बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

शहंशाह आलम की ‘इस समय की पटकथा विद्रूप समय में जीवन के विविध रूपों का संग्रह है(समीक्षा)सुशील कुमार भारद्वाज.



                शहंशाह आलम की ‘इस समय की पटकथा विद्रूप समय में जीवन के विविध रूपों का संग्रह है.

 

 सुशील कुमार भारद्वाज.


शहंशाह आलम की छोटी-लंबी कविताओं से सजी ‘इस समय की पटकथा’ विद्रूप समय में जीवन के विविध रूपों का संग्रह है. इसमें एक तरफ जीवन का प्रस्फुटन है, कल्पना की उड़ान है तो दूसरे तरफ आत्मा तक को तड़पाने वाली जीवन की सच्चाइयां. 48 कविताओं का यह संग्रह ‘कोई जादू कोई कौतुक’ तथा ‘आदिकालीन समय को जीते हुए’ शीर्षक के रूप में दो भागों में बंटा है. पहले हिस्से में 29 कविता है जो जिज्ञासा, कौतुहल और जिजीविषा को समेटे हुए हैं. कवि ने अपने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए प्रकृति के बहाने जीवन के विविध पहलू को उकेरने की कोशिश की है. जीने की लालसा है जो मरने नहीं देती है, ‘खानाबदोश’ की तरह अपने पूरे अस्तित्व को समेटे इधर-उधर भटक सकते हैं लेकिन पलायन नहीं. फिर चाहे कोई घास की तरह बर्बरता से काट कर फ़ेंक क्यों न दें, वे फिर उग आएंगें उन असंख्य घास की तरह. वर्तमान समय की जटिलताओं के बीच जीवन का निर्वाह इसलिए हो पा रहा है क्योंकि मानवता रूपी ‘नदी’ संगीत के रूप में अभी भी शेष है.

कितना अजीब है कि हम अपनी पृथ्वी पर जीवन जीने में कठिनाई महसूस करते हैं और ‘मंगलग्रह’ पर जीवन की तलाश एक कौ़तुहल और ढेरों अपेक्षाओं के साथ करते हैं. जीवन के सुनहले ख्वाबों को सजाने के लिए लड़कियां आगे बढती हैं लेकिन मंजिल का एहसास होते ही सोचतीं हैं आगे बढने से क्या होगा? एक पिता हैं जिनके झोले में असीम प्रेम, सान्तावना, शांति, सुरक्षा और संभावनाएं समायी हैं. बैंड पार्टी वाले भी अपने दुखों को छिपाकर हमारी खुशियों में शरीक होते हैं लेकिन हम क्या कर पाते हैं? ‘खीरा’ आदि कुछ कविताओं का स्वर कौतुहल से शुरू होता है लेकिन दुःख–दर्द का एहसास इसे गंभीर ब
ना देता है. संग्रह के दूसरे हिस्से में
19 कविताओं का स्वर हताशा–निराशा और शोकगीतों से भरा है. चाहे जीवन के निष्क्रियता को दर्शाती ‘सबके भीतर बर्फ’ हो या फिर लोकतंत्र की तबाही को रेखांकित करती ‘जनतंत्र का शोकगीत’. संग्रह की सबसे लंबी कविता “जेबकतरियों की कविता” में जेबकतरने वाली लड़कियों के विभिन्न मनोभावों को बेहद ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है.

कुछ कविताओं को अलग रखें तो सहज शब्दों में गूढ़ अर्थों को उभारने की कोशिश भी संग्रह को खास बनाता है.

पुस्तक :- इस समय की पटकथा , कवि :- शहंशाह आलम

प्रकाशक :- शब्दा प्रकाशन , पटना , पृष्ठ :- 130  ,मूल्य :- 150/-                          

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