शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें
संजय कुमार कुंदन

22 अक्टूबर 2016 को पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान में महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास हर बार की तरह साहित्यिक गोष्ठि "दूसरा शनिवार" का मुक्ताकाश में शाम के चार बजे कार्यक्रम चल रहा था और ख्यात शायर संजय कुमार कुंदन अपनी बेहतरीन नज़्मों एवं गजलों के साथ थे। ' बेचैनियाँ ' "एक लड़का मिलने आता है" और "तुम्हें क्या बेकरारी है" के गजलकार को नजदीक से बैठकर सुनने का जो मजा है वह कहीं और कहाँ? उनकी गजलों के शब्दों एवं भावों में सुनते सुनते खो जाना श्रोताओं के लिए बडी बात नहीं है। आज प्रस्तुत है आपके लिए उनकी कुछ गजलें, जिसका आस्वादन आप भी करें।

ग़ज़ल

आज  फिर  रस्मो-राह  हो   जाए
दिल  ज़रा-सा  तबाह   हो   जाए

ये तो मुमकिन नहीं के उल्फ़त में
जाँ  न दें  और  निबाह  हो  जाए

दिल को आती है जो ये पगडंडी
चल  दे   तू  शाहराह   हो   जाए

आज बदला हुआ मिज़ाज है कुछ
इक करम   की  निगाह  हो  जाए

कौन  हसरत  थी  जो   हुई   पूरी
कैसे   पूरी   ये    चाह  हो   जाए

दिन भी  कट  जाए तो ग़नीमत है
और  बसर  कैसे  माह  हो  जाए

वैसे  'कुन्दन' ने  ये  बताया  नहीं
चाहता   था    तबाह   हो   जाए

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ग़ज़ल

कुछ  बात है ऐसी  जो  कही ही नहीं जाती
छुप  बैठी  है  आँखों में  नमी ही नहीं जाती

ख़ामोश रह, इज़हार न कर अपने ग़मों का
फ़रियाद  ग़रीबों की  सुनी  ही  नहीं  जाती

आने को  तो आते  हैं ख़यालात बहुत   से
कहने  के बाद  तिश्नालबी  ही  नहीं  जाती

संजीदा ज़माने को  यही  हमसे शिकायत
होंठों पे जो ठहरी  है हँसी  ही  नहीं  जाती

हों दोस्त के दुश्मन हैं सभी बर-सरे- पैकार
और जंग कोई  हमसे  लड़ी  ही नहीं जाती

कुछ तल्ख़ तजरबों से नज़र हो गई धुँधली
माज़ी  की  वो  तहरीर  पढ़ी  ही नहीं जाती

वादा कोई करते हुए  डर जाता है 'कुन्दन'
जो  बात  न  पूरी  हो  कही  ही नहीं जाती

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तिश्नालबी- प्यास,बर-सरे- पैकार-लड़ने को उतारू,तल्ख़- कटु, तजरबों- अनुभवों,माज़ी- अतीत,तहरीर- लेखनी.

ग़ज़ल

ये दुनिया है  आनी-जानी  कब  तक हम को  भरमाए
शायद दरिया पार ही बेकल मन को थोड़ा चैन आए

आने-जानेवाला मौसम उजले-काले तन का रोग
सच्चे  जज़्बों  का  एक  लम्हा बादे-फ़ना भी  जी जाए

हम उजड़े लोगों की  कोई बस्ती- गाँव , न शह्र कोई
हमको सलीक़ा बस जाने का कोई भला क्यूँ समझाए

बेहतर है तुम देख के हमको अपनी नज़र को फेर ही लो
हम इसके क़ायल ही नहीं हैं  सर ये कहीं पे झुक जाए

उस पागल को देख के हम भी बचपन में कुछ हँसते थे
आईना अब  हमपे  हँसकर  अक्स उसी  का दिखलाए

गाड़ी,सोफ़ा, दौलत, बँगला, ओहदा, कुर्सी, ताक़त, नाम,
कितना भी कुछ दे दे लेकिन आँख का पानी
ले जाए

दिल तो  पारा-पारा  बाँटा , अब क्या  जाँ भी बाँटोगे
'कुन्दन जी' क्यूँ ठहरे हुए हो?कौन तुम्हारे पास आए

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ग़ज़ल

तनहा-तनहा   लफ़्ज़   मिलेगा,  पारा-पारा  तहरीरें
कड़ियाँ जब बिखरेंगी इक दिन, टूटेंगी जब ज़ंजीरें

कौन किसी को पूछनेवाला, कौन किसी का है महरम
तनहाई  की नागन आकर  डंस  जाती  सब तक़दीरें

इक कमरा तो भरा हुआ है,इक कमरा वीरान बहुत
इक में ख़्वाबों का कोलाहल, इक से गुम  हैं ताबीरें

कोई समझाएगा हमको जीवन भर का क्या हासिल
चारों जानिब एक ख़ला है, कहाँ  गईं  सब तदबीरें

बंदिश पे तो नाज़ बहुत था नपा-तुला था हर मिसरा
प्रेम के गीत ने तोड़े बंधन  नाच उठीं कितनी हीरें

तेरा दर्पण एक जज़ीरा  जिसमें बस  तेरा ही राज
दर्पण तोड़ो,  मिल  जाएँगी  तुझको  हज़ारों  जागीरें

" 'कुन्दन जी' कब चुप रहते हैं," सब कहते हैं, जाने कौन
उनकी  है  गुफ़्तार में चुप्पी,  ख़ामोशी में तक़रीरें

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पारा-पारा  तहरीरें - टुकड़ा टुकड़ा लेखनी,महरम-अंतरंग, ताबीरें - स्वप्नफल,ख़ला-शून्य मिसरा- पंक्ति, जज़ीरा- टापू,
गुफ़्तार- बोली

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