मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

पटना पुस्तक मेला 2017

आज की तारीक में #पटना_पुस्तक_मेला महज एक साहित्यिक एवं  सांस्कृतिक आयोजन मात्र नहीं है। यह साहित्य का वह संगम है जहां हर कोई कम-से-कम एक बार डुबकी जरूर लगाना चाहता है। जहां उन्हें अपनी आवाज बुलंद करने के लिए एक बड़ा-सा मंच मिलता है। अखबारों में कवरेज के साथ-साथ साहित्य और कला से जुड़े दिग्गजों से रूबरू होने का भी मौका मिलता है। हर बार मेला में कुछ-न-कुछ अलग करने की कोशिश की जाती है। लोगों की सुख-सुविधाओं का विशेष ख्याल किया जाता है। बाबजूद इसके रास्ते में काँटे कम नहीं मिलते हैं। आयोजन में होनेवाली कठिनाइयों को तो लोग खुशी-खुशी झेल लेते हैं। अलग-अलग तरीके से मिलनेवाले दबाब को भी लोग सहन कर लेते हैं। लेकिन अपने ही जब राजनीति पर उतर आते हैं तो दु:ख तो होता ही है। आयोजक पर अनावश्यक दबाब बनाना। उन्हें घुड़की और धमकी देना कम-से-कम किसी साहित्यकार को तो शोभा नहीं देता! आयोजक तो कार्यक्रम को सफल से सफलतम बनाने के लिए एड़ी-चोटी एक करते हैं किसके लिए? इस साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन से सिर्फ आयोजकों को ही फायदा होता है? क्या इसी के सहारे उनका घर-परिवार चलता है?
जी, नहीं हुजूर। पटना पुस्तक मेला, पटना की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यह बिहार को साहित्य के केंद्र में लाने की एक सार्थक और सफल मुहिम है। यदि आप अपने निजी स्वार्थवश इसे बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं तो आप आयोजक को नहीं बल्कि अपनी संस्कृति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। आपके लिए शिकायतों की झड़ी लगाना और काँटें बोना आसान हो सकता है लेकिन आपके लिए निर्माण करना बड़ा ही दुरूह कार्य होगा। आज पटना पुस्तक मेला जिस मुकाम और मजबूती पर है उसे और मजबूत किए जाने की जरूरत है। साहित्यकारों के साथ-साथ प्रकाशकों को भी प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। देश और विदेश का ध्यान पटना की ओर खींचनें की जरूरत है। और शुभकामनाएं दें कि पटना पुस्तक मेला 2017 पिछले सारे रिकार्डों को तोड़ते हुए एक नया कीर्तिमान रचे। इस बार तो मेले का आयोजन भी गांधी मैदान के उत्तर में बने नये ऑडोटोरियम में होगा। जहां न धूल के दर्शन होंगें न चिपचिपाती गर्मी का एहसास।
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सुशील कुमार भारद्वाज

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

जनेऊ (कहानी): सुशील कुमार भारद्वाज

जनेऊ  (कहानी)
सुशील कुमार भारद्वाज



रात में लोग सारी चिंताओं को दरकिनार कर सिर्फ गहरी नींद में सोना चाहते हैं. दिनभर की शारीरिक और मानसिक थकान को बिस्तर में ही छोड़ एक नई ऊर्जा के साथ नई सुबह में नई जिंदगी नए तरीके से शुरू करना चाहते हैं. लेकिन यह सुख आज मालिनी के नसीब में नहीं है. आँखों से नींद रूठ गई है. क्योंकि आज जिंदगी उसे धूल भरे अतीत के पन्नों में झाँकने के लिए मजबूर कर गई है. उस अतीत के पन्ने को, जिसे वह छूना नहीं चाहती है. वह तो सिर्फ हर गुजरते हुए दिन के साथ आगे ही बढना चाहती है. लेकिन आज वह बेबस है. उसकी सारी बुद्धि नाकाम हो गई है. वह लोगों पर हँसती थी कि सोने के लिए दवाई खाने की क्या जरूरत है? देह्तोड़ मेहनत तो करो! फिर देखो, नींद कैसे आती है. लेकिन पति से नींद की गोली मांगकर खाने के बाबजूद भी उसे आज नींद नहीं आ रही है. उसे सिर्फ याद आ रही है सुबह की घटना, जब वह सिर्फ असहाय मूरत बनी बैठी रही. गालियाँ सुनती रही. अपमानित होती रही. आज तक किसी ने उससे तेज आवाज में बात करने की हिमाकत नहीं की. हाथ उठाना तो बहुत दूर की बात थी. लेकिन आज प्रेम ने घर में घुसकर वह सबकुछ कर दिया जिसकी परिकल्पना किसी ने नहीं की थी. उसकी चोटी खींचकर प्रेम ने कुर्सी में बैठा दिया था और वह कुछ न कर सकी जबकि कॉलेज में विद्यार्थी कौन कहे? किसी प्रोफेसर की भी हिम्मत उससे बात करने की नहीं होती थी. और यह सब होता रहा उसके पति के सामने. वह पति जो रिटायर्ड प्रोफेसर ही नहीं है बल्कि राज्य में कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा प्राप्त पदाधिकारी भी है. कई आयोग का मेम्बर भी है. आखिर क्या हो गया पद, पैरवी और पैसा का? लोग तो कहते हैं कि धन और शानोशौकत की हवा में जाति –धर्म का बैरियर टूट जाता है. लेकिन आज वह अपनी जाति की ही वजह से पिटता रहा. दनादन थप्पड़ खाता रहा. क्या वह सिर्फ जाति का ही असर था जिसके भरोसे प्रेम सबकुछ आसानी से कर गया? हां. शायद वह सवर्णवादी मानसिकता ही थी जिसके आगे एक दलित का इज्जत रिरियाता हुआ नज़र आया. मालिनी को नज़र आया वह कच्चा-सुता जिसे ‘जनेऊ’ कहा जाता है. जिसकी सौगंध खाकर वह एक-एक शब्द बोल रहा था. मालिनी की आँखें फटी की फटी रह गई. लग रहा था जैसे उस जनेऊ के एक-एक धागे से असंख्य अदृश्य किरणें निकल रही थीं जिसने उन दोनों दम्पतियों को जकड़ रखा था. बेबस और लाचार कर रखा था. और प्रेम घंटे भर के तमाशे के बाद शांति से बगैर कोई खरोंच लिए–दिए वहां से चला गया.
मालिनी को याद आने लगी 5 जून 1974 का वह दिन– जब चिलचिलाती गर्मी से बेपरवाह लोग राज्य के सुदूर इलाके से पटना आए थे. दोपहर के बाद चार लाख से अधिक लोग गाँधी मैदान में जमा हो गए थे सिर्फ और सिर्फ जेपी को सुनने के लिए. सम्पूर्णक्रांति का साक्षी बनने के लिए. उस क्रांति का साक्षी बनने के लिए जिसका उद्देश्य सिर्फ इंदिरा गाँधी की सरकार को गिराना नहीं था. बल्कि इसी बहाने राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति को सम्पूर्ण क्रांति के रूप में प्रस्तुत करना था. वर्षों से चली आ रही जड़ हो चुकी परम्पराओं को तोड़ कर एक नया समाज बनाना था. जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लेना था. उस महायज्ञ की साक्षी मालिनी भी बनी थी. खचाखच भरे गाँधी मैदान के पूर्वी छोड़ पर वह अपने प्रोफेसर के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. देख रही थी क्रांति के विस्फोट को. देख रही थी अद्भुत दृश्य को. लाखों की संख्या में लोग अपना जनेऊ तोड़ रहे थे और नारे से गाँधी मैदान गूंज रहा था- 
"जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।
समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो।"

स्वतंत्रता सेनानी जय प्रकाश नारायण अपनी दुनियां में खोए हुए थे भले ही उनके बारे में अफवाहें फैलती रहती थी. कांग्रेस पार्टी तो अक्सर उन्हें अपने निशाने पर ही रखती थी. शायद उन्हें तख्तापलट कर डर उन्हीं से सबसे ज्यादे था. जब विश्विद्यालयों में गिरते शिक्षा स्तर पर चिंता जताते हुए कुछ विद्यार्थियों ने आंदोंलन का नेतृत्व करने का आग्रह जेपी से किया तो उन्होंने भी कुछ शर्तों के साथ अपनी सहमती दे दी. उन्हें भी अपने ऊपर लगे आरोपों का जबाब देने के लिए एक मंच मिल गया था. लेकिन इस आंदोलन ने जिन किसी की भी जिंदगी बदली उनमें से मालिनी और प्रोफेसर चौधरी एक थे. वे दोनों अलग–अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के होने के बाबजूद एक होते चले गए. प्रोफेसर साब भी पूरे दिल से मालिनी को अब श्रृंगार रस पढ़ाते-पढ़ाते श्रृंगार रस में डुबोने भी लगे थे. मालिनी को भी इस रस का ऐसा स्वाद लगा कि माता-पिता से जिद्द कर पहले वह होस्टल में रहने लगी फिर बेरोक-टोक सैदपुर में अकेले रह रहे प्रोफेसर के घर भी आने-जाने लगी. बात ऐसी नहीं थी कि प्रोफेसर साब अकेले थे. उनके पीछे उनकी पत्नी, दो बच्चे और माता-पिता गंगा के उस पार उत्तरी बिहार के एक छोटे से गाँव में किसी तरह गुजर-बसर कर रहे थे. लेकिन उन्होंने हमेशा स्वयं को सबके सामने कुँवारा ही बताया. वो तो महज एक संयोग था कि मालिनी ने प्रोफेसर साब को रंगे हाथों पत्र पढ़ते पकड़ लिया तो राज खुला कि पिताजी ने घर बुलाया है -पत्नी की तबीयत बहुत खराब है. भूचाल आ गया था उसदिन. जिसे शांत करने में प्रोफेसर साब को पसीना छूट गया था. और मालिनी ने ऐसी चुप्पी साध ली थी कि प्रोफेसर साब की सारी बुद्धि रिरियाती नज़र आई. अंत में अपनी बात साफ़ –साफ़ कहने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा उनके पास - "अच्छा तुम्हीं बताओं कि इसमें मेरी क्या गलती है? बारह साल कोई शादी की उम्र होती है?.... और शादी के कुछ ही दिनों के बाद तो वह अपने मायके चली गई... मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी, तब जाकर कहीं ससुराल गया... वह भी कुछ ही दिनों के लिए. और बाद में पता चला कि मैं बाप भी बन गया. जिंदगी इतनी जल्दी बदलती चली जाएगी मुझे नहीं पता था. जबकि वो मेरे साथ कभी रही ही नहीं तो फिर मैं क्यों मान लूँ कि वो मेरा ही संतान होगा जबकि वो तो कईयों से हंसी–ठिठोली करती है. ऊपर से शक्ल न सूरत. मुझे तो घिन आती है. न रहने-सहने का सऊर न बोलने-चालने का ढ़ंग. पूरा का पूरा गोबर का चोथ. वो तो घरवालों की बात थी कि उसे घर में लाकर बैठा दिया हूं. और जब कभी घर जाता हूँ तो मजबूरी में उसके साथ सो लेता हूं. वर्ना कहाँ मैं प्रोफेसर और कहाँ वो अनपढ़ गँवार देहाती औरत... कहती है मैं ही उसका देवता हूँ जैसे मैं रखूँगा वैसे ही रहेगी. दोनों बेटे के सहारे ही वह पूरी जिंदगी गुजार लेगी. लेकिन मैं तो नहीं न गुजार सकता? सभा-सोसायटी में कैसे मैं उसे ले जा सकता हूँ? इज्ज़त-प्रतिष्ठा भी कोई चीज होती है कि नहीं?" 
इतना कुछ बोलने के बाबजूद भी मालिनी सिर्फ हूँ-हां करके वहां से चली आई. और कई दिनों तक वह प्रोफेसर साब से मिली तक नहीं. अपने कमरे में ही सिमटी रही. दुनियाभर की चिंताओं से घिरी रही. दुनियादारी और झूठ-फरेब की कहानियां पढ़ती और सुनती रही. सच और झूठ की परिभाषा खोजती रही? अपने जीवन की चिंता में वह गलती रही. जिसके प्रेम में घरवालों से लड़कर अलग हुई वही झूठा निकला तो वह किस पर भरोसा करे? कष्टकारी मानसिक द्वंद्व के बाद वह अपने घर लौटने की बात सोचने लगी. अभी तक घरवालों को कोई विशेष जानकारी इस रिश्ते की नहीं थी. सोचने लगी -पता नहीं बाद में क्या होगा? जब वह माँ से घर लौटने की बात की तो माँ बहुत डर गई. किसी अन्होनी के डर से उसका आवाज थरथराने लगा. उसकी कुशलता जानने के लिए तरह –तरह के सवाल कुरेदती रही लेकिन वह जबाब इतना ही देती रही कि “अब आगे कॉलेज करने की विशेष जरूरत नहीं है. वह सीधे परीक्षा में बैठ सकती है. फिर फिजूल में घर से बाहर क्या रहना?” अंत में माँ बोली- “पापा से बात करती हूं. जल्द ही तुम्हें वापस लिवा लावेंगें”. मालिनी को कुछ तसल्ली मिली. वह अपना सामान समेटने में लग गई. हर गुजरते दिन के साथ उसका दर्द नासूर बनके चुभता था. जिंदगी में सबकुछ उसे बेकार लगने लगा. बरसता हुआ हर बारिश का बूंद उसे पिघलता हुआ घाव नज़र आता था. एक दिन उसके पिता आए और कागजी खानापूर्ति करने के बाद उसे अपने साथ वापस घर ले गए. होस्टल छोड़ने के पहले वह अकेले में खूब रोई. खुद को खुद ही दिलासा देती रही. और सबकुछ भूलकर एक नई जिंदगी जीने का प्रण करती रही. कभी दुबारा प्रोफेसर का नाम नहीं लेने का प्रण करती रही. लेकिन कभी उसके मुँह से प्रोफेसर के लिए बददुआ नहीं निकली. चेहरे के भावों को नियंत्रित करना सीख गई थी लेकिन दिल और दिमाग के अंदर मचे कोहराम कभी उसे चैन से नहीं रहने देते थे. घर में अक्सर अपनी चंचलता से धमाल मचाने वाली मालिनी अब वह नहीं रही. जिंदगी को स्वीकारना सीख गई थी. गिला-शिकवा करना भूल गई थी. कम बोलना सीख गई थी. जिंदगी में सुखी रहने का मंत्र- कम खाना, गम खाना और कम बोलना सीख गई थी. लेकिन एकांत में कभी-कभी खूब रोती थी. कभी-कभी वह प्रोफेसर के साथ बने अपने रिश्ते पर खुद ही हँसती भी थी. कहती- “जिंदगी में एक प्यार भी नसीब नहीं हुआ. मिला भी तो शादीशुदा बाल-बच्चों वाला एक प्रोफेसर!”.
जब कभी घरवाले उससे पूछते -"सबकुछ ठीक तो है न? इतनी शांत क्यों रहती हो? देह गलते जा रहा है. खुद पर ध्यान दिया करो. सिर्फ पढ़ाई–लिखाई से ही सबकुछ नहीं होता है....." तो बीच में ही उनलोगों की बात काटते हुए साफ झूठ बोल जाती- "होस्टल में अकेले रहने की आदत पड़ गई है न! एकांत ही अच्छा लगता है. क्या और क्यों किसी से बेकार में बकबक करूँ?"  घरवाले उसके जबाब पर कंधा उचकाते और मुँह बनाते हुए शांति से आगे बढ़ जाते.
उस दिन जब मालिनी परीक्षा फॉर्म भरने विश्वविद्यालय पहुंची तो प्रोफेसर दरवाजे पर ही दिख गए. मालिनी का चेहरा अचानक अजीब तरीके से खिल उठा. लगा जैसे बहुत बड़ी खुशी मिल गई हो. लेकिन पल भर में ही वह संयत हो गई. नजर दायें-बायें घुमाकर शांत भाव से आगे बढ़ गई. मालिनी के इस व्यवहार से विचलित हो प्रोफेसर चक्कर पर चक्कर लगाने लगा ताकि वह उससे एकांत में बात कर सके. और जब विभाग के अंदर एक बार मौका मिला तो बेचैन हो- "तुम्हारा ये व्यवहार मुझे कुछ समझ नहीं आया? तुम होस्टल छोड़कर भी चली गई बिना कोई सूचना दिए?"
-"मुझे आपसे पूछकर कोई काम करनी चाहिए? कौन होते हैं आप मुझसे सवाल करनेवाले?"  -मालिनी ने सख्त आवाज में जबाब दी.
इस अप्रत्याशित जबाब से पहले तो प्रोफेसर साब बुरी तरह उछल पड़े. चेहरे का भाव बदल गया. फिर खुद को नियंत्रित करते हुए- "आप जो कुछ भी कह रही हैं वह शायद सही ही कह रही हों. लेकिन मुझे लगता है कि आपको एक बार मुझसे बात करनी चाहिए. भावना में बहकर लिया गया कोई भी निर्णय सही नहीं होता है. शांति से एक बार विचार करने में कोई बुराई नहीं है. कोई जोरजबर्दस्ती की बात तो है नहीं." 
- "झूठ-फरेब पर बने रिश्ते की ईमारत ठहरती ही कितनी देर है जो आगे कुछ बात करूँ?"- सख्ती से मालिनी बोली.
शांतभाव से अपनापन दिखलाते हुए प्रोफेसर- "अभी जो कुछ भी तुम बोलोगी मैं सुनने को तैयार हूँ. तुम्हारे सारे गुस्से को झेलने के लिए तैयार हूँ. यदि तुम हाथ भी चला दोगी तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा क्योंकि मैं तुम्हारे अंदर चल रहे दर्द को महसूस कर सकता हूँ. तुम्हारी जगह कोई और भी होती तो शायद वो भी ऐसे ही पेश आती.”
इतना सुनते ही मालिनी का चेहरा रूआंसा हो गया और वह फुट फुट कर रोने लगी. प्रोफेसर ने जेब से रूमाल निकालते हुए मालिनी की ओर बढ़ाया और कंधे पर थपकी देते हुए शांत रहने के लिए कहा -"हिम्मत से काम लो. ऐसे बच्चे की तरह नहीं रोते. मैं तुम्हारे साथ हूँ न! फॉर्म का काम कर लो तो मैं तुम्हारे साथ गंगा किनारे चलता हूँ. वहीं आराम से बातें होगीं. फिर जो उचित लगे वही करना." 
मालिनी फॉर्म भरकर चुपचाप विभाग के आगे खड़ी हो गई. विभाग में तब तक कई और प्राध्यापक भी आ चुके थे. प्रोफेसर साब अपना बैग ले अपने साथियों से कुछ कहकर वहां से निकल पड़े. वे दोनों भीड़भाड़ वाले अशोक राजपथ पर कुछ दूर चलने के बाद दरभंगा हाउस की ओर मुड़ गए.

गंगा के तट पर स्थित दरभंगा हाउस यूं तो अब पटना विश्वविद्यालय का ही हिस्सा है जहां कई विषयों की पढ़ाई होती है लेकिन वर्षों पहले यह दरभंगा महाराज का निवास स्थान हुआ करता था. राज शासन के सिलसिले में अक्सर पटना आने वाले महाराजा रामेश्वर सिंह जितने ख्यातिप्राप्त शासक थे उतने ही बड़े तांत्रिक भी थे और दक्षिणेश्वर काली के उपासक भी. अपनी आदत के अनुसार उन्होंने ईमारत के उत्तरी हिस्से में दक्षिणेश्वर काली की मंदिर भी बनवाई जिसमें पहले तो सिर्फ राजघराने के लोग ही पूजा किया करते थे लेकिन बाद के वर्षों में इस मनोकामना सिद्धि मंदिर को सार्वजनिक कर दिया गया. जहां अक्सर पूजा करनेवालों की भीड़ लगी रहती है. और दरभंगा हाउस में पढ़ाई करने वाले भी जब-तब निर्मल गंगा को निहारने घाट किनारे पहुँच जाते हैं.
लेकिन जब वे दोनों दरभंगा हाउस के राजा और रानी ब्लॉक के बीच से निकले रास्ते से गुजरते हुए गंगा किनारे पहुंचे तो काफी शांति थी. गंगा अपने विशाल पेट में ठंढ़ी हवाओं के साथ बह रही थी. मालिनी गंगा के पानी को देखते हुए प्रोफेसर के साथ घाट किनारे एक पत्थर पर बैठ गई तब प्रोफेसर ने कहना शुरू किया -"मालिनी! बातचीत का कोई न कोई तो सिरा होना ही चाहिए. लेकिन दु:ख इस बात का है कि पता नहीं -मेरी कौन-सी बात तुम्हें सच लगेगी और कौन-सी तुम्हें काँटे की तरह चुभेगी जो तुम्हारे गुस्से को और बढ़ा दे. ...... लेकिन मैं क्या करूँ? सच को कहीं न कहीं तो बयां करना ही होगा." मालिनी का हाथ पकड़ते हुए -"देखो! ये सच है कि मेरी शादी हो चुकी है. मेरे दो बच्चे हैं. लेकिन मेरा उनसे कोई लगाव नहीं है. मेरे लिए वे सिर्फ और सिर्फ बंधन के रिश्ते हैं जिसे मुझे निभाना ही पड़ेगा अब चाहे जैसे भी हो. लेकिन जिनसे मुझे कोई सुख ही नहीं उसका ढ़िंढ़ोरा क्यों पीटूँ और किस-किस के पास पीटूँ?  उससे फायदा ही क्या मिलना है? यदि तुम मेरे इतने पास नहीं होती और मेरे घर नहीं जाती तो क्या तुम मेरे बारे में यह सबकुछ जान पाती? नहीं ना? हर इंसान का अपना दर्द होता है. हर दुखी इंसान अपने टूटे सपनों को दिल में दबाकर अंधेरी रात में रोता है. तकिये को गीला करता है. मेरे भी कुछ सपने हैं. मैं कब तक समझौता करूँ? कब तक मैं खुद को तिल-तिल कर मारता रहूँ? क्या मैं इंसान नहीं हूँ? मुझे अपने तरीके से जीने का हक नहीं है? मैं क्यों माता-पिता से मिले सामाजिक रिश्ते के बंधन की गुलामी करूँ? और ऐसा तो कहीं नहीं लिखा है कि पुरूष दूसरी शादी नहीं कर सकता? मेरी एक पत्नी गाँव में रहे पैतृक सम्पत्ति पर हक जमाए. खाए-पीए और जिए. लेकिन तुम्हें मैं अपने साथ रखने के लिए तो तैयार हूँ. तुम पढ़ी-लिखी हो, मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकती हो. तुम्हें सभा-सोसाइटी में ले जाने में मुझे कोई हिचक तो नहीं. बच्चे जन्माना और उसी की परवरिश में जिंदगी गुजार देना ही सबकुछ तो नहीं? पढ़ाई का सदुपयोग करना. जीवन को समृद्ध करना. अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना भी जरूरी है. जन्म लेने वाला हर जानवर भी अपनी मौत तक के सफर को किसी न किसी तरीके से तय कर ही लेता है फिर मनुष्य और जानवर में फर्क ही क्या रह जाता है? यूं भी प्रेम में त्याग का महत्व है स्वार्थ का नहीं. फिर भी मेरे नौकरी के पैसे पर तुम्हारा हक रहेगा. पेंशन-अनुकम्पा आदि की सारी सुविधाएं तुम्हें दे सकता हूँ. अपनी पहुँच के सहारे तुम्हारे उज्जवल भविष्य के लिए जो कुछ भी संभव होगा, करने को तैयार हूं...... और तुम्हीं बताओ कि एक इंसान को किसके साथ रहना चाहिए जिससे प्रेम हो या जिससे सिर्फ सामाजिक बंधन का रिश्ता हो?"
- "सबकुछ मानती हूँ लेकिन झूठ का क्या?
- "मैनें झूठ कब बोला? तुमसे मैंने कब और क्या कहा? तुम मुझसे कभी कुछ पूछी जिसका जबाब मैंने नहीं दिया या आनाकानी की? तुम  इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार होकर भी मूर्खों की तरह बात करती हो? कान देखने की बजाय कौआ को देखती हो? लोग तो बहुत कुछ कहते हैं लेकिन वही तो सच नहीं होता? अब विशेष क्या कहूँ? तुम बच्ची तो हो नहीं? अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो. मैं तो सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि -जिंदगी में तुम्हारा साथ मिल जाए तो बहुत ही खुशी होगी और मैं चाहूँगा कि तुम भी अपने पैरों पर खड़ा हो अपनी एक पहचान बनाओ..........." 
प्रोफेसर साब अपनी बात पूरी कर पाते उससे पहले ही एक झटका लगा. लगा जैसे किसी ने उन्हें गंगा में धकेलने की कोशिश की हो. मालिनी अचानक हुए हमले को समझ पाती उससे पहले ही उसकी नजर प्रोफेसर की गर्दन पकड़े अपने चचेरे भाई पर गई, जो दरभंगा हाउस में ही पीजी की पढ़ाई कर रहा था. किसी तरह उसकी नज़र इन दोनों पर पड़ी और और वह आक्रामक रूप में अपने साथियों के साथ आ धमका. मालिनी कुछ सोच पाती. कुछ कह पाती उससे पहले ही वे लोग प्रोफेसर चौधरी को पीटते पीटते घाट से सड़क तक ले गए. मालिनी अवाक् होकर सिर्फ सारा तमाशा देखती रह गई. बहुत ही कम समय में पूरा नज़ारा ही बदल गया. प्रोफेसर चौधरी सड़क पर बेल्ट से मार खाता रहा. माँ –बहन की गाली सुनता रहा. हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता रहा. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था अशोक राजपथ पर. एक भीड़ थी जिसके लिए यह सब तमाशा था. कॉलेज के बच्चे थे जिनकी नज़रों में वे चरित्रहीन थे. जो इसी के लायक थे. वो तो शुक्र था कि उधर से थाना की गाड़ी गुजरी और मजमा समाप्त हुआ. प्रोफेसर साब को पीएमसीएच में ईलाज के लिए भर्ती करवाया गया.
उस घटना के बाद से मालिनी का घर से निकलना भी लगभग बंद हो गया. वो सिर्फ भाई के बाईक पर ही बैठकर पटना साईंस कॉलेज में परीक्षा देने आती थी. लेकिन परीक्षा के आखिरी दिन मालिनी का भाई बाहर में इंतजार ही करता रह गया लेकिन मालिनी वापस नहीं आई. वह पूरे कॉलेज में एक-एक कोना ढ़ूंढ आया लेकिन वो नहीं मिली. घर में सब परेशान थे कि आखिर जवान लड़की चली कहाँ गई? घरवालों ने शक के आधार पर प्रोफेसर को ढ़ूढ़ना शुरू किया तो पता चला कि वह तो एक सप्ताह पहले ही छुट्टी लेकर चार वर्षों के लिए अवैतनिक अवकाश पर चला गया है. निराश हो घरवालों ने थाना में सिर्फ गुमशुदगी की एक रपट लिखवा दी, और समाज में अपनी इज्ज़त बचाने के लिए तरह-तरह की कहानियां गढ़ ली.
कोई चार वर्षों के बाद मालिनी फिर पटना में दिखाई दी. तब तक काफी कुछ बदल चुका था. वह प्रोफेसर के साथ शादी के बंधन में बंध चुकी थी तो अपने परिवार से सारे रिश्ते खो चुकी थी. पिता ने शर्म से आत्महत्या कर ली थी तो माँ बिखरते परिवार की चिंता में बिस्तर पकड़ चुकी थी. बीपी के कारण दो बार पैरालाइसिस का अटैक हो चुका था. छोटी बहन की शादी की बात बार-बार बिगड़ जा रही थी. भाई ने धमकी दे रखी थी कि घर में यदि किसी ने मालिनी से कोई संबंध रखा तो वह भी बाबूजी की तरह मौत को गले लगा लेगा. बच ही क्या गया था? भाई अक्सर कहता था – “जमींदार घराने की लड़की होकर भी उसने कोई लाज-लिहाज नहीं की. एक चौधरी के साथ चली गई. जिसका छुआ घर में कोई खाता तक नहीं उस अछूत को अपने हाथों खाना बनाकर खिला रही है. छी: छी:... अपनी राजनीति चमकाने के लिए गांधी मैदान में बूढ़े जेपी ने जनेऊ तोड़ने का नारा दे दिया तो क्या हम अपना संस्कार भूल जाएंगे? नेता का क्या है? वह तो डोम-चमार के घर भी जाकर खा लेता है. तो क्या हम भी वही काम कर लें?.......समानता का मतलब क्या है? अपना संस्कार छोड़ देना? दूसरे को अपनी तरह उन्नत बनाने की बजाय खुद को ही अवनत कर लेना? नैतिकता की तिलांजलि दे अनैतिकता को ग्रहण कर लेना? प्रोफेसर से शादी कर लेना? वह भी शादीशुदा और दो-तीन बच्चों के बाप से? क्या यही संस्कार है? वाह रे जेपी! बहुत खूब कहा तुमने भी.”
हाँ, अनैतिकता के सहारे कितनी नैतिकता की बात की जा सकती है? जैसे सत्ता पाने वाले नेता लूट-खसोट में जुट गए. आरक्षण की आड़ में जातिवाद का नंगा नाच कर गए. वैसे ही कॉलेजों और स्कूलों में पढ़ाई की जगह चोरी-चमारी को प्रोत्साहित कर गए. तब न शान से बच्चे परीक्षा में चोरी करते थे. और कहते थे- 
"चोरी की सरकार है
चोरी ही अधिकार है."

वैसे भी जेपी को कोई कितना और क्यों दोष दें? चाल तो चालबाज नेताओं ने चली जो एक बुजुर्ग होते स्वतंत्रता सेनानी को अपने नापाक मंसूबों को फलीभूत करने के लिए इस्तेमाल कर लिया.


मालिनी प्रोफेसर के साथ एक नई दुनियां में रहने लगी. लेकिन दुर्दुराने वालों की भी कमी नहीं थी. उसे दुःख तो तब होता था जब अपना काम करवाने के लिए लोग अच्छी –अच्छी बात बोलकर आ जाते थे और काम होते या बिगड़ते ही जाति-सूचक गाली भी देते थे और मुफ्त की सलाह भी. इन सब से परेशान हो उसने लोगों से मिलना छोड़ दिया. सामाजिक आयोजनों से दूर रहने लगी. खुद को कमरे तक सिमटती चली गई. अब वह सिर्फ खुद को आगे बढ़ाने के लिए पढ़ाई करने लगी. परिवार में पति-पत्नी के अलावे तीसरा कोई था भी तो नहीं. शुरू में मालिनी को बच्चे की इच्छा नहीं थी जिसकी वजह से वह बार-बार गर्भपात करवाती रही और बाद में डॉक्टर ने ही जबाब दे दिया. बाद में तो, वो एक कुत्ता भी पाल ली और उसी के सहारे एकांत में मन बहलाने लगी.
वर्षों बाद जेपी के सिपाही जब राज्य में सत्तारूढ़ हो गए तो राजनीतिक फायदा प्रोफेसर चौधरी को भी मिला. विश्वविद्यालय में वह विभागाध्यक्ष तो बने ही विभिन्न कमेटियों के भी सदस्य बने. और जब राज्य में व्याख्याताओं की बहाली होने लगी तो मालिनी को भी एक नौकरी किसी तरह मिल ही गई.
लेकिन माँ की मृत्यु होने पर लगभग 25 वर्षों के बाद जब मालिनी अपने घर गई तो काफी कुछ बदल चुका था. न घर वैसा था न घरवाले. रिश्तों की गर्माहट में उतार-चढ़ाव इतना अधिक था कि वह समझ नहीं पा रही थी कि वह वहां आकर खुद को सम्मानित महसूस कर रही है या अपमानित. भाई के खस्ताहाल घर में वह बहुत कुछ मदद करना चाह रही थी लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं था. मीठी बातों में फंसा सारी मदद वापस कर दी जा रही थी. बहनों ने शुरू में, एक लम्बें अरसे बाद मिलने पर बहनापा दिखलाया था. लेकिन एक-दो दिन के बाद ही उस व्यवहार में भी कहीं-न-कहीं रूखापन आ गया. रिश्तों की गर्माहट और आत्मीयता क्षीण होती लगी. नकली मुस्कुराहट, जरूरत से ज्यादे मिलता भाव कहीं न कहीं उसके मन को कचोट रहा था. कुछ भी स्वाभाविक नहीं लग रहा था. कभी–कभी तो लगता था कि घर का एक–एक कोना उसे धिक्कार रहा है. पिताजी की कराहें सुनाई पड रही हो. पिताजी की तस्वीरों में उनका निराश चेहरा नज़र आता था. भाई के बच्चे थे तो बहनों की भी छोटी–बड़ी कई संताने थीं. सभी अपनी माँओं को दुलारती, फुसलाती, झगड़ती थी लेकिन मालिनी के आते ही सब शांत हो जाते थे. कोई मालिनी के पास बैठना नहीं चाहता था. कभी वह बच्चों से अपनापन दिखलाने के लिए रुपए देने की कोशिश करती तो न बच्चे लेते न उनकी माँ लेने देतीं. बच्चों में इस नए रिश्ते के प्रति कोई खास दिलचस्पी भी नहीं थी. सिर्फ शिवानी कभी-कभार उससे दो-चार बातें कर लेती थी. शिवानी उसकी सबसे छोटी बहन की बेटी थी. शिवानी अपने माता-पिता के साथ गाँव में ही रहती थी क्योंकि उसकी माँ की शादी सुदूर गाँव में हुई थी. मालिनी के प्रोफेसर से शादी कर लेने के बाद जो सबसे बड़ी समस्या आई थी वह थी शिवानी की माँ की शादी. सारी कोशिश और अधिक दहेज देने के लिए तैयार रहने के बाबजूद उसके रिश्ते को किसी अच्छे परिवार में संस्कार और जाति के नाम पर स्वीकार नहीं किया गया था. भाई रिश्ते की तलाश करते करते थक कर बैठ गया था. वो तो दूर के एक रिश्तेदार ने गाँव में ही किसी बेरोजगार से शादी कर देने का प्रस्ताव दिया, जो कि माँ को जँच गई और घर के सारे सदस्यों के इच्छा के विरूद्ध जाते हुए शादी करवा दी. आस-पास के कई लोगों ने भी माँ को समझाने की बहुत कोशिश की. लेकिन माँ कहती रही- "मेरे मर जाने के बाद इसे कौन देखेगा? भाई-भतीजे के भरोसे कैसे छोड़ दूँ? शादी हो जाएगी तो कम से कम अपने घर में तो रहेगी? कहने को उसे भी तो अपना एक घर-परिवार होगा? दु:ख की घड़ी में मुझे ताना तो नहीं देगी? बेरोजगार है लड़का, गरीब तो नहीं? खेतीबाड़ी से कम-से-कम पेट तो पाल सकता है? बाँकी नसीब को कौन जानता है? पढ़ी-लिखी है. कोई ढ़ंग की नौकरी-चाकरी देख ले. फिर शहर में ही रहे न? कौन उसे मना करता है?  अब किसी की गलती की वजह से दूसरे की जिंदगी बर्बाद तो नहीं की जा सकती न? जो हो गया उसके लिए रोने से क्या मिलेगा? जो संभव है. वश में है. वही क्यों नहीं किया जाए?"
शिवानी मौसी से दस दिन में ही इतनी घुलमिल गई कि मालिनी जब उसे अपने पास कुछ दिन रखने की बात कही तो वह बहुत खुश हो गई. माँ-बाबू जी से मौसी के पास रहने की जिद्द करने लगी. शिवानी के पिता उसके जिद्द के सामने झुक गए और वह मौसी के साथ रहने लगी.
शिवानी को तो खुला राज मिल गया था. दस बजे तक मौसा-मौसी कॉलेज चले जाते थे और वह बंद कमरे के अंदर या तो दिनभर सोती थी या दिनभर टीवी देखती रहती थी. खाने-पीने की भी पूरी छूट थी. शाम में मौसी कुछ -न-कुछ हमेशा लेती ही आती थी. कभी-कभी उसे अकेले में डर भी लगता था लेकिन यहाँ पर उसे मन लग गया था. न भाई से लड़ना न माँ की मार. जब शिवानी अपने पिता के साथ अपने गाँव उत्तर बिहार जाने को तैयार नहीं हुई तो मौसी उसका नाम पास के ही स्कूल में लिखवा दी. अब तो लगभग तीनों एक ही साथ घर से निकलते और शाम में एक ही साथ लौटते थे.
समय कब निकल गया पता ही नहीं चला? शिवानी कॉलेज में पहुंच गई. उसके शरीर ही नहीं मन में भी बहुत बड़ा बदलाव आ गया. बचपन से मिली स्वतंत्रता ने उसके विचारों को भी स्वच्छंद बना दिया. उसे तो अब मौसी की बात भी अच्छी नहीं लगती थी. उसे ब्वॉयफ्रेंड से घंटों बात करने पर रोकटोक करना बिल्कुल पसंद नहीं था. लेकिन मौसी परेशान थी कि लड़की दिनभर ऑरकुट-फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में लगी रहती है. जाने किस-किस जान-अंजान से दिन भर चैट करती रहती है. सिगरेट और शराब की बोतल जिस दिन कॉलेज से लौटने के बाद मौसी डाईनिंग रूम में देखी उस दिन उसके आँखों के आगे अंधेरा छा गया. सदमे से वह एक ही जगह खड़ी की खड़ी रह गई. सिर्फ उसके आंखों से आंसू बहने लगे. लगा जैसे लड़की उसके हाथ से निकल चुकी है. उसके पीठ पीछे अब घर में क्या-क्या होता है? कहना मुश्किल. और शिवानी के मुँह से जब शराब की गंध आ ही रही थी तो विशेष शक-सुबहा की बात ही कहाँ शेष रहती है? कॉलेज जाने के बदले शिवानी कहाँ किसके साथ घूमती रहती है? कौन जानता है? अब वो ये बात किससे कहे? कितनी बदनामी होगी? लोगों को कहते देर न लगेगी कि दूसरे की लड़की को बिगाड़ दी? अपने स्वार्थ में बर्बाद कर दी?  मालिनी को अपने कॉलेज के दिन याद आने लगे. उसका शरीर ऊपर से नीचे तक कांपने लगा कि -क्या यह लड़की मेरी ही तरह घर में बागी बनेगी? घर-परिवार के इज्ज़त को आग में झोंकेगीमेरी ही तरह जिंदगी भर कष्ट भोगेगी?
मालिनी का चेहरा सख्त हो गया - "नहीं, नहीं! मेरे जीते जी तो शिवानी अब दूसरी मालिनी नहीं बन सकती है. मैं अपने ऊपर अब दाग नहीं ले पाऊँगी. मैं इसकी शादी यहीं कहीं करवा दूँगी अपनी बेटी कहकर. क्योंकि अब ये ग्रामीण परिवेश में निर्वाह नहीं कर पाएगी और सारी बातें भी दब जाएंगी. शायद यही मेरा पश्चाताप भी हो. शायद सारे भाई-बहनों का प्यार इसी बहाने वापस पा सकूँ. मैं इतना किसके लिए कमाती हूँ? एक लड़की की ब्याह तक नहीं करवा सकती? इतना भी अपने बहन के लिए नहीं कर पाऊंगी तो भला ऐसी जिंदगी का क्या लाभ?"
और वह तब से एक अच्छे सजातीय लड़के की तलाश में जुट गई. कोई डेढ़ वर्ष की तलाश के बाद एक नौकरीपेशा लड़का मिला जो कम ही पैसे में शादी के लिए भी तैयार हो गया. लड़का के घरवाले उनके सामाजिक और राजनीतिक रसूख से ही प्रभावित हो गए थे. इतना बड़ा घर-परिवार और एकलौती बेटी. आज नहीं तो कल सबकुछ लड़के का ही तो हो जाएगा. और राजनीतिक संपर्क का फायदा भी कहीं न कहीं जीवन में तो मिलेगा ही. लड़का नौकरी कर ही रहा है, लड़की भी कर ही लेगी. फिर दहेज के चक्कर में क्या पड़ना? तब तक शिवानी भी थर्ड ईयर में आ चुकी थी. और मौसी के कुछ दबाब और नियंत्रण में भी. उसे भी लगने लगा कि पता नहीं उसके माता-पिता उसकी शादी किसी नौकरीपेशा वाले से करवाने में सक्षम भी होंगें कि किसी किसान के हाथों ब्याह देंगें? शिवानी को भी भौतिकवादी दृष्टिकोण से फायदा ही फायदा दिखा इसलिए भी वह मौसी के हाँ में हाँ मिलाने लगी और अपने कुछ गतिविधियों पर भी नियंत्रण करने लगी.
तीन महीने की तैयारी के बाद शिवानी की शादी हो गई. लेकिन उसे ससुराल में वह आजादी नहीं मिली जो उसे मौसी के घर मिली हुई थी. मौसी के यहां नौकरानी घर का काम करने व खाना बनाने आती थी लेकिन ससुराल में तो अचानक ही खाना बनाने, बर्तन धोने और कपड़ा धोने की जिम्मेदारी भी आ पड़ी. जिससे उसे काफी परेशानी होने लगी. ऑरकुट-फेसबुक पर लगे रहने, चैट करने या लम्बे समय तक फोन पर बात करने की वजह से भी ससुराल में अक्सर उसे ताने सुनने पड़ते थे. मामला बिगड़ता ही चला गया. और आखिरकार एक दिन शिवानी घर में हंगामा करके अपने मौसी के पास लौट आई. मौसी शिवानी को समझाने की बजाय शिवानी के ससुराल वाले को ही भला-बुरा कहने लगी. घर में नौकर आदि रखने की सलाह देने लगी. कई बार तो वह शिवानी के पति प्रेम को ही दहेज-प्रताड़ना आदि के नाम पर केस करने की भी धमकी दे चुकी थी. प्रेम को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह कहे तो क्या कहे? उसे लगने लगा जैसे उसकी जिंदगी उलझ गई हो. एक क्लर्क एक प्रोफेसर के स्टेटस की बराबरी कैसे कर सकता है? उसे तो ऐसी शादी करनी ही नहीं चाहिए थी. लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था?  जिंदगी में समझौता करने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा था उसके पास. थक-हार कर एक बार फिर से उसने जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की. शिवानी से तो कभी बात होती नहीं थी मौसी को ही उसने समझाने की बहुत कोशिश की. लेकिन मौसी जिस अंदाज में बात करती थी वह प्रेम को अंदर तक तोड़ने के लिए काफी था. और प्रोफेसर साहब! वे तो सिर्फ एक राजनेता की ही तरह घुमाफिरा कर बात करते थे. कुछ भी राफ –साफ बोलने से परहेज करते थे. प्रेम के घरवालों को भी प्रोफेसर साब आनेवाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में व्यस्तता बताकर कुछ इस तरह कन्नी काटते थे कि लगता था जैसे कि उनके लिए पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कहीं अधिक राजनीतिक जीवन ही महत्वपूर्ण हो. इतना कुछ होने के बाद लगा कि प्रेम की जिंदगी ऐसे जगह उलझ गई है जहां से बाहर निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है. अब गुस्सा और विषाद के सिवाय बचा ही क्या था उसके पास? गुस्से में वह बहुत कुछ बोलता था लेकिन फिर यह सोचकर शांत हो जाता कि इसके लिए किसे दोष दूँ? माता-पिता की इच्छा से शादी की है इसलिए उन्हें दोष दे दूँ? लेकिन उन्होंने तो कभी मेरा बुरा नहीं चाहा! और आज भी वे मेरे लिए परेशान हैं. मेरी इस स्थिति के लिए उनके आंखों में भी आंसू हैं. शायद मेरी जिंदगी की नियति ही यही हो? कौन जानता है कि ईश्वर ने मेरे हिस्से में दुःख-ही-दुःख रखा हो?

और आज सुबह प्रेम मालिनी के घर अचानक ही बहुत गुस्से में आ धमका. शिवानी को खोजा तो पता चला वह शहर से कहीं बाहर दोस्तों के संग घूमने गई हुई है. उसका गुस्सा और सातवें आसमान पर पहुँच गया. उसने हाथ में लिए अखबार को मालिनी और प्रोफेसर चौधरी के सामने टेबुल पर पटकते हुए कहा– “तुम्हारी इतनी बड़ी हिम्मत कैसे हुई?... तू मेरे घर में घुसने का साहस कैसे किया था रे हरामी की औलाद?” इस अप्रत्याशित घटना से मालिनी और प्रोफेसर चौधरी की आँखें फटी की फटी रह गईं. प्रोफेसर साब जब तक कुछ समझ और बोल पाते उससे पहले ही प्रेम ने उन्हें दो थप्पड़ रशीद कर दिया. मालिनी ज्योंहि वहां से हिलने की कोशिश की प्रेम ने उनकी चोटी कसकर खींची और कुर्सी में लाकर पटक दिया. कहता रहा- “अरे रंडी! तेरी शादी नहीं हो रही थी जो इस चौधरी के लिए मर रही थी? तेरे बाप की औकात नहीं थी तेरी शादी कराने की जो इस नीच के साथ जाति भ्रष्ट कर ली और मेरी भी कर दी? आज तो तू उससे भी अधिक गुनाहगार लग रही है...” वह उसे दांत पर दांत चढ़ा कर एक से एक भद्दी गालियाँ देता रहा. लगा जैसे कोई शीशे को खौलाकर उसकी कानों में उड़ेल रहा हो. और प्रेम अपनी जनेऊ खींच, दोनों हाथों को जोड़े सौगंध खाता रहा कि वह अब शिवानी को एक पल के लिए भी अपने पास नहीं रखेगा. वह उसे तलाक दे देगा. तलाक शब्द सुनते ही मालिनी की आँखें बंद हो गईं और आंसू उसके आंखों के कोरों से बहने लगी. वह अब क्या बोल रहा था? कुछ भी उसे सुनाई नहीं पड़ रही थी. अंत में प्रेम अपने अंदर का सारा जहर उगलने के बाद शांत पड़ गया. सोफा में धंसकर बैठते हुए, मालिनी को ही आदेश देते हुए बोला – “प्यास लगी है. पानी पिलाओ.” मालिनी धीमी कदमों से उठी और एक प्लेट में मिठाई और एक गिलास में पानी लेकर सामने टेबल पर रख दी. पानी तो पी लिया लेकिन मिठाई की प्लेट को छुआ तक नहीं. और कुटिल मुस्कान के साथ उसने कहा- “आज धोखा नहीं दी होती! तो शायद ऐसा दिन देखने को नहीं मिलता. सोचा था तुम्हें कभी बेटे की कमी महसूस होने नहीं दूँगा. तुम्हें एक बेटे से भी बढकर मानूंगा लेकिन तुमने वह हक खो दिया. कितना आश्चर्य है कि तुमने इस दलित चौधरी को सामंती चौधरी बनाकर मेरे घर में घुसा दिया. तुम्हें रत्तीभर भी शर्म नहीं आई..... खैर, आज से हमलोगों का रिश्ता खत्म. मान लूँगा कि शिवानी मेरे लिए मर गई. यूं भी मेरे घर में अब उसका सामंजस्य संभव नहीं है. जल्द ही मैं तलाक के पेपर भिजवा दूँगा. तुमलोग भी शांति से रहो और मैं भी.”
प्रोफेसर चौधरी से मुखातिब हो– “प्रोफेसर साब! जिंदगी और राजनीति में बहुत बड़ा फर्क होता है. लेकिन स्वार्थी लोगों के दिमाग में ये बात आती कहां हैं? झूठ-फरेब पर खड़ा रिश्ता ज्यादे समय टिकता ही कहां है? आप अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन मेरी अंतरात्मा इसे कबूल नहीं करती है. रिश्ते का आखिरी प्रणाम!” कहते हुए उसने हाथ जोड़ दिया और चुपचाप वहां से हमेशा हमेशा के लिए फिर न कभी लौटने के वादे के साथ चला गया. मालिनी और प्रोफेसर चौधरी दरवाजे से उनकों जाते देखते रह गए. लगा जैसे बहुत कुछ समाप्त हो गया. हाथ से कुछ निकलता जा रहा है. रोकने की इच्छा होने के बाबजूद वे रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. तब से मालिनी कुर्सी में जो बैठी, तो दिनभर अखबार के उस खबर को ही देखती रही जिसमें प्रोफेसर चौधरी को पासी जाति के आधार पर विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने की बात छपी थी.





गुरुवार, 14 सितंबर 2017

लौकिक सीता का मानवीय स्वरूप है आशा प्रभात की मैं जनक नंदिनी: सुशील कुमार भारद्वाज

लौकिक सीता का मानवीय स्वरूप है आशा प्रभात की मैं जनक नंदिनी
सुशील कुमार भारद्वाज






इन दिनों जिन किताबों को मैंने पढ़ा, उनमें से एक है – आशा प्रभात की कृति “मैं जनक नंदिनी”. आशा प्रभात ने इस उपन्यास में सीता के दृष्टिकोण से सीता के जन्म से अंतकाल तक की लगभग सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को जिस मानवीय एवं लौकिक धरातल पर तर्क के साथ तेंतालीस अध्यायों में प्रस्तुत करने की सफल कोशिश की है वह काबिलेगौर है.

रामायण के विभिन्न पात्रों की ही तरह सीता पर केंद्रित अनेक किताबें पहले भी लिखीं गईं हैं लेकिन अधिकांश में उन्हें राम की अर्धांगिनी के रूप में प्रस्तुत किया गया है या फिर लक्ष्मी के अवतार के रूप में. दूसरे शब्दों में कहें तो वहां भक्ति और श्रद्धा की भावना प्रबल थी जिसकी वजह से उनके सुख-दुःख को महज एक लीला मानकर सहजता के साथ स्वीकार कर लिया गया. सीता के मौन को आज्ञाकारिणी के रूप में प्रस्तुत किया गया. श्रीराम को मर्यादापुरुषोत्तम करार देने के लिए धर्म के नाम पर किए गए अव्यवहारिक कार्य में सीता के प्रतिरोधी स्वर को गौण कर दिया गया. और राम के हर निर्णय में अविवेकी रूप से उनकी सहभागिता और समर्थन मान लिया गया. मर्यादा पुरुषोत्तम राम के निर्णय पर अंगुली उठाना भी इतना आसान नहीं. लेकिन बहुत कम लोगों ने सीता को एक इंसान के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. जिसके अपने दर्द थे. जिसके अंदर भी कोमल भावनाएँ थीं. जो हर सुख-दुःख में मचलती थी. भटकती थी. और फिर नियंत्रित कर ली जाती थी. लोक समाज के अनुरूप व्यवहार करती थी. जिसमें उसका स्वाभिमान भी थक कर आहत होता था. लेकिन वह झुकती नहीं थी. वह याचक बनने की बजाय लव-कुश को अयोध्यनरेश के हवाले कर न सिर्फ अपने पति का परित्याग करती है बल्कि खुद को भी इस मृत्युलोक से स्वतंत्र कर लेती है. एक आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी, आदर्श बहू और यथासंभव एक आदर्श माँ बनकर एक आदर्श स्त्री के प्रतिमान को स्थापित करने की कोशिश करती है. युगानुरूप स्त्री मुक्ति का द्वार खोलती है.

आशा प्रभात ने अपनी लेखनी से सीता के आचरण, त्याग, स्वाभिमान, कर्तव्य, पराक्रम और चारित्रिक गुणों को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश की है. साथ-ही-साथ उन्होंने इस उपन्यास में कौशल्या, तारा और मंदोदरी आदि के सहारे विभिन्न राजघरानों की तत्कालीन स्त्रियों के दुःख-दर्द और सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश की है तो जंगल में रह रहीं वन-वासिनों के सहारे सामान्य जीवन में स्त्रियों की शक्ति और परिस्थिति को भी.


आशा प्रभात

उपन्यासकार ने हनुमान के समुद्र पार कर लंका पहुंचने की घटना को जिस व्यावहारिक तर्क के साथ प्रस्तुत किया है उसी तर्क के साथ वनवास मिलने पर राम के दक्षिण दिशा की ओर रूख करने और जंगलों में रह रहे ऋषि-मुनियों एवं वनवासियों की समस्याओं को दूर करते हुए एकछत्र राज्य हेतु साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को भी.
आशा प्रभात ने सीता को एक सामान्य स्त्री के रूप में विभिन्न मनोभावों के साथ मानवीय गुणों एवं अवगुणों के आवरण में प्रस्तुत किया है. साथ ही उन्होंने जहां मिथिला के ऐतिहासिक सांस्कृतिक गौरव को उकेरने की कोशिश की है वहीं रामायण के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से तत्कालीन देशकाल को भी दिखाने की कोशिश की है. लेकिन इसे पूर्ण रामायण नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह न सिर्फ सीता के दृष्टि से लिखी गई है बल्कि सामान्यतौर पर रामायण के उन्हीं प्रसंगों को लिया गया है जिसमें सीता की सहभागिता रही है. यहां तक की सीता के मौत के साथ ही किताब भी समाप्त हो जाती है.

कायाप्रवेश के अंदाज में सीता को आत्मसात कर उसके सघन एवं सूक्ष्म भावना को जिस सहजता और धैर्य के साथ प्रस्तुत किया गया है उससे इस कृति के पीछे उपन्यासकार का किया गया श्रम स्पष्ट परिलक्षित होता है. उपन्यास की घटनाएं जितनी रामायण सम्मत हैं इसकी भाषा उतनी ही संस्कृतनिष्ठ है. तत्सम शब्दों की अधिकता की वजह से उपन्यास जितना भी स्तरीय या गंभीर दिखे लेकिन यह पठनीयता में न ही कहीं बाधक है ना ही यह कहीं बोरियत का एहसास कराती है. लेकिन कहीं-कहीं ऐसा जरूर महसूस होता है कि कुछ घटनाओं को थोड़ी हडबडी के साथ समेट दिया गया जबकि वहां भी यथोचित उदारता की जरूरत थी. अलौकिक कथा को लौकिक कथा के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है लेकिन संवाद में कहीं भी क्षेत्रीय भाषा अर्थात देशकाल के अनुरूप लोकभाषा का प्रयोग दिखाई नहीं देती है जो स्वाभाविकता की क्षति है.

पुस्तक :- मैं जनक नंदिनी
रचनाकार :- आशा प्रभात
प्रकाशक :- राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ :-320
मूल्य :- 299
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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ (पदचाप के साथ-शंकरानंद): राजकिशोर राजन

अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ
(पदचाप के साथ-शंकरानंद) : राजकिशोर राजन
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शंकरानंद एक प्रतिभावान युवा कवि हैं।उनकी पहली कवितासंग्रह 'दूसरे दिन के लिए' भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से प्रकाशित हुई।'पदचाप के साथ' उनका दूसरा काव्यसंग्रह है जो बोधि प्रकाशन से आई है।इस संग्रह को कई कई बार पलटा,कई कई बार पढ़ा और यह विश्वास गहरा होता गया की शंकरानंद अंतर्वस्तु और शिल्प के मामले में हमें निरंतर प्रभावित करते हैं और कई बार तो चकित कर देते हैं। शब्दों की मितव्ययिता और गहन भावबोध लिए इनकी कविताएँ ऐसी हैं जिन पर इस कवि के हस्ताक्षर हैं।इधर हिंदी में समकालीन और समकालीनता आदि पर जो बहस छिड़ी हुई है तथा भाषा,कहन,चेतना आदि को खंगाला जा रहा है तब पता चल रहा है कि वर्तमान में लिखना ही समकालीन होना नहीं है।आज मुहावरे और अंतर्वस्तु के मामले में भी कई कवि विगत हैं।शब्द और विषय इतने घिसे पिटे की अधिकांश कविताओं से कवि गायब हैं यानी कविता पर कवि का अपना हस्ताक्षर ही नहीं है।कहने का तात्पर्य यह की कविता में मौलिकता ही गायब है जो किसी कविता को कविता बनाने के लिए प्राथमिक कारक है।गौरतलब है कि वक्त के साथ समाज की भाषा भी बदली है और जनता से जुड़ा कवि उस भाषा से सायास नहीं जुड़ता वह उसी में साँस लेता है।मान बहादुर सिंह ने सही कहा है कि भाषा ,कविता का डी एन ए है और वह भाषा ही है जिससे हम कवि के संसार के बारे में जान सकते हैं।शंकरानंद की काव्यभाषा और काव्यचेतना समकालीन है।समय के साथ होना एक कवि के लिए बुनियादी शर्त है,बाकी शर्तें इसके बाद हैं।इस कवि की भाषा में बलात् और सायास पच्चीकारी नहीं है, देसज शब्दों की बहुलता है न तत्सम शब्दों की,ज्यादा से ज्यादा उसने तद्भव को साधा  है।लड़कियां(पृ.107)शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखें--

कहीं तो जरूर है वसंत
जिसके कारण घर चहक रहा है

इसी प्रकार की भाषा को कवि ने अपनी कविताओं में साधा है जिसमें न ज्यादा चाक चिक्य है,न उलझाव और न असहजता।सधी और कसी हुई भाषा जरूर है  पर इतनी भी नहीं जैसे नट टंगी हुई रस्सी पर करतब दिखाता है।इस स्वभाव के कारण ही कविताएँ संप्रेषित होती हैं और अमूर्तन का शिकार होने से अपने को बचा लेती हैं।इन दिनों यह प्रचलन में है कि कई कवि सायास शब्दों का पहाड़ खड़ा करते हैं और आप बारम्बार उस पहाड़ पर चढ़ें और उतरें पर कविता कामिनी के दर्शन न होने हैं।और अंत में वही होता है,आप आगे बढ़ जाते हैं।यहाँ सिर्फ कवि नहीं चुकता ,कविता भी एक मौका खो देती है।शंकरानंद की कविताएँ भाषा में कैद हो कर नहीं रहतीं अपितु वे भाषा का अतिक्रमण करती हैं।संग्रह की एक कविता है'बन रहा है(प,101)यह कविता दरअसल ,हर पल परिवर्तन के परम् सत्य को रेखांकित करती है।हर पल कुछ बन रहा है,कुछ नष्ट हो रहा है परंतु जीवन है कि पुनर्नवा हो रहा है।यानी परिवर्तन के बीच भी एक अनुशासन है,व्यवस्था है जो अपना काम कर रही है-----

कोई आकाश बना रहा है
कोई पंख
कहीं धूप पक रही है
कहीं गल रही है रात
कोई पत्थर को पानी बनाता है
कोई राख को चिंगारी

जीवन की तमाम उलझनों,दुःख दर्द और नाउम्मिदियों के बीच भी
कवि उम्मीद की रेख देख पाता है।यथार्थ को पहचानने और कविता में ढालने के लिए जो समझदारी और हुनर की जरुरत पड़ती है उसे साधने में कवि निरंतर सचेष्ट है।अपने तेवर और कहन में उसकी कविता समकालीन कविता की अभ्यस्त सरंचना के अंतर्गत है।इसके दो परिणाम हुए हैं-प्रथम, की कवि शब्दों को साधने और मितव्ययिता बरतने में काफी हद तक सफल हुआ है।इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में शंकरानंद ने भाषिक प्रयोग के मामले में  जिस संयम और अनुशासन का परिचय दिया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए और कवि से हमारी उम्मीदें बढ़ जाती है।एक कविता (फूंकना,प-112)का उदाहरण लिया जा सकता है----

लौ जल रही थी दीये की
उसे बुझाना था

वह फूंक रहा था बार बार
लेकिन लौ जलती रही
दीया अपलक था

इस कविता में लौ को बुझाने के लिए यानी हमारी उम्मीदों,आशाओं को बुझानें के लिए निरंतर कोशिशें होती रहीं परंतु लौ जो मनुष्य की जिजीविषा  का प्रतीक है,जीवन का पर्याय है उसे कोई बुझा न सका, सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए ।लौ जलती रही ,दीया अपलक रहा।अगर उम्मीद न रहे तो फिर बचेगा क्या!यह कविता बड़े सलीके से नपे तुले शब्दों में मनुष्य की आदिम कथा कहती है।हर कवि के पास कुछ विलक्षणता होनी चाहिए और जब आप इस कवि की कविताओं की यात्रा करेंगे तो इसे सहज ही रेखांकित कर सकते हैं।पर,यही मितकथन और शिल्प सजगता कई बार किसी कवि की सीमा भी हो जाती है।इस संग्रह में  कुछ कविताएँ उसी शिल्प सजगता के कारण कमजोर और प्रभावहीन भी हो गयी हैं।क्योंकि शिल्प कविता में शिल्पहीनता की हद तक बारीक भी हो सकती हैं और इतना भारी कि कविता उसके  नीचे दब कर रह जाए।

           इन दिनों हिंदी कविता में गांव की उपस्थिति निरंतर कमजोर होती जा रही है और यदा कदा जो गाँव दीखता भी है वह सतही है।गांव के भीतर भी गांव होता है जैसे शहर के भीतर शहर। शंकरानंद की कविताओं में जो गांव है वह वास्तविक गांव है।आमतौर पर गांव के चरित्र को समझे बिना हम गांव की बात करते हैं।आज बड़े शहरों में रहने वाले कवि,लेखक भी गांव जाते हैं पर एक पर्यटक की तरह।उनका गाँव नकली होता है उनका ग्रामीण बोध अवास्तविक होता है।कवि स्वयं बिहार के कोसी क्षेत्र का निवासी है इसीलिए वह गांव के भीतर गांव को देखता है।सिर्फ देखता ही नहीं वह जीता भी है।इस संग्रह में कई कविताओं की पृष्ठभूमि गांव है।'जिद'कविता  अपने टटके बिम्बों के साथ मनुष्य की अदम्य इच्छा,जिजीविषा और अंतत उसके जीने के लिए जिद को  जिस ताकत के साथ उठाती है वह कविता को  अंततः  पुनर्नवा करती है।यहां वही चिरकालिक दुःख और अभाव है जिसने जीवन को ताकत दी है-

जो कांच धूप रोकती थी
उसे एक बच्चे  ने पत्थर मार कर तोड़ दिया

आज इस देश में किसान और किसानी की स्थिति हृदयविदारक है,किसान मर रहे हैं और पूरा देश मर्सिया गा रहा है।पोखर,तालाब,कुएं सभी सूख रहे हैं।ऐसा लगता है कि इस देश को अब इनकी जरुरत नहीं रह गयी है।अमेरिकी आवारा पूंजी  जब एक तरफ सब कुछ तहस नहस करती जा रही है हम जात पात और धर्म की राजनीति में जी रहे हैं।यह कैसी विडम्बना है कि अन्नदाता किसान अब स्वयं अन्न के लिए बड़े बड़े शहरों की तरफ भाग रहा है।आप कभी जनसेवा एक्सप्रेस में बैठ कर देखिये यह देश किधर जा रहा है।शंकरानंद की 'भाव'नामक कविता बड़ी संजीदगी से उस करुण दृश्य को शब्दों के माध्यम से जीवंत करती है------

सबसे सस्ता खेत सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज सबसे सस्ती फसल
और उससे भी बढ़ कर भी सस्ता किसान

और यह भी की-
जिसके मरने से  किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फांसी नहीं होती

शंकरानंद की ऐसी कविताओं में जो बिम्ब उभरता है वह भरोसे को भरोसा देता है।कवि का यह परिवेश उसे जीवन देता है।कविता को जीवन जैसे कवि के जीवन देता है।शंकरानंद की इन कविताओं को पढ़ते त्रिलोचन की याद हो आती है जब वे कहते हैं-
जीवन जिस धरती का कविता भी उसकी
सूक्ष्म सत्य है,तप है,नहीं चाय की चुस्की

यह कवि कविता  में कागज की लेखी नहीं लिखता बल्कि आँखिन देखी लिखता है।किसी कवि को समझने के लिए भाषा और बिम्ब महत्वपूर्ण उपकरण हैं।इन दो उपकरणों के आधार पर अगर  कोई इस कवि को समझे तो वह इतना समझ लेगा की यह कवि जमीन से गहराई तक जुड़ा कवि है।उसने अपनी शैली  आप गढ़ी है और उसकी कविताओं में मौलिकता है।उसका अंदाजे बयाँ अलहदा है।

बचपन की बाढ़ की याद

बाढ़ की बात जब भी आती है तो मुझे बचपन की याद आती है। जब मैं ठीक से चलना-बोलना भी नहीं सीख पाया था। जब नाना जी हम सभी को अपने गाँव लेकर चले गए थे बाद में। याद है वह दृश्य जब मेरे आँगन में लबालब पानी हिलोरे मार रहे थे और मैं रसोईघर के सामने दुहार (बरामदे) पर जमीन में लेटे सबकुछ देख रहा था। देख रहा था मछलियों की अठखेलियाँ। साँपों का तेजी से पानी में तैरना। घर तो ऊँचा था इसलिए दुहारी पर पानी चौखट पर लाख सिर पटकने के बाबजूद कभी लाँघ न सका। लेकिन आँगन के बाहर सड़क पर तो नाव चल रही थी। क्या-क्या बह रहे थे ठीक से कुछ याद नहीं पर आदमियों को बहते जरूर देखा। शायद वे तैर भी रहे थे। सबसे अजीब लगता था बँसवाड़ी का नजारा। चारों ओर पानी ही पानी। समतल पानी। बाँस के ऊपरी कुछ हिस्से पानी में जमे से लगते थे। और सबसे अजीब लगता था बरगद का पेड़। लगता था जैसे पानी में उगा कोई झाड़ी हो। सिर्फ और सिर्फ कुछ पत्ते नजर आते थे। रसोईघर के दीवार से सटे में मक्के का  एक बोझा भी रखा था। जिसमें से कभी कभार भूँटा तोड़कर आग में पका कर खाते थे। जब आँगन से पानी निकल गया था तो एक दिन एक हेलीकॉप्टर आँगन में एक बोरी गिरा गया। माँ डरकर घर के अंदर चली गई थी और पड़ोसी बोरिया ले गई। माँ बताई थी कि उसमें चना, चूड़ा, शक्कर, और माचिस, मोमबत्ती आदि सामान थे। ..कितना कुछ याद आता है। लेकिन पटना आने के बाद कभी ढ़ँग से गाँव गया नहीं। बाढ़ की त्रासदी तो अक्सर आई, लेकिन हर बार पटना में ही रहा। पानी निकल जाने पर कभी कभार गया लेकिन याद की बाढ़ बचपन की ही बाढ़ रही।
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सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 30 जुलाई 2017

नामवरसिंह को याद करते पी के पाठक

हाल ही में भारत के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का जन्मदिन था। नामवर सिंह आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गये हैं कि दोस्त और दुश्मन दोनों ही उनकों याद करते हैं। जिन्हें उनका आशीर्वाद मिला वे तो स्वयं को धन्य मानते हैं लेकिन जिन्हें नहीं मिला वे उनके मरने तक की बात करते हैं। जबकि नामवर सिंह कोई कुर्सी नहीं एक आदमी का नाम है। लोग अपनी क्षमता बढ़ा उनके कद का हो सकता है। संभव है उनसे बेहतर भी हो जाएं। लेकिन दुर्भाग्य है कि लोग ईर्ष्यावश उन्हें गाली देने में ही अपना समय और शक्ति लगाते हैं। खैर आइए पढ़ते हैं पुष्पेंद्र कुमार पाठक का संस्मरण।


श्री मान नामवर महाशय को कई बार सुनने को मिला। बीएचयू मे यदा-कदा सेमिनार का आयोजन और नामवर जी स्टार वक्ता के तौर पर जाने जाते थे। बीएचयू परंपरागत रूप से भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का प्रवाह स्थल रहा है। ऐसे प्रवाहमान सांस्कृतिक लहर मे तथाकथित प्रगतिशीलता के कंकड़-पत्थर फेंकने की वामपंथी बुद्धि तो कूट कूट कर भरी थी हमारे पूज्य गुरूवर में। उपर से काशी विश्वनाथ की नगरी। अगर वहां जाकर अगर मुहम्मद गोरी, गजनवी, बाबर,औरंगजेब और वो सभी आक्रांता जिन्होंने भारत की अस्मिता को तार तार किया, उनकी तारीफ की जाए, उनमे अच्छाइयों का दर्शन निर्लज्जता पूर्वक किया जाए तो मशहूर होने के चांसेज ज्यादा हैं। गुरूजी को पता नही कहां से मुगलो की खनकती तलवार मे हिन्दुओ की आर्तनाद की जगह लोकधुन सुनाई देता था। सारांश यह कि गुरु नामवर जी को बोलने के लिए कोई भी टाॅपिक दिया जाता उसमे अमेरिका, आरएसएस, ब्राह्मणवाद विलेन बनकर उभर आते। हां भारत की बहुलतावादी संस्कृति उनकी प्राथमिक चिंता थी जिसकी रक्षा बिना मुगलिया संस्कृति को पिरोए संभव ही नही थी। आरएसएस के हिन्दुत्व मे गुरूजी को हिन्दुस्तान की एकता खंड खंड मालूम पड़ती थी जिसे बचाने के लिए आइने अकबरी या बाबरनामा को आत्मसात करना परम आवश्यक था।हा, गुरू जी मुस्लिम आक्रांता मे नायकत्व की छवि ढूंढने को उतावले रहते। कभी-कभार तो ढूंढने मे असफल होने पर नई छवि ही गढ़ डालते। इस इरादे के साथ की पढ़ने वाला भारतीय संस्कृति पर इस तरह हमला होता देख धैर्य खोकर अनाप-शनाप बोले और फिर मिडिया मे इसे उग्र हिन्दुत्व के रूप मे पेश करें। फिर खुद को साहित्य मे बोल्ड एक्सपेरिमेंटल के तौर पर स्थापित करने मे आसानी भी होगी। गुरूजी जी वेद, पुराण, उपनिषद्, मानस आदि ग्रंथो का गहन अध्ययन किया है लेकिन उनकी व्याकुलता उस समय देखते ही बनती जब वो इन सभी ग्रंथो मे मुहम्मद साहब का कोई जिक्र न पाते। लगता ये सभी ग्रंथ ही अपूर्ण है और इसके साथ साथ सारा संसार भी। भारतीय वैचारिक धरातल का टेक्टोनिक शिफ्ट हो जाता अगर कही से भी हनुमान जी या कृष्ण जी हिन्दुत्व की किताब से न होकर किसी अरबी संस्कृति का कोई नाम होता फिर तो सेक्युलरिज्म और गंगा जमुनी तहजीब  (पता नही इस का उच्चारण गुरु जी बारंबार क्यो  करते थे।) का कुछ अलग ही रंग होता। इसका दर्द उनके चेहरे और वाणी से महसूस किया जा सकता था।लेकिन सेक्युलर तब्के को जीवनज्योति की आभा यही मंद पड़ जाती है। उन्हे हिन्दी आलोचना मे वाचन परम्परा का आग्रही नेता माना जाता है। गुरूजी पर श्री काशी विश्वनाथ की कृपा बनी रहे। वे स्वस्थ एवं दीर्घायु हो। यही हम सब की कामना है।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर  

 सुशील कुमार भारद्वाज  

प्रगतिशील लेखक संघ,बिहार के तत्वावधान में आयोजित मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह में जब अधिकांश वक्ता मुक्तिबोध के विभिन्न विचारों एवं रचनाओं को उद्धृत करते हुए समकालीन परिदृश्य में दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार पर निशाना साधते हुए भारत में फासिस्टों के आ जाने और उसके प्रभावों के तांडव को रेखांकित कर रहे थे. बाजारवाद और अस्मिता की चर्चा कर रहे थे. तब अध्यक्षीय भाषण देने के लिए उठे पटना के वयोवृद्ध आलोचक व प्रलेस के पूर्व महासचिव खगेन्द्र ठाकुर एक अलग रूप में दिखे. ससमय अध्यक्षीय वक्ता के रूप आमंत्रित होने की सूचना नहीं मिलने की नाराजगी उन्होंने मंच पर ही जाहिर कर दी. और उसके बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं भी मुक्तिबोध की तरह नेहरू के विचारों से पहले सहमत नहीं था. लेकिन जिस तरह अक्सर नेहरू की खबर रखते हुए अंत समय में मुक्तिबोध कहने लगे थे कि “नेहरू के बाद फासिस्ट आ जाएगा. इसलिए नेहरू का होना जरूरी है”. वैसे ही आज मैं भी मानता हूं कि नेहरू अच्छे थे उनके जाने के बाद फासिस्ट का खतरा है. और यह भी सच है कि आज वे सत्ता में आ गए हैं लेकिन अभी तक फासिज्म आया नहीं है. और इसके लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेवार है. जब-जब वामपंथ कमजोर होता है जनतंत्र कमजोर होता है. आगे उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को समझना कठिन है. रामविलास शर्मा जो उन्हें वाम और दक्षिण अवसरवाद का जंक्शन मानते थे और नामवर सिंह जो उन्हें 'अस्मिता की खोज'वाला कवि कहते हैं. इन दोनों ने ही इनका मूल्यांकन गलत किया है. ‘जिस तरह उनकी कविता ‘अंधेरे में’ को पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है. जितना उनके व्यक्तित्व का बखान किया जा रहा है. उतना वे हैं नहीं. सबसे बड़े कवि के रूप में नागार्जुन हैं. और मुक्तिबोध से कई मायने में बेहतर और जनवादी कवि हैं. मुक्तिबोध की कविता का 'अंधेरा'पूंजीवाद का अंधेरा है जो दिखाई नहीं देता इस कारण वो खतरनाक है. लोगों को सामंती फासीवाद दिखता है जबकि पूँजीवादी फासीवाद सबसे खतरनाक है.”  आगे उन्होंने कहा कि “मुक्तिबोध ने किताबों पर जो आलोचना प्रस्तुत की है वह उन्हें कुछ हद तक अलग बनाता है.”


खगेन्द्र ठाकुर की बातों का जबाब दूसरे सत्र में आलोक धन्वा ने देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि कोई भी कवि छोटा या बड़ा नहीं होता है. जिसने एक भी कविता की वह कवि है. कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे किसी को छोटा और किसी को बड़ा कहा जा सके. मुक्तिबोध ने भी नागार्जुन की तरह जीवन में कई कष्ट देखे. बहुत संघर्ष किए. कोई भी महान कवि यूं ही नहीं बन जाता है. वह अपने परिवेश और पहले से मिले चीजों से भी बहुत कुछ सीखता है. मैंने तो मुक्तिबोध और नागार्जुन  दोनों से ही सीखा है. जिस जमीन को निराला ने तैयार किया उसी को मुक्तिबोध ने आगे बढ़ाया. यदि निराला नहीं होते तो मुक्तिबोध भी नहीं होते.’


दूसरे सत्र 'मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलताको संबोधित करते प्रख्यात कवि आलोकधन्वा  ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा "एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा 'मुक्तिबोध'. मुक्तिबोध एक लाइट हाउस की तरह से थे." आलोकधन्वा ने आगे कहा "मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे. यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता. जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता. मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया जो उन्हें विजातीय बनाता है. जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता. मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे." 



मुक्तिबोध की कहानी क्लाइड इथरलीपक्षी और दीमकका जिक्र करते हुए चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा "मुक्तिबोध कहते हैं कि इस देश के हर नगर में एक अमेरिका है. ये कहानियां बाजारवाद पर चोट करती है. मुक्तिबोध साम्राज्यवादपूंजीवाद के खतरों को बखूबी समझते थे."
संस्कृकर्मी अनीश अंकुर ने कहा " मुक्तिबोध ने घर-परिवार की बदहाली के राजनीतिक श्रोत को तलाशने की बात की. उन्होंने हमेशा राज्य को अपने निशाने पर रखा. भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के 'रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध होने की परिघटना की गहरी समझ से उन्होंने साठ के दशक में ही उस खतरनाक संभावना को पहचान  लिया था जो  समकालीन परिदृश्य में भयावह  ढंग से साकार हो गई प्रतीत होती है. इससे कैसे लड़ा जाएइसके लिए एक लेखक को अपने व्यक्तिवादी सीमाओं का अतिक्रमण कर सर्वहारा के संघर्ष में शामिल होनेउस स्तर की वैचारिक तैयारी के युगीन कार्यभार को उठाना चाहिए."

  पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर व आलोचक  तरुण कुमार ने कहा " मुक्तिबोध की पंक्ति 'तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब'. सरकार पोषित प्रतिक्रियावादियीं के अड्डे बगैर इनके ढाहे काम नहीं चलेगा. कुछ गढ़मठ वो भी है जिनके बीच हम काम कर रहे हैं. हमारे बीच अवसरवादी और संस्कारी रुझानों के भी गढ़ को तोड़ना है. मुक्तिबोध को सिर्फ मार्क्सवादी आलोचना के औजारों से नही समझा जा सकता. " तरुण कुमार ने  प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और मुक्तिबोध के बीच के पत्र सन्दर्भ का उदाहरण देते हुए कहा " प्रगतिशील लेखन के बीच नए संदर्भो में बदलाव आना चाहिए.  लेखकों पर  प्रहार ज्यादा  हुआ जबकि उनकी विचारधारा पर  आक्रमण होना चाहिए था. "  
 प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने'मुक्तिबोध जन्मशताब्दी  समारोह  के प्रथम सत्र मेंसमकालीन परिदृश्य और मुक्तिबोध'  को संबोधित करते हुए कहा कि “मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय लोगों से ये आग्रह किया कि अपनी सीमाओं से आगे जाकर जनता के संघर्ष में व्यापक रूप से  शामिल हों. मुक्तिबोध वैसे लेखक नहीं थे जो सृजनात्मक कार्यों में ही सिर्फ लगे रहे. वे संगठनात्मक कामों में भी भाग लिया करते थे. प्रगतिशील लेखक संघ की उज्जैन यूनिट की इन्होंने स्थापना की. 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया जिसका राहुल सांकृत्यायन ने उद्घाटन किया था.” बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष ब्रज कुमार पांडे ने  समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विषय प्रवेश किया " समकालीन वक्त में पूरे देश में फासीवादी खतरा है. जिसका नृशंस स्वरूप  हिटलर की आतताई  सत्ता में दिखती है. उस सत्ता का मुकाबला समाजवादी सोवियत संघ ने स्तालिन के नेतृत्व में किया  और उसे पराजित किया. आज भारत को उस महान लड़ाई से सबक सीखना  चाहिए. मुक्तिबोध हमें उसमें हमारी सहायता करते हैं. " जन संस्कृति मंच के सुधीर सुमन ने कहा " अभावों के बीच बहुसंख्यक  जनता का जो संघर्ष है उसमें अपने सवालों को शामिल करने की बात मुक्तिबोध किया करते थे. धारा के प्रतिकूल किस तरह जिया सकता हैएक सार्थकताएक जिद के उदाहरण हैं मुक्तिबोध. संवादों के जरिये निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति हमें मुक्तिबोध सिखाते हैं.” चर्चित कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार  ने परिवारभाषासमाज  से उनके अलगाव का जिक्र करते हुए कहा " मुक्तिबोध का बाह्य और अंतर जगत से संघर्ष बेहद बीहड़ था. मुक्तिबोध जैसी अदम्य जिज्ञासा दूसरी जगह नही मिलता. उनका युगबोध इतना व्यापक थाऐसी स्थितियां बनाई जिससे हमशा उनके जीवन मे तनाव रहता है. सरकारी नौकरी से इनकार,  कविता लिखना व प्रेम इन सब उनके फैसलों को भी  देखना होगा मुक्तिबोध को समझने के लिए. अपने ही अचेतन में इंडिस्कोप डालकर उसे निहारते का काम करने का काम मुक्तिबोध करते थे." 
कवि रमेश ऋतंभर ने अपना कहा "मुक्तिबोध जागने और रोने वाले कवि हैं. समय के,यथार्थ से जलने वाले कवि थे. आत्म भर्त्सना के कवि थे. रूढ़िवादी वादी स्मृतियों से वे लगातार लड़ता है. बेटे को  नौकरी भी लग जाये,पुरस्कार भी मिल जाये और बड़ी कविता भी लिख लें ऐसा नही हो सकता. चुनौती देने वाला कवि है मुक्तिबोध. कविता लिखने के लिए जलना पड़ता हैगलाना पड़ता है." 
प्रलेस के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय  के अनुसार "एक तरफ सुविधाएं हैं दूसरी तरफ  संघर्ष है.  मध्यमवर्गीय बुद्धजीवी का संघर्षकैसे मार्शल ला लग जाता है. मुक्तिबोध  के अंतःकरण का आयतन  बेहद विस्तृत है. प्रगतिवादी कविता को समाप्त करने की साजिश को वे बखूबी पहचान गए थे. वे यांत्रिक नहीं थे.”  दूसरे सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर ने कहा "रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे महत्वपूर्ण आलोचक मुक्तिबोध को मैं मानता हूं. सबसे अधिक उन्होंने लेखक के आत्मसंघर्ष की बात उठाई."

प्रथम सत्र को डॉ श्री राम तिवारीडॉ सुनीता कुमारी  गुप्तासंजीवसीताराम प्रभंजन आदि ने संबोधित किया. संचालन प्रलेस के  प्रदेश महासचिव रवींद्र नाथ राय ने किया. जबकि दूसरे सत्र को परमाणु कुमार,शशांक शेखर ,  रवींद्र नाथ राय ने भी संबोधित किया. संचालन  कवयित्री  पूनम सिंह ने किया.