मंगलवार, 11 जुलाई 2017

शंकरानंद की कविताएं

शंकरानंद की कविताएं हमारे दिल को छूती हैं. दिमाग को सोचने को विवश करती हैं. और प्रस्तुत करती हैं हमारे सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ के परिदृश्य को. कविताएं नोस्टाल्जिया की गिरफ्त में है जो हमारे बदलाव को रेखांकित करती हैं. कविताएं भविष्य की समस्याओं एवं चीजों से भावनात्मक अलगाव को भी स्पष्ट करती हैं. चिट्ठी की उम्र ही नहीं है बल्कि कैलेंडर से जुड़ा सुख-दुःख और सपना-निराशा भी है. जिंदगी के बहुरंगे–चटक रंग हैं और खुद के लिए बोते कंटीले बीज हैं तो निराशा के दौर में डगमगाता भरोसा है. पढ़ते हैं शंकरानंद की कुछ अच्छी कविताओं को:-


 शंकरानंद



चिट्ठी की उम्र
चिट्ठी की उम्र कितनी होती है
कोई पोस्टकार्ड कोई लिफाफा कोई अन्तर्देशीय पत्र
कितने दिनों तक सुरक्षित रहेगा
कभी ये भी जानने का मन करता है

मेरे पास पहले की बहुत चिट्ठियां हैं बक्से में
कभी उन्हें खोल कर देखता हूं तो
और ज्यादा पुरानी लगने लगती हैं
और ज्यादा कमजोर और ज्यादा निरीह
सालों बाद इनका क्या होगा पता नहीं

अब नई चिट्ठियां कम ही आती हैं
कम ही आता है डाकिया
किसी के लिखे की राह देखना कम हुआ
ये अब पुरानी बात है

कौन इंतजार करे इनके लिखने और पहुंचने का
जब इतने साधन मौजूद हैं चिट्ठियों के विकल्प के रुप में
तब कौन इतना धैर्य रखेगा

मैं भी इससे परेशान नहीं हूं
बस इतना सोचता हूं कि सालों बाद अगर बच्चे
चिट्ठी के बारे में पूछेंगे चित्र देखकर
तब बिना उदाहरण उन्हें कैसे समझाउंगा।

कैलेंडर
मैं दीवार पर टांगता हूं तो बीते दिन याद आते हैं
वे बीते तीस साल
कैलेंडर देख कर कौंध जाते हैं

कैसा भी हो वह
पर सबमें तारीख तो वैसी ही रहती है
वैसे ही छपा रहता है दिन

उसके चित्र तो अलग रहते हैं
लेकिन उनका असर कम होता है
खूबसूरत होने पर भी तस्वीरें तारीखों के दुःख
कम नहीं कर पाती

मैं हर बार नये कैलेंडर शौक से खरीदता हूं
सोचता हूं कि ये पहले से अलग हों
कम तकलीफदेह
पहले के आंसू पहले की उदासी पहले का दुःख इससे नहीं झांके
नहीं झांके पहले की मृत्यु

लेकिन जैसे ही महीना नया आता है
बीता समय आंखों के सामने घूम जाता है
तारीख देखकर वही वही

इसके बावजूद मैं पुराने कैलेंडर नहीं रखता
बदलता हूं हर बार हर साल
क्योंकि इसमें भविष्य का स्वप्न भी दर्ज होता है
जो बताता है कि घबराओ नहीं दोस्त!
ये समय बदल जाएगा।

रंग के चोर
इतने से डिब्बे में रंग भरा है
जितने डिब्बे उतने रंग उतना मौसम उतने स्वप्न
जरा सा उड़ेल दो तो
सन्नाटा भी फूल बनकर खिल जाएगा

ये डिब्बे लेकिन पता नहीं कहां गुम होने लगे अब
पहले तो रंग बहुत थे जीवन में
फिर धीरे धीरे सिमटने लगा सबकुछ
उदासी बढ़ी दुःख बढ़ा मृत्यु का कारण बढ़ा
फिर तो रंग स्वप्न से भी लापता हो गये

ये रंग जरुर किसी न किसी की अलमारी में कैद होंगे
किसी न किसी की जेब में होंगे ये रंग
तभी तो बाहर नहीं दिखाई पड़ते इन्द्रधनुष की तरह

ये आपका रंग सबने मिलकर चुराया
अगर भरना चाहते हैं खालीपन तो तलाशी लीजिए

जो अपराधी होगा वह पकड़ा जाएगा।

पेड़
ओ किसान!
तुम नहीं रोंपो बीज धरती के गर्भ में
नहीं जोतो खेत
अब मत बहाओ पसीना
ये तुम्हारे दुश्मन हैं

तुम कुछ और सोचो जो तुम्हें जिन्दा रहने का मौका देगा
तुम कुछ और करो जो दो वक्त की रोटी दे तुम्हें

ये लोकतंत्र है
जिसके सामने रोओगे वही उठ कर चल देगा
जिससे मांगोगे मदद वही सादे कागज पर अंगूठा लगवा लेगा

तुम जिस पौधे को रोपोगे विदर्भ में
वह दिल्ली में पेड़ बनकर खड़ा मिलेगा
वह सबको छांह देगा और तुम्हें धूप में जलना पड़ेगा

तुम्हें ध्यान खींचने के लिए
उसी पेड़ की टहनी में फांसी लगाकर मरना पड़ेगा
भरी सभा में हजारों लोगों के बीच
और सब इसे तमाशे की तरह देखेंगे

इसलिए कहता हूं कि मत रांपो बींज।

भरोसा
पहचानी सी आवाज को खोज रहा हूं
नयी जगह में हवा भी अलग है
पानी भी अलग
भाषा अलग है

जिन सड़कों पर चल रहा हूं ये भी पता नहीं कहां ले जाएंगी
हाथ के नक्शे और शहर में महीन फर्क है
पूछने पर अलग जवाब मिलते हैं
ऐसे में सहम जाता हूं छोटे बच्चों की तरह

न पिता की उंगली है यहां न मां के भरोसे के हाथ का आसरा
कोई तरीका नहीं जो बता दे कि ये दिशा सही है
इतना रहस्य है इतना धुआं इतना विश्वासघात
कि हर पता गलत निकलता है

ये देश हमें कहां ले जाएगा
अब कोई नहीं बता सकता।
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परिचय:-
शंकरानंद
जन्म-8 अक्टूबर 1983
;खगड़िया के एक गांव हरिपुर मेंद्ध

शिक्षा-एम0,बी0एड
प्रकाशन-आलोचना,वाक,आजकल,हंस,पाखी,वागर्थ,पक्षधर,उद्भावना,कथन,वसुधा,लमही,तहलका,पुनर्नवा,वर्तमान साहित्य,नया ज्ञानोदय,परिकथा,जनपक्ष,माध्यम,शुक्रवार साहित्य वार्षिकी,स्वाधीनता,साक्षात्कार,सदानीरा,बया,मंतव्य,दस्तावेज,जनसत्ता,समावर्तन,परिचय,आउटलुक,दुनिया इन दिनों साहित्य विशेषांक,समय के साखी,निकट,अनहद,युद्धरत आम आदमी,अक्षर पर्व,हिन्दुस्तान,प्रभात खबर,दैनिक भास्कर,अहा!जिन्दगी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।कुछ में कहानी भी।
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से भी नियमित रूप से कविताएं प्रसारित।
कविताओं का कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

पहला कविता संग्रह दूसरे दिन के लिए‘;2012द्धभारतीय भाषा परिषद,कोलकाता से
प्रथम कृति प्रकाशन मालाके अंतर्गत चयनित एवं प्रकाशित।
दूसरा कविता संग्रहपदचाप के साथ‘;2015द्धराजभाषा विभाग के सहयोग से बोधि प्रकाशन,जयपुर से प्रकाशित।
सम्मान-2016 का विद्यापति पुरस्कार

सम्प्रति-अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगड़िया-851204,मो0-08986933049



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