साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का एक महत्वपूर्ण स्थान है। गजल सुनना जितना अच्छा लगता है लिखना उतना ही श्रमसाध्य। साथ ही गजल की सफलता तभी मानी जाती है जब वह न सिर्फ सुनने वाले को सम्मोहित कर ले बल्कि अपने संवाद को भी उद्देश्यपूर्ण तरीके से लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा सके। तो आज आनंद लेते हैं ख्यात गजलगो संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलों का।
ग़ज़ल
गरचे दुनिया में हैं हम जैसे गुनहगार कहाँ
हमको तुझ जैसे मसीहाओं की दरकार कहाँ
ज़िन्दगी, तेरे ही तानों से तो आजिज़ होकर
ख़ुद को हम बेचने आए हैं, ख़रीदार कहाँ
शह्र में अब तलक गरचे है वही रस्मे-सितम
दिल को जो लुत्फ़ दें अब वैसे सितमगार कहाँ
तेज़ था शौक़ का व्योपार, सुना तो आए
बढ़ गईं सारी दुकाँ, गुम हुआ बाज़ार कहाँ
हमने सोचा था सुकूँ में कहेंगे हम भी कुछ
एक लम्हे के लिए भी मिला क़रार कहाँ
शाम भी अब ज़रा कतरा के गुज़र जाती है
दिन को भी शाम का रहता है इन्तज़ार कहाँ
साथ उजड़े हुए लोगों के रहा है कबसे
हाकिमे-शह्र, वो तेरा है वफ़ादार कहाँ
किस अदा से वो कहे झूठ के दीवाना करे
कर ले तू शायरी, उससे बड़ा फ़नकार कहाँ
तू भी आलम पे भला छाएगा कैसे 'कुन्दन'
तू तो सादा है तेरी ज़ात गिरहदार कहाँ
##############
अब तो यक़ीं भी लगते हैं हमको क़यास से
हर शै को छू लिया है इतना ही पास से
शीशा-ए-तबस्सुम की फ़क़त किर्चियाँ मिलीं
हँसते हुए वो चेहरे मिले हैं उदास से
हम उसके इंतज़ार में इस दरजा मह्व थे
हम देख न पाए उसे गुज़रा वो पास से
इक रात में क्या क्या नहीं उसपे गुज़र गया
आँखें बहुत ही आम, मनाज़िर थे ख़ास से
महफ़िल में तो 'कुन्दन जी' बड़े ख़न्दाज़न दिखे
छुपकर उन्हें जो देखा लगे मह्वे-यास से
########
क़यास- अनुमान, शीशा-ए-तबस्सुम- मुस्कान का दर्पण, मह्व-- तल्लीन, ख़न्दाज़न- हँसता हुआ, मह्वे-यास--दुःख में तल्लीन
____________
तुझको ग़लतफ़हमी थी ऐसी साथ निभाना मुश्किल था
लेकिन तुझको उस हालत में छोड़ के जाना मुश्किल था
तानों में इलज़ाम थे तेरे मेरी शहादत ख़्वाबों पर
एक मुनासिब हल पे इन हालात में आना मुश्किल था
टूट नहीं पाएगा रिश्ता इसपे यक़ीं होने के बाद
हम दोनों के बीच लड़ाई का थम जाना मुश्किल था
तीरन्दाज़ी की यह तेरी मश्क़ बहुत नौख़ेज़ लगी
सख़्त मेरे सीने पे तेरा तीर चलाना मुश्किल था
कितना तू बेबस था उस दम जब तीखे अल्फ़ाज़ कहे
उन झूठे इलज़ाम पे मेरा तैश में आना मुश्किल था
ज़िन्दा रहने की ख़ातिर जब फिरने लगा मैं शह्र-ब-शह्र
यादों की गलियों में पलट कर आना-जाना मुश्किल था
जिसका दावा था कितनों को ज़ेरे-अदब ले आया था
मान लिया उसने 'कुन्दन' को राह पे लाना मुश्किल था
#########
दिल की ही बातें लिखनी थीं लेकिन तूफाँ उतर गया
आज की उलझन कल की मुश्किल का नज़्ज़ारा उभर गया
नर्म , मुलायम उन जज़्बों का एक अजब ये हाल हुआ
कारगहे- दुनिया में उनमें पत्थर- सा कुछ उतर गया
अपनी वो औक़ात कहाँ है फ़ुरसत के कुछ लम्हें हों
इक लम्हा ख़ाली जो गुज़रा ख़ौफ़ सा कोई उभर गया
हम बेढंगे लोग से उसको दौलत ने यूँ खेंच लिया
ख़द्दो-ख़ाल तो हम जैसे थे लेकिन कितना निखर गया
उसको ये ख़ुशफ़हमी है के वो आज़ाद परिन्दा है
वक़्त बहुत हुशियारी से बस उसका पर है कतर गया
अब तो जिधर भी देखते हैं बस ज़िल्लत के ही सामाँ हैं
अब तो इन हालात के हाथों सारा जादू बिखर गया
क्या दोगे 'कुन्दन' को तवज्जो, क्यूँ तुम उसका मान रखो
बेेमक़सद कुछ वक़्त गुज़ारा, ख़ामोशी से गुज़र गया
########
संपर्क:-
संजय कुमार कुंदन
मो०- 9835660910
![]() |
| संजय कुमार कुंदन |
ग़ज़ल
गरचे दुनिया में हैं हम जैसे गुनहगार कहाँ
हमको तुझ जैसे मसीहाओं की दरकार कहाँ
ज़िन्दगी, तेरे ही तानों से तो आजिज़ होकर
ख़ुद को हम बेचने आए हैं, ख़रीदार कहाँ
शह्र में अब तलक गरचे है वही रस्मे-सितम
दिल को जो लुत्फ़ दें अब वैसे सितमगार कहाँ
तेज़ था शौक़ का व्योपार, सुना तो आए
बढ़ गईं सारी दुकाँ, गुम हुआ बाज़ार कहाँ
हमने सोचा था सुकूँ में कहेंगे हम भी कुछ
एक लम्हे के लिए भी मिला क़रार कहाँ
शाम भी अब ज़रा कतरा के गुज़र जाती है
दिन को भी शाम का रहता है इन्तज़ार कहाँ
साथ उजड़े हुए लोगों के रहा है कबसे
हाकिमे-शह्र, वो तेरा है वफ़ादार कहाँ
किस अदा से वो कहे झूठ के दीवाना करे
कर ले तू शायरी, उससे बड़ा फ़नकार कहाँ
तू भी आलम पे भला छाएगा कैसे 'कुन्दन'
तू तो सादा है तेरी ज़ात गिरहदार कहाँ
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अब तो यक़ीं भी लगते हैं हमको क़यास से
हर शै को छू लिया है इतना ही पास से
शीशा-ए-तबस्सुम की फ़क़त किर्चियाँ मिलीं
हँसते हुए वो चेहरे मिले हैं उदास से
हम उसके इंतज़ार में इस दरजा मह्व थे
हम देख न पाए उसे गुज़रा वो पास से
इक रात में क्या क्या नहीं उसपे गुज़र गया
आँखें बहुत ही आम, मनाज़िर थे ख़ास से
महफ़िल में तो 'कुन्दन जी' बड़े ख़न्दाज़न दिखे
छुपकर उन्हें जो देखा लगे मह्वे-यास से
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क़यास- अनुमान, शीशा-ए-तबस्सुम- मुस्कान का दर्पण, मह्व-- तल्लीन, ख़न्दाज़न- हँसता हुआ, मह्वे-यास--दुःख में तल्लीन
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तुझको ग़लतफ़हमी थी ऐसी साथ निभाना मुश्किल था
लेकिन तुझको उस हालत में छोड़ के जाना मुश्किल था
तानों में इलज़ाम थे तेरे मेरी शहादत ख़्वाबों पर
एक मुनासिब हल पे इन हालात में आना मुश्किल था
टूट नहीं पाएगा रिश्ता इसपे यक़ीं होने के बाद
हम दोनों के बीच लड़ाई का थम जाना मुश्किल था
तीरन्दाज़ी की यह तेरी मश्क़ बहुत नौख़ेज़ लगी
सख़्त मेरे सीने पे तेरा तीर चलाना मुश्किल था
कितना तू बेबस था उस दम जब तीखे अल्फ़ाज़ कहे
उन झूठे इलज़ाम पे मेरा तैश में आना मुश्किल था
ज़िन्दा रहने की ख़ातिर जब फिरने लगा मैं शह्र-ब-शह्र
यादों की गलियों में पलट कर आना-जाना मुश्किल था
जिसका दावा था कितनों को ज़ेरे-अदब ले आया था
मान लिया उसने 'कुन्दन' को राह पे लाना मुश्किल था
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दिल की ही बातें लिखनी थीं लेकिन तूफाँ उतर गया
आज की उलझन कल की मुश्किल का नज़्ज़ारा उभर गया
नर्म , मुलायम उन जज़्बों का एक अजब ये हाल हुआ
कारगहे- दुनिया में उनमें पत्थर- सा कुछ उतर गया
अपनी वो औक़ात कहाँ है फ़ुरसत के कुछ लम्हें हों
इक लम्हा ख़ाली जो गुज़रा ख़ौफ़ सा कोई उभर गया
हम बेढंगे लोग से उसको दौलत ने यूँ खेंच लिया
ख़द्दो-ख़ाल तो हम जैसे थे लेकिन कितना निखर गया
उसको ये ख़ुशफ़हमी है के वो आज़ाद परिन्दा है
वक़्त बहुत हुशियारी से बस उसका पर है कतर गया
अब तो जिधर भी देखते हैं बस ज़िल्लत के ही सामाँ हैं
अब तो इन हालात के हाथों सारा जादू बिखर गया
क्या दोगे 'कुन्दन' को तवज्जो, क्यूँ तुम उसका मान रखो
बेेमक़सद कुछ वक़्त गुज़ारा, ख़ामोशी से गुज़र गया
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संपर्क:-
संजय कुमार कुंदन
मो०- 9835660910

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