गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है अवधेश प्रीत की कहानी चाँद के पार एक चाभी



विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : चाँद के पार एक चाभी
-    सुशील कुमार भारद्वाज
अवधेश प्रीत अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को बहुत ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनकी कहानियों में सिर्फ विमर्श ही नहीं होता है बल्कि भूत, भविष्य के साथ-साथ वर्तमान का भी एक प्रतिरूप नज़र आता है. उन्होंने अपनी लंबी कहानी “चाँद के पार एक चाभी” में भी बदलते समय के साथ विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में एक विचारणीय सामाजिक कहानी को ही मूलभूत जातिगत समस्याओं के साथ प्रस्तुत किया है.
इसमें कोई दोमत नहीं है कि बदलते समय और शिक्षा की जागरूकता के बीच विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में जाति-धर्म की दीवारें दरकने लगी है. चाहे इसे निजी स्वार्थ कहें या आवश्यकता, लेकिन परिस्थितियां बदल रही हैं. लेकिन सुदूर कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों, जहाँ जातिवाद गहरी जड़ तक धंसी हैं वहां छुआछूत, शोषण, और दबंगई जैसी समस्याएं अभी भी गंभीर हैं. मुशहरों से लोग एक दूरी बनाये रखने में ही अपने संस्कार की भलाई मानते हैं, विकल्पहीनता की ही स्थिति में वे दलितो के शरणागत होंगे, वह भी उनकी औकात बताते हुए. चाह कर भी कोई उनकी मदद नहीं कर सकता, समाज से कोई भी आदमी किसी और के लिए बेबजह पंगा नहीं लेना चाहता है. यदि कोई नौजवान आगे आएगा भी तो रूढ़िवादी और शक्तिसंपन्न राजनीतिक बुजुर्गों के हथकण्डो को ही भेंट चढ़ जाएगा.
कथा नायक पिंटू भी अपनी वस्तुस्थिति से परिचित है. बदले माहौल में इज्जत की रोटी खाने के लिए लुधियाना से मोबाइल बनाने की कला सीखकर आता है. बूढी माँ की सेवा की खातिर ढिबरी बाजार में ही एक दुकान से अपने जीवन की गुजर बसर करना चाहता है. आगे की पढाई न कर पाने के कसक के साथ किसी-न-किसी किताब और पत्रिका में उलझा रहता है. उसे ऊंच-नीच का भान है लेकिन दिल पर किसका जोर चलता है? तारा खुद मोबाइल बनवाने आयी और खुद ही वह उसे फोन करने लगी, और फिर दोनों के बीच थोड़ी आत्मीयता पनप गई तो इसमें उसका क्या कसूर है? सबों के साथ वह मेलजोल से रहना चाहता है. अपने घर, जमीन, और लोगों को छोड़ कर वह कहाँ और क्यों जाये? वह अपनी सीमा जानता है. छल-प्रपंच की हवा उसे भी है, तभी तो अपने टूटते सपने की तरह राजकुमारी पासिन के भी बिखरते सपने का भान मात्र होने से ही उसके अंदर एक व्यंग्यात्मक दर्द उभरता है– “अभागी को नही पता कि रमेश पांडे उसे छल रहा है. बाभन सब दुआरी मुंह मारेगा, अपने दुआरी झांकने भी न देगा.”
लेकिन रमेश पांडे राजकुमारी पासिन से दगा नहीं करता है. पटना भाग कर मंदिर में शादी रचा लेता है. परंतु मुखिया जी की राजनीति और भ्रष्ट थानेदार की मिली-भगत से उनकी प्रेम कहानी तब भी तबाह हो जाती है जबकि वे पंचायत में भी साथ-साथ जीने मरने की कसम खाते हैं , गुहार लगाते हैं. राजकुमारी के रोने-बिलखने का कोई असर समाज के निष्ठुर ठेकेदारों पर नही पड़ता है और माथा मुड़ाकर सारे गांव घूमने के बाद भुतहा बगीचा में बरगद के पेड़ पर लटकना ही उसकी नियति बन जाती है.
तारा का मोबाइल से बात करते पकड़ाने और किताब मिल जाने के बाद पिंटू की नियति सामान्य तौर पर लिखी जा चुकी थी. दोनों फिर से कुछ साहस बटोर कर कुछ गुल खिलाते उससे पहले ही तारा की शादी करनी थी और इस विषम परिस्थिति में रमेश से बेहतर कोई लड़का चाह कर भी शायद इतनी जल्दी और इस परिस्थिति में नही मिलता. पिंटू भी अपने प्रेम करने की सजा झेलकर तीन महीने बाद बाहर आ गया. इसमें तारा जीवन भर ताना सुनने और घूंट–घूंट कर मरने को ही अपनी नियति मान चुकी. यहाँ एक बिंदु रखना चाहूँगा कि बाभन समाज में अपनी बेटियों के प्रति एक अजीब सहानुभूति देखी जाती है और यहाँ तारा की शादी समाज के द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को दबाने के रूप में देखा जाना चाहिए. क्योंकि तारा के पिता गरीब हैं लेकिन अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझते हैं और उसकी शादी सरयूपार वाले से ही करने की बात सोचते थे.
कथाकार संस्मरणात्मक शैली में कहानी की शुरुआत करते हुए कथानायक पिंटू कुमार के सामाजिक, आर्थिक, मानसिक एवं बौद्धिक परिस्थिति से हमारा परिचय कराते हैं. कहानी बढते हुए जब मूल रूप में आने लगती है तब तक समय काफी बदल चुका होता है, साथ ही साथ पिंटू कुमार की परिस्थिति भी बदल चुकी होती है. पहली बार जहाँ वह संकोचवश या फिर अस्पृश्यता के भोगे हुए दंश की वजह से थोडा असहज महसूस करता है, वहीं दूसरी बार वह आत्मविश्वास से लबालब ही नहीं बल्कि कथाकार से आत्मीय-अधिकार व अपेक्षा के भाव से भी मिलता है. उसका यह परिवर्तन लुधियाना में बिताये समय की वजह से हुआ जहाँ उसे किसी सामाजिक विद्रूपता का सामना नहीं करना पड़ा.
जबकि जाति विभेद से विकृत मानसिकता का ही एक रूप ढिबरी गांव में दिखता है जब रामधारी पासी कहता है “कोई मरे, चाहे जिये. हमरी बेटी ना मिली तो हम केस करेंगे,केस”. तब विशम्भर मिश्रा कहते हैं – “स्साला पासी, बेटी से ताड़ी बेचवाता था, तब ना कुछ सोचा. अब केस–मुकदमा बतियाता है. हम लोग क्या यहाँ चूड़ी पहिन के बैठे हैं, रे मादर....” वहीं मुखिया दिगम्बर मिश्रा ने भी फरमान दिया – “पंचायत के बाहर जो जाएगा, उसको गांव में वास न मिलेगा.” जबकि पिंटू और तारा के मामले में रातों-रात थाना में इस कदर सबकुछ निबटा लिया जाता है कि न किसी पंचायत की जरुरत होती है न किसी का गांव से निर्वासन. इससे एक बात तो स्पष्ट है कि जातिवाद और नियतिवाद दोनों ही सामर्थ्य जनों के सुविधानुसार ही व्यवहृत होते हैं.
कथाकार ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से स्पष्ट किया है कि मनुष्य किस कदर और कब तक दोहरे चेहरे को जीता है? बात चाहे मिश्रा जी का हो, चाहे पांडे जी का हो, या फिर यादव जी का. जन्मजात गाली देने की आदत ना वे छोड़ते हैं ना ही अपना काम निकालने के लिए जी हुजूरी करने से पीछे हटते हैं. मजे की बात तो देखिये कि शुद्दर बाभन का काम नही कर सकता, वह शास्त्र नही जान सकता है. लेकिन रमेश पांडे पिंटू के साथ फोकट की दारू पी सकते हैं, मोबाइल लोग उसके यहाँ बनवा सकते हैं, उसके दिये किराये या रूपये को ही मिश्रा जी जेब में नही रख सकते हैं बल्कि गोतिया को झूठी शानोशौकत और रूतबा दिखाने के लिए सरकारी स्कूल के पास गैरमजरुआ जमीन और संरक्षण भी उसे दे सकते हैं.
हमारे समाज की यही नियति है जहाँ शक्तिसंपन्न लोग अपने इशारे पर कानून को धत्ता बताते हुए निर्बलों को हर तरीके से प्रताड़ित और शोषित करते रहते हैं. इस स्थिति के बदलने में शायद अभी काफी समय शेष है.
 कहानी में एक चुनौती लेखक समुदाय के लिए भी है. आपके उन आदर्शवादी शब्दों के क्या मायने हैं जो चारदीवारियों के बीच कल्पना के उड़ानों पर सवार होकर रची जाती है जबकि यथार्थ की जमीन बेहद ही रुखड़ी और रोंगटे खड़े करने वाले हैं? जहाँ मोबाइल नंबर याद रखने के बजाय उसे सेव करते हैं, और मेमोरी फुल होने पर दूर के परिचितों को लिस्ट से बेदर्दी से बिना कोई अपराध किये उडा देते हैं? क्या सिर्फ पाठकों से सहानुभूति बटोर लेने और उन्हें कोरी कल्पनाओं के सहारे आने वाले समय में शिक्षा और जागरूकता के बदौलत सामाजिक परिवर्तन के सपने बेचते रहेंगें? यदि हाँ, तो फिर इंतज़ार करते रहिये पिंटू कुमार का, जो चाँद के पार फेंके गए उस चाभी को लेने आ रहा है, जिसे उसने अपने जिंदगी की सबसे हसीन हंसी को सात तालों में महफूज रखकर चाँद की ओर उछाल दिया था. वही पिंटू, जो कहानी पर प्रतिक्रिया के बहाने अपनी पीड़ा को शब्द दे रहा है, जो आपकी लफ्फाजियों में खुद के लिए जीवन जीने की एक कला की तलाश तब कर रहा है जब लोग मुशहर को इंसान नहीं समझते हैं, मुसीबत इतनी की कोई चाहकर भी इस नारकीय जीवन से उठ पाने में असहाय महसूस करता हो.
एक बड़ा ही लाजिमी सवाल है – प्यार करने का अधिकार. लेकिन प्रेम करने का अधिकार किसे है? इस सवाल का जबाब सिर्फ एक है – जिसके पास सत्ता है, शक्ति है और जो व्यवस्था में या तो शरीक है या फिर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उसे प्रभावित करने का माद्दा रखता है.
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

शहंशाह आलम की ‘इस समय की पटकथा विद्रूप समय में जीवन के विविध रूपों का संग्रह है(समीक्षा)सुशील कुमार भारद्वाज.



                शहंशाह आलम की ‘इस समय की पटकथा विद्रूप समय में जीवन के विविध रूपों का संग्रह है.

 

 सुशील कुमार भारद्वाज.


शहंशाह आलम की छोटी-लंबी कविताओं से सजी ‘इस समय की पटकथा’ विद्रूप समय में जीवन के विविध रूपों का संग्रह है. इसमें एक तरफ जीवन का प्रस्फुटन है, कल्पना की उड़ान है तो दूसरे तरफ आत्मा तक को तड़पाने वाली जीवन की सच्चाइयां. 48 कविताओं का यह संग्रह ‘कोई जादू कोई कौतुक’ तथा ‘आदिकालीन समय को जीते हुए’ शीर्षक के रूप में दो भागों में बंटा है. पहले हिस्से में 29 कविता है जो जिज्ञासा, कौतुहल और जिजीविषा को समेटे हुए हैं. कवि ने अपने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए प्रकृति के बहाने जीवन के विविध पहलू को उकेरने की कोशिश की है. जीने की लालसा है जो मरने नहीं देती है, ‘खानाबदोश’ की तरह अपने पूरे अस्तित्व को समेटे इधर-उधर भटक सकते हैं लेकिन पलायन नहीं. फिर चाहे कोई घास की तरह बर्बरता से काट कर फ़ेंक क्यों न दें, वे फिर उग आएंगें उन असंख्य घास की तरह. वर्तमान समय की जटिलताओं के बीच जीवन का निर्वाह इसलिए हो पा रहा है क्योंकि मानवता रूपी ‘नदी’ संगीत के रूप में अभी भी शेष है.

कितना अजीब है कि हम अपनी पृथ्वी पर जीवन जीने में कठिनाई महसूस करते हैं और ‘मंगलग्रह’ पर जीवन की तलाश एक कौ़तुहल और ढेरों अपेक्षाओं के साथ करते हैं. जीवन के सुनहले ख्वाबों को सजाने के लिए लड़कियां आगे बढती हैं लेकिन मंजिल का एहसास होते ही सोचतीं हैं आगे बढने से क्या होगा? एक पिता हैं जिनके झोले में असीम प्रेम, सान्तावना, शांति, सुरक्षा और संभावनाएं समायी हैं. बैंड पार्टी वाले भी अपने दुखों को छिपाकर हमारी खुशियों में शरीक होते हैं लेकिन हम क्या कर पाते हैं? ‘खीरा’ आदि कुछ कविताओं का स्वर कौतुहल से शुरू होता है लेकिन दुःख–दर्द का एहसास इसे गंभीर ब
ना देता है. संग्रह के दूसरे हिस्से में
19 कविताओं का स्वर हताशा–निराशा और शोकगीतों से भरा है. चाहे जीवन के निष्क्रियता को दर्शाती ‘सबके भीतर बर्फ’ हो या फिर लोकतंत्र की तबाही को रेखांकित करती ‘जनतंत्र का शोकगीत’. संग्रह की सबसे लंबी कविता “जेबकतरियों की कविता” में जेबकतरने वाली लड़कियों के विभिन्न मनोभावों को बेहद ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है.

कुछ कविताओं को अलग रखें तो सहज शब्दों में गूढ़ अर्थों को उभारने की कोशिश भी संग्रह को खास बनाता है.

पुस्तक :- इस समय की पटकथा , कवि :- शहंशाह आलम

प्रकाशक :- शब्दा प्रकाशन , पटना , पृष्ठ :- 130  ,मूल्य :- 150/-                          

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

गीताश्री की कहानी सोनमछरी दैहिक प्रेम पर निःस्वार्थ प्रेम की जीत है (सुशील कुमार भारद्वाज )



सोनमछरी: दैहिक प्रेम पर निःस्वार्थ प्रेम की जीत

                                     
  -सुशील कुमार भारद्वाज
स्त्री अस्मिता के अनछुए पहलुओं पर बेबाकी से लिखने वालों में गीताश्री का नाम अहम है. लंबे समय से पत्रकारिता एवं साहित्य से जुडी लेखिका का अनुभव फलक इतना विस्तृत है कि उन्हें सिर्फ स्त्री विमर्श या किसी और विमर्श तक में सीमित करना उचित नहीं है. वे अपने पात्रों को स्त्री–पुरुष मानने की बजाय उसे सिर्फ पात्र मानती हैं और परिस्थिति के अनुसार न्याय करती हैं. खालिस आदर्शवाद की बजाय वो मनोवैज्ञानिकनी यथार्थ को तवज्जो देती हैं.
गीताश्री की कहानी “सोनमछरी” चयन के अधिकार और बेमेल विवाह के बीच संकरे आर्थिक गली से गुजरती है. जहाँ एक तरफ धोखा है तो दूसरे तरफ बेबसी. किसी को बदल देने की जिद्द है तो स्वयं ही बदल जाने की नियति. कुछ श्राप का भ्रम है तो कुछ अपनी अपरिपक्वता में लिए गए निर्णय का पश्चाताप. अंत में है दैहिक प्रेम पर निःस्वार्थ प्रेम की जीत, और उद्देश्यपूर्ण जीवन.
गौर करने वाली बात है कि लेखिका पत्रकारिता में बीडी व्यवसाय एवं बीडी मजदूर पर गहन रिपोर्टिंग कर चुकी हैं. अतः संभव है कि सोनमछरी कहानी का बीजारोपण उसी अनुभव की परिणति हो. खैर कहानी फ्लाश्बैक में तीव्र गति से बगैर विशेष रायता फैलाये आगे बढती है. जहाँ शंकर लड़की की बीडी बनाने की कला के बारे में जानकारी लेने के बाद ही शादी के लिए हामी भरता है. शंकर के नजरिये से शादी का मतलब है - स्त्री-पुरुष का दैहिक मिलन और बीडी बनाने के सामाजिक पेशे में ही रम कर सारे सुखों और दुखों के बीच जीवन का पूर्ण निर्वाह. जहाँ न चुहल करने के लिए अवकाश है, न ही अपने आर्थिक स्थिति को विस्तार देने की चाह है और न ही सेफ जोन से बाहर जाकर कुछ नया कर गुजरने की प्रेरणा.
भारतीय समाज में एक कहावत है “किसी लड़की की शादी में झूठ बोलना ठीक वैसे ही गलत नहीं है जैसे महाभारत में युद्धिस्थिर का झूठ बोलना”, और वे सोचते हैं कि स्त्री में वह शक्ति है जो किसी भी व्यक्ति और परिस्थिति पर शासन कर सकती है. जिसके परिणाम को हम रुम्पा के उस रूप में देख सकते हैं जिसमें वो अपने मायके से लायी कहानियों में शंकर को उलझा कर शारीरिक संसर्ग से महीनों दूर ही नहीं रखती है, बल्कि बीडी बनाने के काम को छोड़ कर मछली मारने को विवश भी करती है.
घर की शांति और सफल गृहस्थ जीवन की चाह में हार मानकर खुद को बदलने की गरज से शंकर जब मछली मारने के लिए तैयार होता है तब रुम्पा के ह्रदय में समायी अंतहीन भावनाएं मुखर हो विजय घोष को पूरे जांगीपुर में फैलाने लगती हैं. उसके अंदर का नासमझ लालच इस कदर फुंफकार मारता है कि शंकर अपने पहले दैहिक सुख को पाने के आश्वासन मात्र से काल्पनिक दुनिया में खोकर बेबस मन से ही सही लेकिन गंगा के लहरों से जूझने चला जाता है.
इंसान तब सबसे ज्यादे दुखी होता है जब उससे कोई चीज छीन लिया जाय, चाहे वह वस्तु उसके नज़र में कितना ही तुच्छ क्यों न हो? रुम्पा का दुख-दारुण होना, और उसी बीडी व्यवसाय में अव्वल होना जिससे नफ़रत हो, उबकाई आती हो, नियति का रहस्योद्घाटन करता है. यदि रुम्पा अपनी जिद्द में न बहकती तो क्या यह परिस्थिति संभव था? कहा जाता है जब इंसान दुखी होता है तभी उसे प्रेम होता है, वह जीवन की सच्चाइयों से वाकिफ होता है, वह उन्नति के मार्ग की ओर बढ़ता है. लेकिन यह भी सच है कि रुम्पा को नयी खुशी भी इसी बीडी व्यवसाय में लगे अमित दास से मिलती है. जिससे मछली का उसका चयन गलत साबित होता है. लेकिन यह हमारे बदले एवं उन्मुक्त वातावरण का असर है, जहाँ छटपटाहट है मुक्ति का, उन्मुक्त जीवन जीने का, आसमान को किसी भी कीमत पर छूने का.
लेकिन बंग्लादेश की जेल से साल भर की यातना झेलने के बाद जब शंकर वापस आया तो उसकी दुनिया उजड चुकी थी, उसका दोष क्या था? नियति को उसी से सारा दगा करना था जो निर्दोष था? उसने शांति से जीवन जीना चाहा, क्या यह था उसका दोष? पत्नी की खुशी की खातिर खुद को बदल लेना गुनाह था? रुम्पा के माता-पिता ने झूठ बोला और उनकी शादी करवा दी, उसकी सजा सिर्फ शंकर को मिलनी चाहिए? रुम्पा न तो शंकर का चयन की थी न ही उसके व्यवसाय और आर्थिक स्थिति को, तो इसमें उसका क्या दोष था? रुम्पा का कष्ट तो उसके माता-पिता या उसका खुद का चयन था, लेकिन शंकर का कष्ट किसका चयन था?
माना कि बाद में बीडी का चयन उसकी नियति थी, लेकिन अमित का चयन किसका था? क्या उसका काल्पनिक दुनियां चकनाचूर हो चुका था? क्या वो व्यावहारिक हो चुकी थी? नियति को चुनौती देने का सामर्थ उसमें आ चुका था या उससे समझौता कर चुकी थी? कहीं रुम्पा का ये यथार्थ से पलायन तो नहीं? उसमें शंकर के सवालों का सामना करने का साहस नहीं?
मानवीय दृष्टिकोण से जो गलत हुआ लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो रुम्पा ने अमित का चयन सही ही किया, इससे सिर्फ एक इंसान, शंकर, की जीते जी मौत हुई वर्ना तीनों जिंदगी की तबाही ही नियति थी. जब त्रेता युग में लंका से वापसी के बाद सीता का शांतिपूर्वक निर्वाह राम के साथ न हो सका तो जहरीले वातावरण वाले कलयुग में रुम्पा का निर्वाह शंकर के साथ कैसे हो पाएगा? यातनाओं एवं भावनात्मक जख्मों से छलनी हो चुका शंकर फ्रायड के सिद्धांत से शायद ही कहीं चुकेगा. आदर्शवाद और कानून कुछ भी कहे लेकिन टूट चुका विश्वास का गांठ शायद ही कभी उन्हें चैन की साँस लेने देगा. एक इंसान के तौर पर शंकर रुम्पा को एक शरीर के अलावे शायद ही कुछ और समझ पाएगा, जहाँ सहानुभूति भी कभी रिस-रिस कर ही पहुंचे. लेकिन अमित के साथ नये जीवन में व्यावहारिक रूप से उसे सबकुछ मिलने की संभावना शेष है.
गीताश्री ने गंगा किनारे बसे एक बस्ती की कहानी में जहाँ बिम्बों का यथोचित प्रयोग किया है, वहीं हिंदी और बांग्ला के शब्दों का इस्तेमाल कर एक बेहतरीन शिल्प में कहानी को प्रस्तुत करने का सफल प्रयास भी किया है. यहाँ तक की शीर्षक “सोनमछरी” भी विरोधाभास को समेटे आकर्षण का केंद्र है जो आपको सोचने-विचारने पर मजबूर कर देता है. संभव है कुछ लोग इसके भावनात्मक पक्ष को लेकर टीका –टिप्पणी करें, लेकिन भावना हमारे जीवन से इतर है क्या? विद्वान आलोचकों ने भावना में बहने से मना किया है भावना से तो नहीं.
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