विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में
अनीश अंकुर
हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं मसलन कविता, कहानी में कई किस्म के आंदोलन चले, नये-नये ‘वाद’ का जन्म हुआ। लेकिन नाटक में वैचारिक बहसों की केाई वैसी निरंतर परिपाटी नहीं रही। आजादी के पहले जन नाट्य संघ की जब स्थापना हुई तो तो नारा ही था ‘ हमारी नायक जनता है’’। इसके प्रदर्शित प्रस्तुति ‘नवान्न’ में पहली बार किसान को नायक के रूप में मंच पर अवतरित हुआ।
सत्तर के दशक में नाटकों में ‘बैक टू द रूट्स’ यानी अपनी ‘जड़ों की ओर लौटो’ की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ लिया। इसके तहत नाटकों में भारतीयता’ व परंपरागत विरासत की खोज का सिलसिला प्रारंभ हुआ। जिसे देखों वो ‘लोक’ व ‘फोक’ की बात करने लगा।
‘भारतीयता की खोज’ की ये पूरी प्रक्रिया बदनाम अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन द्वारा समर्थित था। ‘फोक’ की प्रधानता वाली इस परिघटना ने इसने निर्देशक को ताकतवर तथा नाटककारों को कमजोर बना दिया। रंगमंच में प्रदर्शनकारी तत्वों की प्रधानता होने लगी फलतः ‘टेक्सट’ का महत्व कमजोर होने लगा।
मजबूत निर्देशक ने पहले चरण में नाटककारों को पृष्ठभूमि में धकेला वही दूसरे चरण में अभिनेताओं को अप्रासंगिक बनाना शुरू कर दिया। रंगमंच में अभिनेता अब डिजायन का निष्क्रिय तत्व में तब्दील होता जा रहा है। एक्टर अब आब्जेक्ट में बदल गया है।
एक समय नुक्कड़ नाटकों ने प्रोसेनियम पर होने वाले थियेटर केा बेहद सशक्त चुनौती दी थी। नुक्कड़ नाटकों के एक बड़े हिस्से के एन.जी.ओ करण की प्रक्रिया ने भी उसकी वैचारिक वैधता को कमजोर कर डाला है।
बिहार का रंगमंच मुख्यतः प्रयोगधर्मी माना जाता रहा है। चॅुंकि बिहार प्रारंभ से ही विभिन्न आंदोलनों व संघर्षों की भूमि रहा है। साथ रंगमंच की जनपक्षधर धारा ने वैचारिक बहसों से जीवंत संपर्क बनाए रखा फलतः नये-नये प्रयोग होते रहे हैं। बिहार के रंगमंच के प्रयोगधर्मी होने का यह प्रमुख कारण है।
लेकिन फिर भी वैचारिक बहसें नयी-नयी शक्लों में सामने आ रहे हैं। अभी थियेटर ओलंपिक को लेकर रंगमंच दो हिस्सों में विभाजित है । सतह पर दिखने पर भले ही रंगकर्मियों के दो समूहों के मध्य का संघर्ष दिख रहा है। दरअसल यह विचाराधात्मक प्रश्न है।
सत्ता की सरपरस्ती में होने वाले चलने वाले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों द्वारा आयोजित महोत्सवों के रंगमंचविरोधी चरित्र पर सवाल उठने लगे हैं। एन.एस.डी से प्रशिक्षित रंगकर्मियों के संकटग्रस्त रंगमंच होने की पहचान हैं , ये सवाल। अभी हिंदी रंगमंच अपने संकटों की पहचान कर रहा है। यही बात वैचारिक विमर्श की दृष्टि से बेहद उम्मीद पैदा करने वाली है।
बिहार नुक्कड़ नाटकों को लेकर भी काफ़ी चर्चित रहे हैं। सफदर हाशमी की हत्या के पश्चात बिहार के नुक्कड़ नाटको की बाढ़ आ गयी। नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई कि जब बिहार के सौ साल हुए तो रंगमंच की मुख्य पहचान के रूप में नुक्कड़ नाटकों को रखना पड़ा।
बिहार के रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती है कि अपनी प्रयोगधर्मिता को बचाये रखते हुए उसे आगे विकसित करने का काम करे।
इसके अलावा बिहार की उभरती सामाजिक शक्तियों एवं उनसे जुड़े बिहार के लोकनाटकों यथा सलहेस, रेशमा चौहरमल, हिरनी बिरनी, सती बिहुला, दीना भद्री, बहुला गढ़िन आदि के साथ को आधुनिक रंग चेतना के साथ तालमेल बनाना एक ऐसा कार्यभार है जिसे आगे आने वाले दिनों में सम्पन्न होना है।
बिहार के रंगमंच को यहां के सामाजिक राजनीतिक जीवन में हस्तक्षेप करना है। उसे विवादों से भी घबराना नही है। जैसा कि गिरीश कर्नाड कहते हैं '' जो रंगमंच विवाद से बचता है वो अपना कफ़न खुद तैयार कर रहा है।"

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