गुरुवार, 7 जुलाई 2016

भावना की 'सपनों को मरने मत देना' पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी

  भावना की अपनी ख़ासियत है कि इनकी कविताएँ इन्हीं की जीवनानुभूतियों को प्रकट करती हैं। हर कविता में भावना अपने को रचते हुए पूरी स्त्री-जाति को रच जाती हैं। भावना की स्त्री-जाति आज के पुरुष-समाज को पूरी तरह चुनौती भी देती हैं। ये कविताएँ पुरुष द्वारा किसी स्त्री को अमरत्व की प्रार्थना के बाद का प्रसाद लेने से मना भी करती हैं। इन कविताओं में स्त्री की अपनी शक्ति बार-बार लौटती दिखाई देती है। ये कविताएँ किसी आदिम भय की तरह अपने पाठ के समय हमारे कानों तक नहीं पहुँचतीं बल्कि ये कविताएँ एक डरी हुई स्त्री को उसके डर से मुक्ति का रास्ता दिखाती हुई चलती हैं। पढते हैं भावना की 'सपनों को मरने मत देना' पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी।
भावना

     'सपनों को मरने मत देना'(भावना) : एक अच्छी दुनिया का मतलब समझाती कविताएँ
     ● शहंशाह आलम

कविता का मतलब प्रार्थना के शब्द नहीं होते। मेरा मानना है कि कोई कवि जैसे ही अपनी कविता को प्रार्थना का माध्यम बना लेता है, कविता की मृत्यु उसी क्षण हो जाती है। इसलिए कि कविता-लेखन का अर्थ यह तो क़तई नहीं है कि कवि अपने आस-पास की उन शक्तियों के पक्ष में कविता लिखना शुरू कर दे, जो शक्तियाँ हमारे हिस्से का सबकुछ छिनती चली आई हैं सदियों से। बहुत सारे कवि ऐसा शिद्दत से करते आए हैं। यानी बहुत सारे कवि ऐसा करके कविता को मारते आए हैं। ऐसे बहुत सारे कवियों के होने के बावजूद उन कवियों की सँख्या अधिक है, जो नींद तक में चलते हुए उन शक्तियों के पास नहीं चले जाते, जो शक्तियाँ कुछ लाभ पहुँचाने के बदले में कवि के लड़ने की ताक़त को मार डालते हैं। मुझे समकालीन कविता की कवयित्री भावना की कविताओं को पढ़ते हुए यही लगा। भावना एक ऐसी कवयित्री हैं, जो अपने हिस्से के सपनों को पाने के लिए आवेदन अथवा निवेदन नहीं करतीं। न इसके लिए करुण शब्दों का इस्तेमाल करती दिखाई देती हैं :
   जब भी आती है यह ख़बर
   फिर किसी का नोचा गया है
   ज़िंदा गोश्त
   किसी भेड़िए ने फिर बनाया है
   किसी लड़की को शिकार
   तो सच पूछिए
   स्त्री होने की आत्मग्लानि
   मुझे जीने नहीं देती।

भावना इन पंक्तियों के तुरंत बाद अपने कवि के ज़िंदा होने का सबूत देती हैं :
   सवाल इतना
   कि कैसे जीएगी लड़की
   लेकिन पीड़िता की जिजीविषा
   बोझिल आँखों में उतरते सपने
   और देह के साथ निचोड़ी गई आत्मा
   सुप्त नहीं हुई है
   फ़ोटो पत्रकार कहती है
   'बलात्कार जीवन का अंत नहीं
   मैं लौटना चाहती हूँ काम पर'
   तो सच कहूँ
   हमारे अंदर भरने लगती है
   धरती की ऊष्मा
   प्रकृति की ख़ुशबू
   और स्त्री होने का अहसास।

कविता की ये पंक्तियाँ भावना की सद्य: प्रकाशित कविताओं की किताब 'सपनों को मरने मत देना' से ली गई हैं। संग्रह में भावना की नब्बे के आसपास कविताओं को जगह दी गई है। ये सारी कविताएँ एक स्त्री की मिट्टी, एक स्त्री की थकान, एक स्त्री के पसीने से होते हुए एक स्त्री के ही चाक पर गढ़ी गई हैं। यही वजह है कि इन कविताओं में एक स्त्री की तकलीफ़ इस तरह दिखाई देती है, जैसे हम किसी झील के साफ़ पानी में अपना चेहरा स्पष्ट देख लेते हैं। लेकिन यहाँ दर्ज तकलीफ़ उस स्त्री की नहीं है, जो अपने कमरे को बंद करके रोज़ रोती हैं। ये ऐसी स्त्री की तकलीफ़ की कविताएँ हैं, जो पूरी तरह स्वस्थ है और जिनके स्तनों में अभी दूध भी ख़ूब भरा हुआ है यानी ये कविताएँ एक ऐसी स्त्री की कविताएँ हैं, जो जीवट है, जीवित है और जिसका जीवन वृत्तांत संघर्ष से परिपूर्ण है :
   नदी अब भी तड़पती है समुंदर के लिए
   लेकिन नदी अब समझदार हो गई है
   वह नहीं मिटाना चाहती अपना वजूद
   वह जीना चाहती है
   अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ(नदी/पृ.14)।

भावना की अपनी ख़ासियत है कि इनकी कविताएँ इन्हीं की जीवनानुभूतियों को प्रकट करती हैं। हर कविता में भावना अपने को रचते हुए पूरी स्त्री-जाति को रच जाती हैं। भावना की स्त्री-जाति आज के पुरुष-समाज को पूरी तरह चुनौती भी देती हैं। ये कविताएँ पुरुष द्वारा किसी स्त्री को अमरत्व की प्रार्थना के बाद का प्रसाद लेने से मना भी करती हैं। इन कविताओं में स्त्री की अपनी शक्ति बार-बार लौटती दिखाई देती है। ये कविताएँ किसी आदिम भय की तरह अपने पाठ के समय हमारे कानों तक नहीं पहुँचतीं बल्कि ये कविताएँ एक डरी हुई स्त्री को उसके डर से मुक्ति का रास्ता दिखाती हुई चलती हैं :
   उसे पता है
   सूरज तो आसमान से निकलता है
   किसी की आँखों में कैसे
   पर उसे नहीं मालूम
   सूरज आँख में भी निकलता है
   बशर्ते उसके अंदर बचा हो
   रात के अँधकार को झेलने का जज़्बा(प्यार का सूरज/पृ.23)।

भावना की कविताएँ हमारे भीतर धरती की तरह फैलती हैं। इनकी कविताएँ एक स्त्री के वर्तमान के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। इसलिए कि भावना ने अपने कवि-जीवन में जो कुछ सीखा है, एक स्त्री से ही सीखा है, जोकि दब्बू टाइप स्त्री क़तई नहीं है। भावना जानती हैं कि इस पुरुषवादी समाज से अपना हक़ और अपना हिस्सा लेने के लिए यह ज़रूरी है कि एक मज़बूत स्त्री की पूरी ताक़त के साथ अपने हिस्से की लड़ाई ख़ुद ही लड़नी पड़ेगी। एक स्त्री के लिए ऐसा करना बेहद ज़रूरी भी हो गया है क्योंकि आज पुरुष स्त्री को लेकर अपनी असंवेदनशीलता की हदें पार करने में लगातार भीड़ा दिखाई देता है। उस पर से इस कठिन, जटिल, असहज, क्रूर-कठोर समय अलग ही तरह से इनका पीछा करता दिखाई देता है :
   इससे पहले कि
   तेज़ धूप
   झुलसा दे मेरा चेहरा
   मुझे ढूँढ़ लेनी चाहिए
   भावनाओं की गहन छाँव
   इससे पहले कि
   उबड़-खाबड़ ज़मीन
   थका दे मुझे बुरी तरह
   मुझे तलाश लेनी चाहिए
   एक समतल कोलतार में
   लिपटी सड़क(मेरा अस्तित्व/पृ.17)।

भावना की यह एक अलग तरह की विशेषता है कि संकट आने से पहले अपनी सुरक्षा में लग जाना चाहती हैं। यह भी सुखद है कि भावना ऐसा करने के लिए किसी चतुराई से काम नहीं लेतीं बल्कि बिलकुल सहज और रचनात्मक होकर अपने स्त्री-समाज के लिए एक बेहतर, जीने लायक़ दुनिया को सुरक्षित कर लेना चाहती हैं। अपनी दुनिया को बचाए रखने का किसी स्त्री का यह तरीक़ा मुझे देशज लगता है और कारगर भी। यही कविता का काम भी है कि बिना मार-काट के इस पूरी दुनिया को बचाए रखना, जिस दुनिया को आज हम सब पूरी तरह नष्ट कर देने के लिए उतारू हैं। इतने उतारू हैं कि हम अपने जीवन में बिलकुल अप्रकृत दिखाई देते हैं। अब हम अपने जीवन में न मिट्टी से कुछ सीखते हैं, न किसी पेड़ से, न किसी स्त्री से :
   औरत
   जो ख़ुद एक नदी है
   स्थिर नदी
   जो तोड़ दे अपनी सीमाएँ
   तो आ जाता है सैलाब(औरत/पृ.51)

अथवा,
   मेरी कविता
   नहीं बनना चाहती
   कॉरपोरेट जगत की ज़ुबान
   न ही पढ़ना चाहती है
   किसी के सम्मान में कशीदे
   मेरी कविता
   आज भी पंचायत भवन जाते हुए
   सुस्ता लेना चाहती है
   पीपल की छाँव में
   जहाँ टोकरी भर घास छिल
   गप मारती होती हैं तरुनियाँ(मेरी कविता/पृ.81)।

भावना की कविताएँ कोई नई कविता-प्रवृति, कोई नई कविता-शैली, कोई नई कविता-भाषा या कोई नई कविता-परंपरा भले विकसित नहीं कर पाई हैं, तब भी इन कविताओं को पढ़ते-गुनते हुए हम एकदम से निराश नहीं हो जाते। भावना की कविताओं को पढ़ते हुए हमें इतना अहसास ज़रूर होता रहता है कि ये कविताएँ इतने के बावजूद हमारे भीतर एक नया साहस अवश्य देती हैं। साथ ही, इन कविताओं की कवयित्री के भीतर समकालीन कविता को विस्तारने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं, इससे हम इनका नहीं कर सकते। इसलिए कि कविता-कर्म एक निहायत दुष्कर कर्म है और हर कवि अंतत: अपने इस कर्म को चमकाने-दमकाने के लिए सीखता ही रहता है। भावना भी कविता के इस दुष्कर कर्म से जुड़े रहकर समकालीन कविता को एक नवीनता और एक अनूठापन भविष्य में देंगी, इसे लेकर कविता समाज पूरी तरह आश्वस्त दिखाई देता है। भावना के भीतर कविता को समझने, कविता को बरतने की जो गहराई, जो व्यापकता है, वह तारीफ़ के क़ाबिल है। इसलिए भी कि भावना की कविताएँ मूल्य-केन्द्रित हैं और मानव-केन्द्रित भी। इसलिए भी कि भावना की कविताएँ हमारे सपनों को मरने नहीं देना चाहतीं।
``````````````````````````````````````````````````````
सपनों को मरने मत देना(कविता-संग्रह)/ कवयित्री : भावना/ प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, सी-56/यू जी एफ़-4, शालीमार गार्डेन, एक्सटेंशन-।।, ग़ाज़ियाबाद-201005 (उत्तर प्रदेश), मोबाइल संपर्क : 09546333084, मूल्य : ₹ 225 मात्र।
●●●
शहंशाह आलम

शहंशाह आलम
प्रकाशन विभाग, कमरा सँख्या : 17, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015, बिहार, मोबाइल : 09835417537
 
 
 
 



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें