भावना की गजल में शिल्प की रवानी दिखती है तो कथ्य में जनचेतना से जुडे सवाल। जहां मर्म और चुनौती एक साथ देखने को मिलते हैं। आप खुद भावना की प्रस्तुत गजलों में इसे महसूस करें।
1
नदियों के गंदे पानी को घर में निथार कर
चूल्हा जला रही है वो पत्ते बुहार कर
फुटपाथ के परिंदों की तकदीर है यही
ताउम्र उनको जीना है दामन पसार कर
उड़ने लगी है कल्पना बिंबों की खोज में
कुछ शब्द चल पड़े हैं स्वयं को निखार कर
जो कामयाब होते हैं हर गाम पर सदा
जो हर लड़ाई लड़ते हैं ग़लती सुधार कर
अब तो लड़ाई है मेरी अन्याय के ख़िलाफ़
हर झूठ का रख देंगे हम चोला उतार कर
2
वो मंज़िल से पिछड़ता जा रहा है
मगर फिर भी वो चलता जा रहा है
डुबो कर पूरी धरती चैन लेगा
ये जो बादल बरसता जा रहा है
दिखी है आइने में शक्ल जबसे
हर-इक मंजर बदलता जा रहा है
भला क्यूं छीन लेते हो खिलौने ?
वो बच्चा अब हहरता जा रहा है
ख़बर क्या देख ली चैनल पे उसने
बदन तबसे सिहरता जा रहा है
कभी तो आग निकलेगी यहां से
वो पत्थर को रगड़ता जा रहा है
3
ये गुस्सा फूट लावा हाे रहा है
उन्हें लगता दिखावा हो रहा है
प्रलोभन है कि मांगें पूरी होंगी
मगर यह तो भुलावा हाे रहा है
सुना था स्वर्ग जैसा है ये धरती
यहां फिर क्यों दिखावा हो रहा है
वो पानी में दिखाने चांद लाया
बड़ा अच्छा छलावा हो रहा है
हुई सत्ता की ऐसी ताजपोशी
नगर भर को बुलावा हो रहा है
4
एक-सी होती नहीं हर इक कहानी की वजह
कौन कह सकता है दरिया की रवानी की वजह
वक़्त ने धीरे से आकर कह दिया कुछ कान में
आ गई हमको समझ इस मेहरबानी की वजह
जब जिसे चाहो, उसे सत्ता के मद में रौंद दो
क्यूं भला होती नहीं है हुक्मरानी की वजह ?
पेड़-पौधे काटकर औ तोड़ कर चट्टान को
पूछते हैं वो ही यूं बौराये पानी की वजह
है अड़ा घोड़ा बहुत शतरंज की इस चाल में
है यही राजा की अब तक ज़िंदगानी की वजह
5
कुछ तो लब से कहा करे कोई
मेरी ख़ातिर दुआ करे कोई
तोड़ कर पत्थरों के सीने को
बन के दरिया बहा करे कोई
दिल लगाया है चांदनी से अगर,
रात भर फिर जगा करे कोई
प्रेम बूंदों में ढल के जब आये
कितने दिन तक बचा करे कोई
छोड़ कर चल दिया शहर उनका
बेख़बर हो, रहा करे कोई
ख़ार राहों का फिर न चुभ जाये
बाख़बर हो चला करे कोई
उम्र भर हम किया करें सज़्दा
यूं ही खुल कर हंसा करे कोई
6
देर तक माटी के संग सज़्दा हुआ है धूप में
खेतिहर से बीज तब रोपा गया है धूप में
जेठ की इस दोपहर में नींद क्यूं आती नहीं
वो परिंदा दर-ब-दर क्या खोजता है धूप में
हाथ में रस्सी बंधी है और रुखे बाल हैं
एक पागल बैठ कर क्या सोचता है धूप में ?
गंध होती क्या बदन की, शख़्स क्या कह पाएगा
छांव को जो आशियाना टांकता है धूप में
बूंद माथे की टपक कर दास्तां उसकी कहे
जो फलों औ सब्जियों को बेचता है धूप में
7
पलकों से क्या कहता पानी
आंसू में जब ढलता पानी
जिस रंग में घोलोगे उसको
घुल कर वैसा बनता पानी
कीचड़ रख कर मन के भीतर
ख़ूब कमल-सा खिलता पानी
क्या कहता है तट से जाकर
कल-कल छल-छल बहता पानी
सूरज ने नज़रें क्या डालीं
सात रंग में ढलता पानी
बादल तो उसकी छत पर था,
मेरे घर क्यूं बरसा पानी ?
झील में अक्सर ख़ामोशी से
नाम किसी का जपता पानी
8
अपने बचपन की कहानी आज भी
याद मुझको है जुबानी आज भी
दोपहर की धूप में गुड़ियों के संग
खेलती मुनिया सयानी आज भी
छांव में पीपल के, पंचों की यहां
चल रही है हुक्मरानी आज भी
चाय-बिस्कुट से नहीं करते विदा
गांव में है मेजबानी आज भी
झील में ही अक्स अपना देखता
ये गगन है आसमानी आज भी
9
कई जालों में उलझा आदमी का
कहां रहता ठिकाना आदमी का
दिलों की मिल्लतें होती यहां भी
सहज होता है रिश्ता आदमी का
कभी गिरगिट, कभी गिद्धों की भाषा,
तो कैसे हो भरोसा आदमी का
कोई चाहत, कोई अहसास होगा
सड़क पर ईंट ढोता आदमी का
नहीं भाता है मुझको तिल बराबर
समंदर-सा गरजना आदमी का
मुकद्दर साथ हो, सबकुछ मुमकिन,
ज़माना क्या करेगा आदमी का
10
यूं सरे राह क्या माजरा हो गया
दिल अकेला था, अब आपका हो गया
चैन मिलता नहीं है कहीं भी यहां
एक दूजे से क्या वास्ता हो गया
ढूंढ़ते रह गए, बस, तुम्हारा पता
मुझसे मेरा पता लापता हो गया
जिनकी ख़ुशियों से मतलब नहीं था कभी
उनके ग़म से भी अब वास्ता हो गया
है बदल-सा गया सारा मंजर यहां
पल में कैसा अलग वाक़या हो गया
थीं जुदा मंज़िलें, ख़्वाहिशें भी अलग
क्यूं भला एक-ही रास्ता हो गया
संपर्क:-
bhavna.201120@gmail.com
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| भावना |
1
नदियों के गंदे पानी को घर में निथार कर
चूल्हा जला रही है वो पत्ते बुहार कर
फुटपाथ के परिंदों की तकदीर है यही
ताउम्र उनको जीना है दामन पसार कर
उड़ने लगी है कल्पना बिंबों की खोज में
कुछ शब्द चल पड़े हैं स्वयं को निखार कर
जो कामयाब होते हैं हर गाम पर सदा
जो हर लड़ाई लड़ते हैं ग़लती सुधार कर
अब तो लड़ाई है मेरी अन्याय के ख़िलाफ़
हर झूठ का रख देंगे हम चोला उतार कर
2
वो मंज़िल से पिछड़ता जा रहा है
मगर फिर भी वो चलता जा रहा है
डुबो कर पूरी धरती चैन लेगा
ये जो बादल बरसता जा रहा है
दिखी है आइने में शक्ल जबसे
हर-इक मंजर बदलता जा रहा है
भला क्यूं छीन लेते हो खिलौने ?
वो बच्चा अब हहरता जा रहा है
ख़बर क्या देख ली चैनल पे उसने
बदन तबसे सिहरता जा रहा है
कभी तो आग निकलेगी यहां से
वो पत्थर को रगड़ता जा रहा है
3
ये गुस्सा फूट लावा हाे रहा है
उन्हें लगता दिखावा हो रहा है
प्रलोभन है कि मांगें पूरी होंगी
मगर यह तो भुलावा हाे रहा है
सुना था स्वर्ग जैसा है ये धरती
यहां फिर क्यों दिखावा हो रहा है
वो पानी में दिखाने चांद लाया
बड़ा अच्छा छलावा हो रहा है
हुई सत्ता की ऐसी ताजपोशी
नगर भर को बुलावा हो रहा है
4
एक-सी होती नहीं हर इक कहानी की वजह
कौन कह सकता है दरिया की रवानी की वजह
वक़्त ने धीरे से आकर कह दिया कुछ कान में
आ गई हमको समझ इस मेहरबानी की वजह
जब जिसे चाहो, उसे सत्ता के मद में रौंद दो
क्यूं भला होती नहीं है हुक्मरानी की वजह ?
पेड़-पौधे काटकर औ तोड़ कर चट्टान को
पूछते हैं वो ही यूं बौराये पानी की वजह
है अड़ा घोड़ा बहुत शतरंज की इस चाल में
है यही राजा की अब तक ज़िंदगानी की वजह
5
कुछ तो लब से कहा करे कोई
मेरी ख़ातिर दुआ करे कोई
तोड़ कर पत्थरों के सीने को
बन के दरिया बहा करे कोई
दिल लगाया है चांदनी से अगर,
रात भर फिर जगा करे कोई
प्रेम बूंदों में ढल के जब आये
कितने दिन तक बचा करे कोई
छोड़ कर चल दिया शहर उनका
बेख़बर हो, रहा करे कोई
ख़ार राहों का फिर न चुभ जाये
बाख़बर हो चला करे कोई
उम्र भर हम किया करें सज़्दा
यूं ही खुल कर हंसा करे कोई
6
देर तक माटी के संग सज़्दा हुआ है धूप में
खेतिहर से बीज तब रोपा गया है धूप में
जेठ की इस दोपहर में नींद क्यूं आती नहीं
वो परिंदा दर-ब-दर क्या खोजता है धूप में
हाथ में रस्सी बंधी है और रुखे बाल हैं
एक पागल बैठ कर क्या सोचता है धूप में ?
गंध होती क्या बदन की, शख़्स क्या कह पाएगा
छांव को जो आशियाना टांकता है धूप में
बूंद माथे की टपक कर दास्तां उसकी कहे
जो फलों औ सब्जियों को बेचता है धूप में
7
पलकों से क्या कहता पानी
आंसू में जब ढलता पानी
जिस रंग में घोलोगे उसको
घुल कर वैसा बनता पानी
कीचड़ रख कर मन के भीतर
ख़ूब कमल-सा खिलता पानी
क्या कहता है तट से जाकर
कल-कल छल-छल बहता पानी
सूरज ने नज़रें क्या डालीं
सात रंग में ढलता पानी
बादल तो उसकी छत पर था,
मेरे घर क्यूं बरसा पानी ?
झील में अक्सर ख़ामोशी से
नाम किसी का जपता पानी
8
अपने बचपन की कहानी आज भी
याद मुझको है जुबानी आज भी
दोपहर की धूप में गुड़ियों के संग
खेलती मुनिया सयानी आज भी
छांव में पीपल के, पंचों की यहां
चल रही है हुक्मरानी आज भी
चाय-बिस्कुट से नहीं करते विदा
गांव में है मेजबानी आज भी
झील में ही अक्स अपना देखता
ये गगन है आसमानी आज भी
9
कई जालों में उलझा आदमी का
कहां रहता ठिकाना आदमी का
दिलों की मिल्लतें होती यहां भी
सहज होता है रिश्ता आदमी का
कभी गिरगिट, कभी गिद्धों की भाषा,
तो कैसे हो भरोसा आदमी का
कोई चाहत, कोई अहसास होगा
सड़क पर ईंट ढोता आदमी का
नहीं भाता है मुझको तिल बराबर
समंदर-सा गरजना आदमी का
मुकद्दर साथ हो, सबकुछ मुमकिन,
ज़माना क्या करेगा आदमी का
10
यूं सरे राह क्या माजरा हो गया
दिल अकेला था, अब आपका हो गया
चैन मिलता नहीं है कहीं भी यहां
एक दूजे से क्या वास्ता हो गया
ढूंढ़ते रह गए, बस, तुम्हारा पता
मुझसे मेरा पता लापता हो गया
जिनकी ख़ुशियों से मतलब नहीं था कभी
उनके ग़म से भी अब वास्ता हो गया
है बदल-सा गया सारा मंजर यहां
पल में कैसा अलग वाक़या हो गया
थीं जुदा मंज़िलें, ख़्वाहिशें भी अलग
क्यूं भला एक-ही रास्ता हो गया
संपर्क:-
bhavna.201120@gmail.com

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