नियति के जाल में
फंसी है सिनीवाली की “अधजली”: सुशील कुमार भारद्वाज
इन दिनों सिनीवाली
शर्मा की कहानी “अधजली” काफी चर्चा में हैं. चर्चा भी वाजिब है क्योंकि ग्रामीण
परिवेश में रची गई यह कहानी जितना सम्वेदनशील और मार्मिक है उतना ही विचारणीय भी.
सिनीवाली ने अपने कुशल कौशल का प्रदर्शन शब्दों के सटीक प्रयोग से कहानी को सहज,
सरल और पठनीय बनाने में किया है. बिम्बों और संकेतों का प्रयोग भी अच्छा किया गया
है. कहानी की कसावट और बुनावट भी काफी चुस्त है.
कहानी “अधजली” किसी
भी तरह से न तो पाठकों का समय बर्बाद करती है और ना ही सिर्फ कपोल-कल्पित दुनियां
की सैर कराती है. यह कहानी यथार्थ की रुखड़ी जमीन पर आर्थिक रूप से बदहाल परिवार
में महत्वाकांक्षा-रूपी विषबीज के पनपने, उसके पुष्पित होने और उससे होनेवाली बर्बादी
को सलीके से बयां करती है. कहानी फ्लाश्बैक तकनीक में है तो नीम का पेड़ कहानी के
शुरू से अंत तक साक्ष्य के रूप में मौजूद है.
कहानी के पात्रों की
बात करें तो इसमें मुख्यरूप से तीन मानवीय और एक परिवेशीय पात्र है. और सभी के सभी
चार अलग-अलग सामाजिक समस्याओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. जितना गुण–दोष मानवीय
पात्रों पर दिया जा सकता है उससे रत्ती भर भी कम दोष परिवेश को नहीं दिया जा सकता
है. घर जितना एकांत में है उतना ही समाज या लोगों से कटा हुआ. जितनी गरीबी और
तंगहाली है उतनी ही बलबती महत्वाकांक्षा. पड़ोसी से तुलना करने की सनक है तो झूठी
मान–मर्यादा और प्रतिष्ठा का दंभ. और सबसे बड़ी बात कि गलत को गलत जानते हुए भी गलत
नहीं मानने की सोच, क्योंकि कईयों ने ऐसा किया है, बाबजूद यह जानते हुए कि ऐसा
करने पर संभावित परेशानियों से इंकार नहीं किया जा सकता है.
दरअसल में यह कहानी
बिहार जैसे पिछड़े इलाके में होने पकरौआ विवाह या जबरिया विवाह या अपहरण विवाह जैसी
कुप्रथा पर आधारित है. इस प्रकार के विवाह में लड़की के घरवाले अपनी पसंद के लड़के
को विवाह की नियत से जोर-जबर्दस्ती करके ले आते हैं और विवाह करके छोड़ देते हैं.
अमूमन धारणा यही रहती है कि लड़केवाले थोड़े बहुत रेर–बहेर और मान–मनौवल के बाद लड़की
को अपना ही लेंगें. आखिर धर्मों में भी तो स्त्री के शरीर पर पहला हक उसके पति का
ही होता है. मौत के बाद भी अग्नि देने का कर्तव्य पति का ही है तो फिर लड़का भागकर
जाएगा कहां? लेकिन इसी बहाने समाज में लड़के के अति-महत्व पर भी सवाल उठाने की
कोशिश की गई है.
खैर, कुमकुम के नसीब
में ऐसी शादी का सुख नहीं लिखा था. शादी के वक्त अपने पति का जो चेहरा देखी, जिसे
देखकर निष्पाप नई दुनियां का ख्वाब बुनने लगी, वह कभी पूरा हो ना सका. अलबत्ता
उसका बेरोजगार भाई महेंद्र सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से तिरस्कार और दुत्कार को
चुपचाप सिर्फ बहन की खुशी की खातिर पीता रहा और घर में लड़केवालों की झूठी बड़ाई और
आश्वासन के गोले फेंकते रहा. लेकिन जब महेंद्र भी टूटने लगा और उसका धैर्य जबाब देने
लगा तो सच जुबान से फिसलने लगा और फिसलने लगा पति के लम्बे इंतज़ार में बैठी कुमकुम
का मानसिक संतुलन. जहां न वह घर की रही ना घाट की रही. उसकी पहचान, उसका अस्तित्व सब
खतरे में पड़ गया. न वह अविवाहित रही न ही विवाहित. अब वह अपने घर में होकर भी
पराये के घर में थी. सामाजिक रूप से मानसिक दबाब महसूस कर रही थी. पड़ोसियों के
ताने जितने उसके कान में खौलते हुए शीशे की तरह महसूस होता था उतने ही तीव्र आवेग
से मानसिक रूप से संघर्ष और सामंजस्य से जूझ रही थी. आखिर वो किसे दोष दे? –खुद को,
जो एक लड़की है, या अपनी गरीबी और तंगहाली को? इस बर्बादी के लिए दोष वह अपनी भाभी
को दे, जिसने इस शादी का प्रस्ताव भाई के सामने रखी थी? या दोष दे अपने भाई को
जिसने अपनी सक्रियता से शादी करवाई थी? लेकिन किसी को वह दोष क्यों दे? कौन उसका
पराया है जिसने जानबूझ कर उसे नरक की जिंदगी में धकेलने की साजिश की? शायद किसी ने
नहीं. यदि लड़के वाले कुमकुम को ले जाते तो सब वाह–वाह कर रहे होते. सभी परिवार को
दाद दे रहे होते क्योंकि उस जैसे लड़के को ब्याह लाना उस परिवार के लिए नामुमकिन
था. तो क्या दोष लड़के का है? उसे कुमकुम को साथ में ले जाना चाहिए था? लेकिन क्यों
ले जाना चाहिए था? क्या लड़के की अपनी जिंदगी और पसंद नहीं थी? लड़के के परिवार की
कोई इज्जत नहीं थी? यदि कुमकुम के घर वाले अपने से बेहतर घर–परिवार का ख्वाब देख
सकते हैं तो लड़केवाले को क्यों नहीं देखना चाहिए? क्यों उसे जबर्दस्ती के वैवाहिक
जीवन को आजीवन ढोना चाहिए था? और वही हुआ. लड़के ने कुमकुम को अपने घर लाने या अपनी
पत्नी मानने से इंकार कर दिया.
और इसके बाद तो
कुमकुम के पिता भी बेटी को विदा किए बगैर ही इस दुनिया से विदा हो गए. अपनी ही
महत्वाकांक्षाओं का शिकार बना परिवार धीरे–धीरे लोग और समाज से कटते तो चला गया
लेकिन कोई ठोस निर्णय न ले सका. निराशा के गर्त में समाते हुए जहां वह खुद को
खेतीबाड़ी में झोंकने लगा वहीं अकेले में शांति चाहते –ना चाहते हुए भी सहानुभूतिपूर्ण
व्यवहार से कुमकुम के विखंडित जीवन के दुःख को दूर करने की कोशिश करती रही.
जहां मानसिक आवेश
में कुमकुम दोषारोपण और मानसिक बिमारियों की शिकार होती गई वहीं शांति और महेंद्र
भी मानसिक रूप से थके हुए और निराश ही थे जो अपनी जिंदगी को नियति के आगे नतमस्तक
हो सबकुछ सहने को तैयार हो गए थे. न कोई आशा थी न कोई उम्मीद. इस बीच तानों से
छल्ली शांति यदि एक बच्चे की इच्छा व्यक्त करती है तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वह पति
के साथ सोना चाहती है बल्कि घर का माहौल बदलना चाहती है. खुशी की एक चिंगारी के
सहारे श्मशान बनते घर में फिर से रौशनी जलाना चाहती है. वंश को आगे बढ़ाना चाहती
है. एक मनुष्य के रूप में अपने जैसे संतति को जन्म दे अपने कर्तव्य का निर्वाह
करना चाहती है वर्ना प्रेमाभाव और अपनत्व के अभाव में खुद को जला कर समाप्त कर लेने
की तैयारी तो कर ही लेती है. भले ही आवेश में कुमकुम उसे कुछ भी कह ले, लेकिन खुद
शांति अपराधबोध से ग्रस्त नहीं है ऐसा तो महेंद्र के बारे में भी नहीं कहा जा सकता
है. क्या कुमकुम खुद के किस्मत को कम दोष देती होगी? सच तो यही है कि नियति को ही
सबकुछ मान आगे के बारे में किसी ने कुछ सोचा ही नहीं. न तो कुमकुम अपने नैतिक और
मानसिक द्वंद्व से बाहर आ नई जिंदगी जीने की कोशिश की, न ही किन्हीं कारणों से महेंद्र
और शांति ने दिलचस्पी ली? सभी एक ही गलती के इर्द-गिर्द खुद की जिंदगी बर्बाद करनी
शुरू कर दी. और जब शांति अपने स्वार्थ में आ अपना घर बसाने चली तो कुमकुम के आवेश ने
उसे तबाही की ओर मोड़ दिया. जबकि शांति के गर्भवती होने मात्र से घर की फिजा बदलने
लगी थी. शांति के साथ-साथ महेंद्र और कुमकुम के चेहरे पर भी एक नई जिंदगी की
खुमारी दिखने लगी थी. कहानी पूरी होकर भी अधूरी है. लेखक बांकी कल्पना पाठकों के
हवाले छोड़ देती है.
इस विषय पर पहले भी न
सिर्फ कहानियां लिखी जा चुकी हैं बल्कि कई क्षेत्रीय फ़िल्में भी बन चुकी हैं. फिर
भी इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि पुराने विषय को नये तरीके से और अलग रेंज
में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है. सिनीवाली कहानी को प्रथम पुरुष और अन्य
पुरुष में संप्रेषित करते हुए पठनीयता को बरकरार रखने में सफल रही हैं.


