ग्रंथ के पृष्ठ उलट पलट कर देखे।उसमें लिखा था कि वैसे तो हर साहब गलती करता है लेकिन साहब को गलती करने में मज़ा आने लगे यह बिना सहायक की मेहनत और क़िस्मत के नहीं होता।गलती करने वाले साहबों को आईएएस और पीसीएस लॉबी भी देवतातुल्य आदर देती है।सहायक ने यह बात भी गांठ बांध ली।इसके बाद वह दफ्तर में सब पर सवारी गांठने लगा।उसने कई कीर्तिमान बनाए हैं।मैं उससे मिलकर जीवन के कुछ और रहस्य जानना चाहता हूं।वह समय नहीं दे रहा।वह समय का सहायक है।जिसका समय निकल जाता है उसे विनम्रता से लात मारकर बाहर निकाल देता है।
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