गुरुवार, 10 मई 2018

बौद्धों के प्रभाव को कम करने वाले उदयनाचार्य :सुशील कुमार भारद्वाज


बौद्धों के प्रभाव को कम करने वाले उदयनाचार्य  
सुशील कुमार भारद्वाज


बिहार के समस्तीपुर जिला अंतर्गत शिवाजीनगर प्रखंड के करियन ग्राम में जन्में उदयनाचार्य अर्थात आचार्य उदयन प्राचीन न्याय वैशेषिक परम्परा के आखिरी महत्त्वपूर्ण दार्शनिक माने जाते हैं. सच तो ये है कि नव्यन्याय के संस्थापक उदयनाचार्य ने ‘न्याय वैशेषिक’ के दर्शन को ही नए रूप में ‘नव्यन्याय’ में परिणत कर दिया. दरअसल उदयनाचार्य के लेखन में न्याय और वैशेषिक दर्शन जिस रूप में मिलता है और प्रणाली विज्ञान के प्रति उनकी जो अति सूक्ष्म निष्ठा पाई जाती है, वह ‘नव्यन्याय’ की विचार प्रणाली के बहुत ही करीब है.
महामहिषी कुमारिलभट्ट के शिष्य उदयनाचार्य ने बढ़ते बौद्ध प्रभाव को रोकने के लिए न सिर्फ पुरजोर कोशिश की बल्कि वेद की सत्ता को स्थापित करने के लिए ईश्वर के अस्तित्त्व को भी स्थापित करने की कोशिश की. नास्तिकता को नकारते हुए आस्तिकता को मजबूती प्रदान करने की कोशिश की. भविष्य पुराण में एक उदाहरण पढ़ने को मिलता है कि ‘जब एक बौद्ध पंडित ने राजा को बौद्ध विचारधारा से जोड़ने के लिए चुनौती दी कि यदि आपके पास वेदों के विद्वान हैं तो मुझसे शास्त्रार्थ करने के लिए भेजें. तब राजा ने उदयनाचार्य को कुछ पंडितों के साथ भेजा. जहां बौद्ध पंडित ने अपने मायिक प्रयोग से एक शिलाखंड को पानी बना दिया और उदयनाचार्य को उस पानी को पुनः शिलाखंड में तब्दील करने की चुनौती दे डाली और बिना समय गवाए उदयनाचार्य ने सफलतापूर्वक पानी को पुनः शिलाखंड बना दिया.’
इसी घटना से एक किंवदंती भी जुड़ी हुई है कि जब उदयनाचार्य ने उसी बौद्ध पंडित के सामने यह चुनौती रखी कि ‘वे दोनों दो बड़े तालवृक्ष पर चढ़कर कूदेंगे और जो जिएगा वो जीतेगा, तो बौद्ध पंडित ने चुनौती स्वीकार कर ली और ‘वेद अप्रमाण है’ कहकर कूद गया और मर गया जबकि ‘वेद प्रमाण है’ कहकर कूदने वाले उदयनाचार्य जीवित रहकर जीत गए. और राजा ने वेदशास्त्र का प्रमाण्य नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया और उन्हें राजगुरू बना दिया. साथ ही राजा ने नास्तिकों के सारे शास्त्र पानी में फिंकवा दिए और सारे नास्तिकों को सजा देकर सख्ती से आस्तिक बना दिया.
लेकिन यह भी जगजाहिर है कि श्रीहर्ष ने अपने पिता की हार का बदला चुकाने के लिए उदयनाचार्य को चुनौती दी और खंडन खंडवाद में उदयन के मत का खंडन भी किया.
इस तरह के पौराणिक कथा में सत्य और दंतकथा का घालमेल हो सकता है लेकिन इतना तो तय है कि उदयनाचार्य ने बौद्ध दार्शनिकों से शास्त्रार्थ करके न्याय दर्शन को प्रतिष्ठापित किया. महान नैयायिक उदयनाचार्य भारत में बौद्ध दर्शन का खंडन करते हुए उसके वैचारिक प्रभाव को कम करने वाले पंडितों में से एक प्रभावशाली पंडित थे. उनके ग्रन्थ विशेषकर आत्मतत्व विवेक में बौद्ध दर्शन की बहुत ही तीखी आलोचना हुई है. उनका बौद्ध दर्शन का खंडन सूक्ष्म बुद्धि और वाद कौशल का एक बेहतरीन नमूना है.
दसवीं सदी के चरम पाद या ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्में सनातनी परम्परा के उदयनाचार्य के सात ग्रंथों में “आत्मतत्व विवेक” और “न्यायाकुसुमांजलि” स्वतंत्र ग्रन्थ हैं जबकि “लक्षणावली” और “लक्षणमाला” संग्राहक प्रकरण ग्रन्थ हैं और शेष ग्रन्थ अन्य की टीका. जहां ‘किरणावली’ प्रशस्तपादभाष्य की टीका है वहीं ‘तात्पर्यपरिशुद्धि’ वाचस्पति मिश्र रचित ‘न्यायवार्तिक’ की प्रौढ़ व्याख्या है जिसे ‘न्यायनिबंध’ भी कहा जाता है. ‘लक्षणावली’ जहां वैशेषिक दर्शन का सार संग्रह है तो ‘बोधसिद्धि’ न्यायसूत्र की वृत्ति है. ‘आत्मतत्व विवेक’ में बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद के सिद्धांतों का विस्तृत खंडन ईश्वर की सिद्धि नैयायिक पद्धति से की गई है. और विशेष परिपक्व और तार्किकतापूर्ण यह ग्रन्थ उदयनाचार्य की सर्वश्रेष्ठ कृति भी है. जबकि न्यायकुसुमांजलि में ईश्वर की सिद्धि विभिन्न तार्किक तथ्यों से की गई है. ऐसा माना जाता है कि ईश्वरसिद्धि विषयक ग्रंथों में यह संस्कृत के दार्शनिक साहित्य में एक महत्वपूर्ण दखल रखती है. कुसुमांजलि में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि के लिये निम्नलिखित नौ 'प्रमाण' दिए गए  हैं-

कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः।
वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः॥ 


श्लोक को ऐसे देखा जा सकता है-

1.  कार्यात्- यह जगत् कार्य है अतः इसका निमित्त कारण अवश्य होना चाहिए. जगत् में सामंजस्य एवं समन्वय इसके चेतन कर्ता से आता है. अतः सर्वज्ञ चेतन ईश्वर इस जगत् के निमित्त कारण एवं प्रायोजक कर्ता है.
2.  आयोजनात् - जड़ होने से परमाणुओं में आद्य स्पन्दन नहीं हो सकता और बिना स्पंदन के परमाणु द्वयणुक आदि नहीं बना सकते. जड़ होने से अदृष्ट भी स्वयं परमाणुओं में गतिसंचार नहीं कर सकता. अतः परमाणुओं में आद्यस्पन्दन का संचार करने के लिए तथा उन्हें द्वयणुकादि बनाने के लिए चेतन ईश्वर की आवश्यकता है.
3.  धृत्यादेः – जिस प्रकार इस जगत् की सृष्टि के लिए चेतन सृष्टिकर्ता आवश्यक है, उसी प्रकार इस जगत् को धारण करने के लिए एवं इसका प्रलय में संहार करने के लिए चेतन धर्ता एवं संहर्ता की आवश्यकता है. और यह कर्ता-धर्ता-संहर्ता ईश्वर है.
4.  पदात्- पदों में अपने अर्थों को अभिव्यक्त करने की शक्ति ईश्वर से आती है. इस पद से यह अर्थ बोद्धव्य है”, यह ईश्वर-संकेत पद-शक्ति है.
5.   प्रत्यतः
6.  श्रुतेः
7.  वाक्यात्
8.  संख्याविशेषात्- नैयायिकों के अनुसार द्वयणुक का परिणाम उसके घटक दो अणुओं के परिमाण्डल्य से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि दो अणुओं की संख्या से उत्पन्न होता है. संख्या का प्रत्यय चेतन द्रष्टा से सम्बद्ध है, सृष्टि के समय जीवात्मायें जड़ द्रव्य रूप में स्थित हैं एवं अदृष्ट, परमाणु, काल, दिक्, मन आदि सब जड़ हैं. अतः दो की संख्या के प्रत्यय के लिए चेतन ईश्वर की सत्ता आवश्यक है.
9.   अदृष्टात्- अदृष्ट जीवों के शुभाशुभ कर्मसंस्कारों का आगार है. ये संचित संस्कार फलोन्मुख होकर जीवों को कर्मफल भोग कराने के प्रयोजन से सृष्टि के हेतु बनते हैं. किन्तु अदृष्ट जड़ है, अतः उसे सर्वज्ञ ईश्वर के निर्देशन तथा संचालन की आवश्यकता है. अतः अदृष्ट के संचालक के रूप में सर्वज्ञ ईश्वर की सत्ता सिद्ध होती है.

दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायमत में जगत् के कर्तव्य से ईश्वर की सिद्धि मानी जाती है और बौद्ध नितांत निरीश्वरवादी हैं. षड्दर्शनों में भी ईश्वरसिद्धि के विविध प्रकार हैं. उदयनाचार्य ने इन सबका सम्यक अध्ययन करने के पश्चात ही अपने मत की प्रतिस्थापना की.
उदयनाचार्य के विषय में यह किंवदन्ति भी प्रसिद्ध है कि जब ये असमय पुरी में जगन्नाथ मंदिर पहुँचे तो दरवाजा बंद मिला. तब इन्होंने भगवान को ललकार कर कहा था कि ऐश्वर्य के मद में मत्त आप मेरी अवज्ञा कर रहे हैं, किन्तु (निरीश्वरवादी) बौद्धों के उपस्थित होने पर आपका अस्तित्व मेरे अधीन हो जाता है. और उदयनाचार्य के ऐसा बोलते ही बंद दरवाजे खुल गए. और थोड़े दिन के बाद खुद जगन्नाथ ने वहां पुजारियों को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि मेरी मूर्ति पर जो पीताम्बर है, वह उदयनाचार्य को दीजिए, क्योंकि वह मेरा ही अंश है. उसने मेरी स्थापना की है. मेरा अस्तित्व सिद्ध किया है जब बौद्ध मेरा तिरस्कार कर रहा था.
 गौरतलब है कि प्रौढ़ नैयायिक उदयनाचार्य ने 'न्यायकुसुमांजलि' को पूरा करके उपसंहार में लिखा है कि वे साफ-सच्चे और ईमानदार नास्तिकों के लिए भी वही स्थान चाहते हैं जो सच्चे आस्तिकों को मिले. उन्होंने अपनी बात इस तरह से कही है-  
“इत्येवं श्रुतिनीति संप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते
येषां नास्पदमादधासि हृदये ते शैलसाराशया:।
किन्तु प्रस्तुतविप्रतीप विधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तका:
काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नरा:”

‘जातिबाधक’, ‘अनवस्था’ आदि सिद्धांत को विकसित करने वाले मिथिलावासी उदयनाचार्य पुरी से लौटने के बाद पुनः मिथिला आए और वर्षों तक शास्त्र का अध्ययन करते रहे. और वृद्धावस्था में काशी में आकर अपने प्राण त्याग दिए. 
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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

मुसहरों की जिंदगी है ‘दक्खिन टोला’ (समीक्षा)


मुसहरों की जिंदगी है ‘दक्खिन टोला’ (समीक्षा)






सुशील कुमार भारद्वाज
रंगमंच और पत्रकारिता की दुनिया से कथा-कहानी के क्षेत्र में आए कमलेश की पहली कहानी-संग्रह ‘दक्खिन टोला’ इन दिनों काफी चर्चा में है. यूँ तो बांध, मउगा, कठकरेजी, हत्यारा, दक्खिन टोला, सपनों के पार, अंचरा पर लौंडा, दुश्मन, जमीन, अपने लोग, गड़हा, डफ बज रहा है, जैसी बारह कहानियों का यह संग्रह पूर्ण रूप से मुसहरों की ही कहानी है. जिसे कथाकार ने अपने शिल्पकला के साथ कुछ इस तरह शब्दबद्ध किया है कि आप शुरू से अंत तक इसमें खोकर न सिर्फ पढ़ते रहते हैं बल्कि उठाए गए समस्याओं से भी रूबरू होते रहते हैं. जहां ये कहानियां कई बार चौंकती हैं तो कई बार आपको निःशब्द भी कर देती हैं. पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर केंद्रित ये कहानियां न सिर्फ भोजपुर और बक्सर की पृष्ठभूमि में लिखी गई है बल्कि बेगूसराय के बसही में आए बाढ़ के बहाने त्रस्त जिंदगी और उस त्रासदी के बीच भी फैले भ्रष्टाचार को रेखांकित करने की कोशिश करती है. जो आपके मर्म को छूती हैं. जो आपको काफी कुछ सोचने को मजबूर कर देती हैं. कमलेश बहुत ही सहजता के साथ कहानी का वातावरण बुनते हुए विषय में प्रवेश करते हैं और जीवन की आम घटनाओं को खास नज़रिए से प्रस्तुत करते हैं. जहां जीवन का नितांत सुख-दुःख, प्रेम-त्याग, धोखा-समर्पण आदि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है. वे लगभग अपनी हर कहानी में जहां लोक-संस्कृति और गीत-संगीत का पुट भरते हैं वहीं बोलचाल की भाषा के साथ-साथ ‘इटैलियन सैलून’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर भाषा के साथ भी खेलने की भी कोशिश करते हैं. ‘जमीन’ जहां अतिकाल्पनिक जान पड़ती है तो ‘अंचरा पर लौंडा’ जैसी कहानियां आपको निःशब्द भी कर देती हैं.

‘दक्खिन टोला’ आश्वस्त करती है कि कमलेश अपनी हर कहानी के साथ परिपक्व होते जा रहे हैं और आने वाले वर्षों में हिंदी साहित्य में अपनी मुकमल पहचान बनाएंगें.
पुस्तक :- दक्खिन टोला
कथाकार:- कमलेश
प्रकाशक :- वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य:- 195
पृष्ठ:- 197

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

जागरण का बिहार संवादी बिहार साहित्य में एक दीवार खींच गया


जागरण का बिहार संवादी बिहार साहित्य में एक दीवार खींच गया





सुशील कुमार भारद्वाज
गत दिनों पटना में दैनिक जागरण का कार्यक्रम "बिहार संवादी" आयोजित हुआ जो कि शुरू से आज तक चर्चा में बना हुआ है। पक्ष-विपक्ष और वहिष्कार-समर्थन की बातें बहुत हुई। लेकिन अजीब संयोग है कि कार्यक्रम किसी का और झगड़ा किसी से। भावनात्मक रूप से इस द्वंद्व में काफी लोग घायल हुए हैं। इन चोटों को भरने में शायद कुछ वक्त लगे। संभव है कि इसके कुछ दूरगामी परिणाम भी आएं। खैर, बिना किसी मामले में फंसे मैंनें एक निष्पक्ष रपट बनाने की कोशिश की है आपलोगों के लिए. 
पटना के तारामंडल सभागार में दैनिक जागरण के अभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम ‘बिहार संवादी’ अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया. जैसे तीन साल पहले 27-29 अप्रैल 2015 को इसी सभागार में अखिल भारतीय कथा समारोह भूकंप के झटकों के बीच संपन्न हुआ था वैसे ही ‘बिहार संवादी’ भी अनिश्चितताओं और वहिष्कार के हंगामें के बीच सफलतापूर्वक संपन्न हो गया. कथा–समारोह जहां माँ-बेटी, पति-पत्नी और पत्नी-पति के आरोपों से घिरी रही तो ‘बिहार संवादी’ मैथिली को बोली कहे जाने के आरोपों के बीच. 
जब कार्यक्रम अपने नियत तिथि के करीब थी उसी समय ‘मैथिली’ को बोली कहे जाने से नाराज ‘विभूति आनंद’ ने खुद को कार्यक्रम से अलग होने की घोषणा कर दी. जबकि इन्हीं दिनों दैनिक जागरण के सहयोग से ही आयोजित कार्यक्रम ‘आखर’ में भोजपुरी वालों ने घोषणा कर दी कि- “चुनाव का मौसम है और ऐसी तैयारी करें कि यदि जो भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया तो भोजपुरी समाज वोट नहीं देंगें.” इसी कार्यक्रम में मैथिली संस्कृति, भाषा और सिनेमा की तुलना भोजपुरी से की गई. जबकि पिछले दिनों ही उषाकिरण खान और विभूति आनंद समेत कई दिग्गज मैथिलीप्रेमी साहित्यकारों ने “मैथिली” को राजभाषा का दर्जा दिलाने की मुहिम छेड़ी थी. और कहीं-न-कहीं संकेत मिल गया था कि श्रेष्ठता की लड़ाई कहीं-न-कहीं शुरू हो गई है. क्योंकि कुछ भोजपुरिया लोग अपनी भाषा को चांद और मंगल तक पहुंची भाषा बताने लगे. वे भोजपुरी को बोली के रूप में मानने से भी कतराने लगे.

इसी बीच कठुआ प्रसंग की एक खबर ने अखबार को विवादों में घसीट लिया. जिसकी वजह से विरोधियों को एक बेहतरीन मौका मिल गया. जहां एक ओर मैथिली अस्मिता के नाम पर विरोध शुरू हुआ वहीं कुछ को कठुआ के मामले में अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई. तीसरे किस्म के वे लोग थे जिन्हें मंच पर मौका नहीं मिला और कहने लगे –एक ही चेहरा हर कार्यक्रम में क्यों? दूसरे को मौका क्यों नहीं?
इन्हीं सब अनिश्चिताओं के बीच 20 अप्रैल 2018 को पटना के मौर्या होटल में सभी स्थानीय वक्ताओं को एक कार्यक्रम में बुलाया गया और अधिकांश उसमें शरीक भी हुए और देर रात वहीं जमें भी रहे. और मैथिली के लिए एक नए वक्ता को तलाश भी लिया गया. लेकिन 21 अप्रैल 2018 के सुबह नौ बजे के बाद कुछ वक्ताओं (अधिकांश कवियों) की अंतरात्मा जगने लगी और धीरे-धीरे कठुआ या मैथिली के नाम पर कार्यक्रम से अलग होने की घोषणा फेसबुक आदि से करने लगे. और एक बजे दिन तक में लगभग दस वक्ताओं ने अपने नाम की वापसी की घोषणा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कर दी. जबकि राज की बात है कि मैथिली स्टूडेंट यूनियन के बैनर तले कुछ उग्र युवा तारामंडल के मेनगेट पर साढ़े नौ बजे से ही तैनात हो गए थे और सबको लानत भेज रहे थे. विश्वस्त सूत्र से जानकारी मिली थी कि कार्यक्रम को असफल करने की हर संभव कोशिश वे लोग करेंगें और मैथिली के प्रतिनिधि प्रो० वीरेन्द्र झा को देखते ही पिटाई करते हुए दुर्गत कर देंगें. किसी भी हाल में वे सभागार में न पहुँच सकें.
लेकिन कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया और दैनिक जागरण बेस्टसेलर की चौथी तिमाही सूची की घोषणा की गई. और पहले सत्र, ‘साहित्य का सत्ता विमर्श’, में  रंगकर्मी अनीस अंकुर ने विधान पार्षद प्रो रामबचन राय और रेवती रमण से बातचीत शुरू की. हालांकि अनीस अंकुर ने मंच से ही विरोधी स्वर को हवा दी. दूसरे सत्र में हृदयनारायण दीक्षित और एस एन चौधरी ने ‘नया समाज और राष्ट्रवाद’ पर अपना विचार रखा. तीसरे सत्र में राणा यशवंत ने ‘बिहार: मीडिया की चुनौतियां’ पर खुलकर बोले. चौथे सत्र में ‘नए पुराने के फेर में लेखन’ पर शशिकांत मिश्र, क्षितिज रॉय, प्रवीण कुमार ने अवधेश प्रीत के विभिन्न सवालों के जबाब दिए. जबकि पांचवे सत्र में उदय शंकर से वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने बेहतरीन बातचीत की. छठे सत्र में अनिल विभाकर, रमेश ऋतम्भर और अरुण नारायण ने ‘जाति के जंजाल में साहित्य’ विषय पर अनंत विजय के सवालों पर अपनी राय रखी. जबकि पहले दिन का समापन राजशेखर के मजनूं के टीला से हुआ.

मैथिली समर्थक पहले दिन सुबह से कड़ी धूप में गेट के बाहर बैठे रहे और शाम चार बजे के लगभग पुलिस की पहल पर वहां से हटाए गए. जबकि दूसरे दिन क्रांतिकारी मैथिली समर्थक अपने नए और उग्र तेवर के साथ दरवाजे पर फिर से बैठ गए. जबकि राउंड टेबल टॉक में प्रो० जितेन्द्र वत्स और डॉ विनय चौधरी ‘विश्विद्यालयों में हिंदी’ के बहाने अंदरखाने में भरे सड़ांध पर बेबाक बोल रहे थे. तो ऋषिकेश सुलभ, रामधारी सिंह दिवाकर, शिवदयाल ‘बिहार की कथाभूमि’ पर अपने विचार प्रेम भारद्वाज के सवालों के जबाबों में दे रहे थे. तो माहौल को मोहब्बत के रंग में रंग दिया गीताश्री, रत्नेश्वर,गिरीन्द्रनाथ झा और भावना शेखर ने. तब तीसरे सत्र में अवधेश प्रीत, संतोष दीक्षित, अनिल विभाकर, और अनु सिंह चौधरी ने रचनात्मकता का समकाल विषय पर अपनी बात रखी.
चौथे सत्र की शुरूआत होती उससे पहले ही अधिकांश क्रांतिकारी मैथिली समर्थकों ने सभागार में अपनी जगह बना ली. और ज्योंहि अनंत विजय ने ‘बिन बोली भाषा सुन?’ विषय पर बात करने के लिए मंच पर उपस्थित प्रो० वीरेन्द्र झा, अनिरुद्ध सिन्हा, नरेन, निराला तिवारी का परिचय दे कुछ कहना शुरू किया ही कि एक मैथिल ने अपने सीट से उठकर मैथिली के सन्दर्भ में आपत्ति की और अनंतजी कुछ जबाब देते उससे पहले ही सारे मैथिल हंगामा करने लगे. कुर्सियों पर चढ़कर मुर्दाबाद-जिंदाबाद करने लगे. आयोजकों की कोई बात सुने बगैर वे मंच के करीब होते हुए मंच पर चढ़ गए और धक्कामुक्की करने लगे. मंच पर जूते-चप्पल उछलने लगे. इसी बीच कुछ लड़कों ने मिलकर वीरेन्द्र झा के मुंह में स्याही पोत दी. जिसके छींटे अन्य उपस्थित लोगों पर भी पड़े. अंत में कोतवाली थाना के सिपाही आए और हंगामा करनेवालों को दबोचकर ले गए. तब तक सभागार से सामान्य दर्शक/ श्रोता बाहर आ चुके थे.
हंगामे के बाद फिर वहीं से सत्र की शुरूआत की गई. जिसमें हर वक्ता ने तुलनात्मक रूप से मैथिली, मगही, भोजपुरी, और अंगिका को सर्वश्रेठ भाषा माना. किसी ने खुद को बोली के रूप में स्वीकार नहीं किया. और इस तीखी नोकझोंक ने सभागार के माहौल को खुशनुमा बना दिया. दर्शकों ने तालियां पिटी.
पांचवे सत्र में प्रो तरुण कुमार और आशा प्रभात ने ‘सीता के कितने मिथ’ पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए. तो छठे सत्र में महुआ माझी, डॉ सुनीता गुप्ता और सुशील कुमार भारद्वाज ने ‘परिधि से केंद्र की दस्तक (हाशिए का साहित्य)’ विषय पर शहंशाह आलम के सवालों के यथोचित जबाब दिए. सातवें सत्र में ‘धर्म और साहित्य’ विषय पर नरेन्द्र कोहली से एसपी सिंह ने बात की. और अंतिम सत्र में विनोद अनुपम ने पंकज त्रिपाठी से ‘सिनेमा में बिहारी’ विषय पर बात की.
इस तरीके से यह दो-दिवसीय कार्यक्रम समाप्त हो गया. और दो दिन के इन सत्रों में दर्शक सभागार में जिस तरीके से जमे रहे वह पिछले कथा-समारोह में आए लोगों से कतई कम नहीं थे. हां, ये अलग बात है कि दिन की तुलना में शाम में भीड़ अधिक रही. और इस आयोजन ने कई लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ भी दिया. राजनीति के तर्ज पर देखें तो शायद आने वाले दिनों में साहित्य में कुछ नए समीकरण पटना की धरती पर बनते-बिगड़ते नज़र आए.

संपर्क :- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com


शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध (रपट):सुशील कुमार भारद्वाज


वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध (रपट)

सुशील कुमार भारद्वाज


डॉ० चतुर्भुज की स्मृति में आयोजित 9वीं अखिल भारतीय ऐतिहासिक नाट्य महोत्सव 2018 के चौथे दिन 20  फरवरी 2018 को अभियान सांस्कृतिक मंच के दल ने बृजेश द्वारा लिखित और राजू कुमार द्वारा निर्देशित नाटक शम्बूक वध का मंचन किया.


नाटक अपने सारगर्भित कथ्य और कलाकारों के दमदार अभिनय से दर्शकों को लगभग डेढ़ घंटे से ज्यादे समय तक बांधे रखा. दर्शक न सिर्फ हास्य दृश्य पर हंसते, और दमदार अभिनय एवं संवाद पर ताली पीटते रहे बल्कि कथा को नए दृष्टिकोण के साथ देखते, समझते और विचारते भी रहे.
नाटक ऐतिहासिक व पौराणिक कथा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. सर्वप्रथम नाटक शम्बूक वध के पृष्ठभूमि को चित्रित करने की कोशिश करता है. इसी क्रम में यह स्पष्ट होता है कि जब चौदह वर्षों के वनबास के बाद श्रीराम अयोध्या लौटते हैं तो सत्ता संचालन के लिए वे क्या-क्या कदम उठाते हैं? सबों की सुख-शांति के लिए किस प्रकार की राज्यव्यवस्था करते हैं? सबों को एक साथ समेटने के लिए किस तरह निषादराज और शबरी की कहानी को प्रचारित किया जाता है? किस प्रकार से चातुर्य वर्णव्यवस्था के कट्टर समर्थक अपनी असहजता के बीच छटपटाते रहते हैं और किस-किस तरह की साजिश रचते रहते हैं?



एक तरफ राज्य में शूद्रों के लिए विद्यालय, जलाशय और कहवाघर खोलने की बातें होती हैं तो दूसरी तरफ छुआछूत का प्रपंच भी बदस्तूर जारी रहता है. राज्य के भद्र लोग, वणिक आदि ही नहीं बल्कि आलाअधिकारी सुशर्मा और गुरू वशिष्ठ की भवें भी इस व्यवस्था से तनी रहती हैं. जबकि गुरू वशिष्ठ की पत्नी देवी अरुंधती भी शूद्र, अन्त्यज रहती है. फिर भी वे वर्ण सामंजस्य और वर्णभेद की महीन रेखा के बीच अर्थ तलाशते नज़र आते हैं.ये लोग अपने स्वार्थसिद्धि के लिए श्रीराम को भी इस्तेमाल करते रहते हैं. राज्य-प्रशासन के लिए नियम-उपनियम और शास्त्र की बात कर श्रीराम को गुमराह करते रहते हैं. शूद्रों को ही नियंत्रित करने की कोशिश ये लोग नहीं करते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं शासन करने की भी कोशिश करते रहते हैं. गुरू वशिष्ठ पूरे वर्ण व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए व्रत जैसे पात्रों का भी इस्तेमाल करते हैं जो शम्बूक और उनके बीच एक कड़ी के रूप में भी काम करता है. व्रत गुरू वशिष्ठ के परामर्श पर प्रलोभन देकर शम्बूक को अपने पथ से विचलित कर अपने पक्ष में कर राम को सबल करने की असफल कोशिश भी करता है.
नाटक में धोबनें, पुक्कस और सिपाही हैं तो भट्टारक भी हैं.  बढ़ई वृदु कलिंग के राजपुरोहित की बेटी वलया से भागकर अंतरजातीय विवाह करता है तो गोत्रविहीन सत्यकाम जाबाला भी महर्षि गौतम से मिले जनेऊ के धागे के बीच छटपटा रहा है लेकिन मानवीय हानि को देखते हुए शूद्रों के सामूहिक वेदपाठ का विरोध करता है. वह सीधी लड़ाई की बात करता है.
लेकिन विषम परिस्थिति में वशिष्ठ आदि के परामर्श पर श्रीराम शम्बूक का वध कर देते हैं. नाटक में कथा को एक नए दृष्टिकोण से दिखाने की कोशिश की गई है. जिस तरह नाटक में श्रीराम अप्रस्तुत होकर भी प्रस्तुत हैं वैसे ही संवादों के माध्यम से बहुत सारे सारगर्भित प्रश्नों व विचारों को प्रक्षेपित करने की भी कोशिश की गई है.
राजू कुमार निर्देशित इस नाटक में गौतम गुलाल (शम्बूक), अनीश अंकुर (सुशर्मा), जय प्रकाश (सत्यकाम), आशुतोष कुमार (वशिष्ठ), सुशील कुमार भारद्वाज (वीरावर्मन), आदर्श रंजन (धनगुप्त), संजय कुमार सिंह (भट्टारक, विरोचन), राजू कुमार (वृदु), अनुप्रिया (वलया), अंजली शर्मा(धोबन, जाबाला), सुशील कुमार देव(पंडित), मयंक कुमार शर्मा (पुण्डरीक), इन्द्रजीत (कन्हाई), अभिषेक (सिपाही), राज कुमार (वसंतक), सुधांशु शांडिल्य (व्रत), सौरभ कुमार, कृष्णा, अभिषेक, लक्ष्मी राजपूत, पिंकी, मुस्कान आदि ने अपनी दमदार अभिनय से नाटक को सफल बनाया. वहीं नवलेश शर्मा की संगीत परिकल्पना से भी नाटक को मजबूती प्रदान की.
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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में (आलेख): अनीश अंकुर



  विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में
                                                                                                                   अनीश अंकुर



हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं मसलन कविता, कहानी में कई किस्म के आंदोलन चले, नये-नये ‘वाद’ का जन्म हुआ। लेकिन नाटक में वैचारिक बहसों की केाई वैसी निरंतर परिपाटी नहीं रही। आजादी के पहले जन नाट्य संघ की जब  स्थापना हुई तो तो नारा ही था ‘ हमारी नायक जनता है’’।  इसके प्रदर्शित प्रस्तुति ‘नवान्न’ में पहली बार किसान को नायक के रूप में मंच पर अवतरित हुआ।

सत्तर के दशक में नाटकों में ‘बैक टू द रूट्स’ यानी अपनी ‘जड़ों की ओर लौटो’ की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ लिया। इसके तहत नाटकों में भारतीयता’ व परंपरागत विरासत की खोज का सिलसिला प्रारंभ हुआ। जिसे देखों वो ‘लोक’ व ‘फोक’ की बात करने लगा।

‘भारतीयता की खोज’ की ये पूरी प्रक्रिया बदनाम अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन द्वारा समर्थित था। ‘फोक’ की प्रधानता वाली इस परिघटना ने  इसने निर्देशक को ताकतवर तथा  नाटककारों को कमजोर बना दिया।   रंगमंच में प्रदर्शनकारी तत्वों की प्रधानता होने लगी फलतः ‘टेक्सट’ का महत्व कमजोर होने लगा।

 मजबूत निर्देशक ने  पहले चरण में नाटककारों को पृष्ठभूमि में धकेला वही दूसरे  चरण में अभिनेताओं को अप्रासंगिक बनाना शुरू कर दिया। रंगमंच में  अभिनेता अब डिजायन का निष्क्रिय तत्व में तब्दील होता जा रहा है।  एक्टर अब आब्जेक्ट में बदल गया है।

एक समय नुक्कड़ नाटकों ने प्रोसेनियम पर होने वाले थियेटर केा  बेहद सशक्त चुनौती दी थी। नुक्कड़ नाटकों के एक बड़े हिस्से के एन.जी.ओ करण की प्रक्रिया ने  भी उसकी वैचारिक वैधता को कमजोर कर डाला है।

 बिहार का रंगमंच मुख्यतः प्रयोगधर्मी माना जाता रहा है। चॅुंकि बिहार प्रारंभ से ही विभिन्न आंदोलनों व संघर्षों की भूमि रहा है। साथ  रंगमंच की जनपक्षधर धारा ने वैचारिक बहसों से जीवंत संपर्क बनाए रखा फलतः नये-नये प्रयोग होते रहे हैं। बिहार के रंगमंच के  प्रयोगधर्मी होने का यह प्रमुख कारण है।

लेकिन फिर भी वैचारिक बहसें नयी-नयी शक्लों में सामने आ रहे हैं। अभी थियेटर ओलंपिक को लेकर रंगमंच दो हिस्सों में विभाजित है । सतह पर दिखने पर भले ही रंगकर्मियों के दो समूहों के मध्य का संघर्ष दिख रहा है।  दरअसल यह विचाराधात्मक प्रश्न है।
 सत्ता की सरपरस्ती में होने वाले चलने वाले  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों द्वारा आयोजित महोत्सवों  के रंगमंचविरोधी चरित्र पर सवाल उठने लगे हैं। एन.एस.डी से प्रशिक्षित रंगकर्मियों के संकटग्रस्त  रंगमंच होने की पहचान हैं , ये सवाल। अभी हिंदी रंगमंच अपने संकटों की पहचान कर रहा है। यही बात वैचारिक विमर्श की दृष्टि से बेहद उम्मीद  पैदा करने वाली है।

बिहार नुक्कड़ नाटकों को लेकर भी काफ़ी  चर्चित रहे हैं।   सफदर हाशमी की हत्या के पश्चात बिहार के नुक्कड़ नाटको की बाढ़ आ गयी। नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई कि जब बिहार के सौ साल  हुए  तो रंगमंच की मुख्य पहचान के रूप में नुक्कड़ नाटकों को रखना पड़ा।
बिहार  के रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती है कि अपनी प्रयोगधर्मिता  को बचाये रखते हुए उसे आगे विकसित करने का काम करे।

  इसके अलावा बिहार की उभरती  सामाजिक  शक्तियों एवं उनसे जुड़े बिहार के लोकनाटकों यथा सलहेस, रेशमा चौहरमल, हिरनी बिरनी, सती बिहुला, दीना भद्री, बहुला गढ़िन आदि के साथ को आधुनिक रंग चेतना के साथ   तालमेल बनाना एक ऐसा कार्यभार है जिसे आगे आने वाले दिनों में सम्पन्न होना है।

बिहार के रंगमंच को यहां के सामाजिक राजनीतिक जीवन में हस्तक्षेप करना है। उसे विवादों से भी घबराना नही है। जैसा कि गिरीश कर्नाड कहते हैं '' जो रंगमंच विवाद से बचता है वो अपना कफ़न खुद तैयार कर रहा है।"

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

प्रलेस की गतिविधियां इन दिनों (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक
सुशील कुमार भारद्वाज

वर्तमान परिदृश्य को देखकर लगता है कि यदि बिहार प्रगतिशील लेखक संघ निष्क्रिय नहीं है तो कम-से-कम अपने आप को जन्मशताब्दी और शोकसभा तक ही जरूर सिमटाते जा रही है. विस्तार की तो बात ही जुदा है. बिहार इकाई से तात्पर्य राज्य के अड़तीस जिलों से होना चाहिए. लेकिन देखा जाए तो इसकी सक्रिय गतिविधि पटना, गया, बेगूसराय, लखीसराय, समस्तीपुर, आरा, भागलपुर और बक्सर आदि तक ही नज़र आती है.
बिहार प्रलेस के महासचिव रवीन्द्रनाथ राय कहते हैं –“पिछले दो-तीन वर्षों में लगभग पन्द्रह कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. भीष्म सहनी का शताब्दी वर्ष मनाया गया. जिसमें अन्य गणमान्य साहित्यकारों के साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी मुख्य वक्ता थे. फिर मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी मनाया गया जिसमें अवधेश प्रीत, संतोष दीक्षित, रमेश कुमार, राजेंद्र राजन समेत दर्जन भर वक्ता थे. लगभग सभी वक्ता बिहार से ही थे.”
इसके आलावा वे गोदार्गमा, मटिहानी, सिमरिया (बेगूसराय), गया, आरा , भागलपुर, बक्सर, लखीसराय , समस्तीपुर में होने वाली छोटी-बड़ी कविता-पाठ, गजल और विमर्श गोष्ठियों की चर्चा करते हैं. राजधानी पटना की गतिविधि पर रबिन्द्रनाथ राय कम बोलते हैं. पटना की गतिविधि पर कहते हैं किपिछले दिनों रानी श्रीवास्तव के नेतृत्व में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध को श्रद्धांजलि दी गई और काव्य पाठ किया गया.

जबकि बताता चलूँ कि सुरेन्द्रजी को  श्रद्धांजलिसुमन अर्पित करने का कार्यक्रम रानी श्रीवास्तव के निजी आवास पर किया गया था जिसमें शिवनारायण, अनिल विभाकर, रबीन्द्र कुमार दास, समीर परिमल समेत दर्जन भर साहित्यकार उपस्थित हुए. और वहीं पर पहली बार सुनने को मिला कि प्रलेस की ओर से मौखिक रूप में कहा गया कि कोई कार्यक्रम करने की क्या जरूरत है? बस एक प्रेस विज्ञप्ति बना दिया जाय.  वैसी स्थिति में रानी श्रीवास्तव ने अपने आवास पर कार्यक्रम का आयोजन किया था. उसी गोष्ठी में ज्ञात हुआ कि केदार भवन में स्थित प्रलेस के कार्यालय को किसी प्रलेस पदाधिकारी के इशारे पर ही निजी आवास में तब्दील कर दिया गया है. जहां कोई भी साहित्यिक गतिविधि करा पाना असंभव है. प्रलेस कार्यालय में साहित्यिक गतिविधि नहीं करा पाने आदि अन्य कारणों से ही पटना इकाई के सचिव शहंशाह आलम ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.

गौरतलब है कि केदार भवन में पिछले पांच वर्ष पहले राजेंद्र राजन आदि के प्रयास से कन्हैया लाल मुंशी के नाम पर एक कमरा प्रलेस कार्यालय को आवंटित किया गया था जिसका उद्घाटन प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने किया था. और तब से उसमें अक्सर छोटी-छोटी गतिविधियां होती रहीं हैंजबकि बड़े-बड़े आयोजन शिक्षक संघ के भवन में अमूमन आयोजित होते हैं. लेकिन पिछले कुछ महीने सेदफ्तर का यह कमरा निजी आवास बन चुका है.

जबकि रबीन्द्रनाथ राय कहते हैं-पटना इकाई लचर हो गई है और कोई भी ढंग का कार्यक्रम करने में असफल रही है. जल्द ही नई टीमगठित  की जाएगी.

जबकि प्रलेस पटना इकाई के बैनर तले शहंशाह आलम के नेतृत्व में मदन कश्यप समेत कई प्रतिष्ठित कवियों की काव्य-गोष्ठियां टेक्नो-हेराल्ड के दफ्तर में विगत कई महीनों से आयोजित होते रहे हैं.

आश्चर्य यह भी है कि बिहार प्रलेस के सदस्यों में हृषिकेश सुलभ, संतोष दीक्षित, कर्मेन्दु शिशिर जैसे कई लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार शामिल हैं. तो क्या ये साहित्यकार पटना में रहकर भी इन सब गतिविधियों से अनभिग्य हैं? क्या वे प्रलेस के दफ्तर कभी नहीं जाते या सबकुछ जान कर भी चुप हैं? या ये सब फिजूल की बातें हैं? क्या हिन्दी के साहित्यकार प्रलेस के प्रति अभी भी वही नजरिया रखते हैं जो स्थापना के वक्त थी? प्रेमचंद की तरह दर्शक दीर्घा में बैठने वाले?

जबकि एक तरफ प्रलेस के नेतृत्व में जयपुर में पूंजीवादी लिट फेस्ट के विरुद्ध समानांतर लिट फेस्ट आयोजित किया जा रहा है. और बिहार प्रलेस आगामी महीनों में राहुल सांस्कृत्यायन पर एक आयोजन की तैयारी में है. जिसमें इतिहास, दर्शन आदि पर बातचीत करने के लिए रोमिला थापर, केदारनाथ सिंह, और विजय चौधरी आदि को आमंत्रित किया जाना है.

प्रलेस के इतिहास पर किताब लिखने वाले ब्रज कुमार पांडे कहते हैं-1935 में प्रलेस का जब घोषणा-पत्र तैयार किया जा रहा था तो दो ही लक्ष्य रखे गए थे. पहला था फासिज्म का विरोध और दूसरा था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.
1936 ई० में स्थापित प्रलेस का लक्ष्य सिर्फ इसी से पूर्ण हो जाता है कि कल्बुर्गी, पन्सारे, और गौरी लंकेश आदि के हत्या की विरुद्ध प्रदर्शन कर दिया और शोक सभाएं आयोजित कर दीं? क्या साहित्य का इतना ही महत्त्व रह गया है? प्रलेस खुद किस स्थिति में है?

रबीन्द्रनाथ राय स्वीकारते हैं कि पाठकीयता घटी है. इंटरनेट भी एक कारण है लेकिन लेखक भी कहीं दोषी हैं. लेखक प्रलेस के सिद्धांत के अनुरूप जनता के बीच जाकर, जनता की समस्या से रूबरू होकर लिखने की बजाय बंद कमरे में लिखेंगें तो वो भाव, वो जुड़ाव कहां से आएगा?” आगे राय कहते हैं-इसी परंपरा को बनाए रखने के लिए कुछ समय पहले किसान सभा और प्रलेस के तत्वावधान में सिवान में एक आयोजन किया गया था. जिसमें खगेन्द्र ठाकुर भी शरीक हुए थे. लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जो वाजिब माहौल चाहिए वो बन नहीं पा रहा है.  जो सक्रियता होनी चाहिए उसमें कहीं न कहीं चूक हो रही है. समाज में लोगों को उतरना पड़ेगा. उनके बीच से लेखन करना पड़ेगा. तभी पाठकीयता को विस्तार दिया जा सकता है.

ब्रज कुमार पांडे भी कहते हैं-अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवाज उठाई जा रही है. प्रलेस में महान साहित्यकारों के जन्मदिन और वर्षगांठ मनाएं जा रहे हैं.
तो सवाल उठता है कि क्या अब प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक रह गई है? स्थापना के 81 वर्ष देख चुकने के बाबजूद प्रलेस इतने तक ही सिमट कर रह गया है? जरूरी है समय के साथ बदलने की. अपनी अहमियत साबित करने की.


संपर्क :- 

रविवार, 21 जनवरी 2018

नई हिन्दी वाले लेखकों की सोच (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

नई हिन्दी वाले लेखकों की सोच
सुशील कुमार भारद्वाज



पिछले कुछ वर्षों से बाज़ार मेंकुछ किताबें आ रही हैं जो नई वाली हिंदी के नाम से बिक ही नहीं रही है बल्कि  बेस्ट सेलर जैसे टैगलाइन के साथ भी धूम मचा रही है. और इन किताबों के लेखक चाहे निखिल सचानहों या सत्य व्यास या कोई और सभी के सभी ये नए लेखकचेतन भगत की लोकप्रियता से अभिभूत होकर ही लेखन के क्षेत्र में आए हैं.

लेकिन जैसे चेतन भगत को लोगों ने धीर-गंभीर साहित्यकार मानने से इंकार कर दिया है वैसे ही हिंदी के इन लोकप्रिय साहित्य के रचनाकारों को भी विभिन्न वजहों से लोग खारिज कर रहे हैं. और सबसे बड़ी बाततो ये है कि ये रचनाकार ना तोखुद को प्रेमचंद आदि की परंपरा की मानते हैं और ना हीवेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्रमोहन पाठक आदि की श्रेणी का. ये खुद का एक अलग ब्रांडिंग करते हैं. खुद की एक नई श्रेणी मानते हैं जो दोनों के बींच है. ये खुद को  क्लासिकल साहित्य की सीढ़ी मानते हैं. ये सोचते हैं कि ये बिखरते हुए पाठकों को किताबों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और इन पाठकों को वे असली साहित्य की ओर मोड़ने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. ये रचनाकार खुद को आज की जरूरत का लेखक मानते हैं. वे मानते हैं कि वे  आज के युवाओं की जीवनशैली और जरूरत को देखते हुए उनकी रुचि के अनुसार लिखते हैं. ये लेखक ये नहीं मानते कि कोई इनकी किताबों को पढ़कर कोई बड़ी बौद्धिकता हासिल कर लेंगें. वे अपने साहित्य से पाठकों के रूचि परिमार्जन की बात भी नहीं सोचते हैं. कुछ लेखक तो शुद्ध व्यापारी की भाषा में बात करते हैं कि प्रकाशक जितने शब्द की किताब कहते हैं उसी के हिसाब से लिखते हैं. और उसी के अनुसार कहानी में भी काट-छांट करते हैं. हां, कीमत कम रहे इस बात का ध्यान जरूर रखते हैं ताकि किताब अधिक से अधिक हाथों तक पहुँच सके. वे इसलिए नहीं लिखते हैं कि उनकी किताबें पुस्तकालयों की शोभा बने. वे तो  साफ साफ शब्दों में कहते हैं कि अकादमिक लेखन वाले ही धीर गंभीर लिखकर पाठकों की रुचियों का परिमार्जन कर सकते हैं जबकि वे  भूल जाते हैं कि प्रेमचंद और रेणु आदि कोई अकादमिक लेखक नहीं थे.
अपनी ही बातों पर अड़ते हुए नई हिन्दी वाले ये लेखक  कहते हैं कि आज के पाठक  ना तोखुद को प्रेमचंद आदि से जोड़ पाते हैं और ना ही वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के साहित्य से इसलिए वे नई आबोहवा में पल बढ़ रहे युवाओं के मनोरंजन के लिए उन्हीं की भाषा में उन्हीं की पसंद की चीजों को लिख रहे हैं.
इन साहित्य में उद्देश्य क्या होता है? तो सत्य व्यास जैसे लेखकअपनी किताब “बनारसटॉकीज का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि आई कार्ड खो गया मोबाइल खो गया तो पुलिस में तुरंत रपट लिखवानी चाहिए वरना आप कभी भी बड़ी से बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं.”

आपको इन उद्देश्यों को सुनकर ठहाका लगाने की इच्छा हो रही हो लेकिन इन लेखकों को लगता है कि पहले से परिभाषित साहित्य के उद्देश्य को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है. क्योंकि हमारा समय बदल गया है समाज बदल गया है तकनीक के साथ साथ परिस्थितियां बदल गई हैं.इसलिए इन चीजों को बदलने की जरूरत हैक्योंकि समय के साथ चीजे बदल जाती हैं. जो नहीं बदलती हैं वह सड़ –गल के एक दिन खत्म हो जाती है. अपनी प्रासंगिकता खो देती है.  

और सबसे बड़ी बात कि  इन साहित्यकारों को लगता है कि बिक्री के पैमाने पर ही लेखकों की लोकप्रियता ही नहीं आंकी जाय  बल्कि उन्हें मान्यता और स्थापना भी दी जाए. पिछले दिनों पटना में सत्य व्यास ने तो एक कार्यक्रम में बनारसटॉकीज को नोबेल पुरस्कार का हकदार” भी खुलेआम बता दिया.

ये नए लेखक क्या लिखते हैं जो लोगों को लुभाता है? वे  जरूरी बातें लिखते हैं या गैरजरूरी यह मायने नहीं रखता. क्योंकि हर लेखक अपनी अपनी कहानियों पर अपने अपने तरीके से काम करता है. लेकिन इतना तो तय है कि ये लोग पूरा का पूरा मनोरंजन का मसाला तैयार जरूर करते हैं. अब चाहे उसे आप चुटकुले के रूप में स्वीकार करें या दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं के रूप में.

यह भी एक सच है कि नकी लेखनी में एक प्रवाह है जो अंत तक पाठकों को बांधे रखने में सक्षम होता है. अब यह उनके लिखने की शैली कहें या भाषा कौशल. लेकिन इतना तो तय मानें कि  इनके किताबों में आपको एक दो लाइन नहींबल्कि पैराग्राफ के पैराग्राफऔर पूरे पेज अंग्रेजी के शब्द वो भी रोमन लिपि में छपे हुए मिल जाएंगे और लोगों की सबसे बड़ी शिकायत उनकी अंग्रेजी के शब्दों के रोमन में छपने से ही है.जबकि किताब में प्रयोग किए गए रोमन लिपि के शब्द कोई ऐसे नहीं होते, जिनके लिए आपको कोई शब्दकोश पलटना पड़े. और इसीलिए वरिष्ठ लेखक तक स्पष्ट शब्दों में कहते हैं किया तो अंग्रेजी में लिखो या फिरहिंदी मेंदोनों का घालमेल मत करो.’ तब ये  लेखक अपने बचाव में दो ही बात कहते हैं.पहले तो यह कि “ये  किताबें ही इसलिए इतनी बिक रही है क्योंकि इसे इस रूप में लिखाही गया है. और आज का पाठक खुद को इस से जोड़ पाता है.” दूसरी बात वे  कहते हैं कि मेरी भी यह सीमा है कि मैं अपनी बातों को इसी रूप मेंसहजता के साथ अभिव्यक्त कर पाता हूं.” तब  लोगों की एक ही आवाज उठती है कि भारत के हिंदी पट्टी का पला-बढ़ा इंसान अपने हिंदी अथवा क्षेत्रीय भाषामें खुद को अभिव्यक्त करने की बजाय अधकचरी अंग्रेजी में कैसे अभिव्यक्त कर सकता  है? ये हमारी शिक्षा –व्यवस्था का दोष है या व्यक्ति विशेष का?
जबकि ये लेखक स्पष्ट शब्दों मेंकहते हैं कि मैं इन शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखने कीकोशिश करता तो या तो सही शब्दों को नहीं लिख पाता या फिर वह प्रभाव नहीं पड़ता जो अभी है.” यदि थोड़ी देर के लिए इन लेखकों की बातों को सच मान भी लें तो क्या इन लेखकों के पाठक अधकचरा ज्ञान वाले ही हैं? जिनके पास ना तो हिंदी की सही-सही समझ है और ना ही अंग्रेजी की? यह तो सबसे बड़ा सवाल है पाठकों पर भी बनता है?  जबकि  शुद्ध अंग्रेजी में लिखी गई किताबें जिस अनुपात में बिक रही है और पढ़ी जा रही है उसी अनुपात मेंहिंदी की भी किताबें. अब भलेही संख्या कमोबेश जो भी हो.

अब रह गई बात किताबों मेंबिलो द बेल्ट भाषा का इस्तेमाल करने का, तो ये लेखक स्पष्ट कहते हैं कि ऐसास्थापित एवं सम्मानित रचनाकार भी कभी-कभी करते हैंलेकिन इसे पूरी तरीके से सच नहीं माना जा सकता है.क्योंकि जो स्थापित रचनाकारहैं वे यदि ऐसे दृश्यों  या शब्दों का प्रयोग करते हैं तो अमूमन वैसी परिस्थिति होती है यावातावरण होता है. या फिर वे विभिन्न प्रतिबिंब से अपनीबातों को अभिव्यक्त कर देते हैं.लेकिन इन लेखकों का चित्रणपूर्णतः मसाला के रूप में ही प्रयोग किया जाता है.

इन सबके बावजूद सवाल यह उठता है कि आखिर नई हिंदी वाले ये नए लेखक नए पाठकभी बना रहे हैं? या पहले से ही वर्गीकृत पाठकों को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.पहले से ही साहित्यकारों के तैयार जमीन में ही कहीं सेंधमारी कर अपनी नई जमीन तैयार कर रहे हैं? आखिर यहसच प्रकाशकों की ईमानदारी के बगैर कैसे पता चलेगा? लेकिन इतना तो तय है कि आप इन्हें खारिज करें या स्वीकार करें. इन्हें कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. और दिन -प्रतिदिन ये खुद को स्थापित ही करते जा रहे हैं.  

संपर्क :-sushilkumarbhardwaj8@gmail.com